मेरा घर सचमुच किसी स्वर्ग से कम नहीं है

“तुम कहते हो कि वो चिड़चिड़ी हो गई है? ज़रा सोचो, जिस लड़की को तुम शादी से पहले रेस्टोरेंट, सिनेमा और पार्क में घुमाते थे, पत्नी बनने के बाद तुम उसे कहां ले जाते हो? रिश्तेदारी की शादियों में जहां उसे घूंघट निकालकर सबकी जी-हुज़ूरी करनी होती है, मुंडन में, पूजा-पाठ में, या फिर किसी बीमार रिश्तेदार की तीमारदारी करने। तुमने उसके कंधों पर पूरे परिवार की, बच्चों की, और तुम्हारे समाज की इतनी ज़िम्मेदारियां डाल दी हैं, और फिर तुम उम्मीद करते हो कि वो चौबीस घंटे मेकअप करके तुम्हारे सामने मुस्कुराती रहे?”

सर्दियों की एक खुशनुमा शाम थी। शहर की भीड़भाड़ से दूर, देवराज के फार्महाउस पर कॉलेज के पुराने दोस्तों का एक मिलन समारोह रखा गया था। सालों बाद सभी दोस्त अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ इकट्ठा हुए थे। एक तरफ लॉन में बच्चे खेल रहे थे, पत्नियां एक गोल घेरे में बैठकर अपनी गृहस्थी, बच्चों की पढ़ाई और साड़ियों की बातें कर रही थीं, तो दूसरी तरफ अलाव के पास बैठे पति अपने पुराने दिनों को याद कर रहे थे। हंसी-ठिठोली का माहौल था। हवा में भुने हुए टिक्के और कॉफी की महक घुली हुई थी।

तभी बातों-बातों में समीर ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “यार, शादी से पहले और शादी के बाद की ज़िंदगी में ज़मीन-आसमान का फर्क आ जाता है। समझ नहीं आता कि शादी के मंडप में ऐसा कौन सा जादू होता है कि एक हंसती-खिलखिलाती, प्यारी सी गर्लफ्रेंड, रातों-रात एक सख्त और चिड़चिड़ी पत्नी में बदल जाती है।”

समीर की इस बात पर वहां बैठे लगभग सभी दोस्तों ने ठहाका लगाया। रजत, जिसकी शादी को सात साल हो चुके थे, उसने समीर की बात में हामी भरते हुए कहा, “बिल्कुल सही कहा भाई! शादी से पहले मेरी शालिनी को मेरे हर जोक पर हंसी आती थी। हम घंटों फोन पर बातें करते थे। लेकिन आज? आज अगर मैं ऑफिस से थका-हारा आऊं और प्यार से दो बातें करना चाहूं, तो उसे अगले दिन के राशन, बच्चों की फीस और बिजली के बिल की चिंता सताने लगती है। यार, ये भगवान भी ना, गर्लफ्रेंड को इतना मीठा और पत्नी को इतना कड़वा क्यों बनाता है?”

अलाव के पास बैठे सभी दोस्त अपनी-अपनी पत्नियों की ‘खड़ूस’ आदतों की लिस्ट बनाने लगे। उनकी आवाज़ें थोड़ी तेज़ हो गई थीं, जिससे कुछ दूरी पर बैठी उनकी पत्नियों के कानों में भी ये बातें पड़ने लगीं। शालिनी, समीर की पत्नी स्वाति, और बाकी सभी के चेहरों पर एक अजीब सी उदासी और खामोशी छा गई। वे मन ही मन आहत थीं, लेकिन उस महफिल में तमाशा नहीं करना चाहती थीं।

उन सभी दोस्तों के बीच एक शख्स बड़ी शांति से बैठा अपनी कॉफी पी रहा था—आलोक। आलोक हमेशा से ही समूह का सबसे समझदार और सुलझा हुआ इंसान माना जाता था। उसकी पत्नी गरिमा भी वहीं पास में खड़ी ये सब सुन रही थी। शालिनी ने दूर से ही आलोक की तरफ एक उम्मीद भरी नज़र से देखा, मानो कह रही हो कि क्या हमारी कोई कीमत नहीं?

आलोक ने अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखा, गले को साफ किया और मुस्कुराते हुए रजत और समीर की तरफ देखा। “तो मेरे प्यारे दोस्तों,” आलोक की गंभीर लेकिन शांत आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया, “तुम सबको भगवान से बस यही शिकायत है ना कि उसने प्रेमिका को इतना स्वीट और पत्नी को इतना चिड़चिड़ा क्यों बनाया? तो फिर आज एक सच सुन लो।”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। आलोक ने अलाव की आग को थोड़ा कुरेदा और बोलना शुरू किया, “शादी से पहले की बात याद करो रजत। जब शालिनी तुम्हारी गर्लफ्रेंड थी, तब तुम उसे खुश करने के लिए क्या-कुछ नहीं करते थे। अपनी पॉकेट मनी बचाकर, दोस्तों से बाइक उधार मांगकर, तुम उसे शहर के सबसे महंगे कैफे में ले जाते थे। उसके एक बार कहने पर तुम तपती धूप में उसके कॉलेज के बाहर दो-दो घंटे उसका इंतज़ार करते थे। लेकिन शादी के बाद क्या हुआ? आज अगर शालिनी को तैयार होने में पंद्रह मिनट ज़्यादा लग जाएं, तो तुम कार का हॉर्न बजा-बजाकर पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लेते हो। तुम्हारे पास उसके लिए इंतज़ार करने का वो धैर्य कहां चला गया?”

समीर की तरफ मुड़ते हुए आलोक ने कहा, “तुम अपनी लॉन्ग ड्राइव्स को याद कर रहे थे ना? शादी से पहले ज़रा सी बारिश होती थी, तो तुम अपनी प्रेमिका को लॉन्ग ड्राइव पर ले जाने के बहाने ढूंढते थे। अब जब तुम्हारे पास अपनी खुद की बड़ी गाड़ी है, अच्छा बैंक बैलेंस है, तो बारिश होने पर तुम्हें लॉन्ग ड्राइव याद नहीं आती, बल्कि तुम सोफे पर पसर कर पत्नी से कहते हो कि जल्दी से गरमा-गरम चाय और पकौड़े ले आओ। क्या कभी तुमने बारिश में उसका हाथ पकड़कर कहा है कि चलो, आज घर का काम छोड़ो, मैं तुम्हें घुमा कर लाता हूं?”

पत्नियों के समूह में अब एक सुकून भरी खामोशी थी। वे सभी आलोक की बातों को दिल से महसूस कर रही थीं।

आलोक ने अपनी बात जारी रखी, “शादी से पहले अगर प्रेमिका किसी बात पर रूठ जाए, तो तुम 90 के दशक के किसी बॉलीवुड हीरो की तरह शायरी करते थे, उसके आगे-पीछे घूमते थे, उसे मनाने के लिए सौ जतन करते थे। ‘चलो फिर से वही अंदाज़-ए-बयां ढूंढ लाएं, उन रूठी हुई आँखों में वही पुराना जहान ढूंढ लाएं…’ ऐसे डायलॉग्स मारते थे। लेकिन आज? आज अगर पत्नी दिन भर की थकान से चूर होकर, तुम्हारी किसी बात पर नाराज़ हो जाए या तुम्हारी किसी इच्छा को मना कर दे, तो तुम्हारे पौरुष और तुम्हारे ईगो को इतनी ठेस पहुंचती है कि तुम तीन दिन तक उससे बात नहीं करते। सुबह तक मुंह फुलाए घूमते हो।”

“तुम कहते हो कि वो चिड़चिड़ी हो गई है? ज़रा सोचो, जिस लड़की को तुम शादी से पहले रेस्टोरेंट, सिनेमा और पार्क में घुमाते थे, पत्नी बनने के बाद तुम उसे कहां ले जाते हो? रिश्तेदारी की शादियों में जहां उसे घूंघट निकालकर सबकी जी-हुज़ूरी करनी होती है, मुंडन में, पूजा-पाठ में, या फिर किसी बीमार रिश्तेदार की तीमारदारी करने। तुमने उसके कंधों पर पूरे परिवार की, बच्चों की, और तुम्हारे समाज की इतनी ज़िम्मेदारियां डाल दी हैं, और फिर तुम उम्मीद करते हो कि वो चौबीस घंटे मेकअप करके तुम्हारे सामने मुस्कुराती रहे?”

रजत और समीर की नज़रें अब ज़मीन पर झुकी हुई थीं। अलाव की गर्माहट से ज़्यादा आलोक के शब्दों की तपिश ने उन्हें झकझोर दिया था।

“मेरे भाइयों,” आलोक ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “तुम्हारी पत्नी वही लड़की है जिससे तुमने कभी बेइंतहा प्यार किया था। बस फर्क इतना है कि प्रेमिका के रूप में उसे सिर्फ तुम्हारे लिए सजना-संवरना था, लेकिन पत्नी के रूप में उसे तुम्हारे पूरे घर को संवारना पड़ता है। तुमने कभी अपने माता-पिता के लिए रात-रात भर जागकर सेवा नहीं की होगी, लेकिन तुम चाहते हो कि वो तुम्हारे परिवार के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दे। दिन भर मशीन की तरह काम करने के बाद भी, अगर वो तुम्हारे ऑफिस से आने पर एक गिलास पानी देने में दो मिनट की देरी कर दे, तो तुम्हें लगता है कि वो बदल गई है। अरे, वो नहीं बदली है, तुम्हारा नज़रिया बदल गया है। अगर किसी से प्यार और सम्मान चाहते हो, तो पहले उसे वो सम्मान देना सीखो। कल से अपनी पत्नी के अंदर उस पुरानी प्रेमिका को ढूंढने की कोशिश करना, उसकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखना, फिर देखना कि तुम्हारा घर कैसे स्वर्ग बन जाता है।”

उस रात के बाद पार्टी खत्म हुई और सब अपने-अपने घर लौट गए। लेकिन आलोक की बातें रजत के मन में गहराई तक उतर चुकी थीं। उसने महसूस किया कि शालिनी ने उसके और उसके परिवार के लिए अपने करियर, अपने शौक, यहां तक कि अपनी हंसी तक को कुर्बान कर दिया था, और बदले में उसने शालिनी को सिर्फ ताने दिए थे।

अगले दिन रविवार था। शालिनी रोज़ की तरह सुबह छह बजे उठकर रसोई में जाने की तैयारी कर रही थी कि रजत ने उसका हाथ पकड़ लिया। “आज तुम सो जाओ शालू, चाय मैं बनाऊंगा,” रजत ने मुस्कुराते हुए कहा। शालिनी आश्चर्य से उसे देखती रह गई।

रजत ने सिर्फ चाय ही नहीं बनाई, बल्कि नाश्ते में शालिनी की पसंद के सैंडविच भी बनाए। दोपहर को जब शालिनी कपड़े धो रही थी, तो रजत ने जाकर उसकी मदद की। शाम को बिना बताए वो शालिनी के लिए गज़रा ले आया, बिल्कुल वैसे ही जैसे वो कॉलेज के दिनों में लाया करता था।

शुरू में शालिनी को लगा कि शायद रजत ने कोई गलती की है जिसे वो छुपाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन जब हफ्तों तक रजत का यह बर्ताव जारी रहा, तो शालिनी के अंदर का वो सूखा हुआ पौधा फिर से हरा होने लगा। रजत ने उस पर हुक्म चलाना छोड़ दिया था। वो अब घर के कामों में हाथ बंटाता, रात को बच्चों को सुलाने की ज़िम्मेदारी लेता और कभी-कभी वीकेंड पर बिना किसी रिश्तेदार के, सिर्फ शालिनी को डिनर पर बाहर ले जाता। शालिनी की वो पुरानी, खिलखिलाती हुई हंसी, जो सालों से घर के बर्तनों की आवाज़ में दब गई थी, वो फिर से गूंजने लगी थी।

महीनों बीत गए। दिवाली का मौका था और आलोक के घर पर एक छोटी सी पूजा रखी गई थी। रजत और शालिनी भी वहां पहुंचे। शालिनी आज बिल्कुल वैसी लग रही थी जैसी वो कॉलेज के दिनों में लगती थी—चेहरे पर गज़ब का नूर और आंखों में सुकून।

अचानक शालिनी आगे बढ़ी और उसने आलोक की मां के पैर छुए। फिर उसने आलोक की तरफ मुड़कर हाथ जोड़े और रुंधी हुई आवाज़ में कहा, “आलोक भैया, आपने उस दिन पार्टी में जो कहा, उसने मेरे उजड़ते हुए आशियाने को बचा लिया। मैं तो भूल ही गई थी कि मैं एक पत्नी और बहू होने के साथ-साथ किसी की प्रेमिका भी हूं। आपके दोस्त ने मुझे वो खोया हुआ एहसास वापस लौटा दिया है। आज मेरे घर में कोई शिकायत नहीं, कोई झगड़ा नहीं होता। मेरा घर सचमुच किसी स्वर्ग से कम नहीं है। भगवान आप जैसा दोस्त हर इंसान को दे, जो सही रास्ता दिखा सके।”

आलोक ने मुस्कुराते हुए शालिनी के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। वहां खड़े रजत की आंखों में खुशी के आंसू थे, क्योंकि उसे अपनी वो पुरानी शालिनी वापस मिल गई थी, और इस बार वो उसे कभी खोने नहीं वाला था।

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लेखिका : रीमा साहू

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