घर को घर रहने दो

देविका जी को हर चीज़ एकदम परफेक्ट चाहिए होती थी। रोहन और अनन्या को अपने ही घर में किसी मेहमान की तरह रहना पड़ता था। सोफे पर बैठकर खाना मना था, क्योंकि कवर गंदे हो जाएंगे। बिस्तर पर सिलवटें नहीं पड़नी चाहिए। खिलौने खेलने के तुरंत बाद उनके डिब्बे में पैक हो जाने चाहिए। दोस्तों को घर लाना तो जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध था, क्योंकि बच्चे आएंगे तो शोर मचेगा, चीज़ें टूटेंगी और सबसे बड़ी बात—घर गंदा होगा।

देविका जी अपने ड्रॉइंग रूम के मखमली सोफे पर बैठीं, सामने रखी कांच की मेज को निहार रही थीं। मेज पर एक धूल का कण भी नहीं था। फर्श ऐसा चमक रहा था कि उसमें कोई अपना चेहरा देख ले। घर का हर पर्दा, हर कुशन, हर सजावटी सामान अपनी तय जगह पर बिल्कुल परफेक्ट तरीके से रखा हुआ था। बाहर से देखने वाले अक्सर कहते थे, “देविका जी का घर तो बिल्कुल किसी फाइव-स्टार होटल या मैगज़ीन के कवर पेज जैसा लगता है।” यह सुनकर देविका जी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। लेकिन आज, उसी चमकते हुए फर्श और बेदाग दीवारों को देखकर उनके भीतर एक अजीब सा खालीपन गूंज रहा था। इस बड़े से घर में सिर्फ दो लोग रह गए थे—देविका जी और उनके पति रजत जी। और घर में पसरा था एक ऐसा सन्नाटा, जो अब उन्हें अंदर ही अंदर खाने लगा था।

दीवार पर टंगी एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर पर उनकी नज़र गई। तस्वीर में दस साल का रोहन और आठ साल की अनन्या मुस्कुरा रहे थे। तस्वीर को देखते ही देविका जी स्मृतियों के उस भंवर में डूब गईं, जहां से बाहर आना अक्सर उनके लिए तकलीफदेह होता था।

“माँ, देखो मैंने क्या बनाया है!” एक दिन आठ साल की अनन्या अपने हाथों में मिट्टी और रंगों से सना एक प्रोजेक्ट लेकर दौड़ती हुई ड्रॉइंग रूम में आई थी। उसके छोटे-छोटे हाथों से रंग टपक कर उस महंगे ईरानी कालीन पर गिर रहे थे, जिसे देविका जी ने खास तौर पर ऑर्डर देकर मंगवाया था।

“अनन्या! वहीं रुक जाओ!” देविका जी लगभग चीख पड़ी थीं। उनकी नज़र बेटी की उस प्यारी सी मुस्कान या उसकी रचनात्मकता पर नहीं थी, बल्कि कालीन पर गिरे रंग के उन दो कतरों पर थी। “तुमने मेरा पूरा कालीन खराब कर दिया। तुम्हें कितनी बार कहा है कि ये सब गंदे काम बाहर बालकनी में किया करो। जाओ यहाँ से, और पहले अपने हाथ-पैर धोकर आओ!”

अनन्या का उत्साहित चेहरा एकदम से बुझ गया था। वह चुपचाप अपनी मिट्टी की मूर्ति लेकर बालकनी की तरफ मुड़ गई। उस दिन अनन्या ने जो मूर्ति बनाई थी, वह फिर कभी पूरी नहीं हो पाई।

“बच्चों को बच्चों की तरह रहने दो देविका,” रजत जी ने अखबार से नज़रें हटाते हुए कहा था। “घर गंदा होता है तो होने दो। ये दीवारें, ये कालीन इन बच्चों की हंसी से ज्यादा कीमती नहीं हैं। जब ये बड़े हो जाएंगे, तब तुम्हें ये घर साफ तो मिलेगा, लेकिन इसमें रौनक नहीं होगी।”

“आप बीच में मत बोलिए रजत,” देविका जी ने सफाई के कपड़े से कालीन रगड़ते हुए कहा था। “बच्चों को अभी से अनुशासन नहीं सिखाऊंगी तो बड़े होकर क्या करेंगे? घर को कबाड़खाना थोड़ी बनाना है। हर चीज़ अपनी जगह पर होनी चाहिए।”

देविका जी को हर चीज़ एकदम परफेक्ट चाहिए होती थी। रोहन और अनन्या को अपने ही घर में किसी मेहमान की तरह रहना पड़ता था। सोफे पर बैठकर खाना मना था, क्योंकि कवर गंदे हो जाएंगे। बिस्तर पर सिलवटें नहीं पड़नी चाहिए। खिलौने खेलने के तुरंत बाद उनके डिब्बे में पैक हो जाने चाहिए। दोस्तों को घर लाना तो जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध था, क्योंकि बच्चे आएंगे तो शोर मचेगा, चीज़ें टूटेंगी और सबसे बड़ी बात—घर गंदा होगा।

एक बार रोहन का जन्मदिन था। उसने जिद की कि वह अपने दोस्तों को बुलाकर एक छोटी सी पार्टी करेगा। देविका जी ने बेमन से इजाजत तो दे दी, लेकिन पूरी पार्टी के दौरान वह बच्चों के पीछे-पीछे हाथ में डस्टर लिए घूमती रहीं। “बेटा, कोल्ड ड्रिंक संभल कर पीना… बेटा, केक मेज पर मत गिराना… जूते बाहर उतार कर आना।”

नतीजा यह हुआ कि बच्चे सहम गए। पार्टी का सारा मज़ा किरकिरा हो गया। उसके बाद रोहन ने कभी अपने दोस्तों को घर नहीं बुलाया। घर तो साफ रहता, लेकिन बच्चों का बचपन उन बेदाग दीवारों के बीच कहीं घुट कर रह गया था।

समय अपनी गति से बीतता गया। दोनों बच्चे बड़े हो गए। घर में होने वाली छोटी-मोटी गलतियों पर देविका जी की डांट-डपट और भी तेज़ हो गई थी। बच्चों ने घर की उस घुटन से बचने के लिए अपने कमरों में ही रहना शुरू कर दिया था। फिर वह समय भी आया जब दोनों अपनी पढ़ाई और करियर के लिए घर से दूर चले गए। रोहन अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी में सेटल हो गया और अनन्या की शादी हो गई, जिसके बाद वह बेंगलुरु शिफ्ट हो गई।

अब देविका जी का घर हमेशा वैसा ही रहता था, जैसा वह चाहती थीं—एकदम साफ, व्यवस्थित और शांत। कोई सोफे के कवर खराब नहीं करता था, कोई दीवारों पर हाथ नहीं लगाता था, कोई भीगी छतरी लेकर ड्रॉइंग रूम में नहीं आता था। लेकिन इस ‘परफेक्शन’ ने उनकी ज़िंदगी की सारी खुशियां छीन ली थीं।

“देविका, चाय ठंडी हो रही है तुम्हारी,” रजत जी की आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में वापस ला खड़ा किया। रजत जी उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए बोले, “क्या सोच रही हो इतनी गहराई में?”

देविका जी की आँखों में आंसू छलक आए। उन्होंने एक गहरी सांस ली और कांपती आवाज़ में कहा, “रजत, क्या मैंने सच में सब कुछ गलत किया? आज ये घर इतना साफ है, लेकिन मुझे ये सफाई चुभ रही है। जब रोहन और अनन्या छोटे थे, मैंने उन्हें कभी खुलकर जीने ही नहीं दिया। मुझे आज भी अनन्या का वो उतरा हुआ चेहरा याद है, जब मैंने उसे रंग गिराने पर डांटा था। काश… काश मैं उस वक्त समझ पाती कि घर इंसानों से बनता है, दीवारों से नहीं।”

रजत जी ने अपनी पत्नी का हाथ थामते हुए नरमी से कहा, “जो बीत गया, उस पर रोने से कोई फायदा नहीं है देविका। तुमने जो किया, वो तुम्हें उस वक्त सही लगा था। तुम बस चीजों को व्यवस्थित रखना चाहती थीं। लेकिन हाँ, हमने बच्चों के बचपन के वो बेपरवाह पल खो दिए, जिन्हें हम संजो सकते थे।”

“मैं बहुत अकेली हो गई हूँ रजत,” देविका जी सुबकते हुए बोलीं। “जब मैं अपनी सहेली सुधा के घर जाती हूँ, तो उसके पोते-पोतियां पूरे घर में उधम मचाते हैं। दीवारों पर उनके पेंसिल के निशान हैं, खिलौने बिखरे पड़े रहते हैं, लेकिन उस घर में एक जीवंतता है, एक खुशी है। और हमारा घर… हमारा घर तो एक कब्रिस्तान की तरह शांत है। ना कोई शोर, ना कोई हंसी।”

“बच्चों को फोन कर लो, अच्छा लगेगा,” रजत जी ने दिलासा दिया।

अभी दोनों बात कर ही रहे थे कि तभी रजत जी का फोन बज उठा। स्क्रीन पर रोहन का वीडियो कॉल था। देविका जी ने झट से अपने आंसू पोछे और चेहरे पर मुस्कान ले आईं।

“नमस्ते पापा, नमस्ते माँ! कैसे हैं आप दोनों?” रोहन की आवाज़ सुनते ही देविका जी के चेहरे पर रौनक आ गई। स्क्रीन पर पीछे रोहन की पत्नी और उनके चार साल के जुड़वां बच्चे भी नज़र आ रहे थे।

“हम बिल्कुल ठीक हैं बेटा। तुम सब कैसे हो? बच्चे कैसे हैं?” देविका जी ने स्क्रीन के करीब आते हुए पूछा।

“हम सब बहुत बढ़िया हैं माँ। दरअसल, एक बहुत अच्छी खबर देनी थी,” रोहन मुस्कुराते हुए बोला। “मुझे काम से दो महीने की छुट्टियां मिली हैं। और अनन्या के भी ऑफिस में वर्क फ्रॉम होम चल रहा है। तो हमने सोचा है कि इस बार हम सब मिलकर इंडिया आ रहे हैं। पूरे दो महीने हम वहीं रहेंगे। अनन्या भी अपने बेटे कबीर के साथ आ रही है।”

यह सुनते ही देविका जी की आँखों से खुशी के आंसू बह निकले। “सच में रोहन? तुम सब आ रहे हो? हे भगवान, यह तो बहुत अच्छी खबर है। कब आ रहे हो तुम लोग?”

“अगले हफ्ते की टिकट बुक हो गई है माँ,” रोहन ने कहा। फिर वह थोड़ा झिझकते हुए बोला, “बस माँ, एक बात का डर है… बच्चे अभी बहुत छोटे हैं और बहुत शरारती हैं। आपका इतना सजा हुआ घर… वो लोग ज़रूर गंदा करेंगे, चीज़ें फैलाएंगे। आप प्लीज़ परेशान मत होना। मैं उन्हें कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश करूंगा।”

बेटे के मुँह से ये शब्द सुनकर देविका जी के सीने में एक तेज़ दर्द उठा। उनके अपने बेटे को उनके ही घर आने में यह संकोच हो रहा था कि घर गंदा हो जाएगा। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने आंसुओं को रोकते हुए एक दृढ़ आवाज़ में कहा, “नहीं रोहन! तुम उन्हें बिल्कुल नहीं रोकोगे। उन्हें जो करना है, करने देना। मैं चाहती हूँ कि वो मेरे घर को गंदा करें। मैं चाहती हूँ कि वो दीवारों पर रंग लगाएं, सोफे पर उछलें और पूरे घर में अपने खिलौने फैलाएं। यह घर उनका है, कोई म्यूज़ियम नहीं।”

रोहन और रजत जी दोनों हैरानी से देविका जी को देख रहे थे।

कॉल कटने के बाद देविका जी के अंदर एक गज़ब की ऊर्जा आ गई थी। अगले एक हफ्ते तक उन्होंने घर का नक्शा ही बदल दिया। उन्होंने अपने महंगे ईरानी कालीन को तह करके स्टोर रूम में रखवा दिया और उसकी जगह एक आम सा मुलायम मैट बिछा दिया ताकि बच्चों को चोट ना लगे। कांच के सारे कीमती शोपीस, जिन्हें वो जान से ज्यादा संभाल कर रखती थीं, उन्हें अलमारियों के सबसे ऊपरी खानों में बंद कर दिया। सोफे के महंगे रेशमी कवर हटाकर सूती और आरामदेह कवर डाल दिए गए। जो घर कल तक एक आर्ट गैलरी लगता था, आज वह एक प्ले-स्कूल जैसा दिखने लगा था।

आखिरकार वह दिन आ ही गया जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठा हुआ। घर में पैर रखते ही रोहन और अनन्या हैरान रह गए।

“माँ, आपका वो इटालियन क्रिस्टल का वास कहाँ गया? और वो महंगा कालीन?” अनन्या ने चारों तरफ देखते हुए पूछा।

देविका जी ने दोनों बच्चों को गले लगाते हुए कहा, “मैंने वो सब हटा दिया बेटा। मुझे अब इस घर में बेजान चीज़ें नहीं, तुम लोगों की ज़िंदा मुस्कुराहटें चाहिए। बहुत साल बर्बाद कर दिए मैंने सफाई के चक्कर में, अब मुझे बस तुम लोगों के साथ जीना है।”

अगले दो महीने उस घर ने वो सब देखा, जो उसने पिछले पच्चीस सालों में नहीं देखा था। घर के कोने-कोने में बच्चों के खिलौने बिखरे रहते। दीवारों पर क्रेयॉन्स के निशान बन गए थे। कुशन अक्सर ज़मीन पर पड़े मिलते। लेकिन देविका जी के माथे पर एक भी सिलवट नहीं आई।

एक दिन चार साल के कबीर ने दौड़ते हुए आकर मेज से टकराकर अपना पूरा फलों का जूस ज़मीन पर गिरा दिया। कबीर डर के मारे सहम कर रोने लगा। अनन्या दौड़कर आई और कबीर को डांटने ही वाली थी कि देविका जी ने बीच में रोक दिया।

“अरे कुछ नहीं हुआ मेरे बच्चे को,” देविका जी ने कबीर को पुचकारते हुए उसे गोद में उठा लिया। “गिर जाने दो जूस, फर्श ही तो है, साफ हो जाएगा। मेरे पोते के आंसू इस फर्श से कहीं ज्यादा कीमती हैं।”

अनन्या और रोहन दूर खड़े अपनी माँ को अचरज से देख रहे थे। उन्होंने अपनी माँ का यह रूप कभी नहीं देखा था। उस रात जब सब सो गए, तो अनन्या अपनी माँ के पास आई और उनके कंधे पर सिर रखकर बोली, “माँ, आप बहुत बदल गई हैं। हमें बहुत अच्छा लग रहा है आपके साथ। बचपन में हम आपसे बहुत डरते थे, लेकिन आज लग रहा है कि हमें हमारी असली माँ मिल गई।”

देविका जी ने बेटी के बाल सहलाते हुए कहा, “मैं बहुत बड़ी बेवकूफ थी अनन्या। घर साफ करने के चक्कर में मैंने अपना घर ही सूना कर लिया था। घर को घर ही रहने देना चाहिए, उसे कोई नुमाइश की चीज़ नहीं बनाना चाहिए। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो ये बिखरे हुए खिलौने और शोर ही सबसे ज्यादा याद आते हैं। मैं अब अपने बीते हुए कल को तो नहीं बदल सकती, लेकिन मैं अपना आज और आने वाला कल तुम सबके साथ इन खुशियों के बीच जीना चाहती हूँ।”

घर में अब ना तो वह पुरानी सी खामोशी थी, और ना ही बेदाग सफाई। अगर कुछ था, तो वह थी ज़िन्दगी की धड़कन, जो बच्चों की हंसी, उनके कदमों की आहट और एक परिवार के प्यार से गूंज रही थी। घर अंततः एक ‘घर’ बन गया था।

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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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