निस्वार्थ कर्म

शहर के जाने-माने रिटायर्ड बैंक अधिकारी सुधीर बाबू अपनी ईमानदारी और दरियादिली के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर थे। उनके दरवाजे से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। किसी की बेटी की शादी हो, किसी के बच्चे की फीस भरनी हो या किसी के इलाज का खर्च उठाना हो, सुधीर बाबू हमेशा अपनी हैसियत से बढ़कर मदद करते थे। लेकिन उनकी इसी आदत से उनकी पत्नी कावेरी हमेशा खफा रहती थीं। कावेरी एक बेहद व्यावहारिक और भविष्य की चिंता करने वाली महिला थीं। उनका मानना था कि सुधीर अपनी गाढ़ी कमाई लुटाकर अपने ही परिवार, खासकर उनके इकलौते बेटे मयंक के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। घर में अक्सर इसी बात को लेकर कलह होती थी। कावेरी चिल्लाती थीं कि जब उनका खुद का बुरा वक्त आएगा, तो ये सारे लोग जिन्हें सुधीर बाबू ने पाला है, सब मुँह फेर लेंगे। पर सुधीर बाबू बस मुस्कुरा कर कह देते, “कावेरी, नेकी कभी जाया नहीं जाती। ऊपर वाला सब देखता है।”

इसी खींचतान के बीच उनके जीवन में अंजलि का प्रवेश हुआ। अंजलि उनके बैंक में ही एक अस्थाई कर्मचारी थी, जिसके पति की एक सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई थी। अंजलि के ससुराल वालों ने उसे मनहूस कहकर घर से निकाल दिया था और उसके मायके में कोई था नहीं। एक छोटी सी बच्ची के साथ दर-दर की ठोकरें खा रही अंजलि जब आत्महत्या करने के कगार पर पहुँच गई, तब सुधीर बाबू ने उसे संभाला। उन्होंने न सिर्फ अंजलि को बैंक में पक्की नौकरी दिलवाने में मदद की, बल्कि उसे अपने घर के पीछे बने छोटे से आउटहाउस में रहने की जगह भी दे दी। सुधीर बाबू अंजलि का एक पिता और बड़े भाई की तरह खयाल रखते थे। वे उसकी बच्ची के लिए खिलौने लाते, अंजलि को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते और हर कदम पर उसका हौसला बढ़ाते।

लेकिन कावेरी की आँखों में यह सब खटकने लगा था। मोहल्ले की औरतों ने भी आग में घी डालने का काम किया। “अरे कावेरी, तुम्हारा पति उस जवान विधवा पर इतना मेहरबान क्यों है? कुछ तो गड़बड़ है।” ऐसी बातें कावेरी के कानों में जहर घोलने लगीं। शक का बीज जब दिमाग में बो दिया जाता है, तो वह बहुत जल्दी एक जहरीले पेड़ का रूप ले लेता है। कावेरी को लगने लगा कि सुधीर बाबू का अंजलि के प्रति कोई गलत इरादा है या फिर उनका कोई चक्कर चल रहा है। कावेरी ने घर में क्लेश मचाना शुरू कर दिया। बात इतनी बढ़ गई कि कावेरी ने सुधीर बाबू को अल्टीमेटम दे दिया कि या तो इस घर में अंजलि रहेगी या फिर वह खुद। सुधीर बाबू ने कावेरी को लाख समझाने की कोशिश की कि उनका रिश्ता केवल एक पिता और बेटी का है, लेकिन कावेरी के सिर पर तो शक का भूत सवार था। उसने एक न सुनी।

रोज-रोज के तानों और घर की अशांति को देखकर अंजलि गहरी पीड़ा में डूब गई। वह उस इंसान का घर नहीं टूटने देना चाहती थी जिसने उसे नया जीवन दिया था। एक रात, बिना किसी को कुछ बताए, अंजलि अपनी बच्ची को लेकर वह शहर छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। एक चिट्ठी छोड़ गई जिसमें लिखा था, “बाबूजी, आपने मुझे जीवनदान दिया है, लेकिन मेरी वजह से आपका घर टूट रहा है, यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। मुझे माफ़ कर दीजिएगा।” अंजलि के जाने के बाद कावेरी को सुकून मिला, लेकिन सुधीर बाबू अंदर ही अंदर टूट गए।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। पंद्रह साल बीत गए। सुधीर बाबू रिटायर हो चुके थे और उनका बेटा मयंक अपनी नौकरी के सिलसिले में विदेश जा बसा था। जिंदगी एक शांत ढर्रे पर चल रही थी कि अचानक एक दिन सुधीर बाबू को सीने में तेज दर्द हुआ। अस्पताल ले जाने पर पता चला कि उन्हें हार्ट अटैक आया है और उनके दिल के वाल्व पूरी तरह से खराब हो चुके हैं। डॉक्टरों ने तुरंत एक बहुत बड़े और महंगे ऑपरेशन की बात कही, जिसका खर्च लगभग पच्चीस लाख रुपये था।

कावेरी के पैरों तले जमीन खिसक गई। सुधीर बाबू ने अपनी जिंदगी में बचत के नाम पर कुछ खास नहीं किया था। जो भी पैसा था, वह मयंक को विदेश भेजने और उसकी पढ़ाई में खर्च हो गया था। मयंक ने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उसने अभी-अभी विदेश में घर खरीदा है और वह इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सकता। कावेरी ने उन तमाम रिश्तेदारों और दोस्तों के दरवाजे खटखटाए, जिनकी सुधीर बाबू ने अपने समय में दिल खोलकर मदद की थी। लेकिन कावेरी का डर सच साबित हुआ। किसी ने अपना फोन बंद कर लिया, तो किसी ने अपनी मजबूरियों का रोना रो दिया। एक हफ्ते के भीतर कावेरी को समझ आ गया कि इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता।

अस्पताल के आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूलते सुधीर बाबू को बचाने का अब केवल एक ही रास्ता बचा था—उनका पुश्तैनी घर। कावेरी के लिए यह घर सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं, बल्कि उसकी पूरी जिंदगी की यादों का खजाना था। लेकिन पति की जान से बढ़कर कुछ नहीं था। भारी मन से उसने शहर के सबसे बड़े अखबार में घर बेचने का विज्ञापन दे दिया। घर की लोकेशन अच्छी थी, इसलिए बहुत जल्द एक प्रॉपर्टी डीलर का फोन आया कि एक बड़ी कंपनी की मालकिन उस घर को खरीदना चाहती हैं और वे मुँहमांगी कीमत देने को तैयार हैं।

तय समय पर अस्पताल के वेटिंग रूम में ही मीटिंग रखी गई। कावेरी उदास बैठी कागजातों पर हस्ताक्षर करने का इंतजार कर रही थी। तभी एक चमचमाती कार अस्पताल के पोर्टिको में आकर रुकी। कार से एक बेहद आत्मविश्वासी और संभ्रांत सी दिखने वाली महिला उतरी। उसके साथ दो असिस्टेंट भी थे। महिला सीधे कावेरी के पास आई और उसके पैरों को छू लिया। कावेरी ने अचकचा कर पीछे हटते हुए पूछा, “आप कौन हैं? और यह क्या कर रही हैं?”

महिला ने अपनी आँखों से चश्मा हटाया और रुंधे हुए गले से बोली, “पहचाना नहीं काकी? मैं अंजलि हूँ।”

कावेरी बुत बनकर रह गई। यह वही अंजलि थी जिसे उसने शक और नफरत की आग में झुलस कर घर से निकाल दिया था। आज वह इतनी बड़ी इंसान बन गई थी!

अंजलि ने कावेरी के हाथ से घर के कागज लिए और उन्हें धीरे से फाड़ते हुए बोली, “यह आप क्या कर रही थीं काकी? बाबूजी का घर बेच रही थीं? जिस घर की छाँव में मुझे जीवन मिला, उसे मैं कैसे बिकने दे सकती हूँ?”

कावेरी की आँखों में शर्म और पश्चाताप के आँसू छलक आए। वह रोते हुए बोली, “मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था अंजलि। तुम्हारे बाबूजी मौत से लड़ रहे हैं और मेरे पास उनके इलाज के लिए एक फूटी कौड़ी नहीं है। मैंने जिन्हें अपना समझा, सबने धोखा दिया। मुझे तो अब यह भी कहने का हक नहीं है कि मुझे माफ़ कर दो, क्योंकि मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया था।”

अंजलि ने कावेरी के दोनों हाथ पकड़ लिए और उन्हें चूमते हुए कहा, “काकी, आपने जो किया वह एक पत्नी का स्वाभाविक डर था। मैंने कभी उस बात का बुरा नहीं माना। जब मैं यहाँ से गई थी, तो बाबूजी की दी हुई हिम्मत और शिक्षा मेरे साथ थी। मैंने बेंगलुरु जाकर एक छोटी सी नौकरी से शुरुआत की, अपनी पढ़ाई पूरी की और आज मेरी अपनी एक आईटी कंपनी है। यह सब बाबूजी के उस निस्वार्थ प्रेम और भरोसे का नतीजा है जो उन्होंने मुझ पर दिखाया था। जब मैंने कल अखबार में उस घर का विज्ञापन और बाबूजी का नाम देखा, तो मेरी रूह काँप गई। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैंने देश के सबसे बड़े कार्डियोलॉजिस्ट को यहाँ बुला लिया है। बाबूजी के इलाज का सारा खर्च मेरी कंपनी उठाएगी। वह सिर्फ आपके पति नहीं, मेरे भगवान हैं।”

उस दिन कावेरी को सुधीर बाबू की वह बात समझ में आ गई कि ‘नेकी कभी जाया नहीं जाती’। उसने जिन रिश्तेदारों के लिए सुधीर बाबू से हमेशा झगड़ा किया था, वे सब दूर भाग गए थे। और जिस लड़की को उसने नफरत की निगाह से देखा, जिसे चरित्रहीन समझ कर धक्के मार कर निकाल दिया था, आज वही उनके सुहाग की रक्षा के लिए एक फरिश्ता बनकर खड़ी थी।

ऑपरेशन सफल रहा और सुधीर बाबू की जान बच गई। जब उन्हें होश आया और उन्होंने अंजलि को अपने सामने देखा, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो। कावेरी अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। उसने अंजलि को गले से लगा लिया और अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल के लिए सच्चे मन से क्षमा माँगी। सुधीर बाबू ने कावेरी का हाथ पकड़ कर बस इतना कहा, “देखा कावेरी, बोया हुआ बीज अगर सच्चा हो, तो वह एक न एक दिन मीठा फल जरूर देता है।”

दोस्तों, जीवन का यह सबसे बड़ा सत्य है। आप आज किसी के लिए जो निस्वार्थ कर्म करते हैं, वह भविष्य में किसी न किसी रूप में आपके पास लौटकर जरूर आता है। कर्म का बैंक कभी किसी का कर्ज नहीं रखता। जब सारे रास्ते बंद नजर आते हैं, तब आपकी की गई कोई पुरानी भलाई एक नया दरवाजा खोल देती है।

क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा हुआ है जब किसी अनजान या उस व्यक्ति ने आपकी मदद की हो जिससे आपको बिल्कुल उम्मीद न थी? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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