मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी। “हमारा पड़ोसी है ना रोहन… वो हमारी बहुत मदद करता है।” आंटी के ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं? मैं उनकी मदद करता था? मैं तो वो इंसान था जो उनसे बचने के लिए सीढ़ियों में छिप जाता था। मैं वो था जो उन्हें अपना बोझ समझता था। और उन्होंने अपने बेटे के सामने मेरी कितनी झूठी तारीफ की थी, सिर्फ इसलिए ताकि उनके बेटे को कोई परेशानी न हो और शायद खुद को ये तसल्ली देने के लिए कि उनका कोई तो अपना यहाँ है।
मेरे अंदर का सारा अहंकार, सारी झल्लाहट आंसुओं के रूप में मेरी आंखों से बहने लगी। मैं धीरे से चलकर आंटी के पास गया और उनके कदमों के पास फर्श पर बैठ गया।
शहर की इस बहुमंजिला इमारत में हर कोई अपनी अपनी जिंदगी की दौड़ में इस कदर शामिल था कि किसी को खबर ही नहीं होती थी कि पड़ोस के फ्लैट में क्या पक रहा है। मेरी जिंदगी भी कुछ ऐसी ही थी। एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम, सुबह नौ बजे घर से निकलना और रात को आठ बजे थका-हारा वापस लौटना। वीकेंड पर बस सोना या दोस्तों के साथ बाहर जाना। मेरी इस सधी हुई दिनचर्या में अगर कोई अवांछित रुकावट थी, तो वो थीं फ्लैट नंबर 302 में रहने वालीं ‘सावित्री आंटी’।
मैं 303 में रहता था। जब से मैं इस फ्लैट में शिफ्ट हुआ था, सावित्री आंटी ने मुझे अपने बेटे जैसा ही मान लिया था, लेकिन मुझे उनका यह ‘अपनापन’ एक बोझ लगने लगा था। उनके पति, जिन्हें सब ‘दीनानाथ अंकल’ कहते थे, अक्सर बीमार रहते थे। उनके जोड़ों में दर्द रहता था और वो ज्यादातर बिस्तर पर ही आराम करते थे। आंटी और अंकल दोनों ही सत्तर के पार थे। उनका अपना इकलौता बेटा, कुणाल, अमेरिका में किसी बड़ी आईटी कंपनी में ऊंचे पद पर था। साल-दो साल में एक बार आता, कुछ दिन रुकता और फिर अपनी दुनिया में लौट जाता।
शुरुआत में मुझे उनका व्यवहार सामान्य लगा था। एक बुजुर्ग दंपत्ति अकेले रहते हैं, तो मदद करना इंसानियत है। लेकिन धीरे-धीरे मुझे यह सब परेशान करने लगा। कभी उनका वाई-फाई काम नहीं कर रहा होता, तो कभी ऑनलाइन बिजली का बिल जमा करना होता। कभी उनकी कोई खास दवाई बाजार से लानी होती, तो कभी टीवी का रिमोट काम करना बंद कर देता। हर छोटी बात के लिए उनके दरवाजे की बेल बजने से पहले ही मुझे अहसास हो जाता था कि सावित्री आंटी मेरी चौखट पर खड़ी हैं।
“रोहन बेटा, जरा देखना ये मेरे फोन में क्या हो गया, कुणाल की वीडियो कॉल नहीं लग रही।” उनकी ये बातें सुन-सुनकर मैं ऊब चुका था। मेरे मन में अक्सर यह ख्याल आता कि उनका अपना बेटा विदेश में आराम की जिंदगी जी रहा है, उसने अपने माता-पिता को उनके हाल पर छोड़ दिया है, और उन्होंने मुझे अपना मुफ्त का नौकर समझ लिया है। मैं कोई उनका सगा बेटा तो था नहीं जो उनकी हर जिम्मेदारी उठाता।
इस खीझ के चलते मैंने उनसे बचने के बहाने ढूंढने शुरू कर दिए थे। सुबह ऑफिस जाते वक्त अगर मैं उन्हें बालकनी में खड़े देखता, तो मैं लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों से नीचे उतर जाता ताकि उनका कोई काम न सुनना पड़े। कभी वो मुझे कॉरिडोर में मिल भी जातीं, तो मैं अपने कानों में ईयरफोन लगा लेता और फोन पर बात करने का नाटक करते हुए तेजी से निकल जाता। मुझे लगता था कि मैं बहुत चालाकी से बच रहा हूँ, और उन्हें मेरी इस झल्लाहट का कोई अंदाजा नहीं है।
अक्टूबर का महीना था, लेकिन उस दिन शहर में बेमौसम की भारी बारिश हो रही थी। पूरा दिन ऑफिस में काम की थकान और ऊपर से यह आफत की बारिश। कैब वाले ने मुझे सोसाइटी के मेन गेट पर ही उतार दिया क्योंकि अंदर तक जाने वाले रास्ते पर पानी भरा था। मैं अपना लैपटॉप बैग सीने से लगाए, छतरी तानकर किसी तरह अपने ब्लॉक की तरफ बढ़ रहा था। हवा इतनी तेज थी कि छतरी संभालना मुश्किल हो रहा था।
तभी मेरी नजर सोसाइटी के गेट से कुछ दूरी पर स्थित मेडिकल स्टोर के पास पड़ी। वहां एक बुजुर्ग महिला एक हाथ में भारी सा थैला लिए और दूसरे हाथ से अपनी टूटी हुई छतरी को संभालने की नाकाम कोशिश कर रही थी। बारिश के पानी से उनके कपड़े घुटनों तक भीग चुके थे और हवा के झोंकों से वो डगमगा रही थीं। मैंने ध्यान से देखा, वो सावित्री आंटी थीं।
मेरे कदम ठिठक गए। एक पल के लिए मेरे मन में आया कि मैं चुपचाप निकल जाऊं, अगर उन्होंने मुझे देख लिया तो फिर से कोई काम सौंप देंगी या मुझे उन्हें घर तक ले जाना पड़ेगा। लेकिन उनकी वो कांपती हुई हालत देखकर मेरे अंदर का इंसान मुझे धिक्कारने लगा। इतनी तेज बारिश में वो अकेली क्यों निकली हैं? मैंने लंबी सांस ली और तेजी से उनके पास पहुंचा।
“आंटी! आप इतनी तेज बारिश में यहाँ क्या कर रही हैं?” मैंने अपनी छतरी उनके ऊपर करते हुए पूछा।
मेरी आवाज सुनकर उन्होंने चौंककर ऊपर देखा। उनके चेहरे पर बारिश का पानी और पसीना दोनों मिले हुए थे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर एक पल के लिए राहत की चमक आई, लेकिन फिर तुरंत ही एक संकोच ने उसकी जगह ले ली।
“अरे रोहन बेटा… वो… तुम्हारे अंकल की छाती में अचानक बहुत दर्द उठने लगा। उनकी वो नीली वाली गोलियां खत्म हो गई थीं। मैंने डिलीवरी वाले को फोन किया, पर बारिश की वजह से कोई आ ही नहीं रहा था। अंकल की हालत देखी नहीं गई, इसलिए मैं खुद ही चली आई।” उनकी सांसें तेज चल रही थीं और वो ठंड से कांप रही थीं।
उनके हाथ में दवाइयों के साथ-साथ एक और भारी थैला था, जिसमें शायद दूध और कुछ सब्जियां थीं। उन्हें इस हाल में देखकर मुझे खुद पर घिन आने लगी। मैं किस कदर स्वार्थी हो गया था।
“लाइए, ये थैला मुझे दीजिए।” मैंने लगभग उनके हाथ से थैला छीनते हुए कहा और उन्हें सहारा देते हुए सोसाइटी की तरफ ले जाने लगा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप मेरे साथ चलने लगीं। लिफ्ट में भी हम दोनों के बीच खामोशी थी। तीसरी मंजिल पर जब हम पहुंचे, तो मैंने उनका थैला उनके दरवाजे के पास रख दिया। मैं अपने फ्लैट की चाबी निकाल ही रहा था कि आंटी ने धीमी आवाज में कहा, “बेटा, अंदर आओगे क्या? मुझे डर लग रहा है, अंकल की तबीयत ठीक नहीं लग रही।”
मैं मना नहीं कर सका। मैं उनके पीछे-पीछे घर में दाखिल हुआ। घर में घुसते ही एक अजीब सी उदासी और दवाइयों की महक ने मेरा स्वागत किया। दीनानाथ अंकल बेडरूम में बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनकी आंखें बंद थीं और वो हांफ रहे थे। उनके पास ही एक नेब्युलाइज़र मशीन रखी थी।
आंटी ने जल्दी से दवा निकाली और उन्हें पानी के साथ दी। मैं वहीं दरवाजे के पास खड़ा सब देख रहा था। इतने बड़े और आलीशान फ्लैट में सन्नाटा ऐसा था जैसे यह कोई घर नहीं, बल्कि कोई अस्पताल का कमरा हो।
तभी सोफे पर रखा आंटी का फोन बजने लगा। स्क्रीन पर ‘कुणाल कॉलिंग’ चमक रहा था। आंटी ने अंकल को देखा, उनके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान आ गई। उन्होंने जल्दी से अपने भीगे हुए बाल ठीक किए और कॉल रिसीव कर ली।
“हेलो बेटा… कैसे हो तुम?” आंटी ने अपनी कांपती आवाज को सामान्य करने की पूरी कोशिश की।
उधर से एक तेज और झुंझलाई हुई आवाज आई, जिसे मैं भी साफ सुन पा रहा था, “मम्मी! मैंने आपको कितनी बार कहा है कि मेरे ऑफिस टाइम पर बार-बार मैसेज मत किया करो। मैं यहाँ मीटिंग्स में बिजी होता हूँ। क्या हुआ अब?”
“कुछ नहीं बेटा… वो बस तेरे पापा की थोड़ी तबीयत…”
“मम्मी प्लीज! मैं यहाँ बैठकर पापा की तबीयत तो ठीक नहीं कर सकता ना? मैंने पिछले हफ्ते ही तो पैसे ट्रांसफर किए हैं। आपको जो भी जरूरत हो, किसी केयरटेकर को रख लो। आप दोनों मुझे शांति से काम भी नहीं करने देते। इस बार दिवाली पर भी मेरा आना नहीं हो पाएगा, मेरा एक जरूरी प्रोजेक्ट है।”
फोन के स्पीकर से निकलती हर एक बात तीर की तरह चुभ रही थी। मैंने दीनानाथ अंकल की तरफ देखा। वो आंखें बंद किए हुए थे, लेकिन उनके गालों पर आंसुओं की लकीरें साफ बह रही थीं। वो सब सुन रहे थे। एक पिता, जिसने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे को इस लायक बनाने में लगा दी, आज अपने ही बेटे के समय के लिए मोहताज था।
सावित्री आंटी ने अंकल के आंसुओं को देखा और उनकी खुद की आंखें भी छलक पड़ीं, लेकिन उन्होंने अपनी आवाज में जरा भी कंपन नहीं आने दिया।
“कोई बात नहीं बेटा, तू अपना काम कर। हम यहाँ बिल्कुल ठीक हैं। पैसों की कोई कमी नहीं है। और तू हमारी चिंता मत किया कर, हमारा पड़ोसी है ना रोहन, वो बहुत अच्छा लड़का है। वो हमारी बहुत मदद करता है। बिल्कुल तेरे जैसा ही है, हमारे हर काम के लिए एक पैर पर खड़ा रहता है। चल तू मीटिंग कर ले, मैं फोन रखती हूँ।”
आंटी ने कॉल काट दी। फोन कटते ही वो वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गईं और उन्होंने अपने चेहरे को दोनों हाथों से ढंक लिया। वो सिसक-सिसक कर रोने लगीं।
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी। “हमारा पड़ोसी है ना रोहन… वो हमारी बहुत मदद करता है।” आंटी के ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं? मैं उनकी मदद करता था? मैं तो वो इंसान था जो उनसे बचने के लिए सीढ़ियों में छिप जाता था। मैं वो था जो उन्हें अपना बोझ समझता था। और उन्होंने अपने बेटे के सामने मेरी कितनी झूठी तारीफ की थी, सिर्फ इसलिए ताकि उनके बेटे को कोई परेशानी न हो और शायद खुद को ये तसल्ली देने के लिए कि उनका कोई तो अपना यहाँ है।
मेरे अंदर का सारा अहंकार, सारी झल्लाहट आंसुओं के रूप में मेरी आंखों से बहने लगी। मैं धीरे से चलकर आंटी के पास गया और उनके कदमों के पास फर्श पर बैठ गया।
उन्होंने मुझे देखा और जल्दी से अपने आंसू पोंछ लिए। “अरे रोहन बेटा, तुम अभी तक यहीं हो? जाओ, तुम्हारे कपड़े भीग गए हैं, बीमार पड़ जाओगे। मैं… मैं बस ऐसे ही… कुणाल को याद करके… तुम जाओ बेटा, मुझे अब कोई काम नहीं है।” उन्होंने नजरें चुराते हुए कहा।
मैं कुछ बोल नहीं पाया। मैंने बस उनके हाथ से वो दवाइयों का पर्चा लिया जो टेबल पर रखा था।
“आंटी… इस पर्चे में लिखी ये दो दवाइयां पीछे वाले मेडिकल स्टोर पर नहीं मिलतीं। इसके लिए मेन मार्केट जाना पड़ेगा।” मेरी आवाज भारी हो गई थी।
“हाँ बेटा, वो दवाइयां खत्म हो गई हैं। कोई बात नहीं, कल मैं किसी को भेजकर मंगवा लूंगी। तुम जाओ आराम करो।”
“कल क्यों आंटी? जब घर में एक बेटा मौजूद है, तो आप कल का इंतज़ार क्यों करेंगी?” मैंने उनकी आंखों में देखते हुए कहा।
मेरी इस बात पर आंटी ने हैरानी से मुझे देखा। उनकी आंखें फिर से भर आईं। मैंने उनके दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और कहा, “मुझे माफ कर दीजिए आंटी। मैं बहुत स्वार्थी हो गया था। मैं पड़ोस में रहकर भी आपकी तकलीफ नहीं समझ पाया। लेकिन आज से आपको बाजार जाने की या किसी डिलीवरी वाले का इंतज़ार करने की जरूरत नहीं है। आपका ये बेटा अभी यहीं है।”
दीनानाथ अंकल ने भी आंखें खोलकर मेरी तरफ देखा और उनके होठों पर एक कमजोर सी, लेकिन सच्ची मुस्कान तैर गई।
उस रात मैं मेन मार्केट गया, वो दवाइयां लाया और जब तक अंकल की तबीयत पूरी तरह स्थिर नहीं हो गई, मैं वहीं उनके पास बैठा रहा। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते। कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जो बंद दरवाजों के पार, सिर्फ थोड़े से अपनेपन की उम्मीद में पनपते हैं। आज मेरे पास मेरा अपना परिवार नहीं था, वो मुझसे दूर थे, और आंटी-अंकल के पास उनका बेटा नहीं था। लेकिन उस बारिश की रात में, हम दोनों की वो कमी पूरी हो गई थी।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे आस-पास ऐसे कई बुजुर्ग हैं जिन्हें सिर्फ हमारे थोड़े से समय और अपनेपन की जरूरत है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
लेखिका : आरती देवी