अहंकार – गरिमा चौधरी

“अरे रूचि, खुशकिस्मत तो ये हैं कि इन्हें मेरे जैसा पति मिला,” विक्रांत ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, “वर्ना सोचो, किसी और से शादी होती तो आज भी किसी दो कमरों के फ्लैट में बर्तन मांज रही होतीं। ये तो मेरा विजन है, मेरी मेहनत है, जो आज ये महारानियों की तरह इस महल में राज कर रही हैं। सारी मशीनें लाकर दे दी हैं, नौकर-चाकर लगे हैं, इन्हें करना ही क्या पड़ता है? बस हुक्म चलाती हैं। और थोड़ा बहुत किचन का काम तो औरतों का शौक होता है, उसमें थकना कैसा!”

आज सुबह से ही घर में मेहमानों की चहल-पहल थी। पंद्रह साल की लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार विक्रांत का सपना पूरा हुआ था—शहर के सबसे पॉश इलाके में उनका अपना एक आलीशान बंगला। गृह प्रवेश की पूजा संपन्न हो चुकी थी और अब शाम की शानदार पार्टी की तैयारियाँ चल रही थीं। निहारिका के पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। पिछले एक महीने से घर के इंटीरियर से लेकर परदों के रंग, फर्नीचर की सेटिंग और मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ उसी के कंधों पर था। कहने को विक्रांत ने घर बनवाया था, लेकिन उस ईंट-गारे के मकान को सँवार कर ‘घर’ बनाने में निहारिका ने अपने दिन-रात एक कर दिए थे। सुबह चार बजे से उठकर पूजा की व्यवस्था देखना, फिर हलवाइयों के साथ माथापच्ची करना, और अब शाम के मेहमानों के लिए खास तौर पर विक्रांत की पसंद के कुछ व्यंजन खुद अपने हाथों से तैयार करना। उसकी कमर टूट रही थी, लेकिन चेहरे पर वही सधी हुई मुस्कान थी, जो एक कुशल गृहिणी का गहना मानी जाती है।

ड्राइंग रूम से विक्रांत के ठहाकों की आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी। वो अपने बचपन के दोस्तों, सुमित और उसकी पत्नी रूचि के साथ बैठे थे। सुमित और रूचि दूसरे शहर से खास इसी मौके के लिए आए थे।

“भाई, घर क्या बनवाया है तूने! मतलब, देखते ही आँखें चौंधिया जाएँ। ये झूमर कहाँ से लिया?” सुमित ने छत की ओर देखते हुए कहा।

विक्रांत सीना चौड़ा करते हुए बोले, “अरे यार, ये इटली से इम्पोर्ट करवाया है। अपने को तो कॉम्प्रोमाइज करना आता ही नहीं। मैंने आर्किटेक्ट से साफ कह दिया था, बजट की चिंता मत करो, बस मुझे शहर का सबसे बेहतरीन डिज़ाइन चाहिए। मेरी दिन-रात की मेहनत का ही तो नतीजा है, आज जो चाहूँ वो खरीद सकता हूँ।”

किचन में खड़ी निहारिका के कानों में ये बातें साफ पड़ रही थीं। वो कड़ाही में गाजर का हलवा भून रही थी। गाजर कसने से लेकर उसे धीमी आँच पर पकाने तक की मेहनत उसे अब अपने कंधों और कलाइयों के दर्द में महसूस हो रही थी। उसे याद आ रहे थे वो दिन जब शादी के शुरुआती सालों में विक्रांत के पास एक ढंग की नौकरी तक नहीं थी। छोटे से किराए के कमरे में निहारिका ने ट्यूशन पढ़ाकर और सिलाई करके घर का खर्च चलाया था, ताकि विक्रांत अपना बिजनेस खड़ा कर सके। उसने अपने हिस्से की सारी जमा-पूँजी, यहाँ तक कि अपने गहने भी विक्रांत के काम में लगा दिए थे। लेकिन आज, इस चमचमाते महल में, उन पुराने संघर्षों की कोई जगह नहीं थी। आज सिर्फ विक्रांत की सफलता का शोर था।

रूचि उठकर किचन की तरफ आ गई। निहारिका को पसीने में तर-बतर देखकर उसे बुरा लगा। “अरे निहारिका भाभी, आप अभी भी काम में लगी हैं? सुबह से देख रही हूँ, आप एक मिनट के लिए भी नहीं बैठीं। नौकर-चाकर तो हैं, उनसे करवा लीजिए। आप भी चलकर बैठिए हमारे साथ।”

निहारिका ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस हो ही गया रूचि। दरअसल विक्रांत को बाहर की मिठाई या हलवाइयों के हाथ का मीठा पसंद नहीं आता। उन्हें मेरे हाथ का गाजर का हलवा ही चाहिए होता है, खासकर जब कोई खुशी का मौका हो। बस इसे ही खत्म कर रही हूँ, फिर आती हूँ।”

रूचि ने हमदर्दी से कहा, “भाभी, मानना पड़ेगा, आपके अंदर गजब की ऊर्जा है। इतना बड़ा घर सँभालना, फिर सबकी पसंद का ध्यान रखना… ये हर किसी के बस की बात नहीं है। विक्रांत भैया तो बहुत खुशकिस्मत हैं जो उन्हें आप जैसी जीवनसंगिनी मिली, जिसने उनके इस घर को सच में स्वर्ग बना दिया है।”

तभी पीछे से विक्रांत की आवाज़ आई, जो न जाने कब किचन के दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए थे।

“अरे रूचि, खुशकिस्मत तो ये हैं कि इन्हें मेरे जैसा पति मिला,” विक्रांत ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, “वर्ना सोचो, किसी और से शादी होती तो आज भी किसी दो कमरों के फ्लैट में बर्तन मांज रही होतीं। ये तो मेरा विजन है, मेरी मेहनत है, जो आज ये महारानियों की तरह इस महल में राज कर रही हैं। सारी मशीनें लाकर दे दी हैं, नौकर-चाकर लगे हैं, इन्हें करना ही क्या पड़ता है? बस हुक्म चलाती हैं। और थोड़ा बहुत किचन का काम तो औरतों का शौक होता है, उसमें थकना कैसा!”

रूचि थोड़ा असहज हो गई, लेकिन निहारिका के हाथ कछली चलाते-चलाते अचानक रुक गए। विक्रांत का वो वाक्य—”महारानियों की तरह राज कर रही हैं” और “मेरा एहसान है”—उसके दिल में किसी नुकीले काँच की तरह चुभ गया। क्या सच में ये सिर्फ उसका शौक था? क्या अपने बुखार को नज़रअंदाज़ करके रात-रात भर जागकर विक्रांत की बीमार माँ की सेवा करना, पाई-पाई जोड़कर इस घर की नींव के लिए पैसे बचाना, और अपनी खुद की पहचान को पूरी तरह से मिटाकर सिर्फ ‘विक्रांत की पत्नी’ बन जाना… क्या ये सब सिर्फ एक एहसान के तले दबने के लिए था?

विक्रांत अपनी रौ में बोलते जा रहे थे, “मैंने तो हमेशा इसे सबसे बेहतरीन चीज़ें दी हैं। आज लोग तरसते हैं ऐसे घर के लिए। लेकिन वही बात है न, औरतों को चाहे सोने के महल में रख दो, वो कभी उस बात का एहसान नहीं मानतीं। हमेशा लगता है कि जैसे ये तो उनका हक ही था।”

वो एक गंदा सा ठहाका मारकर वापस ड्राइंग रूम की तरफ मुड़ गए, सुमित को किसी नई पेंटिंग के बारे में बताने के लिए।

किचन में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। गैस चूल्हे की लौ निहारिका के चेहरे पर एक अजीब सी तपन छोड़ रही थी, लेकिन उससे भी ज्यादा तपन उसके अंदर उठ रही थी। ‘एहसान?’ उसने खुद से पूछा। जिस आदमी के हर सुख-दुख में, उसकी हर नाकामी में वो एक ढाल बनकर खड़ी रही, आज वो उसकी सफलता में उसे सिर्फ एक आश्रित मान रहा था? उसका वजूद सिर्फ इतना रह गया था कि वो विक्रांत की दी हुई सुविधाओं का उपभोग करने वाली एक मशीन थी?

उसने गहरी साँस ली, माथे का पसीना पोंछा, और एक कांच के खूबसूरत बाउल में गर्मागर्म हलवा निकाला। उसे सजाते हुए उसके हाथ बिल्कुल स्थिर थे। आज उसने तय कर लिया था कि वो इस सड़ांध भरी सोच को बिना जवाब दिए नहीं जाने देगी। खामोशी बहुत हो चुकी थी, अब आत्मसम्मान को अपनी जगह लेनी थी।

ड्राइंग रूम में पहुँचकर निहारिका ने बड़ी नफासत से सबके सामने डेज़र्ट सर्व किया। सुमित ने हलवे की पहली चम्मच चखते ही आँखें बंद कर लीं, “वाह भाभी, क्या बात है! ऐसा स्वाद तो किसी फाइव स्टार होटल में भी नहीं मिलता। आपके हाथों में तो सच में जादू है। भैया, आपको तो रोज़ ये अमृत खाने को मिलता होगा।”

विक्रांत ने भी हलवे का पूरा लुत्फ उठाते हुए बड़े गर्व से सुमित की तरफ देखा, मानो वो हलवा भी उन्हीं की किसी उपलब्धि का हिस्सा हो। “अरे, तो घर में सब कुछ टॉप क्लास जो लाकर रखा है। अच्छे ड्राई फ्रूट्स, असली घी… चीजें अच्छी मिलेंगी तो स्वाद तो आएगा ही न। इसमें कौन सा बड़ा रॉकेट साइंस है।”

निहारिका ने अपनी कुर्सी खींची और आराम से बैठी। उसने पानी का एक घूंट पिया और विक्रांत की आँखों में सीधे देखते हुए एक बहुत ही शांत, लेकिन धारदार आवाज़ में सुमित से कहा,

“हाँ सुमित भाई, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। रॉकेट साइंस तो नहीं है, लेकिन ये घर का खाना है। और विक्रांत की किस्मत पर मुझे भी नाज़ होता है। हर आदमी की किस्मत में कहाँ होता है कि वो बाहर से चाहे जितना भी थक कर आए, घर पर कोई उसके हर दर्द को अपना समझकर, अपनी थकान भूलकर, सिर्फ उसकी एक फरमाइश पर किचन की भट्ठी के सामने खड़ा रहे, ताकि उसे उसके पसंद का गर्म खाना मिल सके।”

विक्रांत के हाथ में हलवे की चम्मच आधी हवा में ही रुक गई। निहारिका का स्वर बिल्कुल संयत था, चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान भी थी, लेकिन शब्दों की चोट बहुत गहरी थी।

उसने आगे कहा, “सच कहूँ तो इस घर को बनाने में ईंट, पत्थर और इटालियन मार्बल तो विक्रांत की मेहनत के ही लगे हैं। लेकिन उन ठंडे पत्थरों में जान फूँककर उसे एक ‘घर’ बनाना… जहाँ आकर इनका तनाव दूर हो सके, वो शायद मेरी मेहनत है। ये सच में बहुत खुशकिस्मत हैं कि इन्हें एक ऐसा जीवनसाथी मिला जिसने इनकी हर कमी को अपना माना और इनकी हर जीत को अपना ताज।”

कमरे में सुई गिरने जैसी शांति छा गई थी। सुमित और रूचि की नज़रें निहारिका पर टिकी थीं। विक्रांत उसे घूर रहे थे, उनके चेहरे का रंग बदल चुका था। लेकिन निहारिका ने अपनी बात अभी खत्म नहीं की थी। उसने बिल्कुल उसी लहज़े में, जिस लहज़े में विक्रांत ने किचन में बात की थी, अपनी बात पूरी की—

“हाँ, वो अलग बात है… कि इस बात का वो कभी एहसान नहीं मानते।”

निहारिका की आखिरी लाइन कमरे में एक भारी गूँज की तरह तैर गई। विक्रांत के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी सारी अकड़, सारा अहंकार जैसे पल भर में ज़मीन पर आ गिरा था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो गुस्सा करें या अपनी गलती मानें। रूचि ने चुपके से निहारिका की तरफ देखकर एक हल्की सी, संतोष भरी मुस्कान दी। निहारिका को अब कोई थकान महसूस नहीं हो रही थी। उसने अपना हक, अपनी पहचान वापस ले ली थी, बिना चीखे, बिना चिल्लाए, बस अपने वजूद की कीमत समझाकर।

क्या आपको लगता है कि निहारिका ने सही जवाब दिया? एक रिश्ते में ‘एहसान’ शब्द की क्या जगह होनी चाहिए? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएँ!

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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