जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा

सुबह के आठ बज रहे थे, लेकिन मास्टर रघुनाथ जी के भीतर जैसे कोई तूफ़ान उबल रहा था। उनकी पत्नी सुमित्रा ने मेज़ पर चाय का प्याला रखते हुए कहा, “चाय ठंडी हो रही है, इसे तो पी लीजिए। सुबह से उस कागज़ में सिर खपाए बैठे हैं, जैसे आज ही कोई बड़ा किला फतह करना हो।”

रघुनाथ जी ने अपनी चश्मे की कमानी को उँगली से ऊपर खिसकाया और माथे पर पड़ी सिलवटों को और गहरा करते हुए बोले, “किला फतह करने से कम है क्या यह? पैंतीस साल, पूरे पैंतीस साल मैंने इस ‘सरस्वती विद्या मंदिर’ को अपने खून-पसीने से सींचा है। जब यह स्कूल टिन के छप्पर में चलता था, तब से मैं यहाँ पढ़ा रहा हूँ। और आज, जब स्कूल की इमारत तीन मंज़िला हो गई है, तो मैनेजमेंट मुझे एक नोटिस थमा देता है कि साठ साल पूरे हो गए, अब आप घर बैठिए। मैं आज ही अपना एक्सटेंशन (सेवा-विस्तार) का पत्र चेयरमैन साहब को सौंपने वाला हूँ।”

सुमित्रा ने एक गहरी साँस ली और तौलिए से हाथ पोंछते हुए पास ही कुर्सी पर बैठ गई। “रघुनाथ जी, अब उम्र हो गई है। साठ के हो गए हैं आप। शरीर को भी आराम की ज़रूरत है। अब रिटायरमेंट ले लीजिए। घर पर रहिए, पोते-पोतियों के साथ समय बिताइए। जिंदगी भर तो आपने चॉक की धूल ही फांकी है, अब थोड़ा सुकून का जीवन जी लीजिए।”

“सुकून?” रघुनाथ जी लगभग चीखते हुए बोले, “सुकून तब मिलेगा जब मुझे मेरा हक़ मिलेगा। तुम्हें क्या लगता है, मैं अब पढ़ाने लायक नहीं रहा? आज भी जब मैं गणित के सूत्र बोर्ड पर लिखता हूँ, तो पूरी क्लास में सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे जाती है। आजकल के ये नए-नवेले बी.एड. पास लड़के, जो मोबाइल में देखकर पढ़ाते हैं, वो मेरी जगह लेंगे? कल ही की बात है, नए वाले विज्ञान के मास्टर को एक साधारण सा प्रार्थना पत्र लिखना नहीं आ रहा था, मेरे पास आया था कि ‘सर जी, ज़रा इसे ड्राफ्ट कर दीजिए’। और मैनेजमेंट मुझे बाहर का रास्ता दिखा रहा है? शहर के विधायक जी को देखो, पचहत्तर की उम्र में भी चुनाव लड़ रहे हैं। उनके लिए उम्र का कोई पैमाना नहीं? यह सब मुझे बाहर करने की साजिश है, लेकिन मैं इतनी आसानी से हार नहीं मानूँगा।”

सुमित्रा जानती थी कि इस समय उनसे बहस करना बेकार है। वह चुपचाप उठी और रसोई में चली गई। रघुनाथ जी ने अपना पूरा ध्यान उस प्रत्यावेदन (अपील) पत्र पर लगा दिया। उन्होंने एक-एक शब्द बहुत चुन-चुन कर लिखा था, जिसमें उनकी उपलब्धियाँ, स्कूल के प्रति उनका समर्पण और आगे भी पूरी ऊर्जा से काम करने का दावा शामिल था। पत्र पूरा करने के बाद उन्होंने उसे एक भूरे रंग के लिफाफे में डाला और सावधानी से अपनी पुरानी चमड़े की अटैची में रख लिया।

“मैं ज़रा बाज़ार तक जा रहा हूँ,” उन्होंने दरवाज़े से ही आवाज़ लगाई, “पोस्ट ऑफिस से इस पत्र की एक कॉपी स्पीड पोस्ट करूँगा और फिर सीधा स्कूल जाकर चेयरमैन को हाथ से यह लिफाफा दूँगा। वापसी में सब्ज़ी लेता आऊँगा, थैला दे दो।”

सुमित्रा ने बिना कुछ कहे एक कपड़े का थैला उनकी ओर बढ़ा दिया। रघुनाथ जी ने अपना छाता उठाया और घर से बाहर निकल पड़े।

मई का महीना था और सूरज आग उगल रहा था। रघुनाथ जी के माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, लेकिन उनके भीतर का क्रोध इस गर्मी से कहीं ज़्यादा तप रहा था। वे बस यही सोच रहे थे कि चेयरमैन उनके पत्र को पढ़कर क्या प्रतिक्रिया देगा। उनका मन इस बात को मानने को तैयार ही नहीं था कि स्कूल उनके बिना भी चल सकता है। उन्हें लगता था कि जिस दिन वे स्कूल की दहलीज से बाहर कदम रखेंगे, उस दिन स्कूल की व्यवस्था चरमरा जाएगी।

पोस्ट ऑफिस के रास्ते में शहर का इकलौता और बहुत पुराना एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज (रोज़गार कार्यालय) पड़ता था। रघुनाथ जी जब उस सड़क से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने देखा कि आज वहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं है। दूर-दूर तक युवाओं की एक विशाल भीड़ जमा थी। किसी के हाथ में प्लास्टिक के फोल्डर थे, तो किसी के हाथ में पसीने से भीग चुके कागज़ात। धूप इतनी तेज़ थी कि लोग पेड़ों की छाँव के लिए एक-दूसरे से धक्का-मुक्की कर रहे थे।

रघुनाथ जी ठिठक गए। उन्होंने अपने चश्मे को साफ़ किया और उस भीड़ को ध्यान से देखा। पच्चीस से तीस साल के हज़ारों युवक और युवतियाँ वहाँ खड़े थे। उनके चेहरों पर एक अजीब सी बेचैनी, हताशा और खालीपन था।

रघुनाथ जी सड़क के किनारे एक पान की दुकान के पास खड़े हो गए। तभी उनकी नज़र एक पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों पर पड़ी, जो पसीने से तरबतर थे और आपस में बात कर रहे थे।

“भाई, इस बार भी लगता है फॉर्म भरने का कोई फायदा नहीं,” एक लड़के ने अपनी फाइल से हवा करते हुए कहा, “क्लर्क की कुल बीस जगहें निकली हैं और यहाँ पचास हज़ार लोग लाइन में लगे हैं।”

दूसरे लड़के ने हताशा से सिर हिलाते हुए कहा, “जगहें निकलेंगी कहाँ से यार? जो लोग कुर्सियों पर बैठे हैं, वो फेविकोल लगाकर बैठे हैं। साठ साल की उम्र हो जाती है, फिर भी रिटायर होने का नाम नहीं लेते। नेताओं से जुगाड़ लगाकर दो-दो साल का एक्सटेंशन ले लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनके बिना तो देश ही नहीं चलेगा। और यहाँ हम लोग एम.ए., बी.एड., एम.एससी. करके जूते चटका रहे हैं। पिताजी रिटायर हुए नहीं, घर में खाने के लाले पड़े हैं, और यहाँ नौकरियां हैं कि जो बूढ़े हो गए हैं, वो छोड़ने को तैयार नहीं।”

“सही कह रहा है तू,” तीसरे ने गहरी साँस लेते हुए कहा। “कल मैं एक प्राइवेट स्कूल में इंटरव्यू देने गया था। वहाँ के प्रिंसिपल साहब खुद पैंसठ के हो रहे हैं। मुझे कहते हैं कि तुम्हारे पास अनुभव नहीं है। अरे भाई, जब तुम लोग कुर्सी छोड़ोगे और हमें मौका दोगे, तभी तो अनुभव आएगा ना! हम क्या माँ के पेट से अनुभव लेकर पैदा होंगे? मेरी तो ओवरएज (उम्र सीमा पार) होने वाली है। समझ नहीं आता कि अगर इस बार नौकरी नहीं लगी, तो बूढ़े माँ-बाप को क्या मुँह दिखाऊँगा। कभी-कभी तो लगता है कि ये डिग्रियां फाड़ कर किसी नदी में फेंक दूँ या खुद ही नदी में कूद जाऊँ।”

लड़के की आवाज़ में इतनी पीड़ा थी कि रघुनाथ जी के सीने में जैसे कोई तीर सा चुभ गया। वे अपनी जगह पर सुन्न खड़े रह गए। लड़के के वे शब्द— ‘जो बूढ़े हो गए हैं, वो कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं… हमें मौका दोगे, तभी तो अनुभव आएगा’— उनके कानों में हथौड़े की तरह बजने लगे।

उन्होंने एक नज़र फिर से उस पूरी भीड़ पर डाली। चश्मों के मोटे शीशों के पीछे से झाँकती वो आँखें, जिनमें भविष्य के सपने होने चाहिए थे, आज गहरे अवसाद और बेबसी से भरी हुई थीं। वे कोई अजनबी नहीं थे। उनमें से कई तो उनके अपने पढ़ाए हुए छात्र लग रहे थे। कुछ चेहरे तो रघुनाथ जी को जाने-पहचाने भी लगे। ये वही होनहार बच्चे थे, जिन्हें वे क्लास में खड़ा करके कहते थे कि ‘तुम आगे चलकर देश का भविष्य बनोगे।’ लेकिन आज वो भविष्य सड़कों पर धक्के खा रहा था, एक मामूली सी नौकरी के लिए जद्दोजहद कर रहा था।

रघुनाथ जी का हाथ अचानक अपनी अटैची के हैंडल पर कस गया, जिसके अंदर उनका एक्सटेंशन वाला पत्र रखा था। उन्हें लगा जैसे वह लिफाफा अचानक बहुत भारी हो गया है, जैसे उसमें कागज़ नहीं, बल्कि इन हज़ारों बेरोज़गार युवाओं का भविष्य कैद हो।

उनके भीतर चल रहा तूफ़ान अचानक शांत हो गया। एक पल में उनकी आँखों से मोह का वह पर्दा हट गया जिसने उन्हें अंधा कर रखा था। उन्हें समझ आ गया कि जिस कुर्सी को वह अपनी जागीर समझ रहे थे, वह दरअसल एक बहती हुई नदी है। अगर पानी एक ही जगह रुका रहेगा, तो उसमें सड़न पैदा हो जाएगी। नई पीढ़ी को मौका देना, उन पर भरोसा करना, प्रकृति का नियम है। वे खुद भी तो तीस साल पहले एक बूढ़े मास्टर जी के रिटायर होने पर ही उस कुर्सी पर बैठे थे। अगर वो मास्टर जी भी उस दिन एक्सटेंशन मांग लेते, तो क्या आज रघुनाथ जी, ‘मास्टर रघुनाथ जी’ बन पाते?

“नहीं… मुझे इन बच्चों के रास्ते का काँटा नहीं बनना है,” रघुनाथ जी ने बुदबुदाते हुए खुद से कहा। “मेरा समय पूरा हो गया है। मैंने अपनी पारी खेल ली है। अब इन युवा कन्धों को अपनी ज़िम्मेदारी उठाने का मौका मिलना चाहिए। ये मुझसे कमज़ोर नहीं हैं, बस इन्हें अवसर की तलाश है।”

उन्होंने अपनी अटैची खोली, उसमें से वह भूरा लिफाफा निकाला, और बिना एक पल गँवाए, उस पत्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। उन टुकड़ों को पास ही पड़े एक कूड़ेदान में फेंकते ही, उन्हें लगा जैसे उनके कंधों से मन भर का बोझ उतर गया हो। उनकी आत्मा जैसे आज़ाद हो गई।

उनका स्कूल जाने का इरादा अब पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने बाज़ार का रुख किया। आज उनकी चाल में एक अजीब सी फुर्ती थी, ठीक वैसी ही फुर्ती जैसी पच्चीस साल की उम्र में पहली बार नौकरी मिलने पर थी। उन्होंने बाज़ार से ताज़ी सब्ज़ियां लीं, और हाँ, सुमित्रा के लिए एक गजरा और मिठाई की दुकान से गर्मागर्म जलेबियां भी बंधवाईं।

जब रघुनाथ जी घर के दरवाज़े पर पहुँचे, तो उन्होंने अपने होंठ गोल किए और एक पुरानी फिल्म की धुन पर सीटी बजाने लगे।

अंदर रसोई में काम कर रही सुमित्रा सीटी की आवाज़ सुनकर बुरी तरह चौंक गई। यह धुन… यह अंदाज़… यह तो शादी के शुरुआती दिनों में रघुनाथ जी का ट्रेडमार्क हुआ करता था! वह हड़बड़ा कर बाहर आई।

उसने देखा, रघुनाथ जी मुस्कुराते हुए खड़े थे। उनके चेहरे पर ना कोई गुस्सा था, ना कोई तनाव। उन्होंने सब्ज़ी का थैला और जलेबी का पैकेट मेज़ पर रखा और गजरा सुमित्रा की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “लो, इसे बालों में लगा लो। और हाँ, ज़रा दो कप कड़क इलायची वाली चाय तो बनाओ!”

सुमित्रा हैरानी से उन्हें देख रही थी, “चाय? लेकिन आप तो चेयरमैन साहब से लड़ने जाने वाले थे? आपका वो पत्र…?”

“अरे कौन सा पत्र? फाड़ कर फेंक दिया उसे मैंने,” रघुनाथ जी ने आराम कुर्सी पर धंसते हुए और आँखें मूँदते हुए कहा।

“फाड़ दिया? लेकिन क्यों? सुबह तो आप…” सुमित्रा की हैरानी कम नहीं हो रही थी।

रघुनाथ जी ने आँखें खोलीं और एक बहुत ही शांत, संतुष्ट मुस्कान के साथ बोले, “सुमित्रा, आज मुझे समझ में आ गया कि पतझड़ के पत्तों को खुद ही पेड़ से टूटकर गिर जाना चाहिए, ताकि वसंत की नई कोंपलों को खिलने की जगह मिल सके। मैंने फैसला कर लिया है। मैं रिटायरमेंट ले रहा हूँ। अब आराम से तुम्हारे हाथ की चाय पीऊंगा, पोते को स्कूल छोड़ने जाऊंगा, और हाँ… अब मुझे अपने उस फेयरवेल (विदाई) समारोह की तैयारी भी तो करनी है। मुझे भाषण जो देना है!”

सुमित्रा की आँखों में खुशी के आँसू तैर गए। उसने राहत की साँस ली और चाय बनाने रसोई की तरफ मुड़ गई। आराम कुर्सी पर लेटे रघुनाथ जी अब एक शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा पास कर चुका एक ऐसा इंसान महसूस कर रहे थे, जिसके मन में भविष्य को लेकर कोई खौफ नहीं, बल्कि एक नए सफर का रोमांच था।

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लेखिका : नीना गर्ग

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