शारदा स्तब्ध रह गई। वह सुमेधा को और फिर उसके हाथ में उस चाय के कप और ताजे खाने को अवाक होकर देखती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। कहाँ सुबह से वह एक-एक घूंट चाय के लिए तरस रही थी, जलालत सह रही थी, और कहाँ इस अनजान लड़की ने बिना मांगे ही उसे इतना सम्मान और अपनापन दे दिया था।
दिसंबर की वह ठिठुरती हुई सुबह थी। बाहर कोहरा इतना घना था कि दस कदम की दूरी पर भी कुछ नजर नहीं आ रहा था। शारदा के घर की टिन की छत से ओस की बूंदें टपक कर सीधे फर्श पर गिर रही थीं। रात भर शारदा की आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था। एक तो कड़ाके की ठंड और उस पर से उसकी सात साल की बेटी मुनिया का तेज बुखार। मुनिया रात भर ज्वर में तपती रही और खांसती रही। शारदा के शराबी पति, माधव ने रात को घर आते ही बिना किसी बात के उस पर हाथ उठा दिया था। माधव ने जो पैसे शराब में उड़ा दिए थे, वे शारदा ने मुनिया की दवा के लिए बचा कर रखे थे। जब शारदा ने विरोध किया, तो उसे गालियों और मार का सामना करना पड़ा। शरीर पर माधव की मार के निशान और मन पर मुनिया की बीमारी का बोझ लिए, शारदा पूरी रात मुनिया के माथे पर पानी की पट्टियां रखती रही।
सुबह के छह बज चुके थे। शारदा का पूरा बदन दर्द से टूट रहा था। रात भर जागने, रोने और मार खाने की वजह से उसका सिर चकरा रहा था। पेट में भूख के मारे ऐंठन हो रही थी क्योंकि कल दोपहर के बाद से उसने अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डाला था। उसका मन कर रहा था कि आज वह काम पर न जाए, अपनी मुनिया को सीने से लगाकर इस ठंडी सुबह में थोड़ी देर सो ले। लेकिन तभी उसे याद आया कि अगर आज वह काम पर नहीं गई, तो मालकिन पैसे काट लेगी और फिर मुनिया के लिए दवा कैसे आएगी? इसी मजबूरी ने शारदा को बिस्तर से उठने पर विवश कर दिया। वह उठी, मुनिया को एक फटे हुए लेकिन मोटे कंबल में लपेटा, एक कटोरी में बचा हुआ बासी पानी पिया और अपने काम के लिए निकल पड़ी।
सड़क पर चलते हुए ठंडी हवाएँ तीर की तरह उसके शरीर को चीर रही थीं। उसका पहला घर, जहाँ उसे काम करना था, वह मालती मैडम का था। मालती मैडम का घर इलाके की सबसे पॉश सोसाइटी में था। जब शारदा वहां पहुँची, तो दीवार घड़ी में साढ़े सात बज रहे थे। वह अपने तय समय से लगभग बीस मिनट लेट थी।
दरवाजा खुलते ही मालती मैडम का पारा सातवें आसमान पर था। “यह क्या तरीका है शारदा? तुम्हारे पास घड़ी नहीं है क्या? या तुमने सोच लिया है कि तुम जब मर्जी आओगी और मैं तुम्हारा यहाँ बैठकर इंतजार करुँगी? मेरे पति को ऑफिस जाना है, बच्चों को स्कूल जाना है, और महारानी जी अब पधार रही हैं!” मालती मैडम ने एक ही सांस में उसे खूब जली-कटी सुना दी।
शारदा ने सिर झुकाए हुए, कांपती आवाज में कहा, “मैडम जी, मेरी मुनिया को रात भर बहुत तेज बुखार था। मैं पूरी रात सो नहीं पाई। बस उसे पट्टियां करती रही। इसलिए आज थोड़ी आंख लग गई थी और आने में देर हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिये।”
“तुम्हारे ये बहाने रोज के हैं! कभी बेटी बीमार, कभी पति ने पीटा। मुझे तुम्हारी इन झूठी कहानियों से कोई मतलब नहीं है। चुपचाप किचन में जाओ और बर्तन मांजो। आज मैंने नाश्ते में बहुत सारे बर्तन कर दिए हैं, जल्दी हाथ चलाना,” मालती मैडम ने कठोरता से कहा और अपने फोन में व्यस्त हो गईं।
शारदा चुपचाप किचन में चली गई। सिंक में जूठे बर्तनों का एक बड़ा सा पहाड़ लगा हुआ था। ठंडे पानी में हाथ डालते ही उसके हाथों की उंगलियां सुन्न पड़ने लगीं। रात भर की थकान, भूख और कमजोरी के कारण उसका सिर भयंकर रूप से चकरा रहा था। बर्तन धोते-धोते अचानक उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसे लगा कि वह अभी वहीं गिर पड़ेगी। उसने किसी तरह सिंक का किनारा पकड़ कर खुद को संभाला।
जब मालती मैडम किचन में आईं, तो शारदा ने हिम्मत करके पूछ ही लिया, “मैडम जी, क्या मुझे एक कप चाय मिल सकती है? मेरा सिर बहुत तेजी से घूम रहा है, रात से कुछ खाया-पीया नहीं है। बस एक कप गर्म चाय मिल जाती तो शरीर में थोड़ी जान आ जाती और मैं जल्दी से सारा काम निपटा लेती।”
मालती मैडम ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो या उनकी तिजोरी की चाबी मांग ली हो। “सुबह-सुबह चाय? तुम काम करने आती हो या यहाँ दावत उड़ाने? दूध कल का ही खत्म हो गया है और जो थोड़ा बहुत बचा था, वह मैंने अपने बच्चों के लिए रख छोड़ा है। तुम लोगों की तो आदत ही ख़राब होती है, उंगली पकड़ो तो पहुंचा पकड़ने लगते हो। जल्दी काम खत्म करो और अपने दूसरे घर जाकर जो पीना है पी लेना। मुझे ऑफिस के लिए निकलना है, तुम्हारे लिए चाय बनाने का समय नहीं है मेरे पास।”
शारदा ने एक गहरी सांस ली, अपने आंसुओं को वापस आँखों में धकेला और चुपचाप बाकी बचे बर्तन धोने लगी। उसके बाद उसने पूरे बड़े से घर में झाड़ू-पोंछा लगाया। जब वह वहां से निकली, तो उसके पैर मन-मन भर के भारी हो रहे थे।
उसका दूसरा घर कामिनी मैडम का था। कामिनी मैडम खुद को बहुत ही धर्म-कर्म वाली और दयालु महिला मानती थीं। उनके घर में हमेशा पूजा-पाठ चलता रहता था। शारदा को लगा कि शायद यहाँ उसे कुछ राहत मिलेगी। कामिनी मैडम के यहाँ पहुँचते ही उसने देखा कि मैडम पूजा कर रही हैं। शारदा ने बिना कोई आवाज़ किए घर का सारा काम शुरू कर दिया। झाड़ू, पोंछा, डस्टिंग सब कुछ उसने अपनी बची-खुची ताकत लगाकर किया। लेकिन पेट की आग अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। एसिडिटी के कारण उसके सीने में जलन हो रही थी और होंठ पूरी तरह सूख चुके थे।
जब कामिनी मैडम की पूजा खत्म हुई, तो शारदा ने डरते-डरते कहा, “दीदी, आज सुबह से कुछ नहीं खाया है। शरीर में बिल्कुल भी ताकत नहीं बची है। क्या रात की कोई बची हुई एक रोटी मिल जाएगी? या फिर एक कप चाय ही दे दीजिये।”
कामिनी मैडम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोलीं, “अरे शारदा, तुम लोग भी ना, बस खाने के लिए ही काम करते हो। चाय तो अभी मैंने बनाई नहीं है और मेरे पास दूध भी नाप का ही आता है। लेकिन हाँ, तुम कह रही हो तो मैं देखती हूँ।”
कुछ देर बाद कामिनी मैडम एक पुरानी प्लास्टिक की पन्नी में कुछ लपेट कर लाईं। “ये लो, इसमें कल सुबह की दो रोटियां हैं और थोड़ी सी आलू-गोभी की सब्जी बची है। यह खा लेना, इससे तुम्हें ताकत मिल जाएगी। तुम भी क्या याद करोगी कि मैं तुम्हारा कितना ख्याल रखती हूँ।”
शारदा ने पन्नी हाथ में ली तो वह बिल्कुल ठंडी और सख्त थी। उसने पन्नी खोलकर देखा। रोटियां सूखकर पापड़ जैसी हो गई थीं और सब्जी से एक अजीब सी खट्टी महक आ रही थी, जो साफ बता रही थी कि वह खराब हो चुकी है। शारदा का स्वाभिमान अंदर ही अंदर रो पड़ा। क्या वह कोई कूड़ेदान थी जिसमें सड़ा-गला और खराब खाना डाला जा रहा था? क्या एक गरीब की भूख की कीमत बस इतनी ही होती है कि उसे जानवरों की तरह बासी खाना दे दिया जाए?
“दीदी, यह सब्जी तो खराब हो गई है, इसमें से बदबू आ रही है,” शारदा ने संकोच के साथ कहा।
कामिनी मैडम ने तुरंत मुँह बनाते हुए कहा, “नखरे तो देखो महारानी के! मुफ्त का खाना भी चाहिए और उसमें भी ताजगी चाहिए। नहीं खाना तो वहीं स्लैब पर रख दो, मैं बाहर कुत्ते को डाल दूंगी। तुम लोगों को कभी कोई खुश नहीं कर सकता।”
शारदा ने वह पन्नी चुपचाप वहीं रख दी। उसने वहां से एक गिलास सादा पानी पिया और अपना काम खत्म करके बाहर निकल आई। अब तक दोपहर के बारह बज चुके थे। धूप तो निकल आई थी, लेकिन शारदा के अंदर का मौसम बेहद सर्द और वीरान हो चुका था। उसकी आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। वह सड़क पर चलते हुए सोच रही थी कि क्या गरीब इंसान की कोई इज्जत नहीं होती? क्या वे लोग इंसान नहीं, सिर्फ मशीनें हैं, जिनसे बस काम लिया जाता है?
आखिरी घर सुमेधा मैडम का था। सुमेधा एक जवान कामकाजी महिला थीं जो हाल ही में इस शहर में शिफ्ट हुई थीं। शारदा उनके यहाँ पिछले एक महीने से ही काम कर रही थी। सुमेधा के घर पहुँचने तक शारदा की हालत ऐसी हो गई थी कि वह मुश्किल से अपने पैरों पर खड़ी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे साफ नजर आ रहे थे।
उसने कांपते हाथों से डोरबेल बजाई। सुमेधा ने जैसे ही दरवाजा खोला, वह शारदा की हालत देखकर चौंक गई।
“शारदा दीदी? क्या हुआ आपको? आपकी तबीयत तो ठीक है? आपका चेहरा इतना उतरा हुआ और पीला क्यों पड़ रहा है?” सुमेधा ने चिंता भरे स्वर में पूछा।
शारदा ने कुछ कहने के लिए अपना मुंह खोला, लेकिन उसके गले से आवाज ही नहीं निकली। वह बस अपना झाड़ू उठाने के लिए आगे बढ़ी।
“अरे नहीं नहीं, आप यह झाड़ू वहीं रख दीजिये,” सुमेधा ने शारदा के हाथ से झाड़ू ले लिया। “आप पहले यहाँ सोफे पर बैठिए।”
“नहीं मैडम जी, मैं फर्श पर ही ठीक हूँ। मेरे कपड़े गंदे हैं, आपका सोफा खराब हो जाएगा,” शारदा ने हिचकिचाते हुए कहा।
“कोई सोफा खराब नहीं होगा दीदी। आप इंसान हैं, कोई मशीन नहीं। चुपचाप यहाँ बैठिए,” सुमेधा ने लगभग जिद करते हुए शारदा को सोफे पर बैठा दिया। सुमेधा तुरंत रसोई में गई और एक गिलास गुनगुना पानी लेकर आई। “पहले यह पानी पीजिये। आपके हाथ कितने ठंडे हो रहे हैं और आप कांप भी रही हैं। क्या बात है दीदी? घर में सब ठीक तो है?”
शारदा जो सुबह से अपनी भावनाओं को दबाए बैठी थी, सुमेधा के इन प्यार भरे मीठे शब्दों को सुनकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसने रोते हुए सुमेधा को सब कुछ बता दिया—रात भर अपनी बच्ची के बुखार में जागना, पति की मारपीट, सुबह से कुछ न खाना और बाकी दोनों घरों की मालकिनों का क्रूर व्यवहार।
सुमेधा सब कुछ सुनती रही। उसकी आँखों में भी नमी आ गई थी। वह बिना कुछ कहे उठी और वापस रसोई में चली गई। दस मिनट बाद वह बाहर आई तो उसके एक हाथ में अदरक, इलायची वाली गरमा-गरम चाय का बड़ा सा कप था और दूसरे हाथ में एक प्लेट थी, जिसमें दो ताज़े, गर्म आलू के पराठे और थोड़ा सा अचार रखा था।
“दीदी, सबसे पहले आप यह खाइये। और हाँ, काम की चिंता बिल्कुल मत कीजिये। आज मेरा वर्क फ्रॉम होम है, मैं अपना काम खुद कर लूंगी। आप आराम से यह चाय पीजिये और पराठे खाइये। उसके बाद मैं आपको कुछ दवाइयाँ दूंगी जो आप अपनी मुनिया को जाकर दे देना। और यह लीजिये पांच सौ रुपये, अपनी बेटी के लिए कुछ फल और अच्छी चीजें ले जाना रास्ते से।”
शारदा स्तब्ध रह गई। वह सुमेधा को और फिर उसके हाथ में उस चाय के कप और ताजे खाने को अवाक होकर देखती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। कहाँ सुबह से वह एक-एक घूंट चाय के लिए तरस रही थी, जलालत सह रही थी, और कहाँ इस अनजान लड़की ने बिना मांगे ही उसे इतना सम्मान और अपनापन दे दिया था।
शारदा ने कांपते हाथों से चाय का कप पकड़ा। चाय की पहली चुस्की लेते ही उसे ऐसा लगा जैसे उसके निर्जीव शरीर में प्राण लौट आए हों। चाय की वह गर्माहट केवल उसके शरीर को ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को भी सुकून दे रही थी।
“भगवान आपका हमेशा भला करे मैडम जी। आपको दुनिया की सारी खुशियां मिलें। आपने आज एक गरीब की दुआ ली है,” शारदा फफकते हुए बोली।
सुमेधा सोफे के पास ही एक स्टूल पर बैठ गई और शारदा को देखते हुए सोचने लगी। उसने कोई बहुत बड़ा खजाना या अपनी आधी संपत्ति तो शारदा के नाम नहीं कर दी थी। उसने तो बस वही किया था जो एक इंसान को दूसरे इंसान के लिए करना चाहिए। बस एक कप चाय और दो ताज़े पराठे ही तो दिए थे। फिर ऐसा क्यों था कि शारदा की आँखों में उसके लिए भगवान जैसा सम्मान दिख रहा था?
शायद इसलिए क्योंकि आज के इस आधुनिक और भागते हुए समाज में, बड़े-बड़े घरों में रहने वाले लोग सब कुछ खरीद सकते हैं, लेकिन वह सहानुभूति, वह इंसानियत और वह अपनत्व कहीं खो गया है। सुमेधा को समझ आ गया था कि किसी भूखे को खाना और किसी थके हुए को सम्मान देना, दुनिया की सबसे बड़ी पूजा है। उस एक प्याली चाय ने आज दो अलग-अलग दुनिया की औरतों के बीच एक ऐसा मानवीय रिश्ता जोड़ दिया था, जो किसी भी वेतन या नौकरी के रिश्ते से कहीं अधिक गहरा और पवित्र था।
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लेखिका : नर्मदा श्रीवास्तव