वफ़ादार

अंदर का नजारा देखकर रोहन के होश उड़ गए। ब्रूनो तुरंत रोहन के पैंट को अपने मुंह से पकड़कर उसे बेडरूम की तरफ खींचने लगा। रोहन दौड़ा-दौड़ा बेडरूम में गया, तो देखा कि सुमित्रा जी फर्श पर बेसुध पड़ी थीं। शायद वे बाथरूम से लौटते वक्त फिसल कर गिर गई थीं। उनका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था और वे लगभग बेहोशी की हालत में थीं। रोहन ने घबराकर तुरंत उन्हें उठाया और बिस्तर पर लिटाया। उसने अपनी माँ को जोर से आवाज़ लगाई।

लखनऊ के पुराने गोमती नगर इलाके में एक बहुत ही खूबसूरत और शांत सा घर था—’शांति निकेतन’। इस घर में साठ वर्षीय श्रीमती सुमित्रा देवी बिल्कुल अकेली रहती थीं। उनके पति, जो एक सरकारी अधिकारी थे, का देहांत पाँच साल पहले ही हो चुका था। उनके दो बच्चे थे—एक बेटा और एक बेटी। दोनों ही अपनी-अपनी उच्च शिक्षा और फिर बेहतरीन नौकरियों के सिलसिले में विदेश जा बसे थे। बेटा लंदन में एक बड़ी आईटी कंपनी में काम करता था, तो बेटी अमेरिका में डॉक्टर थी। दोनों बच्चे अपनी माँ से बहुत प्यार करते थे, हर महीने पैसे भी भेजते और हफ्ते में एक बार वीडियो कॉल पर बात भी कर लेते थे, लेकिन दूरियों ने उस विशाल घर में एक अजीब सा सन्नाटा भर दिया था। सुमित्रा जी के दिन किसी तरह कट जाते, लेकिन रातें बहुत भारी लगती थीं। घर के हर कोने में बच्चों की यादें बिखरी पड़ी थीं, जो अक्सर उन्हें रुला दिया करती थीं।

एक दिन, सर्दियों की एक ठंडी शाम को, सुमित्रा जी मंदिर से लौट रही थीं। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और ठंडी हवाएँ हड्डियों को कंपा रही थीं। तभी उन्हें सड़क के किनारे से एक बहुत ही धीमी और दर्द भरी आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने ठिठक कर देखा तो पाया कि एक छोटा सा, भूरे रंग का पिल्ला कीचड़ में सना हुआ, ठंड से कांप रहा था। किसी गाड़ी ने शायद उसे हल्की सी टक्कर मार दी थी, जिससे उसके पिछले पैर में चोट लग गई थी। सुमित्रा जी का मातृ हृदय उस छोटे से जीव की तड़प देखकर पसीज गया। उन्होंने बिना कुछ सोचे अपनी महंगी शॉल में उस पिल्ले को लपेटा और घर ले आईं।

घर आकर उन्होंने उसे गर्म पानी से नहलाया, उसके घाव पर हल्दी और तेल का लेप लगाया और उसे कटोरी में थोड़ा सा गर्म दूध पीने को दिया। उस रात पहली बार सुमित्रा जी को ऐसा लगा जैसे उनके घर का सूनापन थोड़ा कम हो गया हो। उन्होंने उस पिल्ले का नाम रखा—’ब्रूनो’।

दिन बीतते गए और ब्रूनो सुमित्रा जी की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया। वह सिर्फ एक कुत्ता नहीं, बल्कि उनका साथी, उनका बेटा और उनके अकेलेपन का सबसे बड़ा सहारा बन चुका था। सुमित्रा जी उसे बिल्कुल अपने बच्चों की तरह ही पालती थीं। ब्रूनो के लिए अलग से मलाई वाला दूध आता, उसके लिए खास तरह के बिस्कुट मंगवाए जाते और जब सुमित्रा जी खाना खातीं, तो ब्रूनो उनके पैरों के पास बैठकर अपनी पूंछ हिलाता रहता। ऐसा कभी नहीं हुआ कि सुमित्रा जी ने अपने निवाले में से पहला हिस्सा ब्रूनो को न दिया हो। ब्रूनो भी सुमित्रा जी की हर भावना को समझने लगा था। जब वे उदास होतीं, तो वह अपना सिर उनकी गोद में रख देता और जब वे खुश होतीं, तो वह पूरे घर में गोल-गोल दौड़ लगाकर अपनी खुशी जाहिर करता। पड़ोसियों को भी यह देखकर अचरज होता था कि एक बेज़ुबान जानवर और एक इंसान के बीच इतना गहरा और पवित्र रिश्ता कैसे हो सकता है।

सुमित्रा जी के घर के ठीक बगल वाले मकान में एक नया परिवार किराए पर रहने आया था। उस परिवार में एक बाइस साल का नौजवान लड़का था—रोहन। रोहन सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था और दिन-रात अपनी किताबों में ही डूबा रहता था। रोहन की सुमित्रा जी से ज्यादा बातचीत तो नहीं थी, लेकिन वह बालकनी से अक्सर सुमित्रा जी और ब्रूनो को साथ खेलते, बातें करते और शाम को टहलते हुए देखता था। उसे सुमित्रा जी में अपनी दादी की झलक दिखती थी, जो अब इस दुनिया में नहीं थीं। रोहन की माँ भी सुमित्रा जी का बहुत सम्मान करती थीं और कभी-कभार कोई खास पकवान बनने पर सुमित्रा जी को देना नहीं भूलती थीं।

फरवरी का महीना था और मौसम ने अचानक करवट ली। लगातार तीन दिनों से शहर में बेमौसम बारिश हो रही थी और ठंडी हवाओं ने लोगों का घरों से निकलना मुश्किल कर दिया था। रोहन की परीक्षा में बस कुछ ही दिन बचे थे, इसलिए वह अपने कमरे की खिड़की बंद करके लगातार पढ़ाई कर रहा था। तभी उसकी माँ उसके कमरे में आईं। उनके चेहरे पर चिंता के भाव थे। उन्होंने रोहन से कहा, “रोहन बेटा, जरा बाहर जाकर देख तो, बगल वाली सुमित्रा आंटी के घर से कल सुबह से कोई आहट नहीं आई है। उनका दूध का पैकेट भी कल से दरवाजे पर ही पड़ा है और आज का अखबार भी बाहर ही भीग रहा है। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा। जा कर देख, आंटी ठीक तो हैं?”

रोहन ने अपनी किताब बंद की और बोला, “माँ, हो सकता है आंटी सो रही हों या ठंड की वजह से बाहर न निकली हों। आप बेवजह परेशान हो रही हैं।”

“नहीं बेटा,” माँ ने जोर देते हुए कहा, “कल से मैंने ब्रूनो के भौंकने की भी कोई आवाज़ नहीं सुनी है। वह तो दिन में दो-तीन बार आंटी के साथ लॉन में जरूर आता है। मेरा मन बहुत घबरा रहा है। तुम जाकर एक बार बेल बजाकर देख लो।”

रोहन ने जैकेट पहनी और सुमित्रा जी के घर की तरफ चल दिया। उसने जाकर मेन गेट की घंटी बजाई। एक बार, दो बार, तीन बार… लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। रोहन को अब सचमुच चिंता होने लगी। उसने सुमित्रा जी के मोबाइल पर फोन भी लगाया, लेकिन वह स्विच ऑफ बता रहा था। बारिश तेज हो रही थी। रोहन ने गेट को जोर से धक्का दिया, गनीमत थी कि गेट अंदर से पूरी तरह लॉक नहीं था, बस कुंडी अटकी हुई थी। वह किसी तरह कुंडी खोलकर अंदर घुसा।

जैसे ही वह पोर्च में पहुँचा, उसने देखा कि हॉल की एक खिड़की का शीशा थोड़ा सा खुला हुआ था। उसी खिड़की के पास से ब्रूनो की बहुत ही धीमी और रुंआसी आवाज़ आ रही थी। रोहन ने खिड़की से झांकने की कोशिश की, तो ब्रूनो वहां खड़ा था। ब्रूनो ने रोहन को देखते ही खिड़की के शीशे पर अपने पंजे मारने शुरू कर दिए और अजीब सी करुण आवाज़ निकालने लगा, जैसे वह रोहन से मदद की गुहार लगा रहा हो। रोहन समझ गया कि कुछ तो बहुत गलत हुआ है। उसने किसी तरह उस खिड़की को पूरा खोला और अंदर कूद गया।

अंदर का नजारा देखकर रोहन के होश उड़ गए। ब्रूनो तुरंत रोहन के पैंट को अपने मुंह से पकड़कर उसे बेडरूम की तरफ खींचने लगा। रोहन दौड़ा-दौड़ा बेडरूम में गया, तो देखा कि सुमित्रा जी फर्श पर बेसुध पड़ी थीं। शायद वे बाथरूम से लौटते वक्त फिसल कर गिर गई थीं। उनका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था और वे लगभग बेहोशी की हालत में थीं। रोहन ने घबराकर तुरंत उन्हें उठाया और बिस्तर पर लिटाया। उसने अपनी माँ को जोर से आवाज़ लगाई।

रोहन की माँ भी दौड़कर आ गईं। उन्होंने सुमित्रा जी के हाथ-पैर रगड़े और रोहन ने जल्दी से पड़ोस के डॉक्टर अंकल को फोन कर दिया। डॉक्टर साहब कुछ ही देर में आ गए। उन्होंने सुमित्रा जी की जांच की और बताया, “इन्हें बहुत तेज वायरल फीवर है और कमजोरी की वजह से चक्कर खाकर गिर गई थीं। अच्छा हुआ तुम लोगों ने समय पर देख लिया, वरना इस उम्र में ठंड और डिहाइड्रेशन से स्थिति बहुत बिगड़ सकती थी।” डॉक्टर ने उन्हें एक इंजेक्शन दिया और कुछ दवाइयां लिखकर चले गए।

थोड़ी देर बाद सुमित्रा जी को होश आया। उन्होंने अपनी आंखें खोलीं तो रोहन और उसकी माँ को अपने पास खड़ा पाया। रोहन ने राहत की सांस लेते हुए पूछा, “आंटी, आप ठीक हैं? आपने हमें आवाज़ क्यों नहीं दी? कल से आपने कुछ खाया भी नहीं होगा। आपके बच्चों को फोन मिलाऊं?”

सुमित्रा जी ने बड़ी मुश्किल से अपने सूखे होंठों को हिलाते हुए कहा, “नहीं बेटा, उन्हें फोन मत करना। वे वहां मीलों दूर हैं, बेवजह परेशान हो जाएंगे। आ भी नहीं पाएंगे इतनी जल्दी। मुझे बस बुखार हो गया था और कल रात अचानक चक्कर आ गया। मैं ठीक हो जाऊंगी।”

रोहन की माँ ने प्यार से सुमित्रा जी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “दीदी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। जब तक आप पूरी तरह ठीक नहीं हो जातीं, हम यहीं हैं। मैंने आपके लिए खिचड़ी बना दी है, आप थोड़ा सा खा लीजिए और दवा ले लीजिए।”

सुमित्रा जी ने सिर हिलाया। तभी उनकी नज़र बिस्तर के नीचे बैठे ब्रूनो पर पड़ी। वह बिल्कुल शांत बैठा था, उसकी आँखें लाल थीं और ऐसा लग रहा था जैसे वह रो रहा हो। सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से उसकी तरफ इशारा किया और रोहन से कहा, “बेटा… मेरे किचन में एक डिब्बे में ब्रूनो के बिस्कुट रखे होंगे… और फ्रिज में दूध होगा। कल से इस बेचारे ने कुछ नहीं खाया है। जब से मैं गिरी हूँ, यह मेरे पास से एक इंच भी नहीं हिला है। इसे कुछ खिला दो।”

रोहन तुरंत किचन में गया। उसने एक कटोरी में दूध गर्म किया, उसमें ब्रूनो के पसंदीदा बिस्कुट तोड़े और लाकर ब्रूनो के सामने रख दिए। “ले ब्रूनो, खा ले,” रोहन ने प्यार से कहा।

लेकिन ब्रूनो ने कटोरी की तरफ देखा तक नहीं। उसने अपना मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया और सुमित्रा जी के लटकते हुए हाथ को चाटने लगा। रोहन को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अपनी माँ की तरफ देखा। माँ ने कहा, “शायद यह डरा हुआ है बेटा। इसके मुंह के पास ले जाकर खिलाने की कोशिश कर।”

रोहन ने बिस्कुट का एक टुकड़ा अपने हाथ में लिया और ब्रूनो के मुंह के पास ले गया, लेकिन ब्रूनो ने फिर मुंह फेर लिया। वह एक अजीब सी दर्द भरी आवाज़ निकालते हुए सुमित्रा जी के चेहरे की तरफ देख रहा था।

सुमित्रा जी, जो यह सब देख रही थीं, की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उनका ब्रूनो क्यों भूखा है। उन्होंने बहुत ही कमजोर आवाज़ में रोहन से कहा, “बेटा… वह खिचड़ी की कटोरी मुझे देना।”

रोहन ने खिचड़ी की कटोरी सुमित्रा जी के हाथों में दे दी। सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से चम्मच उठाया और खिचड़ी का एक छोटा सा निवाला अपने मुंह में रखा। फिर उन्होंने ब्रूनो की तरफ देखते हुए कहा, “देख मेरा बच्चा… तेरी माँ ने खाना खा लिया ना। अब तू भी खा ले। मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

यह देखते ही जैसे ब्रूनो की जान में जान आ गई। वह तुरंत बिस्तर पर चढ़ गया, सुमित्रा जी का चेहरा चाटने लगा और खुशी से अपनी पूंछ हिलाने लगा। फिर वह नीचे उतरा और एक ही सांस में अपनी कटोरी का पूरा दूध और बिस्कुट सफाचट कर गया।

यह दृश्य देखकर रोहन और उसकी माँ की आंखें भी छलक आईं। रोहन सोचने लगा कि दुनिया कहती है कि जानवर इंसान की भाषा नहीं समझते, लेकिन यहाँ तो एक बेज़ुबान जानवर ने बिना कुछ कहे ही रिश्ते की सबसे गहरी भाषा बोल दी थी। जो अपने खून के रिश्ते थे, वो मीलों दूर बैठकर सिर्फ स्क्रीन पर चिंता जता सकते थे, लेकिन यह बेज़ुबान इस बूढ़ी औरत की सांसों से अपनी सांसें जोड़कर बैठा था। जब तक माँ ने नहीं खाया, बेटे ने भी अन्न का एक दाना मुंह में नहीं रखा।

रोहन ने आगे बढ़कर ब्रूनो के सिर पर हाथ फेरा। ब्रूनो ने भी रोहन की तरफ कृतज्ञता भरी नजरों से देखा, मानो कह रहा हो कि उसकी दुनिया को बचाने के लिए शुक्रिया। उस दिन के बाद से रोहन और सुमित्रा जी का रिश्ता भी बदल गया। रोहन अब अक्सर अपनी पढ़ाई के बीच थोड़ा समय निकालकर सुमित्रा जी और ब्रूनो के पास बैठने लगा था। उसे एहसास हो गया था कि इस भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ इंसान अपने असली रिश्तों से दूर होता जा रहा है, वहाँ प्रेम और वफादारी की असली मिसाल तो ये बेज़ुबान जानवर ही पेश कर रहे हैं।

अगर आपको लगता है कि इंसानियत और निस्वार्थ प्रेम आज भी जिंदा है, तो कमेंट करके बताएं कि आपके जीवन में ऐसा कौन सा बेज़ुबान साथी रहा है जिसने आपका दिल जीता हो?

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

लेखिका : वैशाली सिन्हा

error: Content is protected !!