रघुनाथ जी मुस्कुराए, पर उस मुस्कान में एक अजीब सा दर्द था। उन्होंने बहुत ही धीमी लेकिन चुभने वाली आवाज में पूछा, “और… इंसानियत? आत्मीयता? क्या ये मशीन वो भी मंगवा सकती है? क्या ये बता सकती है कि तेरी मां जब रसोई में अकेले काम करती है, तो उसके दिल में अपने बेटे से दो पल बात करने की कितनी तड़प होती है? क्या तेरा ये जादुई डिब्बा एक बाप की वो खुशी खरीद सकता है, जो उसे अपने बच्चों को साथ बैठकर हंसते-बोलते देखने से मिलती है?”
रोहन के पास कोई जवाब नहीं था। उसकी उंगलियां, जो अब तक स्क्रीन पर नाच रही थीं, अचानक रुक गईं।
कई सालों बाद, रघुनाथ जी अपने पुश्तैनी गांव से शहर आए थे। उनके चेहरे पर पड़ी झुर्रियां उनके जीवन के तजुर्बे को बयां कर रही थीं, लेकिन आंखों में एक बच्चे जैसी चमक थी। वे अपने इकलौते पोते, रोहन से मिलने के लिए बेहद उत्साहित थे। बचपन में रोहन उनके कंधों पर बैठकर पूरे गांव की सैर करता था। अब वह शहर का एक बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गया था। रघुनाथ जी अपने साथ गांव की मिट्टी की सोंधी महक, रोहन के पसंदीदा आम के अचार का मर्तबान और ढेर सारी यादें लेकर आए थे।
ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे रघुनाथ जी की नजरें बार-बार उस बंद दरवाजे की ओर उठ रही थीं, जिसके पीछे उनका पोता मौजूद था। रसोई में उनकी बहू, मीना, सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाने में जुटी थी। घर में देसी घी और मसालों की खुशबू तैर रही थी, लेकिन उस घर के माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल एक ही चीज तोड़ रही थी—लगातार बजने वाली मोबाइल की नोटिफिकेशन्स की आवाज।
तभी रोहन का दरवाजा खुला। वह एक हाथ में अपना लैपटॉप बैग और दूसरे हाथ में अपना कीमती स्मार्टफोन पकड़े हुए था। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर किसी मशीन की तरह तेजी से चल रही थीं। कानों में वायरलेस इयरफोन लगे थे।
“अच्छा मां, मैं निकल रहा हूं, आज शाम को मीटिंग है तो मुझे लेट हो जाएगा। मेरे लिए खाना मत रखना,” रोहन ने बिना सिर उठाए ही कहा।
रघुनाथ जी, जो सोफे से उठकर उसे गले लगाने के लिए आधे खड़े हो गए थे, ठिठक कर रह गए। उन्होंने अपने कांपते हाथों से अपनी धोती का सिरा पकड़ा और थोड़ी भारी आवाज में बोले, “अरे बेटा! कल रात को ही तो मैं आया हूं और तूने तब से ठीक से बात भी नहीं की। अभी तो सुबह हुई है, कुछ देर तो पास बैठ जा। बचपन में तो तू मेरी छाती से चिपक कर सोया करता था।”
रोहन ने पल भर के लिए स्क्रीन से नजरें हटाईं, दादाजी की ओर देखा और एक हल्की सी, बनावटी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए बोला, “सॉरी दादाजी! आज वीकेंड नहीं है ना। ऑफिस में बहुत काम है। मेरे क्लाइंट्स वेट कर रहे हैं। संडे को पक्का आपके साथ बैठूंगा। अभी मुझे एक कैब बुक करनी है।”
मीना रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और निराशा थी। उसने धीमी आवाज में कहा, “रोहन, मैंने जो लिस्ट व्हाट्सएप की थी, उसका सामान मंगवा दिया? घर में दाल और तेल खत्म हो गया है। शाम को कुछ मेहमान भी आने वाले हैं।”
“उफ्फ मॉम! कितनी बार कहा है कि मुझे काम के बीच में इन सब चीजों के लिए डिस्टर्ब मत किया करो। मैंने ऐप से ग्रोसरी ऑर्डर कर दी है, दस मिनट में डिलीवरी बॉय गेट पर आ जाएगा। और प्लीज, मुझे बार-बार फोन करके ये मत पूछना कि मैं कब आऊंगा। मेरे कलीग्स मुझे चिढ़ाते हैं कि मैं अभी भी मम्माज बॉय हूं,” रोहन ने थोड़ी झुंझलाहट के साथ कहा और वापस अपनी स्क्रीन में गुम हो गया।
“ठीक है बेटा, नहीं करूंगी फोन,” मीना ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा और वापस रसोई में लौट गई।
रघुनाथ जी यह सब बहुत ही अचरज से देख रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन सा काम है जो इस छोटे से कांच के टुकड़े के बिना नहीं हो सकता। जिस पोते की आवाज सुनने के लिए वे महीनों तरसते थे, वह उनके सामने खड़ा था, लेकिन मीलों दूर महसूस हो रहा था।
“ये क्या है बेटा? जब से आया हूं, देख रहा हूं कि तेरी नजरें इस शीशे के टुकड़े से हट ही नहीं रही हैं,” रघुनाथ जी ने सोफे के किनारे पर बैठते हुए, रोहन के हाथ में मौजूद मोबाइल को घूरते हुए पूछा।
रोहन ने एक लंबी सांस ली। उसे लगा जैसे उसे किसी आदिमानव को आधुनिक विज्ञान समझाना पड़ रहा हो। उसने अपना बैग सोफे पर रखा और दादाजी के पास बैठकर, अपना फोन उनकी आंखों के सामने करते हुए बोला, “दादाजी, ये सिर्फ शीशे का टुकड़ा नहीं है, ये स्मार्टफोन है। और सच कहूं तो आजकल हम शहर वालों की सांसें इसी से चलती हैं। इसके बिना हमारा एक कदम भी चलना मुश्किल है।”
“ऐसा क्या जादू है इसमें?” रघुनाथ जी ने फोन को ऐसे देखा जैसे कोई जादुई चिराग हो।
“जादू ही समझ लीजिए दादाजी,” रोहन ने उत्साह से अपनी स्क्रीन को स्वाइप करते हुए कहा। “देखिए, मैं यहां बैठा-बैठा अमेरिका में बैठे अपने बॉस से आमने-सामने बात कर सकता हूं। मुझे बैंक जाने की जरूरत नहीं, मेरे सारे पैसे इसी में हैं। मुझे कोई रास्ता भटकने का डर नहीं, क्योंकि इसमें पूरा नक्शा है।”
रोहन ने कैमरा चालू किया और स्क्रीन दादाजी की ओर घुमा दी। “ये देखिए!”
रघुनाथ जी अपनी ही तस्वीर उस स्क्रीन पर देखकर एकदम चौंक गए। “अरे बाप रे! इसमें तो मैं बिलकुल वैसा ही दिख रहा हूं जैसा शीशे में। बल्कि और भी साफ! मुझे तो पता ही नहीं था कि मैं ऐसा दिखता हूं।”
“यही तो बात है दादाजी! इसे सेल्फी कहते हैं,” रोहन मुस्कुराया। “इस छोटे से डब्बे में पूरी दुनिया सिमटी हुई है। आपको कुछ भी चाहिए—सुई से लेकर हवाई जहाज की टिकट तक, सब बस एक टच पर आपके दरवाजे पर हाजिर हो जाता है। आपको कुछ पढ़ने का मन है, दुनिया की कोई भी किताब इसमें मिल जाएगी। कोई फिल्म देखनी है, वो भी इसमें है। यह हमारा काम इतना आसान कर देता है कि हमें किसी और की जरूरत ही महसूस नहीं होती।”
रघुनाथ जी ध्यान से रोहन की बातें सुन रहे थे। उन्होंने उस फोन को अपने खुरदरे हाथों में लिया। स्क्रीन की ठंडी सतह ने उनकी हथेलियों को छुआ। उन्होंने देखा कि कैसे उस स्क्रीन पर अलग-अलग रंग बिरंगी तस्वीरें और आइकन चमक रहे थे। उन्हें लगा जैसे यह कोई अलादीन का चिराग है, जो हर इच्छा पूरी कर सकता है।
उन्होंने फोन वापस रोहन के हाथ में रखा और एक गहरी, शांत नजरों से उसकी आंखों में देखा। कमरे का वातावरण अचानक से बहुत गंभीर हो गया।
“बेटा, तूने कहा कि ये सुई से लेकर सब कुछ घर ला सकता है?” दादाजी ने पूछा।
“हां दादाजी, बिल्कुल,” रोहन ने गर्व से कहा।
“कपड़े, गहने, खाने-पीने का सामान, सब कुछ?”
“सब कुछ दादाजी। आपको कुछ चाहिए क्या?”
रघुनाथ जी मुस्कुराए, पर उस मुस्कान में एक अजीब सा दर्द था। उन्होंने बहुत ही धीमी लेकिन चुभने वाली आवाज में पूछा, “और… इंसानियत? आत्मीयता? क्या ये मशीन वो भी मंगवा सकती है? क्या ये बता सकती है कि तेरी मां जब रसोई में अकेले काम करती है, तो उसके दिल में अपने बेटे से दो पल बात करने की कितनी तड़प होती है? क्या तेरा ये जादुई डिब्बा एक बाप की वो खुशी खरीद सकता है, जो उसे अपने बच्चों को साथ बैठकर हंसते-बोलते देखने से मिलती है?”
रोहन के पास कोई जवाब नहीं था। उसकी उंगलियां, जो अब तक स्क्रीन पर नाच रही थीं, अचानक रुक गईं।
रघुनाथ जी ने अपनी बात जारी रखी, “तू कहता है कि इसके बिना तेरी दुनिया नहीं चलती। पर बेटा, इस दुनिया को समेटने के चक्कर में तूने अपनी असली दुनिया को अपने से दूर कर दिया है। ये डिब्बा तुझे अमेरिका में बैठे अजनबी से तो जोड़ रहा है, लेकिन तेरे साथ, तेरे ही घर में बैठे तेरे अपनों से तुझे मीलों दूर कर चुका है। तूने इससे सब कुछ डाउनलोड करना सीख लिया, बस रिश्तों के संस्कार और अपनों के लिए वक़्त डाउनलोड करना भूल गया।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। रोहन के हाथ से फोन छूटकर सोफे पर गिर पड़ा। पहली बार उसे वो चमकती हुई स्क्रीन बहुत बेजान और खोखली लगने लगी। उसे याद आया कि पिछले कई महीनों से उसने अपनी मां के साथ बैठकर इत्मीनान से एक कप चाय तक नहीं पी थी। उसने अपने फोन में हजारों दोस्तों की लिस्ट बना रखी थी, लेकिन जब उसे असली सुकून की जरूरत होती थी, तो वह हमेशा खुद को अकेला पाता था।
उसने धीरे से अपना लैपटॉप बैग नीचे रखा और दादाजी के घुटनों के पास फर्श पर बैठ गया। उसने अपना सिर दादाजी की गोद में रख दिया, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह बचपन में किया करता था।
रघुनाथ जी ने अपने कांपते, खुरदरे हाथों से रोहन के बालों को सहलाया। मीना जो रसोई के दरवाजे पर खड़ी सब सुन रही थी, उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन आज वो आंसू खुशी के थे।
रोहन ने गहरी सांस ली और कहा, “दादाजी, गांव में आम के बाग कैसे हैं? मुझे वहां की बातें सुनाइए ना।”
उस दिन, रोहन का फोन पूरे दिन सोफे के एक कोने में पड़ा रहा, स्क्रीन काली और शांत थी। लेकिन उस घर में रिश्तों की जो नई रोशनी जली थी, वह किसी भी डिजिटल स्क्रीन की चमक से कहीं ज्यादा उज्ज्वल और सच्ची थी।
आपको क्या लगता है, क्या हमारे स्मार्टफोन सच में हमारी जिंदगी को स्मार्ट बना रहे हैं, या हमें भावनात्मक रूप से पंगु कर रहे हैं? अपने विचार जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें।
लेखिका : कमला त्यागी