गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा – अनिता शर्मा

बेटी – माँ! जब मैं गुस्से में होती हूँ तब मेरे मुँह से बुरे शब्द जल्दी क्यों निकलने लग जाते हैं? और फिर मुझसे कोई बात भी करना पसंद नहीं करता। सब मुझसे दूरी बना लेते हैं।

माँ – हाँ बेटी! क्योंकि गुस्सा हमारी भावनाओं पर हावी हो जाता है। गुस्सा भावनाओं का एक मजबूत हिस्सा होता है। इसलिए हमें जब गुस्सा आता है तो हमें और कुछ नहीं सुझता। एक तरह से हमारा दिमाग ही चलना बंद हो जाता है। हमारा अहम हमें ओर कुछ सोचने नहीं देता है।

बेटी- हाँ माँ, बात तो सही है, पर अगर किसी ने मुझे पहले बुरा बोला तब….?

माँ – बेटी तब भी हम चुन सकते है कि हम क्या बोले। दूसरे क्या बोल रहे हैं यह उनका चुनाव है, लेकिन हमें क्या बोलना है यह तो हम पर निर्भर करता है। बेटा हमारे शब्द हमारा आइना होते हैं। हम कैसे शब्दों का प्रयोग करते है वही शब्द हमारा स्तर बताते है।

बेटी – माँ ! क्या गुस्से में भी अदब से बात की जा सकती है?

माँ – हाँ बेटा, जरूर की जा सकती है। अदब का मतलब यह नहीं होता कि तुम अपनी बात न कहो। बस ऐसे बोलो कि सामने वाले को चोट न लगे। क्योंकि बाहर का जख्म तो भर जाता है परन्तु दिल पर लगी चोट का घाव एकदम नहीं भरता है। अगर हम इस चोट का ध्यान न रखें तो धीरे – धीरे सारे रिश्ते नाते ख़तम हो जाते हैं और हम अकेले रह जाते हैं। गुस्से में व्यक्ति अंधा हो जाता है लेकिन जब आँखें खुलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 

बेटी – फिर अपनी बात कैसे बोलना चाहिए माँ ?

माँ – जैसे तुम्हारी पसंदीदा चीज़ किसी ने ले ली हो तब ….तुम बहुत बुरे हो, कहने की बजाय बहुत अच्छे से ऐसे कह सकती हो – ‘ मुझे बहुत बुरा लगा, जब तुमने मेरी चीज़ को मुझसे पूछे बिना ले लिया’। आगे से पूछ लिया करो जी। ऐसा कहने से सामने वाले के दिल को चोट नहीं लगेगी और तुम्हारा उससे रिश्ता भी खराब नहीं होगा।

बेटी – मतलब समस्या बतानी है। किसी व्यक्ति को बुरा नहीं बोलना है।

माँ -हाँ बेटी, इसलिए गुस्से में कभी भी किसी को एकदम से कुछ न बोलना बल्कि थोड़ा संभलकर फिर बोलना चाहिए। क्योंकि गुस्सा सब कुछ बर्बाद कर देता है।

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नाम – अनिता शर्मा, इंदौर

रचना – मौलिक व अप्रकाशित

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