शहर के सबसे पॉश इलाके में बना ‘आशीर्वाद’ भवन बाहर से जितना आलीशान और शांत दिखता था, अंदर से उसमें उतनी ही अशांति और कलह मची रहती थी। सेठ रामनारायण जी के देहांत को अभी मुश्किल से दो साल ही बीते थे, लेकिन इस छोटे से अंतराल में ही उस घर की पूरी तस्वीर बदल चुकी थी। रामनारायण जी ने अपनी पूरी उम्र की गाढ़ी कमाई, शहर के बीचों-बीच स्थित यह कोठी और अपना फलता-फूलता व्यापार अपनी पत्नी सुभद्रा देवी के नाम कर दिया था। सुभद्रा देवी पैंसठ साल की एक बेहद सुलझी हुई और शांत स्वभाव की महिला थीं। उन्होंने अपने दोनों बेटों, रोहन और मयंक को बड़े लाड़-प्यार से पाला था, उन्हें आला दर्जे की शिक्षा दिलाई थी और उनकी शादियाँ भी बड़े घराने की लड़कियों से की थीं।
लेकिन कहते हैं न कि पैसा और लालच इंसान की आँखों पर ऐसा पर्दा डाल देते हैं कि उसे खून के रिश्ते भी नज़र नहीं आते। रामनारायण जी के जाने के बाद, घर में रोज़-रोज़ की खटपट शुरू हो गई। बड़ी बहू तान्या और छोटी बहू राधिका के बीच किसी न किसी बात को लेकर हमेशा ठनी रहती। कभी रसोई के खर्च को लेकर, कभी घर की साफ-सफाई को लेकर, तो कभी इस बात पर कि सुभद्रा देवी की देखभाल का ज़िम्मा किसके सिर ज़्यादा है।
सुभद्रा देवी अपने कमरे में बैठी-बैठी ये सब सुनती रहतीं। उनकी आँखों से मूक आँसू बहते रहते। जिन बेटों के लिए उन्होंने अपनी जवानी के सारे शौक कुर्बान कर दिए थे, वे ही बेटे अब एक-दूसरे की शक्ल देखना तक पसंद नहीं करते थे। रोहन, जो कि बड़ा था, हमेशा मयंक पर आरोप लगाता कि वह व्यापार में कम मेहनत करता है और मुनाफा बराबर का चाहता है। वहीं मयंक का तर्क था कि रोहन अपनी मनमानी करता है और उसे कोई अहमियत नहीं देता। बातों-बातों में दोनों भाइयों की बहस इतनी बढ़ जाती कि घर का माहौल युद्ध के मैदान जैसा हो जाता।
एक दिन तो हद ही हो गई। सुभद्रा देवी को रात में अचानक तेज़ बुख़ार आ गया। उनके सीने में भी हल्का दर्द था। उन्होंने काँपते हाथों से रोहन को आवाज़ दी, लेकिन वह अपने कमरे में कोई वेब सीरीज़ देखने में व्यस्त था। फिर उन्होंने मयंक को फोन लगाया, तो तान्या ने फोन उठाकर कहा कि मयंक सो रहे हैं और वह सुबह ही उठेंगे। सुभद्रा देवी सारी रात दर्द से तड़पती रहीं। सुबह जब नौकर घर आया, तब उसने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। उस दिन अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए सुभद्रा देवी ने एक बहुत बड़ा और कड़वा सच स्वीकार कर लिया था—उनके बेटे अब उनके नहीं रहे थे, वे सिर्फ उस जायदाद के वारिस रह गए थे जो अभी तक उनके नाम पर थी।
अस्पताल से घर लौटने के बाद, सुभद्रा देवी ने घर के माहौल को और भी ज़हरीला होते देखा। दोनों भाइयों में अब इस बात पर चर्चा होने लगी थी कि घर को बीच से बाँट दिया जाए।
एक शाम, रोहन और मयंक सुभद्रा देवी के कमरे में आए। उनके चेहरों पर एक अजीब सी बनावटी फिक्र थी। रोहन ने गला साफ करते हुए कहा, “माँ, आप तो देख ही रही हैं कि घर का माहौल दिन-ब-दिन कितना खराब होता जा रहा है। तान्या और राधिका की भी आपस में नहीं बनती। हम नहीं चाहते कि इस रोज़-रोज़ की चिक-चिक से आपकी सेहत पर कोई बुरा असर पड़े।”
मयंक ने तुरंत बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “हाँ माँ, भैया बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। हमने सोचा है कि अगर हम शांति से रहना चाहते हैं, तो हमें व्यापार और इस घर का बँटवारा कर लेना चाहिए। इससे रोज़ के झगड़े खत्म हो जाएँगे और सब सुकून से रह सकेंगे।”
सुभद्रा देवी ने अपनी धँसी हुई आँखों से दोनों बेटों को देखा और शांत स्वर में पूछा, “और मेरा क्या होगा? बँटवारे के बाद मैं कहाँ रहूँगी?”
रोहन ने तुरंत मुस्कुराते हुए कहा, “अरे माँ, आप कैसी बातें कर रही हैं! आप हमारी माँ हैं। आपका हिस्सा हम दोनों में बराबर बँटा रहेगा। हमने तय किया है कि आप पंद्रह दिन मेरे साथ ऊपर वाली मंज़िल पर रहेंगी, और पंद्रह दिन मयंक के साथ नीचे वाली मंज़िल पर। आपका पूरा ख्याल रखा जाएगा। आपको कोई तकलीफ नहीं होगी।”
सुभद्रा देवी के होंठों पर एक बहुत ही फीकी और दर्दभरी मुस्कान तैर गई। पंद्रह दिन! जिस माँ ने अपने शरीर का खून पिलाकर बच्चों को पाला, आज वही बच्चे उसे एक ‘ज़िम्मेदारी’ समझकर पंद्रह-पंद्रह दिनों की किश्तों में बाँट रहे थे। सुभद्रा देवी समझ गईं कि उनके बेटों को उनकी फिक्र नहीं है, बल्कि उन्हें उस करोड़ों की जायदाद की फिक्र है जिस पर अभी भी उनका नाम लिखा था।
सुभद्रा देवी ने एक गहरी साँस ली और कहा, “ठीक है। अगर तुम दोनों की इसी में भलाई है, तो मैं कल ही बँटवारे का कागज़ तैयार करवा लेती हूँ।”
यह सुनते ही दोनों भाइयों की आँखें चमक उठीं। उनके चेहरे की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी। वे दोनों अपनी माँ को आराम करने का बोलकर वहाँ से चले गए।
अगले दिन सुभद्रा देवी ने अपने पति के पुराने और भरोसेमंद वकील, श्रीमान माथुर को घर बुलाया। कमरे का दरवाज़ा बंद करके घंटों तक दोनों के बीच बातचीत हुई। सुभद्रा देवी ने कुछ कागज़ातों पर दस्तखत किए और माथुर जी को कुछ कड़े निर्देश दिए।
रविवार का दिन था। सुभद्रा देवी ने पूरे परिवार को ड्राइंग रूम में इकट्ठा होने के लिए कहा। रोहन, मयंक और उनकी दोनों पत्नियाँ बहुत उत्साहित थीं। उन्हें लग रहा था कि आज उन्हें उनके हिस्से की चाबी मिल जाएगी और वे इस रोज़ की किचकिच से आज़ाद होकर अपने-अपने हिस्से के मालिक बन जाएँगे।
वकील माथुर जी ने अपना ब्रीफकेस खोला और गले को साफ करते हुए कागज़ात बाहर निकाले। पूरे कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई, जिसमें सिर्फ लालच की साँसें सुनाई दे रही थीं।
माथुर जी ने सुभद्रा देवी की तरफ देखा, सुभद्रा देवी ने सहमति में सिर हिलाया।
माथुर जी ने पढ़ना शुरू किया, “स्वर्गीय सेठ रामनारायण जी की धर्मपत्नी, श्रीमती सुभद्रा देवी पूरे होशो-हवास में यह घोषणा करती हैं कि उनके नाम पर दर्ज शहर की यह कोठी ‘आशीर्वाद’, दोनों फैक्ट्रियाँ, और बैंक के सारे फिक्स्ड डिपॉजिट्स को तीन बराबर हिस्सों में बाँटा जा रहा है…”
“तीन हिस्से?” रोहन झटके से अपनी जगह से खड़ा हो गया। “तीन हिस्से कैसे? हम तो दो ही भाई हैं ना! तीसरा हिस्सा किसका है?”
मयंक भी घबरा गया। तान्या और राधिका के चेहरों का रंग उड़ गया। “माँ! कहीं पिताजी का कोई और… मेरा मतलब है, कोई छुपा हुआ रिश्तेदार तो नहीं आ गया?” राधिका ने हकलाते हुए पूछा।
सुभद्रा देवी अपनी कुर्सी पर बहुत ही शांत और स्थिर बैठी थीं। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और अपने दोनों बेटों की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “नहीं, तुम्हारे पिताजी का कोई और वारिस नहीं है। मैंने अपनी पूरी जायदाद के तीन हिस्से किए हैं। एक हिस्सा रोहन का, दूसरा हिस्सा मयंक का…”
“और तीसरा?” रोहन ने बेकरारी से पूछा, उसकी आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था।
“और तीसरा हिस्सा ‘अपनापन वृद्धाश्रम’ का,” सुभद्रा देवी ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा।
कमरे में जैसे बम फट गया। चारों तरफ सन्नाटा छा गया। रोहन और मयंक को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। करोड़ों रुपये की संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा एक वृद्धाश्रम को?
“माँ, आपका दिमाग तो खराब नहीं हो गया है?” मयंक चीख पड़ा। “आप हमारी जायदाद, हमारे खून-पसीने की कमाई किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम को कैसे दे सकती हैं? हम आपको पंद्रह-पंद्रह दिन रखने को तैयार तो थे। हमने कब कहा कि हम आपको घर से निकाल रहे हैं? फिर ये बाहरी लोगों को जायदाद लुटाने का क्या मतलब है?”
सुभद्रा देवी अपनी जगह से उठीं। उनके चेहरे पर आज कोई बेबसी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा तेज़ था जिसने दोनों भाइयों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
“तुम्हारी जायदाद? तुम्हारे खून पसीने की कमाई?” सुभद्रा देवी की आवाज़ में एक अजीब सी कड़क थी। “यह जायदाद तुम्हारे पिता ने अपनी जवानी गला कर बनाई है। और मैंने उस आदमी का साथ तब दिया था जब हमारे पास खाने को दो वक्त की रोटी भी नहीं होती थी। तुम दोनों को तो सब कुछ थाली में सजा-सजाया मिला है।”
सुभद्रा देवी रुकीं, उन्होंने एक लंबी साँस ली और आगे बोलीं, “तुम कह रहे हो कि तुम मुझे पंद्रह-पंद्रह दिन रखने को तैयार थे। बेटा, माँ कोई सूटकेस या फालतू फर्नीचर नहीं होती जिसे तुम अपनी सहूलियत के हिसाब से यहाँ से वहाँ खिसकाते रहो। जिस रात मैं दर्द से तड़प रही थी, तब तुम्हारा यह पंद्रह दिन का रूटीन कहाँ था? तब तो तुम दोनों एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डाल कर सो रहे थे।”
रोहन ने नज़रें चुराते हुए कहा, “माँ, वो तो एक भूल थी। हम आगे से आपका पूरा ख्याल रखेंगे। आप ये कागज़ात फाड़ दीजिए।”
“नहीं रोहन,” सुभद्रा देवी ने दृढ़ता से कहा। “यह सिर्फ एक कागज़ नहीं है, यह मेरे आत्मसम्मान का फैसला है। आज के इस घोर भौतिकवादी और स्वार्थी युग में, जब खून के रिश्ते सिर्फ पैसे की भाषा समझते हैं, तब एक वृद्धाश्रम ही हम जैसे बूढ़ों का ‘तीसरा बेटा’ होता है। यह वो बेटा है जो हमारी जायदाद के हिस्से नहीं करता, जो हमें पंद्रह दिनों की किश्तों में नहीं बाँटता। यह वो बेटा है जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी शिकायत के हमें अपने गले लगाता है और हमारे बुढ़ापे को एक छत देता है।”
सुभद्रा देवी की आँखों में अब आँसू नहीं थे। “मैंने वह तीसरा हिस्सा उस वृद्धाश्रम को सिर्फ दान में नहीं दिया है, बल्कि मैंने अपने लिए एक पक्का घर खरीदा है। मैं आज ही इस घर से जा रही हूँ। अब तुम दोनों इस घर के बाँट-बखरे करते रहना, लड़ते रहना। मुझे मेरी शांति और मेरा असली परिवार मिल गया है।”
सुभद्रा देवी मुड़ीं और अपने कमरे की तरफ चल दीं, जहाँ उनका एक छोटा सा सूटकेस पहले से ही पैक रखा था। पीछे रोहन, मयंक, तान्या और राधिका बुत बने खड़े थे। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस माँ को वे कमज़ोर और बेबस समझकर अपनी उँगलियों पर नचाने की कोशिश कर रहे थे, वह माँ अपने आत्मसम्मान के लिए करोड़ों की संपत्ति को ठोकर मार सकती है।
सुभद्रा देवी जब अपना सूटकेस लेकर मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल रही थीं, तो उन्होंने एक बार पलटकर उस बड़े से घर को देखा। उस घर में उनकी ज़िंदगी की बेशकीमती यादें थीं, लेकिन अब वहाँ सिर्फ ईंट-गारे का ढाँचा और स्वार्थ की बदबू बची थी। उन्होंने एक गहरी सुकून की साँस ली और बाहर खड़ी टैक्सी में बैठ गईं। ‘अपनापन वृद्धाश्रम’ की ओर बढ़ते हुए उन्हें लग रहा था जैसे वे किसी पराए घर से निकलकर, आखिरकार अपने असली घर की ओर जा रही हैं।
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