रिश्तों के आसमान

दोपहर की चिलचिलाती धूप में रसोई का काम समेटते हुए कविता के हाथ अचानक ठिठक गए। फोन की स्क्रीन पर स्कूल की प्रिंसिपल का नंबर चमक रहा था। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आई घबराई हुई आवाज ने कविता के पैरों तले से जमीन खिसका दी। “कविता जी, तुरंत सिटी अस्पताल पहुँचिए, आपकी बेटी रिया का एक्सीडेंट हो गया है।”

ये शब्द किसी भारी हथौड़े की तरह कविता के कानों पर पड़े। फोन हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया। उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। अभी सुबह ही तो वह अपने हाथों से रिया के बालों में दो चोटी गूँथकर, उसे उसके मनपसंद सैंडविच का टिफिन देकर स्कूल बस में बिठाकर आई थी। वह हँसती-खिलखिलाती हुई रिया… अचानक उसे क्या हुआ होगा? कैसी चोट आई होगी? एक्सीडेंट इतना भयंकर कैसे हो गया? कविता बिना कुछ सोचे, नंगे पैर ही सड़क की ओर भाग पड़ी। तवे की तरह तपती सड़क पर उसके पैरों में छाले पड़ रहे थे, लेकिन एक माँ के दिल में उठ रहे प्रलय के सामने वह शारीरिक दर्द कुछ भी नहीं था।

ऑटो वाले को अस्पताल चलने के लिए कहते हुए उसके होंठ बुरी तरह काँप रहे थे। रास्ते का हर एक मिनट उसे एक युग के समान लग रहा था। ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती उसे किसी काल की तरह डरा रही थी। रास्ते भर उसका दिमाग एक भयानक बवंडर में फँसा रहा। तरह-तरह के डरावने खयाल उसे अंदर तक चीर रहे थे। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और मन ही मन सारी दुनिया की चिंताओं को परे धकेल कर बस एक ही रट लगा ली—”हे भगवान, मेरी बच्ची सलामत हो, चाहे मेरी जान ले लेना, बस उसे कुछ न हो। मैं नंगे पैर तुम्हारे मंदिर आऊँगी, बस मेरी रिया को बचा लेना।”

अस्पताल के उस सफेद, फिनाइल की गंध वाले गलियारे में भागते हुए कविता का दिल जोरों से धड़क रहा था। जैसे ही उसकी नजर वार्ड नंबर तीन में बैठी रिया पर पड़ी, उसकी रुकी हुई साँसें वापस लौट आईं। मंत्र सिद्ध हो गया था। रिया एकदम सुरक्षित थी। उसके घुटने और कोहनी पर बस हल्की सी खरोंच थी और एक छोटी सी पट्टी बंधी थी। कविता दौड़कर गई और अपनी बच्ची को सीने से ऐसे लगा लिया जैसे उसे अपने अंदर समा लेगी। उसके आंसुओं से रिया का स्कूल यूनिफॉर्म भीग गया।

रिया को चूमते हुए कविता ईश्वर का धन्यवाद कर रही थी कि तभी पास खड़ी एक नर्स ने कविता के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आवाज में एक अजीब सा भारीपन था। नर्स ने कहा, “आप बहुत खुशनसीब हैं जो आपकी बच्ची को खरोंच तक नहीं आई। स्कूल बस से उतरते वक्त एक तेज रफ्तार बेकाबू कार सीधा इस बच्ची की तरफ आ रही थी। अगर उस रास्ते से गुजर रही एक महिला ने अपनी जान की परवाह किए बिना ऐन मौके पर इसे धक्का न दिया होता, तो आज बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता।”

कविता का दिल कृतज्ञता से भर गया। उस महिला ने उसकी दुनिया उजड़ने से बचा ली थी। “कहाँ हैं वो? मैं उनके पैर छूकर उन्हें धन्यवाद कहना चाहती हूँ। उन्होंने मुझे मेरी जिंदगी वापस दी है, मैं उनके इस अहसान की जीवन भर ऋणी रहूँगी,” कविता ने डबडबाई आँखों से पूछा।

नर्स ने नजरें झुकाते हुए कहा, “वो इमरजेंसी वार्ड में हैं। बच्ची को धक्का देते वक्त कार की पूरी टक्कर सीधे उन्हें ही लगी थी। उनकी हालत बहुत नाजुक है।”

रिया के माथे को एक बार फिर चूमकर, उसे स्कूल की टीचर के पास छोड़कर कविता भारी कदमों से इमरजेंसी वार्ड की तरफ भागी। वह सोच रही थी कि वह उस देवदूत जैसी महिला के इलाज का सारा खर्च उठाएगी, अपनी बहन की तरह उसकी सेवा करेगी। लेकिन जैसे ही उसने इमरजेंसी वार्ड का दरवाजा खोला, सामने का दृश्य देखकर उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई।

वहाँ मॉनिटर की लाइन एकदम सीधी हो चुकी थी और उस पर बीप की एक लंबी, खौफनाक आवाज गूंज रही थी। डॉक्टर उस लहूलुहान महिला के चेहरे पर सफेद चादर ढँक रहे थे। कविता दरवाजे की चौखट पकड़कर वहीं फर्श पर बैठ गई। वह अब इस दुनिया में नहीं रही!

एक अजनबी महिला, जिसने शायद रिया को पहली बार देखा होगा, उसने एक सेकंड भी सोचे बिना एक अनजान बच्ची के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। कविता का पूरा शरीर काँपने लगा। “अगर इस महिला ने मेरी रिया को न बचाया होता तो आज उस चादर के नीचे मेरी दुनिया होती…” यह खयाल ही इतना खौफनाक था कि कविता वहीं बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

तभी एक दस-बारह साल का लड़का बदहवास सा भागता हुआ वहाँ आया और “माँ… माँ…” पुकारते हुए उस खून से सनी सफेद चादर से लिपट गया। कविता का कलेजा फट गया। उस महिला ने किसी और की बच्ची की जान बचाने के लिए अपने ही बच्चे को हमेशा के लिए अनाथ कर दिया था। उस अनाथ बच्चे की चीखें अस्पताल के सन्नाटे को चीर रही थीं, और कविता को लग रहा था जैसे वो चीखें उम्र भर के लिए उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गई हों।

कविता धीरे से उठी और जाकर उस रोते हुए बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। आज एक माँ ने दूसरी माँ को जीवन भर का ऐसा कर्ज दे दिया था जिसे चुकाना नामुमकिन था। लेकिन कविता ने अपनी आँखों से गिरते आंसुओं के बीच यह संकल्प लिया कि वह इस बच्चे को कभी अनाथ नहीं होने देगी। उस अनजान महिला का यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

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