स्वर्ग से सुंदर

विवाह की रस्में खत्म हो चुकी थीं और राधिका अपने नए जीवन के सबसे नाज़ुक पड़ाव पर खड़ी थी। चौबे परिवार शहर का एक प्रतिष्ठित और रुतबे वाला परिवार था। घर की मालकिन, यानी राधिका की सास सुमित्रा देवी का दबदबा सिर्फ घर में ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले में था। सुमित्रा देवी की छवि एक ऐसी महिला की थी जिसके चेहरे पर कभी बेवजह मुस्कान नहीं तैरती थी, जिनकी हर बात एक आदेश होती थी और जिनके बनाए नियमों से घर का एक तिनका भी इधर से उधर नहीं हो सकता था। सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात के भोजन तक, सब कुछ घड़ी की सुइयों के साथ चलता था।

राधिका के लिए यह सब एकदम नया और डरावना था। वह एक बहुत ही साधारण और खुले विचारों वाले परिवार से आई थी, जहाँ गलतियों पर डांट से ज्यादा हँसी ठिठोली होती थी। लेकिन यहाँ, सुमित्रा देवी की भारी आवाज़ और उनकी कमर में बंधे चाबियों के गुच्छे की खनक से ही राधिका के हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते थे।

इन शुरुआती पंद्रह दिनों में अगर राधिका को किसी चीज़ ने बचाए रखा था, तो वो थीं उसकी दो ननदें—अदिति और श्रेया। दोनों बहनें अपने मायके में भाई की शादी के लिए आई हुई थीं। अदिति स्वभाव से बहुत चुलबुली थी और श्रेया बहुत ही समझदार। राधिका के पति, कुणाल, अपने व्यापार में इतने व्यस्त रहते थे कि सुबह निकलते और रात को देर से लौटते। ऐसे में अदिति और श्रेया ही राधिका की परछाईं बनकर उसके साथ रहती थीं। जब भी सुमित्रा देवी राधिका को कोई काम समझातीं या उनके माथे पर कोई सिलवट नज़र आती, तो अदिति कोई ना कोई मज़ाक करके बात टाल देती या श्रेया बीच में आकर राधिका का बचाव कर लेती।

राधिका को लगने लगा था कि उसकी ये दोनों ननदें किसी देवदूत की तरह हैं। उनके साथ बैठकर चाय पीना, मायके की बातें करना, और सास की नज़रों से बचकर छत पर गपशप करना—राधिका की नई दुनिया इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। उसे लगने लगा था कि ससुराल इतना भी बुरा नहीं है, जब तक ये दोनों यहाँ हैं।

लेकिन समय के पंख लगे होते हैं, और खुशियों के पल मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाते हैं। पंद्रह दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। कल रात खाने की मेज़ पर जब अदिति ने कहा कि कल दोपहर की ट्रेन से वे दोनों अपने-अपने ससुराल लौट रही हैं, तो राधिका के गले के नीचे निवाला ही नहीं उतरा। उसे लगा जैसे किसी ने तपती धूप में उसके सिर से छाता छीन लिया हो। रात भर वह बिस्तर पर करवटें बदलती रही। कुणाल गहरी नींद में थे, और राधिका छत के पंखे को घूरते हुए आने वाले कल के बारे में सोचकर कांप रही थी।

“कल दीदी और श्रेया चली जाएंगी। कुणाल सुबह ऑफिस निकल जाएंगे। मैं और माँ जी… अकेले इस इतने बड़े घर में। वो तो मुझसे ठीक से बात भी नहीं करतीं। अगर मुझसे पूजा की थाली में कोई कमी रह गई तो? अगर दाल में नमक तेज़ हो गया तो? अगर मुझे सुबह उठने में पाँच मिनट की भी देरी हो गई तो वो मुझे कच्चा चबा जाएंगी।” राधिका के मन में ऐसे सैकड़ों डरावने ख्यालों ने डेरा डाल लिया था। उसकी आँखें भर आईं। उसे अपनी माँ की बहुत याद आ रही थी।

अगली सुबह घर में एक अजीब सी उदासी छाई हुई थी। राधिका ने जल्दी उठकर नाश्ता तो बना लिया, लेकिन उसका मन कहीं और था। अदिति और श्रेया का सामान पैक हो चुका था। दोनों बहनें अपने मायके से विदा लेते हुए भावुक हो रही थीं। राधिका एक कोने में खड़ी अपनी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेटे, सहमी हुई सी सब देख रही थी। उसे लग रहा था मानो वह किसी बियाबान जंगल में अकेली छूटने वाली है।

तभी सुमित्रा देवी भारी कदमों से हॉल में आईं। उनके हाथ में दो सुंदर थालियाँ थीं, जिनमें शगुन के कपड़े, गहने और मिठाइयाँ सजी थीं। हमेशा की तरह उनका चेहरा शांत और गंभीर था। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को देखा, जो अब रोने लगी थीं।

“अब बस करो तुम दोनों। रोकर घर का माहौल क्यों भारी कर रही हो? अपने-अपने घर जा रही हो, कोई वनवास पर नहीं।” सुमित्रा देवी ने कड़क आवाज़ में कहा, लेकिन उनकी आँखों के किनारों पर आई नमी राधिका की नज़रों से छुप नहीं सकी।

“माँ, हमारा तो मायका छूट रहा है ना। अब कौन हमें तुम्हारे हाथ की बनी कचौड़ियां खिलाएगा? कौन सुबह-सुबह हमारे देर तक सोने पर डांटेगा?” श्रेया ने सुबकते हुए कहा।

सुमित्रा देवी ने लंबी सांस ली और राधिका की तरफ मुड़ीं। राधिका जो अब तक एक खंभे की आड़ में खड़ी थी, सास की नज़र पड़ते ही सहम कर दो कदम और पीछे हो गई।

“राधिका,” सुमित्रा देवी की भारी आवाज़ गूंजी।

“जी… जी माँ जी,” राधिका घबराई हुई आवाज़ में बोली।

“इधर आओ।”

राधिका के पैर कांप रहे थे। वह डरते-डरते सुमित्रा देवी के सामने आकर खड़ी हो गई। सुमित्रा देवी ने दोनों शगुन की थालियाँ राधिका की ओर बढ़ाते हुए कहा, “ये लो। आज से इस घर के सारे लेन-देन, शगुन और रीति-रिवाजों की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। अपनी दोनों ननदों को अपने हाथ से ये शगुन दो और विदा करो।”

राधिका ने झिझकते हुए थालियाँ पकड़ लीं, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की। उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, “पर माँ जी… ये आप ही दे दीजिए। आप बड़ी हैं… मैं कैसे…”

सुमित्रा देवी ने राधिका की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “बड़ी हूँ, तभी तो अपनी ज़िम्मेदारी तुम्हें सौंप रही हूँ। मैं कब तक ये सब संभालूंगी? और बेटियों को विदा करना किसी मेहमान को विदा करने जैसा है। बेटियां तो मेहमान होती हैं राधिका, आज यहाँ, कल अपने घर। लेकिन तुम…”

सुमित्रा देवी थोड़ा रुकीं। उनके चेहरे का वह सख्त आवरण, वह अनुशासन का मुखौटा अचानक पिघलने लगा। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथों को आगे बढ़ाया और राधिका के दोनों गालों को थाम लिया।

“तुम मेहमान नहीं हो, राधिका। तुम इस घर की जड़ हो। मेरी ये बेटियां तो चिड़ियों की तरह हैं, दाना चुगने आईं और अपने घोंसले में उड़ गईं। ये कभी मेरा बुढ़ापा नहीं संवारेंगी। जब मेरे घुटनों में दर्द होगा, तब अदिति मुझे तेल मलने नहीं आएगी। जब मुझे रात को प्यास लगेगी, तब श्रेया मुझे पानी का गिलास नहीं पकड़ाएगी। वो काम तुम करोगी। तुम बहु नहीं, आज से मेरी असली बेटी हो, जो मेरे साथ, इसी आंगन में मेरी आखिरी सांस तक रहेगी।”

यह सुनते ही घर में जैसे सन्नाटा छा गया। अदिति और श्रेया भी हैरान रह गईं क्योंकि उन्होंने अपनी माँ का ऐसा कोमल रूप पहले कभी नहीं देखा था। राधिका, जो कल रात से डर के मारे कांप रही थी, उसकी आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। सुमित्रा देवी ने उसे अपने सीने से लगा लिया। वह कोई सख्त सास का आलिंगन नहीं था, वह एक माँ की ममतामयी छाँव थी, जिसमें दुनिया की सारी सुरक्षा समाई थी।

“अरे वाह माँ! मतलब हम पराई हो गईं और ये तुम्हारी सगी? देख रहे हो दीदी, हमारा पत्ता कैसे कट गया,” अदिति ने माहौल को हल्का करने के लिए हंसते हुए कहा।

“हाँ, कट गया पत्ता। अब तुम दोनों अपने-अपने घर जाओ। मेरी बेटी अब मेरे पास है,” सुमित्रा देवी ने मुस्कुराते हुए राधिका के सिर पर हाथ फेरा।

राधिका ने सुमित्रा देवी के सीने में अपना सिर और गहरे तक छुपा लिया। कल रात तक जो घर उसे एक जेल जैसा लग रहा था, जो सास उसे किसी तानाशाह से कम नहीं लग रही थी, आज वही घर उसे स्वर्ग और वही सास अपनी सगी माँ लगने लगी थी। ननदों के जाने का जो डर उसे सता रहा था, वह अब हवा हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि नारियल की तरह दिखने वाली सुमित्रा देवी ऊपर से जितनी सख्त हैं, अंदर से उतनी ही कोमल और स्नेह से भरी हैं। अब राधिका को किसी अदिति या श्रेया के सहारे की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि अब उसे उसकी ‘माँ’ मिल गई थी।

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