ममता जी नगर की गणमान्य नेता की पत्नी थीं।नेता जी के साथ पार्टी प्रचार में भी जातीं थीं। पूर्ण रूप से समाज के प्रति जागरूक थीं।पति कंस्ट्रक्शन वर्क में थे।आय अच्छी ही थी।
मोहल्ले के लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा थीं वो।जब भी किसी बच्ची का रिजल्ट आया, उसे शाबासी देते हुए कहतीं”देख बिटिया, पढ़ाई कभी ना छोड़ना।
पढ़ लिख कर मां-बाप का नाम रोशन करना।नौकरी करना, अपने माता-पिता का सहारा बनना।” सभी लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे।कुछ सालों में उनकी इकलौती बेटी की शादी हुई, उसी नगर में।बेटी ने पास ही के विद्यालय में पढ़ाना चाहता, तो ममता जी ने पति का जोर लगा कर नौकरी दिलवा दी बेटी की।
नौकरी करने के साथ-साथ घर संभालने,बच्चा और पति संभालने में उनकी बेटी( रिया) को दिक्कतें आने लगीं।आखिर में ममता जी ने बेटी को मायके में ही रहने को कहा, पति और बच्चों के साथ।बेटे से बोलीं”अरे इतना बड़ा घर है, काफी कमरे हैं, कहीं भी रह लेगी।सब उसका ही तो है।”
भाई छोटा था ,उसे कोई आपत्ति क्यूं होती?
कुछ सालों में बेटे की शादी कर दी उन्होंने।बहू तो मानो रूप और गुण का संगम थी।सरकारी नौकरी छोड़कर आई थी।थी एडहॉक में,पर अच्छे स्कूल में पढ़ाती थी।ड्राइंग गजब की थी उसकी।एक ही घर में जहां ननद काम पर जाती हो और घर में रहने वाले लोगों की खातिर दारी बहू के नाम जारी कर दी गई।
धीरे-धीरे दामाद जी घर के हर मामले में दखल देने लगे।बहू को ही बात-बात पर नीचा दिखाने लगे वो।बहू(मधु) को बुरा इस बात से लगता था कि सासू मां दामाद को कुछ नहीं कहती,ना टोकती हैं ना मना करती है।
बहू से तो हमेशा कहती रहती थीं वो”दामाद का ध्यान रखना धर्म है हमारा।तुम उससे बदजबानी मत करना।इस घर में पहला हक इन्हीं का है।कुछ कह देते हैं,तो अच्छे के लिए ही कहते होंगें।तुम बात किया करो उनसे।”
मधु मन मसोस कर रह जाती।दामाद तो ससुराल में रहकर साले और ससुर के बीच अड़चनें पैदा कर रहे थे। बात-बात पर साले को नीचा दिखानै लगे थे अब वो।मधु भी एक बेटी की मां बन गई थी अब।थोड़ी बड़ी होने पर ,मधु ने घर पर ही ड्राइंगरुम में ड्राइंग सिखाने की इच्छा जताई तो सबसे पहले दामाद जी के आत्मसम्मान को चोट पहुंची।
सासू मां के सामने मधु को बिठाकर परिवार के संस्कारों का पाठ पढ़ाने लगे।आदत के अनुसार सासू मां ने उन्हीं का पक्ष लेकर कहा”सही तो कह रहा है दामाद जी।तुझे किस चीज की कमी है,जो पेंटिंग सिखाएगी।अरे चुपचाप खाना बनाओ, आराम करो।”
ये सब सुनना मधु के लिए तब और कष्टकर हो जाता जब,स्कूल से बेटी के आते ही हांथ में चाय का कप पकड़ाते हुए बड़े गर्व से कहतीं” इसे देखो,अपनी मेहनत और लगन से इतने बड़े स्कूल में पढ़ाती है।लोग कितनी इज्जत करते हैं।बस इसकी सासू मां के आने पर इसकी काम करते-करते हालात खराब हो जाती है।”
मधु के पास चुप रहने के अलावा और कुछ नहीं बचता। सौभाग्य वश,वहां से थोड़ी दूर पर ही एक नया स्कूल खुल चुका था।मधु ने सासू मां से वहां जाकर पढ़ाने की अनुमति मांगी,तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया।
अब मधु किस्से कहे?एक दिन ससुर जी को चाय का कप पकड़ाते हुए बोली मधु”पापा जी,मैं दिन भर आलसी की तरह घर में पड़ी -पड़ी बेकार सी होती जा रही हूं।वो नया स्कूल तो आपके परिचित का है। उद्घाटन में आपको बुलाया है।आप मेरे लिए बात करियेगा ना ,तो वो मुझे बुलाकर मेरी काबिलियत देखकर ही मुझे वहां रखेंगे।”
पापा जी ने सपाट स्वर में कहा चलने को। उद्घाटन भाषण भी हो गया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी समाप्त हो गई।मधु की नौकरी के बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा।बेमन से घर आकर मधु ने यहीं समझा कि वह लायक नहीं है नौकरी करने के।परंतु स्कूल के सभी कार्यक्रमों में साज सज्जा की तैयारी मधु के ऊपर ही थी।
मधु इससे खुश ही थी कि कुछ काम कर तो रही है कम से कम।
एक रात सासू मां और पापा जी की बातें सुनी मधु ने।पापा कह रहे थे उनसे”तुम्हारी वजह से मैं नज़रें नहीं मिला पा रहा मधु से।उसे कितनी उम्मीद थी मुझसे। सिर्फ तुम्हारी असहमति की वजह से मैंने स्कूल में कोई बात ही नहीं की।करता तो हो ही जाता।अब देखो भागवान ,हमारी बेटी जा रही है ना पढ़ाने।फिर बहू की नौकरी से तुम्हें इतनी दिक्कत क्यूं होती है?”
सासू मां ने करारा सा जवाब दिया पापा को”अब देखो, दुनिया दारी की समझ हमें ही समझाना पड़ेगा उसे।यदि उसकी नौकरी लग गई,तो घर के सारे काम मुझे ही करने पड़ेंगे।तुम्हें क्या पता , मोहल्ले की औरतें तो मुझे सुनाएंगी ना।बहू की कमाई खाने का ताना देंगीं। हजम कर पाएंगे तब आप। सबके सामने तो बोलना पड़ता है मुझे।अब आप ज्यादा साइड मत लिया करो।
दोनों के बीच का वार्तालाप सुनकर मधु को हंसी आ गई।एक इंसान जो स्वभाव से बहुत अनुशासित थे।हर कोई डरता था उनसे।आज उन्होंने अपनी बहू को अहमियत दी।और एक सास,जो हर लड़की को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहतीं हैं,अपनी ही बहू के नौकरी करने पर आपत्ति जताती हैं।
बाहर किसी को पता भी नहीं चल पाता,कि कैसे वो बहू की इच्छा मारकर भी उससे खुश होने का अभिनय करवाती है।सासू मां ने तो एक दिन चिढ़कर कहा सबके सामने” आजकल की बहुओं को चाहे कितना भी प्यार दे दो,ये सगी नहीं होती।
“अब मधु ने सोच लिया था कि घर में रहकर भी अपने परों को फैलाएगी।खाली तो नहीं बैठेगी।झट से मधु ने घर के बाहर एक विज्ञापन चिपकाया,और अपनी क्लास शुरू कर दिया।अब वह खुशी-खुशी बच्चियों और बच्चों को सिखाने लगी।
घर में भी कोई परेशानी नहीं हुई।काम तो सब समय से कर ही लेती थी
पढ़ी-लिखी होने का सबसे बड़ा फायदा यही है कि हम कब ,कहां,और किससे
कितना बात करें।मधु की पाठशाला में लड़कें -लड़कियां आने लगे।मधु उन्हें एक चीज ड्राइंग के अलावा भी रोज सिखाती थी “कभी भी दोहरे चेहरे लगाकर मत जीना।जो सच जब बोलना चाहिए,तभी बोलना।
शुभ्रा बैनर्जी