काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने पास को देखा, फिर मुझे देखा, और फिर पास को देखा।
“लेकिन… आपने तो कहा था कि आपके पास टाइम नहीं है?” उसकी आवाज़ अब बिल्कुल बदल चुकी थी। उसमें अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक मीठा सा आश्चर्य था।
“मैंने इसलिए कहा था ताकि तुम्हें सरप्राइज दे सकूँ, मेरी ड्रामा क्वीन,” मैंने उसके गाल खींचते हुए कहा। “मैंने अपने बॉस से लड़-झगड़ कर वीकेंड की छुट्टी ली है। और तुम यहाँ मुझे क्रूर, अत्याचारी और पत्थरदिल साबित करने में लगी हुई हो।”
शाम के सात बज रहे थे। नवंबर की हल्की-हल्की ठंड ने शहर को अपनी चादर में लपेटना शुरू कर दिया था। मैं ऑफिस की थकान और ट्रैफिक की झिकझिक को पीछे छोड़ते हुए जब घर के दरवाजे पर पहुँचा, तो हमेशा की तरह कॉल-बेल बजाई। अमूमन दो सेकंड के भीतर दरवाजा खुल जाता था और सामने मेरी पत्नी, काव्या, एक हल्की सी मुस्कान और हाथ में पानी का गिलास लिए खड़ी मिलती थी। लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ। मुझे अपनी चाबी निकालकर खुद ही ताला खोलना पड़ा। घर के अंदर घुसते ही अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। ड्राइंग रूम की लाइट बंद थी और बेडरूम से छनकर आ रही हल्की सी रोशनी यह बताने के लिए काफी थी कि आज घर का मौसम बाहर के मौसम से कहीं ज्यादा सर्द है।
मैं दबे पाँव बेडरूम की तरफ बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। मैंने झाँककर देखा, काव्या बेड के एक किनारे पर लेटी हुई थी। उसने ओढ़ने वाला हल्का कंबल गले तक खींच रखा था और उसकी पीठ मेरी तरफ, यानी दरवाजे की तरफ थी। मैं समझ गया। यह कोई आम नींद नहीं थी, यह एक मौन विरोध था। शादी के इन चार सालों में मैंने काव्या की “रूठने की डिक्शनरी” को बहुत अच्छी तरह से पढ़ लिया था। जब वह बात-बात पर ताने मारे, तो समझो नाराजगी हल्की है। जब वह बर्तन जोर-जोर से पटके, तो समझो गुस्सा सातवें आसमान पर है। लेकिन जब वह चुपचाप करवट बदलकर लेट जाए और पीठ मेरी तरफ कर ले, तो समझो मामला बेहद गंभीर है और अब मुझे अपनी रातों की नींद गंवानी पड़ सकती है।
मैं चुपचाप कमरे में दाखिल हुआ। अपने जूते उतारे, बैग को सोफे पर रखा और बिना कोई आवाज़ किए फ्रेश होने चला गया। बाहर आया तो देखा डाइनिंग टेबल पर सिर्फ एक ही थाली लगी हुई थी। सब्जी, रोटी और दाल करीने से सजे थे, लेकिन सिर्फ एक इंसान के लिए। यह दूसरा बड़ा संकेत था। इसका मतलब था— “मुझे भूख नहीं है, आप खा लीजिए।” और जाहिर सी बात है, जब पत्नी भूखी पेट लेटी हो, तो दुनिया का कौन सा पति चैन से खाना खा सकता है? वो निवाला गले से नीचे उतरने के बजाय सीधे छाती में जाकर अटक जाता है।
मैं वापस बेडरूम में आया और बेड के दूसरे किनारे पर बैठ गया। मुझे पता था कि वो सो नहीं रही है। जब इंसान सच में सोता है, तो उसकी सांसों की एक लय होती है, लेकिन काव्या की सांसें रुकी-रुकी सी थीं। वह कान लगाकर मेरी हर आहट को सुन रही थी। मैंने हल्की सी खाँसी की, लेकिन उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। मैंने देखा, कंबल के बाहर उसका एक गाल हल्का सा दिख रहा था, जो गुस्से से लाल हो चुका था। आँखें बंद थीं, लेकिन पलकों के किनारे हल्के से भीगे हुए लग रहे थे। ये देखकर मेरे अंदर का पति तड़प उठा, लेकिन मैं जानता था कि अगर मैंने अभी उससे सीधे पूछ लिया कि “क्या हुआ है?”, तो जवाब मिलेगा “कुछ नहीं!” और फिर यह “कुछ नहीं” पूरी रात का सिरदर्द बन जाएगा।
मैंने एक अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया। मैं उसके बिल्कुल करीब खिसक गया। मैंने अपने फोन का फ्रंट कैमरा खोला, उसमें अपना चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा किया, होंठों को सिकोड़ कर एक अजीब सा बत्तख वाला मुँह बनाया और फोन को धीरे से उसके चेहरे के सामने कर दिया। काव्या ने हल्की सी आँखें खोलीं और फोन की स्क्रीन पर मेरा वो जोकर जैसा चेहरा देखकर झट से आँखें बंद कर लीं। लेकिन मैं जानता था, उसके होठों के कोनों में एक मुस्कान छटपटा रही है। उसने कंबल को और ऊपर खींच लिया ताकि मैं उसकी हँसी न देख सकूँ।
मैंने हार नहीं मानी। मैंने धीरे से सिटी बजानी शुरू कर दी। वो भी कोई रोमांटिक गाना नहीं, बल्कि एक पुराना, बेतुका सा विज्ञापन का जिंगल। इसके बाद मैंने उसके कानों के पास जाकर अजीब-अजीब सी आवाजें निकालनी शुरू कर दीं। कभी बिल्ली की म्याऊँ, तो कभी किसी कार्टून कैरेक्टर की तरह बड़बड़ाना। मैं जानता था कि काव्या बहुत देर तक अपनी हँसी नहीं रोक सकती।
अचानक उसने झटके से कंबल हटाया और उठकर बैठ गई। उसकी आँखें लाल थीं, गाल तमतमाए हुए थे और होंठ गुस्से से काँप रहे थे।
“क्या तरीका है ये समीर?” वह लगभग रोते हुए चिल्लाई। “आप हर बार ऐसा ही करते हैं! जब भी मैं आपसे नाराज होती हूँ, जब भी मेरा दिल दुखा होता है, आप ये अपनी जोकरगिरी शुरू कर देते हैं। कभी आँख मारेंगे, कभी सिटी बजाएंगे, कभी बंदरों जैसी शक्ल बनाएंगे! क्या आपको लगता है कि हर बात का मज़ाक उड़ाना सही है?”
मैं थोड़ा सकपका गया। मैंने मासूमियत से पूछा, “तो क्या करूँ यार? तुम ऐसे मुँह फुलाकर लेट जाती हो, मुझसे तुम्हारा ये उदास चेहरा देखा नहीं जाता। इसलिए हंसाने की कोशिश करता हूँ।”
“मुझे नहीं हंसना है!” उसने एक तकिया मेरी तरफ फेंकते हुए कहा। “मेरा मन करता है कि आप मुझे प्यार से मनाएं। मेरी मिन्नतें करें। मेरे आगे-पीछे घूमें, मुझे सॉरी बोलें। जैसे फिल्मों में होता है, जैसे बाकी पति अपनी पत्नियों को मनाते हैं। लेकिन नहीं! आपको तो मेरे गुस्से की, मेरे दुख की कोई कद्र ही नहीं है। आप मुझे ठीक से नाराज भी नहीं होने देते। मेरी हँसी छूट जाती है और मेरा सारा गुस्सा पानी हो जाता है। आप बहुत स्वार्थी हैं!”
मैं हैरान रह गया। स्वार्थी? मैं? मैंने तो आज तक उसे एक फूलदान टूटने पर भी नहीं डाँटा था। उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश सिर आँखों पर रखता हूँ। फिर अचानक ये इल्जाम क्यों?
“काव्या, मेरी बात सुनो…” मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसने झटक दिया।
“आप बहुत क्रूर हैं समीर। सच में, आपके अंदर कोई भावना ही नहीं है। आप मेरी कोई बात नहीं मानते। हर बात को मना कर देते हैं। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता आपके साथ ऐसे रहना।” उसने अपने आँसू पोछते हुए कहा।
अब मेरे सब्र का बाँध टूट गया। क्रूर? मतलब सीरियसली? मैं इस घर में एक तानाशाह की तरह बर्ताव करता हूँ क्या? मैंने तो आज तक उसे तेज़ आवाज़ में भी कुछ नहीं कहा। मैं अपनी ऑफिस की हजार टेंशन बाहर छोड़कर आता हूँ ताकि उसे खुश रख सकूँ।
“काव्या, एक मिनट रुको,” मैंने थोड़ा गंभीर स्वर में कहा। “मैंने ऐसा क्या कर दिया जो मैं अचानक क्रूर हो गया? हे भगवान, मैंने तो सपने में भी कभी तुम पर गुस्सा नहीं किया है। तुम्हारी हर ज़िद, हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करता हूँ। अब तुम ही बता दो कि मैंने आज ऐसी कौन सी क्रूरता कर दी जो मुझे ही नहीं पता?”
काव्या ने मुझे एक गहरी, शिकायती नजर से देखा। उसकी आँखों में अब गुस्सा कम और शिकायत ज्यादा थी।
“याद है, कल रात मैंने आपसे क्या कहा था?” उसने भारी आवाज़ में पूछा।
मैंने दिमाग पर ज़ोर डाला। कल रात? कल रात तो हम बैठकर टीवी देख रहे थे। “हाँ, तुमने कहा था कि तुम वीकेंड पर अपनी सहेली रिया के साथ उस नए आर्ट एग्जिबिशन में जाना चाहती हो।”
“और आपने क्या जवाब दिया था?” उसने फिर पूछा।
“मैंने कहा था कि इस वीकेंड मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है, ऑफिस का एक बहुत जरूरी प्रोजेक्ट है और मैं तुम्हें वहां ड्रॉप नहीं कर पाऊंगा। तुम कैब से चली जाना,” मैंने सफाई देते हुए कहा। “इसमें क्रूरता कहाँ से आ गई?”
“सिर्फ ड्रॉप करने की बात नहीं थी समीर!” काव्या की आवाज़ फिर से ऊँची हो गई। “मैंने आपसे कहा था कि आप भी मेरे साथ चलिए। मैं आपके साथ वो वक्त बिताना चाहती थी। मैं चाहती थी कि हम दोनों साथ मिलकर कुछ नया देखें। लेकिन आपने बिना सोचे, बिना मेरी फीलिंग्स को समझे, एक सेकंड में मना कर दिया। आपने ये भी नहीं सोचा कि मुझे कैसा लगेगा। आप हमेशा अपने काम को मुझसे ज्यादा अहमियत देते हैं।”
मैं अवाक रह गया। क्या सिर्फ इतनी सी बात पर यह पूरा महायुद्ध छिड़ा हुआ था? मेरा मन किया कि अपना सिर दीवार पर मार लूँ, लेकिन फिर मुझे उसकी मासूमियत पर बहुत प्यार आया। वो एक छोटी बच्ची की तरह सिर्फ मेरा वक्त और मेरा ध्यान चाहती थी।
मैंने एक गहरी सांस ली। मैं अपनी जगह से उठा और अलमारी की तरफ गया। मैंने अपना ऑफिस बैग खोला और उसके अंदर से एक छोटा सा, रंग-बिरंगा लिफाफा निकाला। मैं वापस काव्या के पास आया और वह लिफाफा उसके हाथ में रख दिया।
“ये क्या है?” उसने संदेह भरी नजरों से लिफाफे को देखते हुए पूछा।
“खोलकर देख लो, शायद इस ‘क्रूर’ पति के पाप थोड़े कम हो जाएं,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
काव्या ने धीरे से लिफाफा खोला। उसके अंदर दो वीआईपी पास थे। उसी आर्ट एग्जिबिशन के पास, जिसके बारे में वह बात कर रही थी। सिर्फ पास ही नहीं, बल्कि उसके बाद शहर के सबसे महंगे रूफटॉप रेस्टोरेंट में डिनर का रिजर्वेशन वाउचर भी था।
काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने पास को देखा, फिर मुझे देखा, और फिर पास को देखा।
“लेकिन… आपने तो कहा था कि आपके पास टाइम नहीं है?” उसकी आवाज़ अब बिल्कुल बदल चुकी थी। उसमें अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक मीठा सा आश्चर्य था।
“मैंने इसलिए कहा था ताकि तुम्हें सरप्राइज दे सकूँ, मेरी ड्रामा क्वीन,” मैंने उसके गाल खींचते हुए कहा। “मैंने अपने बॉस से लड़-झगड़ कर वीकेंड की छुट्टी ली है। और तुम यहाँ मुझे क्रूर, अत्याचारी और पत्थरदिल साबित करने में लगी हुई हो।”
काव्या का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसकी आँखों से जो आँसू अब गिरे, वो गुस्से के नहीं, बल्कि प्यार और पछतावे के थे। उसने पास को साइड में रखा और मुझे कसकर गले लगा लिया।
“आई एम सॉरी समीर… आई एम सो सॉरी। मैं कितनी बेवकूफ हूँ ना? मैं हमेशा बिना सोचे-समझे रिएक्ट कर देती हूँ,” वह मेरे सीने में मुँह छिपाकर बोली।
मैंने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेवकूफ तो हो तुम, लेकिन मेरी हो। और सुन लो, मैं कभी फिल्मों वाले हीरो की तरह घुटनों पर बैठकर चिरौरी नहीं करूँगा। मैं तुम्हें हमेशा ऐसे ही बेतुके चेहरे बनाकर, बंदरों जैसी हरकतें करके ही मनाऊंगा। क्योंकि जब तुम अपनी वो झूठी नाराजगी छोड़कर अचानक से हंस पड़ती हो ना… कसम से, दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगती हो।”
काव्या ने अपना सिर उठाया और मुस्कुरा दी। उसकी भीगी हुई पलकों के बीच से झांकती वो मुस्कान, मेरे दिन भर की सारी थकान मिटाने के लिए काफी थी।
“बहुत भूख लगी है,” उसने अचानक अपने पेट पर हाथ रखते हुए कहा।
“हाँ, तो महारानी जी ने थाली तो एक ही लगाई है डाइनिंग टेबल पर। अब क्या करें?” मैंने मज़ाक में कहा।
“हम दोनों एक ही थाली में खाएंगे। और वैसे भी, एक थाली में खाने से प्यार बढ़ता है,” काव्या ने आँख मारते हुए कहा।
मैं हँस पड़ा। हम दोनों उठकर बाहर आए। डाइनिंग टेबल पर रखी वो ठंडी हो चुकी सब्जी और रोटी, आज दुनिया के किसी भी फाइव स्टार होटल के खाने से ज्यादा स्वादिष्ट लग रही थी। क्योंकि उसमें रूठने-मनाने की चाशनी जो घुल गई थी।
क्या आपके रिश्ते में भी ऐसे ही छोटे-छोटे रूठने-मनाने के किस्से होते हैं? क्या आपका पार्टनर भी आपको मनाने के लिए ऐसे ही अजीबोगरीब तरीके अपनाता है? अपने मज़ेदार किस्से हमारे साथ कमेंट्स में ज़रूर शेयर करें!
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लेखिका : शारदा सक्सेना