समीर और काव्या की शादी को आठ साल हो चुके थे। इन आठ सालों में उनके घर की दीवारें न जाने कितनी ही बार उनकी हँसी, उनकी नोक-झोंक और उनके एक खास ‘पेट डायलॉग’ की गवाह बन चुकी थीं। समीर स्वभाव से थोड़ा लापरवाह था। सुबह ऑफिस जाते वक्त गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ देना, अपनी चाबियाँ रखकर भूल जाना, और अलमारी से एक शर्ट निकालते वक्त दस शर्ट गिरा देना—ये समीर की दिनचर्या का हिस्सा था। वहीं काव्या एकदम सलीकेदार, हर चीज़ को परफेक्शन के साथ करने वाली और घर को किसी कांच के महल की तरह चमका कर रखने वाली महिला थी।
उनकी सुबह की शुरुआत अक्सर इसी बात से होती थी। जब भी काव्या बिस्तर पर वो गीला तौलिया देखती, तो झल्लाते हुए कहती, “समीर! मैं सच कह रही हूँ, मेरे जाने के बाद आप जो दूसरी पत्नी लाएंगे ना, वो पक्का पहले दिन ही आपको छोड़कर मायके भाग जाएगी। उसे इंटरव्यू में ही बता देना कि आपको ये गीले तौलिये की बीमारी है।”
समीर भी कहाँ पीछे रहने वाला था। वह चाय का कप हाथ में लिए हुए, बड़ी ही मासूमियत से जवाब देता, “अरे जान! मैं तो दूसरी तभी लाऊंगा जब तुम खुद उसे ट्रेनिंग दोगी। मैं उसे बता दूँगा कि मेरी पहली बीवी ने मुझे बिगाड़ा है, अब सुधारने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। वैसे भी, मुझे तो बस एक ऐसी चाहिए जो मुझे सुबह-सुबह तुम्हारी तरह मीठी झिड़कियाँ दे सके।”
इस पर काव्या मुँह बनाते हुए कहती, “हाँ-हाँ, सपने देख लीजिए। मैं तो कहती हूँ, ले ही आइए किसी को। कम से कम घर के कामों में मेरा हाथ तो बंटाएगी। हम दोनों मिलकर आपकी क्लास लगाया करेंगे।” फिर दोनों ठहाके लगाकर हँस पड़ते। यह मज़ाक उनके जीवन का एक ऐसा हिस्सा बन गया था, जैसे चाय के साथ बिस्कुट। कभी-कभी मज़ाक इतना आगे बढ़ जाता कि दोनों यह तय करने लगते कि वो ‘दूसरी’ घर के कौन-कौन से काम करेगी और काव्या उसे कैसे अपने इशारों पर नचाएगी। जीवन अपनी पूरी रफ़्तार और खुशियों के साथ बह रहा था।
लेकिन, वक़्त का पहिया हमेशा एक सी रफ़्तार और एक सी दिशा में नहीं घूमता। एक हँसते-खेलते परिवार को नज़र लगने में बस एक पल लगता है।
एक शाम काव्या को अचानक तेज़ बुखार और सीने में दर्द हुआ। समीर ने सोचा कि शायद मौसम बदलने की वजह से वायरल होगा। लेकिन रात होते-होते काव्या की हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा। टेस्ट के बाद पता चला कि काव्या को एक गंभीर और दुर्लभ किस्म का लंग इन्फेक्शन (फेफड़ों का संक्रमण) हो गया है, जो बहुत तेज़ी से उसके शरीर में फैल रहा था। जो काव्या कुछ घंटे पहले घर में दौड़-दौड़ कर काम कर रही थी, वो अब अस्पताल के आईसीयू (ICU) के बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उसके शरीर से अनगिनत नलियाँ जुड़ी हुई थीं और मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज़ उस शांत और डरावने कमरे में गूँज रही थी।
समीर के लिए तो जैसे दुनिया ही रुक गई थी। उसका वह घर, जो काव्या की आवाज़ों से चहकता था, अब उसे काटने को दौड़ता था। दिन हफ्तों में बदल गए। काव्या की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। डॉक्टर भी अब निराश नज़र आने लगे थे। उनका कहना था कि दवाइयाँ असर नहीं कर रही हैं और अब सब कुछ काव्या की अपनी इच्छाशक्ति और ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। समीर रोज़ आईसीयू के शीशे के बाहर खड़ा होकर अपनी उस दुनिया को टूटते हुए देखता, जिसे उसने इतने प्यार से संजोया था।
अस्पताल में भर्ती हुए काव्या को लगभग बीस दिन हो चुके थे। एक दिन सुबह जब समीर उससे मिलने आईसीयू के अंदर गया, तो काव्या की आँखें खुली थीं। उसकी आँखों की चमक पूरी तरह से गायब हो चुकी थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था और साँसें एक मशीन के सहारे भारी-भारी चल रही थीं। समीर ने काँपते हाथों से उसका हाथ अपने हाथों में लिया। काव्या का हाथ बर्फ की तरह ठंडा था।
काव्या ने बड़ी मुश्किल से अपनी नज़रें समीर के चेहरे पर टिकाईं। उसकी आँखों में आज वह चिर-परिचित शरारत नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी उदासी, लाचारी और एक गहरा सन्नाटा था। उसने अपनी पूरी ताक़त बटोरी और सूखी हुई काँपती आवाज़ में धीमे से कहा, “समीर… मुझे लगता है अब मेरा सफ़र… यहीं तक था। मेरे जाने के बाद… आप सच में… दूसरी शादी कर लीजिएगा। आप अकेले नहीं रह पाएंगे… आपको गीला तौलिया उठाने वाला… कोई चाहिए…”
समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जो वाक्य कल तक उनके बीच ठहाकों का कारण बनता था, आज वही वाक्य मौत का पैगाम बनकर उसके कानों में गूँज रहा था। काव्या की आँखों से एक आँसू छलक कर उसके गालों पर आ गिरा। समीर की रूह काँप उठी। उसका गला रुँध गया, लेकिन उसने अपने आँसुओं को पलकों के पीछे धकेल दिया। वह जानता था कि अगर आज वह टूट गया, तो काव्या ज़िंदगी की बची-खुची डोर भी छोड़ देगी।
समीर ने काव्या के ठंडे हाथ को और ज़ोर से पकड़ा, उसके माथे को चूमा और एक गहरी साँस ली। उसने अपने चेहरे पर एक अजीब सी ज़िद और बनावटी गुस्सा ओढ़ लिया।
वह काव्या की आँखों में सीधे देखते हुए बोला, “अच्छा? इतनी आसानी से हार मान ली तुमने? तुम्हें याद है काव्या, आज से चार साल पहले जब मुझे भयंकर डेंगू हुआ था? मेरी प्लेटलेट्स पंद्रह हज़ार पर आ गई थीं। मैं बिस्तर पर पड़ा दर्द से कराह रहा था और मैंने तुमसे कहा था कि काव्या अब मुझसे यह दर्द और नहीं सहा जाता, मुझे जाने दो। तब तुमने क्या किया था?”
काव्या ने कमज़ोर आँखों से समीर को देखा, पर कुछ बोल नहीं पाई।
समीर ने आगे कहा, “तब तुमने मेरा हाथ कसकर पकड़ा था और मेरे कानों में कहा था— ‘समीर, हमारी शादी में सात जन्मों का कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ है। इस कॉन्ट्रैक्ट में ‘बीच में छोड़कर जाने’ का कोई क्लॉज़ नहीं है। अगर तुम गए, तो मैं यमराज से लड़कर तुम्हें वापस ले आऊँगी।’ काव्या, जब तुम उस दिन यमराज से लड़ने को तैयार थीं, तो आज मुझे क्यों अकेला छोड़ रही हो? क्या तुम्हारे सात जन्मों के कॉन्ट्रैक्ट की वैलिडिटी ख़त्म हो गई?”
समीर की आँखों से अब आँसू बहने लगे थे, पर उसके होठों पर एक हँसी थी। उसने काव्या के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “और रही बात दूसरी लाने की… तो मैडम, मेरी दूसरी बीवी का इंटरव्यू तो तुम्हें ही लेना था ना? तुमने ही तो कहा था कि उसे घर के काम सिखाओगी? अगर तुम ही नहीं रहोगी, तो वो मेरे गीले तौलिये और बिखरे हुए जूतों के साथ मुझे पहले दिन ही घर से बाहर निकाल देगी। क्या तुम चाहोगी कि तुम्हारा समीर सड़क पर आ जाए? नहीं ना! तो चुपचाप जल्दी से ठीक हो जाओ। हमें साथ मिलकर उस ‘दूसरी’ का इंटरव्यू लेना है। और सुनो, मुझे तुम्हारे हाथ की बनी दाल मखनी खानी है, किसी ‘दूसरी’ के हाथ की नहीं।”
काव्या की कातर आँखों में अचानक एक हलचल सी हुई। समीर की बातों ने जैसे उसके अंदर मर रही जीने की इच्छा को एक संजीवनी दे दी थी। उसने अपने कमज़ोर अंगूठे से समीर के हाथ को हल्का सा दबाया, जैसे कह रही हो कि वह हार नहीं मानेगी।
और सचमुच, उस दिन के बाद चमत्कार होने लगा। काव्या के शरीर ने अचानक दवाइयों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया (रेस्पोंस) देना शुरू कर दिया। जो डॉक्टर एक दिन पहले तक सिर हिला रहे थे, वे भी हैरान थे। काव्या की हालत दिन-ब-दिन सुधरने लगी। आईसीयू से उसे प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया और धीरे-धीरे उसके चेहरे की रौनक लौटने लगी। लगभग पंद्रह दिनों के बाद, काव्या अस्पताल से डिस्चार्ज होकर अपने घर लौट आई।
घर में कदम रखते ही समीर ने उसे बड़े प्यार से सोफे पर बैठाया और बोला, “महारानी जी, अब आराम कीजिए। मैं आपके लिए सूप बनाकर लाता हूँ।”
समीर किचन में गया। काव्या मुस्कराते हुए घर को देख रही थी। अचानक उसकी नज़र बेडरूम की तरफ गई। बिस्तर पर समीर का इस्तेमाल किया हुआ गीला तौलिया पड़ा था और उसके जूते कमरे के बीचों-बीच बिखरे पड़े थे।
काव्या के चेहरे पर वही पुरानी चमक और आँखों में वही शरारत लौट आई। उसने आवाज़ लगाई, “समीर!”
समीर दौड़ता हुआ बाहर आया, “क्या हुआ? दर्द हो रहा है क्या?”
काव्या ने बिस्तर की तरफ इशारा करते हुए, अपनी वही पुरानी झिड़कती हुई आवाज़ में कहा, “मैं कह रही हूँ समीर, आप कल ही दूसरी ले आइए! मुझसे अब आपका यह गीला तौलिया नहीं उठाया जाएगा! मैं अस्पताल में क्या गई, आपने तो पूरे घर को कबाड़खाना बना दिया!”
समीर ने राहत की एक बहुत लंबी साँस ली। उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। वह ज़ोर से हँसा और बोला, “अरे जान! अभी तो तुम आई हो, पहले तुम उसे ट्रेनिंग देने लायक तो हो जाओ, फिर ले आऊँगा!”
दोनों की हँसी से पूरा घर एक बार फिर गूँज उठा। उस दिन समीर को समझ में आ गया कि सच्चा प्यार बड़ी-बड़ी कसमें खाने में नहीं, बल्कि ज़िंदगी की छोटी-छोटी नोक-झोंक और उन वादों में होता है, जो हम मौत के दरवाज़े से भी एक-दूसरे को वापस खींच लाने के लिए करते हैं।
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