रमेश एक मेहनती किसान था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन थी, लेकिन वह अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। गाँव में उसकी एक बात सबसे अधिक प्रसिद्ध थी—उसका तेज गुस्सा।
छोटी-सी बात पर भी वह अपना आपा खो बैठता था। कई बार उसकी पत्नी सीता और बेटा मोहन उसे समझाते, “गुस्सा इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है।” लेकिन रमेश हर बार यही कहता, “मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो गलत करेगा, उसे मैं छोड़ूँगा नहीं।”
एक दिन रमेश अपने खेत में काम कर रहा था। तभी उसका पड़ोसी सुरेश गलती से अपने बैलों को रमेश के खेत में ले आया। बैलों ने कुछ फसल रौंद दी। यह देखकर रमेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
उसने बिना कुछ सोचे-समझे सुरेश को खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी। सुरेश बार-बार माफी माँगता रहा और कहता रहा कि यह सब गलती से हुआ है, लेकिन रमेश का क्रोध शांत नहीं हुआ।
गुस्से में उसने सुरेश को धक्का दे दिया। सुरेश गिर पड़ा और उसके हाथ में चोट लग गई। गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। सबने रमेश को समझाया कि इतनी छोटी-सी बात पर इतना गुस्सा करना ठीक नहीं है। मगर रमेश किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।
कुछ दिनों बाद गाँव में पंचायत बैठी। पंचायत ने फैसला सुनाया कि रमेश को सुरेश के इलाज का खर्च देना होगा और नुकसान की भरपाई भी करनी होगी।
रमेश को यह फैसला बिल्कुल पसंद नहीं आया। गुस्से में उसने पंचायत के सामने भी ऊँची आवाज़ में बहस की। इससे गाँव के लोगों का विश्वास भी उससे उठने लगा। धीरे-धीरे लोग उससे दूरी बनाने लगे।
समय बीतता गया। एक दिन रमेश का बेटा मोहन गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसे तुरंत शहर के अस्पताल ले जाना था। रमेश ने गाँव वालों से मदद माँगी, लेकिन अधिकांश लोगों ने बहाना बना दिया। उन्हें रमेश का कठोर स्वभाव और पुराना व्यवहार याद था।
आखिरकार, बड़ी मुश्किल से एक बूढ़े किसान ने अपनी बैलगाड़ी दी, लेकिन अस्पताल पहुँचने में बहुत देर हो गई। डॉक्टर ने कहा कि यदि समय पर इलाज मिल जाता, तो हालत इतनी गंभीर नहीं होती। उस दिन रमेश अस्पताल के बाहर बैठा बहुत रोया।
उसे अपनी हर गलती याद आने लगी। उसे समझ में आया कि उसके गुस्से ने केवल दूसरों को ही नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार को भी दुख पहुँचाया है। यदि उसने लोगों से अच्छे संबंध बनाए होते, तो संकट के समय पूरा गाँव उसके साथ खड़ा होता।
घर लौटने के बाद रमेश ने सबसे पहले सुरेश के घर जाकर उससे माफी माँगी। उसने गाँव के अन्य लोगों से भी अपने व्यवहार के लिए क्षमा माँगी। धीरे-धीरे उसने अपने गुस्से पर नियंत्रण करना शुरू किया। जब भी उसे क्रोध आता, वह कुछ देर शांत बैठता, गहरी साँस लेता और सोचता कि जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय कितना नुकसान पहुँचा सकता है।
कुछ महीनों बाद गाँव वालों ने भी उसके बदले हुए व्यवहार को देखा। लोगों का विश्वास फिर से उस पर लौटने लगा। अब रमेश पहले की तरह गुस्से से नहीं, बल्कि धैर्य और समझदारी से हर समस्या का समाधान करने लगा। उसका परिवार भी खुश रहने लगा और गाँव में उसकी नई पहचान एक शांत और समझदार व्यक्ति के रूप में बनने लगी।
इस घटना ने रमेश को जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया कि गुस्सा एक ऐसी आग है, जो पहले स्वयं को जलाती है और फिर अपने आसपास की हर खुशी को राख बना देती है। इसलिए क्रोध पर नियंत्रण रखना ही सच्ची समझदारी और सफल जीवन की पहचान है।
बेटियाँ- in
वाक्य कहानी प्रतियोगिता
#गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा
लेखिका:
डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ