दो पीढ़ियों का रिश्ता

लंदन की सर्द और भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, जब कार ने बनारस की संकरी और जानी-पहचानी गलियों में प्रवेश किया, तो कबीर के चेहरे पर एक अजीब सी सुकून भरी मुस्कान तैर गई। कबीर और उसकी पत्नी मायरा शादी के तीन साल बाद पहली बार भारत आ रहे थे। मायरा वैसे तो भारतीय मूल की थी, लेकिन उसका जन्म और परवरिश लंदन में ही हुई थी। बनारस का यह पुराना लेकिन विशाल पुश्तैनी घर, यहाँ की हवा में घुली चंदन और धूप की महक, सब कुछ मायरा के लिए बिल्कुल नया और किसी जादुई दुनिया जैसा था। जब से कबीर के पिता का देहांत हुआ था, उसकी माँ, सुमित्रा देवी, इस बड़े से घर में लगभग अकेली ही रहती थीं। हालांकि कबीर की बुआ कुछ ही दूरी पर रहती थीं और अक्सर मिलने आती रहती थीं, लेकिन कबीर के बिना सुमित्रा जी की दुनिया जैसे ठहर सी गई थी। कबीर ने कई बार अपनी माँ को लंदन बुलाने की कोशिश की, लेकिन सुमित्रा जी ने हर बार यह कहकर टाल दिया कि “बेटा, मेरे रामजी तो इसी आंगन में बसते हैं, मैं ये घर छोड़कर सात समंदर पार कैसे रह पाऊंगी।”

बेटे और बहू के आने की खबर सुनकर सुमित्रा जी के भीतर जैसे कोई नई ऊर्जा का संचार हो गया था। उनके घुटनों का पुराना दर्द, जो उन्हें अक्सर परेशान करता था, जैसे अचानक कहीं गायब हो गया था। सुबह के चार बजे से ही घर में चहल-पहल शुरू हो गई थी। जब तक कबीर और मायरा सोकर उठते, पूरे घर में देशी घी में सिकते हुए बेसन और इलायची की सोंधी-सोंधी महक फैल चुकी होती थी। मायरा को यह सब बहुत अद्भुत लग रहा था। उसने तो लंदन में हमेशा मशीनी और नपी-तुली जिंदगी ही देखी थी। यहाँ एक इंसान के भीतर इतना निस्वार्थ प्रेम और इतनी ऊर्जा देखना उसके लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था।

दोपहर का समय था। बनारस की हल्की-हल्की ठंड और खिली हुई धूप आंगन में बिखरी थी। सुमित्रा जी ने कबीर के बचपन की सबसे पसंदीदा चीज— ‘गोंद और मेवे के पारंपरिक लड्डू’ और ‘मठरी’ बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी। मायरा, जो भारतीय संस्कृति और यहाँ के रहन-सहन को बहुत करीब से महसूस करना चाहती थी, दौड़कर अपनी सासू माँ के पास आंगन में बिछी चारपाई पर आकर बैठ गई।

“मम्मी जी, क्या मैं भी आपकी मदद करूँ? मुझे भी सीखना है कि ये कैसे बनता है। कबीर को आपके हाथ का खाना बहुत पसंद है, मैं सीख लूंगी तो लंदन में उसे बनाकर खिलाया करूंगी,” मायरा ने बड़े उत्साह से कहा।

सुमित्रा जी ने अपनी बहू का माथा चूमा और मुस्कुरा कर बोलीं, “अरे मेरी बच्ची, तू क्यों परेशान होगी? ये चूल्हे का काम है, आग की आंच लगेगी तुझे। तू बस यहाँ बैठकर मुझसे बातें कर, उसी में मेरा काम हल्का हो जाएगा।”

लेकिन मायरा कहाँ मानने वाली थी। उसने जिद करके बेसन भूनने के लिए भारी कड़ाही में पलटा चलाना शुरू कर दिया। शुरुआत के दस मिनट तो उसे बड़ा मज़ा आया। यह उसके लिए एक नई और रोमांचक गतिविधि थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मायरा को समझ में आने लगा कि यह काम जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। भारी कड़ाही में लगातार पलटा चलाने से उसके कंधों में दर्द होने लगा, चूल्हे की आंच से उसका गोरा चेहरा लाल हो गया और पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमकने लगीं। कुछ ही देर में उसकी कलाइयां जवाब देने लगीं। गर्म गोंद और मेवे के मिश्रण को हाथों से दबा-दबाकर गोल आकार देना तो और भी मुश्किल था। मायरा ने बमुश्किल सात-आठ लड्डू ही बांधे होंगे कि उसकी हिम्मत जवाब दे गई। उसकी पीठ में भयंकर दर्द उठने लगा।

सुमित्रा जी, जो लगातार बिना रुके, बिना एक भी उफ्फ किए अपना काम किए जा रही थीं, उन्होंने मायरा की हालत देख ली। उन्होंने तुरंत मायरा के हाथ से पलटा ले लिया और बड़े प्यार से पुचकारते हुए बोलीं, “बस बेटा, बहुत मदद कर दी तूने मेरी। अब तू जा और कमरे में जाकर थोड़ी देर पीठ सीधी कर ले। तेरी आदत नहीं है ना इन सब भारी कामों की, थक गई होगी तू। मैं बस इसे समेट कर आती हूँ।”

मायरा बिना कुछ कहे, अपना पसीना पोंछती हुई कमरे की तरफ चल दी। कमरे में कबीर अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। मायरा को हांफते और बिस्तर पर निढाल होते देख उसकी हंसी छूट गई।

“क्या हुआ महारानी? बहुत शौक चढ़ रहा था ना तुम्हें बनारसी हलवाई बनने का? मैं तो पहले ही कह रहा था कि तुमसे नहीं होगा,” कबीर ने हंसते हुए चुटकी ली।

मायरा ने उसे घूरते हुए कहा, “तुम चुप रहो कबीर। मुझे लगा था कि नया काम है, कुछ नया सीख लूंगी और मम्मी जी की मदद भी हो जाएगी। लेकिन हे भगवान… उनके साथ काम करना कितना मुश्किल है! वो कोई मशीन हैं क्या? सुबह चार बजे से उठकर पूरे घर की सफाई, फिर इतना भारी नाश्ता, फिर दोपहर का खाना, और अब यह सब… मैं तो सिर्फ आधे घंटे में टूट गई, मेरी कमर सीधी नहीं हो रही है, लेकिन वो बिना एक पल का ब्रेक लिए लगातार काम कर रही हैं। मैंने उन्हें आराम करने को कहा तो मुझे ही वापस भेज दिया।”

कबीर मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में एक अजीब सा ठहराव था। उसने लैपटॉप बंद किया और खिड़की से बाहर आंगन में अपनी माँ को काम करते हुए देखने लगा।

“जब तुमसे काम नहीं होता तो क्या ज़रूरत थी वहाँ जाने की? ओह, अब समझा… तुम मेरी माँ को इम्प्रेस करना चाहती हो, है ना?” कबीर ने उसे चिढ़ाने के लहजे में कहा।

मायरा ने एक गहरी सांस ली और कहा, “ऐसा कुछ नहीं है कबीर। मैं सच में उनकी मदद करना चाहती थी। लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आती… वो थकती क्यों नहीं हैं? इंसान ही तो हैं, और उनकी उम्र भी हो गई है। मैंने उन्हें सुबह से एक बार भी शांति से बैठकर चाय पीते या आराम करते नहीं देखा।”

कबीर की आंखों में एक गहरी चमक और हल्की सी नमी आ गई। उसने खिड़की से नज़र हटाकर मायरा की तरफ देखा और बहुत ही शांत स्वर में बोला, “मायरा… वो माँ हैं। मैंने उन्हें बचपन से लेकर आज तक ऐसे ही देखा है। जब मैं छोटा था और बीमार पड़ता था, तो वो पूरी-पूरी रात मेरे सिरहाने बैठी रहती थीं और सुबह उठकर फिर से पूरे घर का काम बिना थके निपटा लेती थीं। मुझे लगता था कि शायद माँ के पास कोई सुपरपावर होती है।”

कबीर थोड़ा रुका, उसने फिर बाहर देखा और आगे बोला, “लेकिन सच कहूं मायरा… माँ भी थकती हैं। उनका भी शरीर दुखता है, उनके भी पैरों में दर्द होता है। लेकिन वो अपनी थकान को, अपने दर्द को उस ममता और प्यार के पीछे छिपा लेती हैं, जो वो हमसे करती हैं। उन्हें लगता है कि अगर वो थक कर बैठ गईं, तो उनके बच्चे को उसका मनपसंद खाना कौन खिलाएगा? उनका प्यार उनकी हर थकान पर भारी पड़ जाता है। इसीलिए… शायद माँ कभी थकती नहीं… या यूं कहूँ कि वो हमें कभी यह पता नहीं चलने देतीं कि वो थक गई हैं।”

उस रात, जब पूरा घर सो रहा था, मायरा की आंख खुली। उसे पानी पीना था। जब वह रसोई की तरफ गई, तो उसने देखा कि सुमित्रा जी अपने कमरे में चारपाई पर बैठी हुई हैं और चुपचाप अपने घुटनों पर दर्द निवारक मलहम लगा रही हैं। उनके चेहरे पर दिन भर की वो थकान साफ नजर आ रही थी, जिसे उन्होंने पूरे दिन अपनी मुस्कान के पीछे छिपाए रखा था।

मायरा की आंखों में आंसू आ गए। उसे कबीर की बात पूरी तरह समझ में आ गई थी। बिना कोई शोर किए, मायरा दबे पांव सुमित्रा जी के कमरे में गई और चुपचाप उनके पैरों के पास बैठ गई। सुमित्रा जी कुछ कहतीं, उससे पहले ही मायरा ने उनके पैरों को अपने हाथों में ले लिया और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगी। सुमित्रा जी ने उसे रोकना चाहा, “अरे बहू, क्या कर रही है? तू जा सो जा।”

लेकिन मायरा ने भीगे हुए स्वर में कहा, “नहीं माँ, आज आप कुछ नहीं कहेंगी। आज मुझे पता चल गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत वो हाथ होते हैं, जो अपने बच्चों के लिए कभी थकना नहीं चाहते।” सुमित्रा जी ने नम आंखों से मायरा के सिर पर हाथ फेर दिया। उस रात उस पुराने घर के आंगन में केवल शांति नहीं थी, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच पनपा एक ऐसा गहरा रिश्ता था, जो बिना कुछ कहे ही सब कुछ समझ चुका था।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

लेखिका : मीना सहाय

error: Content is protected !!