लाल सुर्ख जोड़े में सजी, माथे पर भारी मांगटीका और हाथों में रची गहरी मेहंदी के बीच वो किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। पर उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो एक दुल्हन की आँखों में होनी चाहिए। मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल चालू था। स्क्रीन के दूसरी तरफ समीर था, जिसके चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी, बाल बिखरे हुए थे और आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वो कई रातों से सोया नहीं है। आमतौर पर समीर जब भी काव्या को देखता था, तो उसकी तारीफों के पुल बांध देता था, लेकिन आज उसके होंठ कांप रहे थे और आँखों से लगातार पानी बह रहा था।
“काव्या… तुम सच में जा रही हो? मुझे छोड़कर?” समीर की आवाज़ में एक ऐसी घुटन थी जैसे कोई उसका गला दबा रहा हो। काव्या ने अपनी भावनाओं को काबू में रखने की बहुत कोशिश की, लेकिन समीर की रुलाई देखकर उसकी भी आँखें छलक उठीं। उसने भारी आवाज़ में कहा, “समीर, मैंने तुमसे कहा था कि आज मुझे फोन मत करना। मैं नहीं चाहती कि मेरे काजल के साथ-साथ मेरा हौसला भी बह जाए। तुम ऐसे क्यों रो रहे हो? तुम तो हमेशा कहते थे कि हालात चाहे जो भी हों, तुम मुझे हमेशा हंसते हुए देखना चाहते हो। फिर आज ये बिखरे हुए बाल और ये हालत क्यों बना रखी है?” काव्या की आवाज़ बीच-बीच में टूट रही थी।
समीर ने अपने आँसू पोंछने की नाकाम कोशिश की और स्क्रीन को ऐसे छुआ जैसे वो काव्या को छूना चाहता हो। “मैं कैसे मुस्कुराऊं काव्या? मेरी तो पूरी दुनिया ही उजड़ रही है। बचपन से लेकर आज तक, मैंने हर सपना तुम्हारे साथ देखा था। मेरी ज़िंदगी की इकलौती ख्वाहिश थी कि मैं तुम्हें लाल जोड़े में अपनी दुल्हन बनते हुए देखूं। और आज तुम दुल्हन तो बनी हो, पर मेरी नहीं… किसी और की। काव्या, प्लीज, अभी भी वक्त है। मना कर दो इस शादी से। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा। तुम मेरा प्यार हो, तुम पर सिर्फ मेरा हक है।”
समीर की बातें सुनकर काव्या का दिल किसी कांच के टुकड़े की तरह चुभने लगा। उसे वो सारे दिन याद आने लगे जब वो और समीर एक ही स्कूल में पढ़ा करते थे। काव्या हमेशा से अपनी कक्षा में सबसे होशियार और समझदार लड़की थी, जबकि समीर पढ़ाई में थोड़ा कच्चा और चुलबुला था। समीर एक बहुत बड़े और रसूखदार बिल्डर का इकलौता बेटा था। उसके पास आलीशान बंगला, नौकर-चाकर, महंगी गाड़ियां सब कुछ था, लेकिन अगर कुछ नहीं था तो वो था उसके माता-पिता का वक्त और प्यार। उसके माता-पिता अपनी पार्टियों, बिजनेस मीटिंग्स और सोशल क्लब्स में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता था कि समीर किस क्लास में पहुँच गया है।
दूसरी तरफ, काव्या एक बहुत ही साधारण से मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी। उसके पिता, जिन्हें मोहल्ले में सब आदर से ‘मास्टरजी’ कहते थे, एक सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक थे। उनका घर छोटा ज़रूर था, लेकिन वहाँ प्यार, हंसी-मज़ाक और सुकून की कोई कमी नहीं थी। समीर को जो अपनापन अपने करोड़ों के बंगले में कभी नहीं मिला, वो उसे काव्या के उस छोटे से आंगन में मिलता था। समीर अक्सर स्कूल के बाद काव्या के घर ही आ जाया करता था। काव्या की माँ उसे अपने हाथों से खाना खिलाती, मास्टरजी उसे भी काव्या के साथ बैठाकर गणित के सवाल समझाते। समीर के लिए काव्या का घर ही उसकी असली दुनिया बन गया था। दोनों साथ बड़े हुए, साथ हंसे, साथ रोए और कब उनकी ये गहरी दोस्ती एक अटूट प्रेम में बदल गई, यह उन्हें खुद भी पता नहीं चला।
काव्या ने गहरी सांस ली और स्क्रीन पर देखते हुए कहा, “हक? किस हक की बात कर रहे हो समीर? प्यार सिर्फ दो लोगों के बीच का एहसास नहीं होता, वो दो परिवारों का मिलन भी होता है। तुमने कहा था ना कि तुम्हारी माँ मान जाएंगी? क्या हुआ फिर जब मेरे पिता तुम्हारे घर गए थे? याद है तुम्हें वो मनहूस दिन?”
समीर की आँखें शर्म से झुक गईं। वो कुछ बोल नहीं पाया, बस उसके आँसू बहते रहे। काव्या की आँखों में अब दुख से ज्यादा एक अजीब सी ज्वाला धधक रही थी। उसने आगे कहा, “समीर, मेरे बाबूजी, जो एक बहुत ही सीधे और सरल इंसान हैं, तुम्हारी बातों में आकर तुम्हारे घर मेरा रिश्ता लेकर गए थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया, पर मेरी खुशी के लिए, तुम्हारे प्यार पर भरोसा करके, वो तुम्हारे उस महल जैसे घर में गए। उन्होंने बड़ी उम्मीद से तुम्हारी माँ के सामने हाथ जोड़कर कहा था कि हम दोनों बच्चे एक-दूसरे को चाहते हैं, अगर ये शादी हो जाए तो दोनों की ज़िंदगी संवर जाएगी। पर पता है तुम्हारी माँ ने क्या कहा?”
काव्या का गला रुंध गया, पर उसने खुद को संभाला। “तुम्हारी माँ ने मेरे पिता को सोफे पर बैठने तक नहीं दिया। उन्होंने मेरे बाबूजी को सिर से पैर तक घूरते हुए कहा था कि ‘मास्टरजी, आपकी पूरी ज़िंदगी की कमाई और पेंशन को अगर मैं मिला भी दूँ, तो उतने का मेरे घर का कुत्ता महीने भर में खाना खा जाता है। आसमान की तरफ देखने से पहले इंसान को अपनी ज़मीन की औकात देख लेनी चाहिए। ये रिश्ते बराबरी वालों में होते हैं, आप जैसे भिखारियों के साथ नहीं।’ समीर, मेरे पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी में सिर्फ एक ही चीज़ कमाई थी, और वो थी उनकी इज़्ज़त। तुम्हारी माँ ने उस इज़्ज़त को अपने पैसों के अहंकार के पैरों तले रौंद दिया।”
समीर फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो काव्या। मुझे नहीं पता था कि माँ ऐसा कुछ कहेंगी। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, हम अलग रह लेंगे। मैं वो घर छोड़ दूँगा। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।”
काव्या ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “घर छोड़ दोगे? और फिर क्या होगा? मेरे पिता के स्वाभिमान पर जो चोट लगी है, क्या तुम्हारा घर छोड़ने से वो ठीक हो जाएगी? समीर, तुम हमारे घर इसलिए नहीं आते थे क्योंकि तुम बहुत अमीर थे, तुम इसलिए आते थे क्योंकि मेरे माता-पिता ने तुम्हें अपना बेटा माना था। तुमने सालों तक हमारी छोटी सी रसोई में बैठकर खाना खाया, मेरे पिता ने तुम्हें अपने हाथों से पढ़ाया, पर तुम्हारे घर वालों ने मेरे पिता को एक गिलास पानी तक के लिए नहीं पूछा। गलती तुम्हारी नहीं है समीर, गलती मेरी थी कि मैंने सोचा कि प्यार पैसों और हैसियत से बड़ा होता है। जिस दिन बाबूजी तुम्हारे घर से लौटकर आए थे, वो रोए नहीं थे, पर अंदर से पूरी तरह टूट गए थे। उनका वो खामोश चेहरा देखकर ही मैंने तय कर लिया था कि जिस चौखट पर मेरे पिता का सम्मान नहीं हो सका, उस चौखट पर मैं कभी रानी बनकर भी कदम नहीं रखूंगी।”
समीर बस बेबसी से काव्या को देख रहा था। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे।
काव्या ने अपने आँसू पोंछे और अपनी आवाज़ को दृढ़ करते हुए कहा, “बहुत हो गया समीर। मेरी ज़िंदगी का फैसला अब हो चुका है। और मैं तुम्हें बता दूँ, आज मैं जिससे शादी कर रही हूँ, वो कोई करोड़पति नहीं है। वो भी मेरी ही तरह एक साधारण परिवार से है। लेकिन जब उसके पिता हमारे घर रिश्ता लेकर आए, तो उन्होंने मेरे बाबूजी को गले लगाया। उन्होंने कहा कि वो कोई दहेज नहीं चाहते, बल्कि उन्हें गर्व है कि उनके घर में एक ऐसे शिक्षक की बेटी आ रही है जिसने इतने अच्छे संस्कार दिए हैं। चाय पीने के बाद जब वो जाने लगे, तो उन्होंने मेरे पिता को शॉल ओढ़ाकर सम्मान दिया। उन्होंने बाबूजी को यह एहसास ही नहीं होने दिया कि वो लड़की वाले हैं। उन्होंने हमें सम्मान दिया समीर, वो सम्मान जो तुम्हारी माँ करोड़ों रुपये खर्च करके भी किसी को नहीं दे सकती।”
समीर का सिर अब पूरी तरह झुक चुका था। उसे अपनी हार का एहसास हो गया था। काव्या ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और कहा, “समीर, अपनी माँ से मेरी तरफ से एक बात ज़रूर कहना। कहना कि उनकी तिजोरी में जितने भी पैसे हैं, वो सब मिलकर भी वो सुकून और वो सम्मान नहीं खरीद सकते जो मुझे अपने इस नए परिवार में मिलने वाला है। मैं कम पैसों में शायद एक साधारण कपड़े पहनूं, पर मेरी आत्मा हमेशा खुश रहेगी, क्योंकि मेरे सिर पर मेरे पिता के स्वाभिमान की चादर होगी। मैं अपने बाबूजी के आत्मसम्मान को बचाने के लिए तुम जैसे सौ प्यार कुर्बान कर सकती हूँ। अलविदा समीर… हमेशा के लिए खुश रहना।”
इससे पहले कि समीर कुछ और कह पाता, काव्या ने कॉल काट दिया। उसने गहरी सांस ली, आईने में अपनी तरफ देखा, चेहरे पर एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान लाई और अपने बाबूजी का हाथ पकड़कर मंडप की तरफ बढ़ गई, जहाँ उसका नया और सम्मानित जीवन उसका इंतज़ार कर रहा था।
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लेखिका : सविता गर्ग