दो शरीर और एक आत्मा

निधि जब इस घर में बहू बनकर आई थी, तो उसे सबसे ज्यादा हैरानी अपने सास-ससुर का आपसी तालमेल देखकर हुई थी। उसके ससुर जी, यानी पंडित विद्याधर, अपने जमाने के प्रखर विद्वान और यूनिवर्सिटी के टॉपर रहे थे। उनकी कुशाग्र बुद्धि, अनुशासन और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि घर के तीनों बच्चे आज देश-विदेश में ऊंचे पदों पर बैठे थे। लेकिन विद्याधर जी का स्वभाव थोड़ा गंभीर था, वे कभी बच्चों के मामलों में सीधे दखल नहीं देते थे। उनके इस बड़े से परिवार का प्रशासन एक बहुत ही अनोखे और शांतिपूर्ण ‘प्रॉपर चैनल’ के तहत चलता था, जिसकी धुरी थीं निधि की सास, सुमित्रा देवी।

सुमित्रा देवी की आंखें और कान घर के हर कोने पर रहते थे। वे हर सदस्य की छोटी से छोटी परेशानी को बिना उनके कहे भांप लेती थीं। चाहे वो बड़े बेटे मयंक का ऑफिस का तनाव हो, बेटी की ससुराल की कोई अनकही उलझन हो, या नई बहू निधि की इस नए घर में ढलने की झिझक। सुमित्रा देवी चुपचाप वो सारी बातें रात के समय विद्याधर जी के कानों तक पहुंचा देती थीं। विद्याधर जी अपनी पैनी समझ से उस समस्या का कोई बेहतरीन और व्यावहारिक समाधान निकालते, और अगले ही दिन सुमित्रा देवी उस समाधान को बड़े ही सहज और ममता भरे तरीके से बच्चों के सामने ऐसे पेश कर देतीं, जैसे वो उनका अपना ही विचार हो। विद्याधर जी कभी अपनी बुद्धिमत्ता का श्रेय नहीं लेते थे और सुमित्रा देवी कभी अपनी मेहनत का बखान नहीं करती थीं।

निधि अक्सर अपने पति मयंक से मुस्कुराते हुए कहती, “तुम्हारे माता-पिता को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने अग्नि के फेरे लेते वक्त ही कोई अलिखित कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिया था। एक घर की समस्याएं खोज कर लाएगा और दूसरा बिना किसी शोर के उसका समाधान निकालेगा। एक घर को अपनी ममता से जोड़ेगा और दूसरा उसे अपनी बुद्धि से सही दिशा देगा। सच में, ऐसा लगता है जैसे दोनों मिलकर एक ही इंसान का जीवन जी रहे हों।”

इस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ का असली रूप और इसकी असीम गहराई तो तब समझ में आई जब वक्त ने अपनी करवट ली। समय किसी के लिए नहीं रुकता। देखते ही देखते विद्याधर जी और सुमित्रा देवी के जीवन की संध्या आ गई। दोनों के बाल बर्फ की तरह सफेद हो चुके थे और शरीर कमजोर होने लगा था। सुमित्रा देवी को पिछले कुछ सालों से ब्लड प्रेशर और शुगर की पुरानी शिकायत रहने लगी थी, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बीमारियों को अपने चेहरे की उस चिर-परिचित मुस्कान पर हावी नहीं होने दिया। वह अपनी दवाइयां समय पर लेतीं और घर के कामों में उसी तरह मुस्कुराती हुई व्यस्त रहतीं, जैसे वो आज भी कोई नवयुवती हों। घर के किसी भी सदस्य को कभी उन्होंने पानी के एक गिलास के लिए भी कष्ट नहीं दिया था।

सर्दियों के दिन थे और हवा में एक अजीब सी ठिठुरन थी। एक शाम सुमित्रा देवी को अचानक बहुत तेज खांसी और जुकाम हुआ। निधि ने घबराकर तुरंत उन्हें अदरक और तुलसी का काढ़ा बनाकर दिया और मयंक से डॉक्टर को बुलाने की जिद करने लगी। लेकिन सुमित्रा देवी ने हंसकर उसे टाल दिया, “अरे बहू, क्यों घबराती है? ये तो बस बदलते मौसम का असर है। सुबह तक बिल्कुल ठीक हो जाएगा। तू जाकर आराम कर, मयंक भी थका हुआ आया है, उसे खाना दे।” उस रात सुमित्रा देवी ने विद्याधर जी से बहुत देर तक बातें कीं। वो उन दोनों की कोई बहुत ही निजी गुफ्तगू थी, जिसमें सुमित्रा देवी के चेहरे पर किसी दर्द की बजाय एक अजीब सा सुकून और शांति थी।

अगली सुबह जब निधि हमेशा की तरह उनके लिए चाय लेकर उनके कमरे में गई, तो उसने देखा कि विद्याधर जी अपने बिस्तर पर बैठे शून्य में निहार रहे हैं और सुमित्रा देवी अपनी रजाई में बिल्कुल शांति से सो रही हैं। निधि ने जब उन्हें जगाने के लिए आवाज दी, तो कोई हलचल नहीं हुई। निधि के हाथ से चाय का कप छूटकर गिर गया। सुमित्रा देवी ने किसी को कोई कष्ट दिए बिना, अपनी खांसी या तकलीफ की किसी को कोई भनक लगे बिना ही, रात के किसी शांत पहर में अपनी अंतिम सांस ले ली थी। सोते-सोते ही उन्होंने इस दुनिया को बड़ी खामोशी से अलविदा कह दिया था।

पूरे घर में कोहराम मच गया। बच्चे जो जहां थे, रातों-रात फ्लाइट पकड़कर आ गए। निधि का रो-रोकर बुरा हाल था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो सास कल रात तक उसे आराम करने की हिदायत दे रही थी, वो अब कभी आंखें नहीं खोलेगी। लेकिन इस पूरे दुखद माहौल में जिस इंसान को देखकर सब सबसे ज्यादा हैरान थे, वो थे विद्याधर जी। जिनकी पूरी दुनिया सुमित्रा देवी के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिनकी हर बात का जरिया सुमित्रा देवी थीं, वे विद्याधर जी बिल्कुल शांत थे। उनकी आंखों में एक गहरा सूनापन और आंसू तो थे, लेकिन कोई विलाप या चीख-पुकार नहीं थी। उन्होंने अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार की सारी रस्में उसी ‘प्रॉपर चैनल’ और सधे हुए तरीके से निभाईं, जैसे वो जीवन भर हर जिम्मेदारी निभाते आए थे।

तेरहवीं के बाद जब सारे रिश्तेदार चले गए और घर में एक भयानक सन्नाटा पसर गया, तो एक रात निधि विद्याधर जी के कमरे में उन्हें दूध देने गई। उसने देखा कि विद्याधर जी सुमित्रा देवी की एक पुरानी तस्वीर को हाथ में पकड़े उससे बातें कर रहे थे। निधि दरवाजे पर ही ठिठक गई। विद्याधर जी ने निधि की परछाई देखी और उसे पास बुलाकर बोले, “बहू, तुम हमेशा मयंक से कहती थी ना कि हम दोनों के बीच कोई कॉन्ट्रैक्ट है? हां, वो बात बिल्कुल सच थी।”

निधि अवाक रह गई। विद्याधर जी ने एक ठंडी सांस ली और भारी आवाज में आगे कहा, “सुमित्रा हमेशा मुझसे कहती थी कि मैं बच्चों पर या तुम पर बुढ़ापे में कभी कोई बोझ नहीं बनना चाहती। वो चाहती थी कि जब भी ईश्वर का बुलावा आए, तो वो बिना किसी को तकलीफ दिए, चलते-फिरते इस दुनिया से विदा ले। उस रात जब उसे तेज खांसी उठी थी, तो उसे शायद अपने जाने का अहसास हो गया था। उसने उस रात मुझसे एक आखिरी वादा लिया था। उसने कहा था कि उसके जाने के बाद मैं टूटकर या रो-रोकर तुम बच्चों को कमजोर नहीं करूंगा। उसने मुझसे कहा था कि ‘मैंने जीवन भर आपका हर समाधान और आपका हर संदेश बच्चों तक पहुंचाया है, अब आपको मेरा ये आखिरी संदेश उन तक पहुंचाना है कि मैं इस जीवन से बहुत खुश होकर और पूरे सम्मान से गई हूं।’ मैंने उस रात उससे वादा किया था कि मैं उसके इस कॉन्ट्रैक्ट की आखिरी शर्त भी उसी तरह निभाऊंगा, जैसे जीवन भर हम एक-दूसरे का साथ निभाते आए हैं।”

निधि की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसे आज समझ आ गया था कि उन दोनों का रिश्ता किसी लौकिक प्रेम या दिखावे से बहुत ऊपर उठ चुका था। वह सिर्फ पति-पत्नी नहीं थे, बल्कि दो शरीर और एक आत्मा थे। सुमित्रा देवी जाते-जाते भी अपनी खामोशी से पूरे परिवार को एक ऐसा मजबूत धागा दे गई थीं, जिसे विद्याधर जी अपने आंसुओं को पीकर भी मजबूती से थामे हुए थे। उनका वो अदृश्य ‘कॉन्ट्रैक्ट’ मृत्यु के बाद भी नहीं टूटा था।

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