नई बहू

लाल सुर्ख जोड़े में लिपटी, भारी गहनों के बोझ तले बैठी काव्या आज किसी सजी-धजी गुड़िया से कम नहीं लग रही थी। पूरे घर में गेंदे के फूलों और देसी घी की मिठाइयों की महक तैर रही थी। यह शहर के जाने-माने वकील दीनानाथ जी का घर था, जहाँ आज उनके इकलौते बेटे सुशांत की बहू कदम रख चुकी थी। घर के बड़े से आंगन में मुँह-दिखाई की रस्म चल रही थी। औरतों का जमावड़ा था, और जहाँ चार औरतें हों, वहाँ बातों के बवंडर न उठें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। घूंघट की आड़ से काव्या सब कुछ देख और सुन रही थी।

“अरे, लड़की तो बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर है। लाखों में कमाती है। देखना, इस घर की रसोई तो इसने कभी नहीं संभालनी।” एक दूर की मौसी ने पान चबाते हुए अपनी बगल में बैठी महिला से फुसफुसाते हुए कहा।

“हाँ बहन, और सुना है कि अपने फैसले खुद लेती है। बहुत तेज दिमाग की है। शहर में पली-बढ़ी है, हमारे सुशांत जैसे सीधे लड़के को तो अपनी उंगलियों पर नचाएगी। बड़े घरों की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ कहाँ किसी के दबदबे में रहती हैं। इनका तो अपना ही अलग रुतबा होता है,” दूसरी ने भी सुर में सुर मिलाया।

काव्या के कानों में ये सारी बातें पड़ रही थीं। उसके होंठों पर एक हल्की, सौम्य सी मुस्कान तैर गई। उसने न तो अपना घूंघट हटाया और न ही अपनी आँखों में कोई नाराजगी झलकने दी। वह बस एक शांत झील की तरह बैठी रही, जिसमें कोई पत्थर भी फेंके तो कुछ पल की लहरों के बाद फिर से शांति छा जाती है। उसे बचपन से ही सिखाया गया था कि हर बात का जवाब तुरंत देना जरूरी नहीं होता, कभी-कभी आपका धैर्य ही आपका सबसे बड़ा उत्तर होता है। मुँह-दिखाई की यह रस्म घंटों चली। तरह-तरह के उपहार, शगुन के लिफाफे और ढेर सारी नसीहतें काव्या की झोली में डाली गईं।

तीन दिन बाद घर की रौनक थोड़ी कम होने लगी। दूर के रिश्तेदार अपने-अपने घरों को लौट चुके थे। घर में अब बस सुशांत के ताऊ जी का परिवार बचा था। ताऊ जी का परिवार हमेशा से ही इस घर में अपना दबदबा रखता आया था। ताई जी, जिनका नाम सुभद्रा था, पुराने ख्यालों की एक सख्त महिला थीं। पूरे खानदान में उनकी बातों को पत्थर की लकीर माना जाता था। अगले दिन उन्हें भी अपने गाँव वापस लौटना था। जाने से पहले, सुभद्रा ताई जी ने काव्या को अपने कमरे में बुलवाया। काव्या सलीके से सिर पर पल्लू रखकर उनके कमरे में दाखिल हुई और उनके पैर छुए।

सुभद्रा ताई जी ने आशीर्वाद देते हुए काव्या को अपने पास पलंग पर बैठा लिया। उनकी आँखों में एक अजीब सा रौब था। उन्होंने काव्या के चेहरे को गौर से देखा और फिर एक गंभीर स्वर में बोलीं, “देखो बहू, तुम पढ़ी-लिखी हो, नौकरी करती हो, यह सब अपनी जगह ठीक है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, मायके की उड़ान अलग होती है और ससुराल की जमीन अलग। हमारी देवरानी, यानी तुम्हारी सास ने इस घर को बहुत जतन से सींचा है। सुशांत इस घर का इकलौता चिराग है, और उसे बचपन से वही मिला है जो उसने चाहा है।”

काव्या चुपचाप सुनती रही। ताई जी ने अपनी बात को और जोर देते हुए कहा, “बेटा, आज तुम्हें मैं एक ऐसा गुरुमंत्र दे रही हूँ जो जिंदगी भर तुम्हारे काम आएगा। औरत का असली गहना उसकी सहनशीलता होती है। घर की शांति के लिए औरत को ही झुकना पड़ता है। जो औरत घर में गूंगी और बहरी बनकर रहती है, वही असल में राज करती है। ‘झुकोगी तो टूटोगी नहीं, सहोगी तो टिकोगी’। बस यही सुखी वैवाहिक जीवन का मूल मंत्र है। मेरी बात समझ रही हो ना?”

ताई जी की इन बातों में सदियों से चली आ रही उस पितृसत्तात्मक सोच की गूंज थी, जिसने न जाने कितनी ही औरतों के सपनों और आत्मसम्मान का गला घोंट दिया था। एक पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। काव्या ने गहरी सांस ली। वह जानती थी कि अगर आज वह चुप रह गई, तो जिंदगी भर उसे इसी खामोशी के पिंजरे में कैद रहना पड़ेगा। उसने अपने सिर का पल्लू थोड़ा ठीक किया, अपनी नजरें उठाईं और ताई जी की आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही मधुर लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।

“ताई जी, आपकी बातों और आपके तजुर्बे का मैं बहुत सम्मान करती हूँ। आपने और माँ जी ने इस घर के लिए जो किया है, उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। लेकिन ताई जी, मैं इस घर में सुशांत की जीवनसंगिनी बनकर आई हूँ, कोई प्रतियोगिता जीतने नहीं। अगर सुशांत इस घर का चिराग हैं, तो मैं भी अपने माता-पिता के घर की रोशनी हूँ। एक रिश्ता तभी खूबसूरत होता है जब दोनों तरफ से बराबर का सम्मान और समझ हो। मैं झुकने से पीछे नहीं हटूंगी, लेकिन सिर्फ वहीं जहाँ प्यार हो। मैं यहाँ एक नई जिंदगी जीने, इस परिवार को अपनाने और खुशियाँ बांटने आई हूँ, सिर्फ ‘सहने’ या ‘घुटने’ के लिए नहीं। मुझे लगता है कि जहाँ सिर्फ सहना पड़े, वहाँ रिश्ते बचते नहीं, बस ढोए जाते हैं।”

काव्या की इस बेबाक लेकिन बेहद सधी हुई बात को सुनकर ताई जी हक्की-बक्की रह गईं। उनके चेहरे का रंग उड़ गया। आज तक इस खानदान में किसी बहू ने उनके सामने इस तरह अपनी बात रखने की हिम्मत नहीं की थी। वे कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी कमरे के दरवाजे पर एक आहट हुई।

काव्या की सास, निर्मला जी, दरवाजे पर खड़ी थीं। उनके हाथों में चाय की ट्रे थी। उन्होंने काव्या की एक-एक बात सुनी थी। ताई जी ने निर्मला जी को देखते ही तंज कसते हुए कहा, “देख रही हो निर्मला अपनी नई-नवेली बहू के तेवर? अभी घर में आई नहीं और जुबान कैंची की तरह चलने लगी है। इसे ही कहते हैं ज्यादा पढ़ाई-लिखाई का गुरूर।”

निर्मला जी धीरे से कमरे के अंदर आईं। उन्होंने चाय की ट्रे मेज पर रखी। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा या तनाव नहीं था, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। उन्होंने जाकर काव्या के कंधे पर प्यार से हाथ रखा और ताई जी की तरफ मुड़कर बोलीं, “दीदी, इसमें गुरूर नहीं, आत्मसम्मान है। और मुझे खुशी है कि मेरी बहू के पास यह है। मैंने अपनी पूरी जिंदगी यह सोचकर गुजार दी कि चुप रहने से घर नहीं टूटते, लेकिन सच तो यह है दीदी, कि अंदर ही अंदर मैं रोज टूटती थी। मैं नहीं चाहती कि जो घुटन मैंने सही, वह मेरी बेटी जैसी बहू भी सहे। काव्या बिल्कुल सही कह रही है। रिश्ते बराबरी से चलते हैं, किसी एक के डर या खामोशी से नहीं।”

ताई जी अवाक रह गईं। जिस निर्मला को उन्होंने हमेशा अपने इशारों पर चलाया था, आज वह अपनी बहू की ढाल बनकर खड़ी थी। ताई जी बिना कुछ कहे, मुँह फुलाकर वहाँ से चली गईं। कमरे में अब सिर्फ सास और बहू थीं। काव्या की आँखों में अपनी सास के लिए एक गहरी कृतज्ञता के आंसू छलक आए।

निर्मला जी ने काव्या के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, रोती क्यों है? तूने जो आज कहा, वह कहने की हिम्मत मुझमें कभी नहीं आई। लेकिन अब इस घर की रीत हम दोनों मिलकर बदलेंगे। यहाँ अब कोई सहेगा नहीं, सब मिलकर खुशी-खुशी रहेंगे।”

काव्या ने अपनी सास को कसकर गले लगा लिया। उस दिन उस घर के आंगन में केवल एक नई बहू का प्रवेश नहीं हुआ था, बल्कि सदियों पुरानी एक रूढ़िवादी सोच की विदाई भी हुई थी। रिश्तों की नींव अब मजबूरी और खामोशी पर नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और एक-दूसरे के साथ पर रखी जा रही थी।

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