“रजत, तुम मेरी बात समझ क्यों नहीं रहे हो? रोहन के इक्कीसवें जन्मदिन पर हमें उसे वही लग्जरी एसयूवी ही गिफ्ट करनी चाहिए, जिसके बारे में वह पिछले छह महीने से बात कर रहा है।” सुमेधा ने अपना लैपटॉप बंद करते हुए गहरी साँस ली और पति की तरफ देखा।
रजत, जो अपनी कंसल्टेंसी फर्म की कुछ फाइलों में उलझा था, ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और शांति से बोला, “सुमेधा, कार की कीमत पच्चीस लाख रुपये है। इक्कीस साल के लड़के के हाथ में इतनी महँगी गाड़ी देना ना तो सुरक्षित है और ना ही व्यावहारिक। अभी उसे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। हम उसे कोई सामान्य गाड़ी भी तो दे सकते हैं।”
“सामान्य गाड़ी?” सुमेधा की आवाज़ में एक तीखापन आ गया। “रजत, तुम भूल रहे हो कि रोहन जिन दोस्तों के साथ उठता-बैठता है, वो सभी बड़े घरों के बच्चे हैं। उसके ग्रुप में सबके पास अपनी-अपनी लग्जरी गाड़ियाँ हैं। अगर हम उसे कोई सस्ती गाड़ी देंगे, तो दोस्तों के बीच उसका क्या इम्प्रेशन पड़ेगा? उसका कॉन्फिडेंस गिर जाएगा। और वैसे भी, हम दोनों अच्छा कमाते हैं। मेरी अपनी एक अच्छी खासी कॉर्पोरेट जॉब है, तुम्हारा अपना जमा-जमाया बिजनेस है। अगर हम अपने इकलौते बेटे के लिए इतना भी नहीं कर सकते, तो इस कमाई का क्या फायदा?”
रजत ने समझाने का आखिरी प्रयास किया, “मैं कमाई की बात नहीं कर रहा हूँ, सुमेधा। मैं जरूरत और दिखावे के बीच के फर्क की बात कर रहा हूँ। पच्चीस लाख एक बहुत बड़ी रकम होती है।”
“अरे, तुम रकम की चिंता क्यों कर रहे हो?” सुमेधा ने रजत के कंधे पर हाथ रखते हुए एक व्यावसायिक मुस्कान के साथ कहा, “मैं तुम पर अकेले कोई बोझ नहीं डाल रही हूँ। हम एक मॉडर्न कपल हैं। मैंने फैसला किया है कि गाड़ी की डाउन पेमेंट से लेकर हर महीने की ईएमआई तक, सब कुछ हम ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ शेयर करेंगे। आधा तुम देना, आधा मैं दूँगी। आखिर बेटा हम दोनों का है, उसकी खुशियों की जिम्मेदारी भी हम दोनों की बराबर है।”
सुमेधा के इस ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ वाले गणित और बेटे के प्रति उसके अंधे मोह के आगे रजत को झुकना ही पड़ा। कुछ ही दिनों में घर के आँगन में वह चमचमाती पच्चीस लाख की गाड़ी खड़ी थी। रोहन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। गाड़ी आने की खुशी में शहर के एक नामी पाँच सितारा होटल में एक शानदार पार्टी का आयोजन किया गया। सुमेधा के कॉर्पोरेट दोस्त, रजत के क्लाइंट्स और रोहन के सारे दोस्त उस पार्टी में शामिल हुए।
पार्टी में हर कोई सुमेधा और रजत की तारीफ कर रहा था। सुमेधा बड़े गर्व से अपनी सहेलियों को बता रही थी कि कैसे उसने और रजत ने मिलकर फिफ्टी-फिफ्टी के फॉर्मूले से यह गाड़ी ली है। “यही तो आज के जमाने की पार्टनरशिप है,” सुमेधा वाइन का ग्लास पकड़े हुए कह रही थी, “पति-पत्नी को हर जिम्मेदारी आधी-आधी बाँट लेनी चाहिए, तभी जिंदगी स्मूथ चलती है।” रजत दूर खड़ा बस मुस्कुरा रहा था, हालाँकि उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सी खटक थी।
इस भव्य आयोजन और वाहवाही को बीते अभी मुश्किल से तीन हफ्ते ही हुए थे कि एक रात रजत के फोन की घंटी अचानक बज उठी। रात के करीब दो बज रहे थे। रजत ने घबराकर फोन उठाया। स्क्रीन पर उसके छोटे भाई अनुज का नाम फ्लैश हो रहा था। अनुज, जो बनारस में अपने पुश्तैनी घर में पिताजी के साथ रहता था और एक सरकारी स्कूल में मामूली सी नौकरी करता था।
“हेलो अनुज, इतनी रात को… सब ठीक तो है?” रजत की आवाज़ में नींद और घबराहट दोनों घुली हुई थीं।
“भैया… पिताजी…” दूसरी तरफ से अनुज की रुंधती हुई आवाज़ आई। “पिताजी बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे। हम लोग उन्हें तुरंत यहाँ के बड़े अस्पताल लेकर आए हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई है और अंदरूनी ब्लीडिंग भी हो रही है। सुबह ही ऑपरेशन करना पड़ेगा। भैया, मुझे बहुत डर लग रहा है।”
रजत के पैरों तले जमीन खिसक गई। “तू घबरा मत अनुज। मैं अभी… मैं अभी इसी वक्त निकलता हूँ। सुबह तक पहुँच जाऊँगा। तू बस पिताजी का ध्यान रख और पैसों की बिल्कुल चिंता मत करना।”
रजत ने फोन काटा और तेजी से अलमारी की तरफ भागा। वह घबराहट में अपने कपड़े एक छोटे से बैग में ठूंसने लगा। सुमेधा भी उठकर बैठ गई थी। उसने सारी बात सुनी।
“रजत, यह तो बहुत बुरा हुआ। तुम जल्दी निकलो,” सुमेधा ने कंबल ओढ़ते हुए कहा। फिर जैसे उसे अचानक कुछ याद आया, वह बिस्तर से उठी और रजत के पास जाकर धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में बोली, “सुनो, मैं जानती हूँ कि इस वक्त तुम्हें जाना ही चाहिए। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। बनारस के उस बड़े प्राइवेट अस्पताल का बिल बहुत भारी-भरकम आएगा। तुम भावनाओं में बहकर सारा बिल अपने कार्ड से मत भर देना। अनुज से साफ-साफ कह देना कि वो भी आधा बिल दे। आखिर पिताजी अकेले तुम्हारे नहीं, उसके भी तो हैं। वो उनके साथ रहता है, उसका भी फर्ज बनता है। हर चीज फिफ्टी-फिफ्टी होनी चाहिए, समझे?”
रजत, जो अपने बैग की चेन बंद कर रहा था, सुमेधा की यह बात सुनकर ठिठक गया। उसने धीरे से बैग को बिस्तर पर रखा और मुड़कर सुमेधा की आँखों में देखा। उसकी आँखों में इस वक्त ना तो कोई गुस्सा था और ना ही कोई शिकायत, बल्कि एक गहरी निराशा और तरस था।
“सुमेधा,” रजत की आवाज़ एकदम शांत, लेकिन किसी धारदार चाकू की तरह तेज थी। “आज से तीन हफ्ते पहले, जब हमने रोहन के दिखावे और शौक के लिए पच्चीस लाख की गाड़ी खरीदी थी, तब तुमने बड़ी आसानी से उस खर्चे को फिफ्टी-फिफ्टी बाँट लिया था। वह हमारा शौक था, कोई जरूरत नहीं। और आज… आज जब मेरे पिता, जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं आज इस मुकाम पर खड़ा हूँ, अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं, तो तुम्हें वहाँ भी अपना ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ का गणित नजर आ रहा है?”
सुमेधा ने सफाई देनी चाही, “मेरा वह मतलब नहीं था रजत। मैं तो बस व्यवहारिकता की बात…”
“कैसी व्यवहारिकता?” रजत ने उसकी बात काटते हुए कहा। “अनुज की महीने की तनख्वाह मात्र तीस हजार रुपये है सुमेधा। उसी में वह अपना घर चलाता है, अपनी पत्नी और बच्चों को पालता है, और पिताजी की रोजमर्रा की दवाइयों का खर्च भी उठाता है। उसने कभी मुझसे एक रुपये की मदद नहीं माँगी। जब मैं यहाँ शहर में अपना करियर बनाने में व्यस्त था, तब अनुज ने अपने सपनों को मारकर पिताजी के बुढ़ापे की लाठी बनना स्वीकार किया। और आज, जब एक भारी मेडिकल इमरजेंसी आई है, तो तुम चाहती हो कि मैं उस गरीब भाई से अस्पताल का आधा बिल माँगू? सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारे हिसाब से रिश्ते किसी पार्टनरशिप फर्म की तरह फिफ्टी-फिफ्टी के शेयर पर चलते हैं?”
रजत ने अपना बैग कंधे पर टांगा और कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए आखिरी बार मुड़कर कहा, “तुम्हारे लिए शायद रिश्ते एक स्प्रेडशीट हैं, जहाँ हर क्रेडिट और डेबिट का हिसाब बराबर होना चाहिए। लेकिन मेरे लिए नहीं। जब बेटा जिद करता है, तो हम अपनी हैसियत से बढ़कर सौ प्रतिशत देते हैं, तब हम प्रतिशत नहीं गिनते। तो फिर माँ-बाप के लिए प्रतिशत क्यों? परिवार और रिश्ते इस ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ की चालाकी से नहीं चलते सुमेधा, ये सौ प्रतिशत समर्पण, प्यार और जरूरत के वक्त बिना सोचे-समझे खड़े रहने से निभाए जाते हैं। काश… तुम्हारी कॉर्पोरेट दुनिया ने तुम्हें यह भी सिखाया होता।”
रजत बिना कोई और शब्द कहे कमरे से बाहर निकल गया। कुछ ही पलों में सुमेधा ने बाहर गाड़ी के स्टार्ट होने और फिर उसके दूर जाने की आवाज़ सुनी। वह वहीं बिस्तर के किनारे बुत बनकर बैठी रह गई। उसकी नजर खिड़की के बाहर खड़ी उस पच्चीस लाख की चमचमाती एसयूवी पर पड़ी, और पहली बार उसे वह गाड़ी अपनी खोखली सोच का एक बहुत भद्दा मजाक लग रही थी।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के इस आधुनिक दौर में हम सच में रिश्तों को व्यापार और प्रतिशत के तराजू में तौलने लगे हैं? क्या बच्चों की फिजूलखर्ची पर दोनों हाथों से पैसा लुटाने वाले लोग माता-पिता की जरूरत के वक्त हिसाब-किताब लगाने में सही हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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