करवाचौथ

सुबह की पहली किरण अभी ठीक से फूटी भी नहीं थी कि घर में बर्तनों की हल्की सी खनक और सुमित्रा जी की आवाज़ गूंजने लगी थी। श्रुति के लिए आज का दिन बेहद खास था। शादी के बाद यह उसका पहला करवाचौथ था। वैसे तो उसने अपनी माँ को हमेशा पूरे विधि-विधान से यह व्रत करते देखा था, लेकिन ससुराल के नियम और तौर-तरीके थोड़े अलग होते हैं, यह बात वह अच्छी तरह जानती थी। इसलिए बिना किसी शिकायत के, वह भोर होने से पहले ही उठ गई थी। सुमित्रा जी, जो कि अपनी पुरानी मान्यताओं और कड़े नियमों के लिए पूरे मोहल्ले में जानी जाती थीं, उन्होंने श्रुति को सरगी का थाल थमाते हुए हर एक रीति-रिवाज बड़ी बारीकी से समझाया।

उन्होंने कड़क लेकिन ममता भरी आवाज़ में हिदायत दी कि उनके घर में करवाचौथ का व्रत बहुत निष्ठा से रखा जाता है। यह कोई आजकल का फैशन नहीं है जिसे जब चाहा किया और जब चाहा छोड़ दिया। पानी की एक बूंद भी गले से नीचे नहीं उतरनी चाहिए। और शाम को सूरज ढलने से पहले सज-धज कर तैयार हो जाना। शर्मा जी की छत पर मोहल्ले की सब औरतें इकट्ठा होंगी, वहीं करवा माता की पूजा होगी। उन्होंने यह भी ताकीद की कि रोहन को फोन करके बता दे कि आज दफ्तर से जल्दी लौट आए क्योंकि चाँद निकलने के वक़्त पति का पास होना बहुत ज़रूरी माना जाता है।

श्रुति ने सिर पर पल्लू सही करते हुए नम्रता से हामी भरी और कहा कि उसने रात में ही रोहन को बता दिया था और वह समय पर आ जाएंगे। सरगी खाने के बाद दिन की शुरुआत हुई। कुछ ही देर में रोहन तैयार होकर कमरे से बाहर आया। वह हमेशा की तरह बहुत जल्दबाज़ी में लग रहा था। उसकी आँखें हल्की लाल थीं, जैसे रात भर ठीक से सोया न हो। श्रुति ने रसोई से बाहर आते हुए उसे रोका और कहा कि नाश्ता टेबल पर लगा दिया है, बस दो मिनट रुक जाए तो वह चाय ले आए।

रोहन ने अपनी घड़ी की तरफ देखते हुए कहा कि आज बिल्कुल समय नहीं है। ऑफिस में एक बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है और उसे क्लाइंट से मिलने शहर के दूसरे कोने में जाना है। उसने कहा कि नाश्ता और टिफिन दोनों रहने दो, वह बाहर ही कुछ खा लेगा। इतना कहकर वह तेज़ी से दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।

सुमित्रा जी, जो दालान में बैठी तुलसी की माला फेर रही थीं, उन्होंने रोहन को खाली हाथ जाते देखा तो टोक दिया। उन्होंने कहा कि आज बहू का पहला करवाचौथ है और वह ऐसे खाली पेट दफ्तर भाग रहा है, कुछ खा कर तो जाना चाहिए था। रोहन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि आज बहुत काम है और शाम को जल्दी भी तो आना है, इसलिए वह सब संभाल लेगा। और वह गाड़ी निकालकर चला गया।

सुमित्रा जी ने माथे पर बल डालते हुए श्रुति से कहा कि ये लड़के भी ना, काम के पीछे अपनी सेहत ही भूल जाते हैं। फिर उन्होंने तंज़ कसते हुए कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्नी की देखा-देखी वह भी भूखा रहने का नाटक कर रहा हो। आजकल के लड़कों का कोई भरोसा नहीं, बीवियों के मोह में पड़कर औरतों वाले काम करने लगते हैं। उन्होंने अपने ज़माने की मिसाल देते हुए कहा कि तब मर्द व्रत-त्योहारों से दूर ही रहते थे। व्रत तो औरतों का गहना है, अपनी पति की लंबी उम्र के लिए थोड़ा कष्ट तो महिलाओं को ही सहना पड़ता है। अगर मर्द भी यही सब करने लगे, तो फिर औरत और मर्द में फर्क ही क्या रह जाएगा।

श्रुति को अपनी सास की यह बात थोड़ी चुभी। उसके मन में सवाल उठा कि क्या प्यार और समर्पण का कोई जेंडर होता है? क्या एक पति अपनी पत्नी की लंबी उम्र की कामना नहीं कर सकता? लेकिन उसने इन ख्यालों को मन में ही दबा लिया। वह जानती थी कि सुमित्रा जी पुराने ख्यालों की महिला हैं और उनसे इस विषय पर बहस करना व्यर्थ है। उसने बस इतना ही कहा कि रोहन सच में बहुत व्यस्त थे और प्रेजेंटेशन की तैयारी के लिए रात में भी देर तक जगे थे।

दिन चढ़ने लगा था। श्रुति ने घर के सारे काम निपटाए। जैसे-जैसे दोपहर ढल रही थी, बिना पानी के उसका गला सूखने लगा था। प्यास और कमज़ोरी के बावजूद, उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—यह चमक उस विश्वास की थी जो उसे रोहन के प्यार से मिलती थी। रोहन और उसकी शादी को महज़ सात महीने ही हुए थे। यह एक अरेंज मैरिज थी, लेकिन इन सात महीनों में रोहन ने श्रुति को जो सम्मान और स्नेह दिया था, उसने श्रुति के दिल में रोहन के लिए एक बहुत गहरा स्थान बना दिया था। रोहन उन पतियों में से नहीं था जो अपनी पत्नी को सिर्फ घर की ज़िम्मेदारी समझने की भूल करते हैं। वह श्रुति की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखता था, उसके सपनों का सम्मान करता था। आज का यह व्रत श्रुति के लिए सिर्फ एक रस्म नहीं थी, बल्कि रोहन के उसी निस्वार्थ प्रेम के प्रति उसका मौन आभार था।

शाम के चार बज चुके थे। श्रुति ने लाल रंग की भारी बनारसी साड़ी पहनी, जो सुमित्रा जी ने खास तौर पर इसी दिन के लिए मंगवाई थी। हाथों में चूड़ियाँ, मांग में सिंदूर और पैरों में आलता लगाए, जब वह आईने के सामने खड़ी हुई, तो एक पल के लिए खुद ही शर्मा गई। सुमित्रा जी के साथ वह शर्मा जी की छत पर पहुंची। वहां मोहल्ले की कई महिलाएं पहले से मौजूद थीं। लाल और गुलाबी साड़ियों में सजी-धजी औरतें पूजा की थाली लिए बैठी थीं। करवा माता की कथा शुरू हुई। हर कोई कथा में मग्न था, लेकिन श्रुति का मन बार-बार रोहन की तरफ भाग रहा था। उसे चिंता हो रही थी कि रोहन ने सुबह से कुछ नहीं खाया था, पता नहीं उसने दोपहर में लंच किया भी होगा या नहीं। काम के दबाव में वह अक्सर अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ कर देता था।

कथा समाप्त होने के बाद, सभी औरतें अपने-अपने घर लौट आईं। अब इंतज़ार था तो बस चाँद का। सर्दियों की आहट के कारण शाम जल्दी घिरने लगी थी। श्रुति और सुमित्रा जी छत पर टहलते हुए आसमान में चाँद को तलाश रही थीं। तभी नीचे से गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। रोहन आ गया था।

श्रुति खुशी से नीचे आई। रोहन सोफे पर निढाल सा बैठा था। उसका चेहरा उतरा हुआ था और होंठ पूरी तरह से सूख चुके थे। टाई ढीली पड़ी थी और कोट उसने पास ही कुर्सी पर फेंक दिया था। श्रुति ने पास जाकर चिंता से पूछा कि क्या वह ठीक है, क्योंकि वह बहुत थका हुआ लग रहा था।

रोहन ने उसे देखा और उसके चेहरे पर एक थकी हुई, लेकिन गहरी मुस्कान आ गई। उसने श्रुति का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा कि वह आज बहुत खूबसूरत लग रही है और उसकी थकान तो उसे देखते ही आधी हो गई है।

तभी सुमित्रा जी रसोई से पानी का गिलास लिए बाहर आ गईं। उन्होंने रोहन की तरफ गिलास बढ़ाते हुए कहा कि उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है, इसलिए पहले पानी पी ले और कुछ खा ले। बहू का तो चाँद देखने के बाद ही व्रत खुलेगा।

रोहन ने पानी का गिलास हाथ में तो लिया, लेकिन पिया नहीं। उसने गिलास वापस मेज़ पर रख दिया और अपनी माँ की आँखों में देखते हुए कहा कि वह अभी पानी नहीं पियेगा। वह भी श्रुति के साथ ही पानी पियेगा।

सुमित्रा जी बुरी तरह चौंक गईं। उन्होंने हैरान होकर पूछा कि इसका क्या मतलब है? क्या उसने पूरे दिन कुछ नहीं खाया-पिया? उन्होंने सुबह ही समझाया था कि ये सब औरतों के काम हैं, फिर उसने बिना वजह अपने शरीर को कष्ट क्यों दिया।

रोहन खड़ा हुआ और अपनी माँ के पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत ही शांत स्वर में बोला कि प्यार और फिक्र पर सिर्फ औरतों का ही एकाधिकार क्यों होना चाहिए। उसने कहा कि जब श्रुति उसकी लंबी उम्र और सलामती के लिए दिन भर बिना पानी की एक बूंद पिए रह सकती है, तो क्या वह उसके लिए इतना भी नहीं कर सकता। उसने अपनी माँ को समझाया कि ये कोई ‘औरतों का काम’ नहीं है, बल्कि यह उसका अपनी पत्नी के प्रति सम्मान और प्रेम है। वह चाहता है कि वे दोनों एक-दूसरे के लिए जिएं, एक-दूसरे का संबल बनें। अगर श्रुति उसकी अर्धांगिनी है, तो उसका आधा हिस्सा भी तो श्रुति ही है। फिर व्रत सिर्फ एक तरफ से क्यों होना चाहिए।

सुमित्रा जी निशब्द रह गईं। उन्होंने रोहन को कभी इस तरह से बात करते नहीं देखा था। उनके भीतर बैठी एक रूढ़िवादी औरत और एक माँ के बीच गहरा द्वंद्व चल रहा था। लेकिन कहीं न कहीं, एक औरत होने के नाते उन्हें रोहन की बात में एक गहरा सुकून भी महसूस हुआ। उन्होंने जीवन भर यही देखा था कि पति अपनी पत्नियों के व्रत को बहुत हल्के में लेते हैं, या फिर उसे उनका फर्ज़ मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन आज उनके बेटे ने उस फर्ज़ को एक खूबसूरत साझेदारी का रूप दे दिया था। उन्हें एहसास हुआ कि दुनिया बदल रही है और ये बदलाव गलत नहीं है।

श्रुति की आँखों से आंसुओं की एक धारा बह निकली। उसने रोहन को कृतज्ञता भरी नज़रों से देखा। उसे लगा जैसे आज उसका प्यार मुकम्मल हो गया है। उसे रोहन से किसी महँगे तोहफे की उम्मीद नहीं थी, लेकिन रोहन ने आज उसे जो सम्मान दिया था, वह दुनिया के हर गहने से कीमती था। रोहन ने अपनी जेब से एक छोटी सी डिब्बी निकाली और श्रुति की हथेली पर रख दी। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि यह उसके पहले करवाचौथ का तोहफा है। और यह सिर्फ एक तोहफा नहीं है, बल्कि यह उसका वादा है कि जीवन के हर सुख-दुःख में, हर व्रत-त्योहार में, वे दोनों बराबर के हिस्सेदार रहेंगे।

तभी छत से सुमित्रा जी की आवाज़ आई कि चाँद निकल आया है।

तीनों जल्दी से छत पर गए। श्रुति ने छलनी से पहले चाँद को देखा और फिर अपने पति को। रोहन ने अपने हाथों से श्रुति को पानी पिलाया और उसके हाथों से बनी मिठाई खिलाई। इसके बाद श्रुति ने भी उसी लोटे से रोहन को पानी पिलाया। सुमित्रा जी यह सब चुपचाप देख रही थीं। उनके होंठों पर अब कोई शिकायत नहीं, बल्कि एक संतोष भरी मुस्कान थी। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों को अपने गले से लगा लिया और दिल से आशीर्वाद दिया।

उन्होंने भावुक आवाज़ में कहा कि उन दोनों ने आज उन्हें एक बहुत बड़ी बात सिखा दी है। रिश्ते पुराने नियमों की बंदिशों से नहीं, बल्कि प्यार, इज़्ज़त और बराबरी से चलते हैं। उस रात आसमान का चाँद भी जैसे उन दोनों के प्रेम की इस नई इबारत को देखकर कुछ ज्यादा ही चमक रहा था। श्रुति को अब समझ आ गया था कि असल व्रत सिर्फ भूखे रहने में नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की तकलीफ को समझने और उसे बाँटने में है। उसका पहला करवाचौथ न सिर्फ एक परंपरा का पालन था, बल्कि उनके दांपत्य जीवन की एक ऐसी मजबूत नींव बन गया था, जिसे कोई भी तूफान कभी नहीं हिला सकता था।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या दांपत्य जीवन में प्यार और समर्पण जताने के लिए सिर्फ पत्नी को ही सारे त्याग करने चाहिए, या फिर रोहन की तरह पति को भी इस साझेदारी में बराबर का हिस्सा लेना चाहिए? आपको श्रुति और रोहन का यह रिश्ता कैसा लगा? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा!

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