शर्मा जी के घर के सामने अच्छी खासी भीड जमा थी। उनके बीच खुसर फुसर जारी थी। एक पचीस वर्षीया
शादीशुदा महिला फाटक पास बैठी थी। अंदर से फाटक बंद था। भीड ज्यादातर उन लेागो की थी जिनकी कोई केा
सामाजिक हैसियत नहीं थी। किसी का आदमी ठेला चलता था तेा कोई बर्तन मांझने का काम। ऐसे भी महिलायें थी
जिनका पति रेाज उनकी घुलाई करता होगा। कालेानी का शिक्षित महिलाएं आती, चुपचाप तमाशा देखकर लोैट जाती।
वे कोई कमेंट नहंी करती बस मुसुकुराती। जानने केा तो सब जान ही चुकी थी। मगर ऐसे दिखाती मानो कुछ नहीं
जानती। निहायत सभ्य सुसंस्कृत। जबकि मन ही मन शर्मा जी के परिवार की दुर्दशा देखकर खुश थी। क्षणांश मुझे
माजरा समझ में नहीं आया। मैं खडा होकर समझने की कोशिश करने लगा।
‘‘लाज नही आती बहू को निकाल दिया?’’एक बुर्जुग सज्जन का पारा गरम था। ’’शादी किया है तो निभाओ। मजाक
थोडे ही है।’’वे आगे बोले। भीड ने उन्हे के स्वर में हुकांर भरी। अब भीड को कौन समझाए कि निभाना सिर्फ एक की
जिम्मेदारी नही होती। रिश्ता चाहे कैसा भी हो। पहल देानेा तरफ से होनी चाहिए। शर्मा दंपति बहू को घर में घुसाने
देना नहीं चाहते थे। कुछ तो वजह होगी? भीड से अबला को इसलिए सहान्भूति थी क्येंाकि उन्हे बताया गया है कि
ससुराल से औरत की अर्थी जाती है। जिंदा शरीर नहीं। इसी विरासत के अनुपालन के लिए वे डंडा लेकर शर्मा जी के
खिलाफ खडी थी। क्या पति भी ऐसा ही चाहता है? इसका जवाब तो वही दे सकता है। अभी तो मॉ बाप के साथ था।
‘‘फाटक खोलती क्येां नहीं।,’’एक मजदूरनी टाइप की महिला कडकी। ऐसी ही कुछ महिलाओं का शह पाकर वह शेरनी
बनी थी।
‘‘तुम चिंता मत करेा। फाटक तो हम खुलवाकर रहेगे।’’ इस महिला को मैं पहचान गया। वह कालेानी में बर्तन मांझने
का काम करती थी। गजब का आत्मविश्वास था उसमें। मानेा समाजसुधार का ठेका ले रखा हो। खुद उसका पति उसे
कितनी बार घर से निकाल चुका हेागा पता नही।
शर्मा जी रिटायर सरकारी अधिकारी थे। धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। बंगलानुमा मकान बनवाया। कार
गाडी एसी कमरा सभी कुछ था उनके पास। देा बेटे ही थे। एक दिल्ली मे इंजीनियर था वही दूसरा जिसकी बीवी को
उन्होने बेदखल किया था वह। पढने में कमजोर। किसी तरह से बीए करके एक स्कूल में कंप्यूटर का काम करता था।
तनख्वाह मामूली मगर शर्मा जी के ऐश्वर्य के सामने सब छुप गया। लडकी के बाप ने सोचा होगा कमी किस बात की
है। लडका कितना भी कमाये बाप ने इतना बना दिया था कि उनकी लडकी राज करेगी। खुद शर्मा जी को इतनी
पेंशन मिलती थी कि दस लेागो को अकेले खिलाए।
‘‘नही खेालूगी,’’अंदर से शर्मा जी की बीवी बोली। ‘‘आप लोग हमारे पारिवारिक मामले में दखल न दे।’’उनका कथन
उचित था।
‘‘बहू को घर में क्येां नही घुसने देती? बेचारी चार घंटे से धूप के सामने बैठी है। तनिक दया मया नहीं है।’’ वह ऐसे
बोल रही थी मानेा उसी की बेटी हो। पता नहीं अपनी बेटी के साथ कितना न्याय कर पाती होगी? उस औरत के उपर
मुझे हंसी आयी।
‘‘आपलेाग जैसा सोच रहे है वैसा नही है। बेहतर होगा अपना अपना काम कीजिए।’’ शर्मा जी अंदर से बोले।
‘‘तुम चिंता मत करेा देखे कैसे नही घुसने देते हेै,’जाहिल महिलाओं ने समवेत स्वर में बोला।
अनिता, शर्मा जी की दूसरी बहू थी। शर्मा जी की पत्नी की शिकायत थी कि वह आज भी परिपक्व नहीं हो पायी है।
मना करने के बावजूद ऐसे कपडे पहनती है कि सिर शर्म से झुक जाए। सास ससुर किसी का लिहाज नही करती।
कुछ भी पहनकर चली आती है। न खाना बनाने की सुध न ही घर संभालने की। छत पर घंटो न जाने किससे बात
करती है। न जानने का सवाल शंका उत्पन्न करता है। शंका ही सारे फसाद की जड थी। क्या बहू को इतनी भी
आजादी नहंी कि वह किसी से फोन पर बात कर सके। क्या हर बात सास ससुर को बताना जरूरी है। यह तो एक
तरह का सासंत था। पति क्या सोचता है? इस सवाल पर वे चुप्पी साध लेते है। जाहिर है बेटा अपनी पत्नी के
चालचलन से सहमत था। बहू भीड से कहती रही,‘मैके इस लिए गयी कि पिता जी की तबीयत ठीक नही थी। एक
महीना रही इस बीच तलाक का नेाटिस मिल गया।’’
‘‘बहुत धेाखेबाज है तुम्हारे सासससुर,’’एक महिला ने मुॅह बनाया।
‘‘पता नही क्या पढे लिखे है। बडका अफसर बने फिरते है।’’दूसरी महिला का भी लहजा वही था।
‘‘देा बार एर्बोशन करा चुकी हूॅ।’’ सुनकर भीड अवाक्। जिस घर में परिंदा भी पर नहीं मार सकता उस घर की इज्जत
बीच सडक पर थी। भला इतनी गूढ जानकारी कोई हर कोई से बांटता है? बहू भी न जाने क्या सेाच कर बैठी थी।
जिस घर में रहने के लिए धरना दे रही है उसी घर की धज्जियां उडा रही थी। तभी पुलिस की गाडी आयी। किसी ने
सूचना दी कि एक अबला को ससुराल वाले घर में घुसने नहीं दे रहे है।’’ पुलिस ने वस्तुस्थिति की जानकारी ली।
‘‘ये क्या तमाशा बना रखा है। बहू को घर में घुसने क्यों नही देते?’’ पुलिस का पुलिसिया अंदाज था।
‘तलाक का केस चल रहा है। आप बीच में मत पडिए। घर मेरा है। आप जबर्दस्ती कुछ नहंी कर सकते?’’शर्मा जी
अफसरी अंदाज में बोले। पुलिस वाले के पास कोई अदालती आदेेश तो था नही जिसकी वह तामिल करा सके। वह तो
पेट्रोलिंग का काम करती थी। उसका काम है अपराध रोकना। यहां तो पारिवारिक झगडा था। वह कर भी क्या सकता
था। सरकार महिलाअेां के प्रति ज्यादा संवेदनशील थी लिहाजा पुलिस वाले वही खडे रहे। बिना खाये पीये सुबह से बहू
फाटक पर बैठी थी। यहां तक कि उसने पानी भी नहीं पिया। हालत बिगडी तो एबुलेस को बुलाया गया। महिला
पुलिस के जरिए उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया। सुबह तक वह ठीक हो गयी। करीबी रिश्तेदारों केा हिदायत
देते हुए पुलिस ने बहू को सौप दिया।
अगली दोपहर वह फिर से धरने पर बैठ गयी। इसबीच रात में जब मामला शांत हो गया तब शर्मा जी
सपरिवार घर में ताला लगा कर अज्ञात जगह चले गये । भीड जिस तरीके से प्रतिक्रिया जाहिर कर रही थी वे अंदर
ही अंदर डर गये। पता नहीं फाटक तोड कर बहू को घर में घुसेड दे। उनके साथ हिंसा भी कर सकती थी भीड। बहू
जब धरनें के लिए फाटक के पास आयी तो देखा फाटक पर ताला लटक रहा था। भीड फिर से जुटने लगी। भीड
अनावश्यक उतेजित थी। ‘‘ताला तोडकर कर घर में घुस जाओ। देखते है क्या करते है शर्मा जी।’’ बहू और उसके साथ
आये करीबी रिश्तेदारों की भी यही राय थी। यह तभी संभव था जब पुलिस की तरफ से हरी झंडी मिल जाए। भला
पुलिस को क्या एतराज हो सकता है अगर सब कुछ उसके मनमाफिक हो?
शर्मा जी संपन्न थे। संपन्नता ने उनके भीतर अंहकार भर दिया। वे रिजर्व रहने लगे। कभी अपनी जोरदार
आवाज से सारे मुहल्ले में अपनी मोजूदगी का एहसास दिलाने वाले शर्मा जी पूरी तरह से सबसे कट गये। न किसी
रिश्तेदार के यहंा जाते, न ही मोहल्ले के किसी शादी ब्याह में शरीक होते। यहंा तक कि किसी के मातमपुरसी में
भी नहंी जाते। वजह वही, मैं अफसर हॅू। सभी इसी लिए उनसे चिढे थे। मीडिल क्लास कालेानी वासिओं के लिए
शर्माजी का यह रूतबा आंखेां में खटकता। कहां सब के सब क्लर्क वहीं शर्मा जी अफसर। हालकि शर्मा जी ने किसी
को, कभी किसी तरह से क्षति नहीं पहुचायी।
‘‘ताला तोडकर घुस जाओ।’’भीड के कथन पर वही खडी पुलिस ने कोई प्रतिक्रिया नहंी जताई। जैसे यह करना
गैरकानूनी है। दो दिन इंतजार के बाद बहू भीड और अपने करीबीओं की मद्द से ताला तोडकर घर में घुस गयी।
पुलिस ने भी चैन की सांस ली। अब उसे बार बार साइरन बजाकर कालोनी मेनहीं आना पडेगा। शर्मा जी को खबर
लगी तो अपने बडे बेटे-बहू को दिल्ली से बुलाया। सब एक साथ अपने घर आये। फाटक अंदर से बंद था। छोटी बहू
अपने करीबिओं के साथ रंगीन टीवी का मजा ले रही थी।
‘‘फाटक खोलेा,’’शर्मा जी कडके। देखते देखते भीड फिर से जुटने लगी। इसबार मामला दूसरा था। कल तक बहू बाहर
थी आज शर्मा जी। शर्मा जी अपने ही घर से बेदखल जो गये। उनके घर पर उनका कब्जा था जिनका उस घर से
इतना ही नाता था कि वह इस घर की बहू थी। अंदर सब अनधिकृत लेाग थे।
‘‘आपलेागो का क्या बिगाडा है हमलेागो ने,’’शर्मा जी बडा लडका कालेानीवासिओं की तरफ मुखातिब था।
‘‘हम तीस साल से रह रहे है वही वह 1 साल से। क्या यही पडोसी धर्म है आपका जो उसके लिए खडे हो गये।’’ वह
किचित् भावुक था। पडोसिओं और मोहल्ले वालेां के जुबान से एक शब्द नहंी फूटा। कल तक जिस बहू के लिए मर
मिटने के लिए तैयार थे आज शर्मा जी को सामने पाकर सबको काठ मार गया। वे शर्मिंदा थे। शर्मा जी को बंद कमरे
में रहने की आदत थी। पर उन्हे क्या पता था कि उनकी यह आदत पडेासिओं के लिए क्षोभ का कारण है? न किसी के
शादी ब्याह में आना न ही किसी के मातमपुरसी में जाना। उनकी अफसरी उनका धर्म। जब उन्हे किसी से कोई
अपेक्षा नहीं तो पडोसी क्यांे करते हेै? शर्मा जी ने बहू के पिता को बुलवाया। पंचायत हुयी। बहू के पिता को दिल की
बीमारी थी। हाथ जोडकर खडा हो गया। अपनी बेटी केा डांटा। संस्कारेां का पाठ पठाया। बेटी की तरह से माफी
मांगते हुए भरे मन से बोलो,’’अब से शिकायत का मौका नही देगी।’’मामला सुलझ गया। इस बीच शर्मा जी अपने
अपमान केा नहीं भूले थे। बेटे को मकान से बेदखल कर दिया।
‘‘इसी मकान का लालच था न तुम्हें’’, बहू से बोले। ‘‘रहो अपने पति के साथ। देखता हू मामूली से तनख्वाह में कैसे
गुजारा हेाता है?’’बहू सन्न। अपने पति की तरफ देखा। पति का सिर झुका था। कहा बंगलानुमा मकान, एसी कमरा,
मंहगी कार। अब किराये के मामूली मकान में रहना पडेगा। बहू को अफसोस होने लगा कि भीड और अपने चचेरे
भाइयों के बल पर अनापशनाप बक दिया। आखिर भीड ने किया क्या? जो हुआ परिवार वालांे की मरजी से हुआ।
उसे यह बात सालती रही कि पति ने उसका साथ क्यंो नहीं दिया। क्यों मुह छुपाकर अपनी मॉं के आंचल में बैठा था।
बाहर वह न्याय की भीख मांग रही थी और वह अंदर मजे ले रहा था। बेशर्म, बेगैरत। उसे खीझ हुयी। फिर सोची चली
जाती मैके। तलाक क्या आसान होता है? एक गलती उसके मॉ बाप ने की। लडके की मजबूती नहंी देखी। बाप की
अमीरी देखकर शादी कर दिया। आर्थिक रूप से अपने मॉ बाप पर निर्भर लडका क्या अपने मॉ बाप के विरूद्व जा
सकता था? वह भरे मन से अपने पति के साथ घर की दहलीज लांघते हुए सासससुर से बोली,‘जायजाद का लालच
मुझे कभी नहीं था। जायजाद क्या अपने साथ लेकर जाएगी? हॉ पति के साथ रहकर मैं खुली हवा में सांस ले
सकूॅगी।’’
श्रीप्रकाश श्रीवास्तव
वाराणसी