वो मुझसे ज्यादा मेरी भाभी की मां है – सुदर्शन सचदेवा

 मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ है…

यह कहते हुए कभी-कभी मेरे अपने होंठ मुस्कुरा उठते हैं और आँखें भीग जाती हैं।

क्योंकि मैं जानती हूँ… माँ का प्यार कभी कम नहीं होता, बस उसकी दिशा बदल जाती है।

एक समय था, जब माँ की हर आवाज़ मेरे लिए होती थी—”बेटा, खाना खा लिया?”, “थक गई होगी, थोड़ा आराम कर ले।” उनकी गोद मेरा सबसे सुरक्षित ठिकाना थी। लेकिन जिस दिन मेरी भाभी इस घर की दहलीज़ पर आईं, मैंने माँ को पहली बार एक और रूप में देखा।

वह मेरी माँ थीं… पर उस दिन से किसी और की भी माँ बन गईं।

शुरू-शुरू में मुझे लगता था कि माँ अब मुझे पहले जितना समय नहीं देतीं। सुबह की पहली चाय अब भाभी के कमरे में जाती थी। बाज़ार से लौटतीं तो पूछतीं, “बहू की पसंद की मिठाई ले ली?” रात को अगर भाभी देर तक काम करतीं, तो माँ प्यार से डाँट देतीं—”बेटी, घर काम से नहीं, अपनेपन से चलता है। अब जाओ, आराम करो।”

मैं मुस्कुराकर छेड़ती, “माँ, अब तो आप मेरी नहीं रहीं… आप तो मुझसे ज़्यादा भाभी की माँ हो गई हैं।”

माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बहुत 

शांत स्वर में कहा—

“तू तो मेरे दिल में रहती है, तुझे संभालने का भरोसा मुझे है। लेकिन वह अपना पूरा संसार छोड़कर यहाँ आई है। अगर मैं उसकी माँ नहीं बनूँगी, तो वह इस घर को अपना कैसे कह पाएगी?”

उनकी यह बात मेरे दिल में उतर गई।

उस दिन पहली बार समझ आया कि माँ का प्यार किसी एक बच्चे का अधिकार नहीं होता। वह तो उस दीपक की लौ है, जो एक दीये से दूसरे दीये को जलाकर भी कम नहीं होती।

कुछ महीनों बाद भाभी बीमार पड़ गईं। माँ पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहीं। कभी दवा देतीं, कभी माथा सहलातीं, कभी कहतीं—”मेरी बेटी जल्दी ठीक हो जाएगी।”

और सच कहूँ, अब इस बात से मुझे कभी जलन नहीं होती। बल्कि गर्व होता है कि मेरी माँ ने मुझे यह सिखाया है कि प्यार कभी बँटता नहीं, वह जितना बाँटो, उतना ही बढ़ता है। जिस घर में सास, बहू को बेटी और बहू, सास को माँ मान ले, वहाँ रिश्ते निभाए नहीं जाते, बल्कि जीए जाते हैं। ऐसे घरों में दीवारें नहीं, दिल जुड़े होते हैं; वहाँ परिवार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और अपनत्व की सबसे सुंदर पहचान बन जाता है।

सुदर्शन सचदेवा

मैं दरवाज़े पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। उस रात मुझे अपनी माँ पर पहले से भी ज़्यादा गर्व हुआ।

कुछ दिनों बाद भाभी अपने मायके फ़ोन पर बात कर रही थीं। उनकी आवाज़ भर्रा गई थी।

उन्होंने अपनी माँ से कहा— मां आप चिता न करो , मुझे मेरी ननद  यानि नेहा जैसा मुझे प्यार और देखभाल करती है ” 

मैं गर्व से कहती हूं, मेरी मां में सब गुण है जो एक मां में होते हैं |  ” वो मेरे से ज्यादा मेरी भाभी की मां हैं”

सुदर्शन सचदेवा 

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