संस्कार के बीज

रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी अपनी पंसदीदा किताब के कुछ पन्ने पलट कर बस सोने की ही तैयारी कर रही थीं। उनका यह पच्चीस सौ स्क्वायर फुट का दो मंजिला घर, जिसे उन्होंने अपने पति के गुजर जाने के बाद अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, अब उनकी एकांत दुनिया का इकलौता गवाह था। उनका बड़ा बेटा विक्रम अपनी पत्नी अंजलि के साथ मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के सिलसिले में पुणे में बसा हुआ था, जबकि छोटा बेटा कबीर अभी दिल्ली से अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी कर रहा था। सुमित्रा जी एक सेवानिवृत्त कॉलेज प्रिंसिपल थीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे पूरी तरह आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी महिला थीं।

अचानक बाहर गेट की घंटी बजी। इतनी रात गए घंटी की आवाज़ सुनकर एक पल के लिए सुमित्रा जी का दिल धक से रह गया। अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों के लिए रात की कोई भी अप्रत्याशित आहट मन में एक अनजाना सा भय पैदा कर ही देती है। उन्होंने खुद को संभाला, शॉल ओढ़ी और धीरे-धीरे चलकर मुख्य दरवाज़े के पास आईं। जब उन्होंने दरवाज़े में लगे लेंस से बाहर झाँका, तो उनकी जान में जान आई। बाहर विक्रम और अंजलि खड़े थे। सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से जल्दी से कुंडी खोली और दरवाज़ा खोल दिया।

“अरे विक्रम! अंजलि! तुम लोग इतनी रात को? और वो भी बिना कोई खबर किए?” सुमित्रा जी के चेहरे पर चिंता और खुशी दोनों के भाव एक साथ तैर गए।

विक्रम ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए और मुस्कुराते हुए बोला, “माँ, कल आपकी शादी की सालगिरह है। पिताजी भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन यह दिन हमारे लिए बहुत खास है। हमने सोचा क्यों न इस बार आपको एक सरप्राइज़ दिया जाए!”

“हे भगवान! ऐसा डरावना सरप्राइज़ भी कोई देता है भला? मेरी तो जान ही निकल गई थी। खैर, अंदर आओ जल्दी, बाहर बहुत ठंड है।” सुमित्रा जी ने दोनों को प्यार से अंदर लिया।

थकान दोनों के चेहरों पर साफ़ दिख रही थी। सुमित्रा जी ने तुरंत पूछा, “तुम दोनों ने रास्ते में कुछ खाया था या मैं रसोई में जाकर कुछ बनाऊँ?”

अंजलि ने अपना बैग सोफे पर रखते हुए कहा, “नहीं माँ जी, हम लोग रास्ते में ही एक ढाबे पर खाना खा कर आए हैं। आप बिल्कुल भी परेशान मत होइए। बस हमें थोड़ा गर्म पानी दे दीजिए।”

भले ही अंजलि ने मना कर दिया था, लेकिन एक माँ का दिल कहाँ मानता है। सुमित्रा जी जानती थीं कि विक्रम को उनके हाथ का बना बेसन का हलवा बहुत पसंद है। उन्होंने बिना कोई समय गँवाए, फटाफट रसोई में जाकर विक्रम के लिए गर्मागर्म हलवा तैयार किया और दोनों को खिलाकर ही सोने के लिए भेजा।

अगली सुबह सुमित्रा जी अपने तय समय पर सुबह पाँच बजे उठ गईं। यह उनकी बरसों पुरानी दिनचर्या थी। विक्रम और अंजलि अभी गहरी नींद में सो रहे थे। सुमित्रा जी तैयार होकर अपनी सोसाइटी के पार्क में टहलने निकल गईं। लौटते समय वे ताज़ी सब्ज़ियाँ, फल और विक्रम की पसंद की कुछ मिठाइयाँ भी लेती आईं। घर वापस आकर उन्होंने स्नान किया, अपने ठाकुर जी की पूजा-आरती की और रसोई में जाकर नाश्ते की तैयारियों में जुट गईं।

सुमित्रा जी को पता था कि विक्रम को उनके हाथ की बनी मेथी की पूरी और रसेदार आलू-टमाटर की सब्ज़ी बहुत पसंद है। अंजलि को भी ये सब पसंद आता था। उन्होंने बहुत ही प्यार और जतन से नाश्ता तैयार किया। जब तक विक्रम और अंजलि सो कर उठे, डाइनिंग टेबल पर गर्मागर्म नाश्ता और अदरक वाली चाय सज चुकी थी।

“वाह माँ! इतनी जल्दी आपने इतना सब कुछ बना भी लिया? आपकी बात ही अलग है।” विक्रम ने मेथी की पूरी का एक निवाला मुँह में रखते हुए कहा। वह अपनी उंगलियाँ चाटते हुए नाश्ता कर रहा था। अंजलि भी चुपचाप खा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गणना चल रही थी जिसे सुमित्रा जी उस वक्त समझ नहीं पाईं।

नाश्ते के बाद सुमित्रा जी को याद आया कि आज सोसाइटी की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्लूए) की एक महत्वपूर्ण मीटिंग है, जिसमें उन्हें जाना था। वे विक्रम और अंजलि को घर पर आराम करने का बोलकर नीचे कम्युनिटी हॉल में चली गईं। मीटिंग करीब एक घंटे चली।

जब सुमित्रा जी वापस लौट रही थीं, तो उन्होंने देखा कि उनके घर का मुख्य दरवाज़ा हल्का सा खुला रह गया था। शायद विक्रम ने बाहर से कोई सामान लेने के बाद दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं किया था। सुमित्रा जी जैसे ही दरवाज़े को धक्का देकर अंदर दाखिल होने वाली थीं, उनके कदम वहीं ठिठक गए। अंदर से अंजलि और विक्रम की आवाज़ें आ रही थीं।

अंजलि कह रही थी, “विक्रम, मैं तो कहती हूँ कि माँ जी के इस इतने बड़े घर को अब बेच ही देना चाहिए। यहाँ देहरादून में इस प्रॉपर्टी की कीमत करोड़ों में मिलेगी। एक अकेली जान के लिए इतने बड़े घर का क्या ही काम है? बेकार में मेंटेनेंस का खर्चा भी लगता है।”

विक्रम ने थोड़ा हैरान होते हुए पूछा, “तो फिर माँ कहाँ रहेंगी?”

अंजलि ने तुरंत जवाब दिया, “अरे, माँ जी को हम अपने साथ पुणे ले चलेंगे। तुमने देखा नहीं, वो कितनी एक्टिव हैं? सुबह उठकर वॉक पर जाती हैं, सारा बाज़ार खुद कर लाती हैं। और खाना तो वो कितना स्वादिष्ट और फुर्ती से बनाती हैं। पुणे में हमें आया और कुक को हर महीने पच्चीस हज़ार रुपये देने पड़ते हैं। ऊपर से वो कामवालियाँ कभी भी छुट्टी मार लेती हैं, जिससे हमारा पूरा रूटीन बिगड़ जाता है। अगर माँ जी हमारे साथ रहेंगी, तो हमारी यह सारी टेंशन ही खत्म हो जाएगी। घर का खाना भी मिलेगा, काम भी समय पर होगा, और आगे चलकर जब हमारे बच्चे होंगे, तो उनकी देखभाल के लिए भी हमें किसी दाई के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। अपना खून तो अपना ही होता है, बच्चों की परवरिश भी अच्छी होगी और पैसों की भी भारी बचत होगी। बाहर वालों पर वैसे भी कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता।”

सुमित्रा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके कानों में अंजलि के शब्द पिघले हुए सीसे की तरह गूँज रहे थे। जिस बेटे और बहू के लिए उन्होंने सुबह-सुबह उठकर इतनी मेहनत की, वो उनके इस स्नेह और फुर्ती को एक ‘मुफ़्त की नौकरानी’ के रूप में देख रहे थे।

लेकिन इससे पहले कि सुमित्रा जी की आँखों से आँसू छलकते, विक्रम की तेज़ और कड़कती हुई आवाज़ ने पूरे घर में सन्नाटा चीर दिया।

“अंजलि! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?” विक्रम गुस्से से आगबबूला हो उठा था। “तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आ रही है यह सब बकते हुए? वो मेरी माँ हैं, कोई बाज़ार से खरीदी हुई नौकरानी नहीं!”

अंजलि हड़बड़ा गई, “अरे मेरा वो मतलब नहीं था… मैं तो बस हमारे और उनके फायदे की…”

“चुप रहो तुम!” विक्रम ने उसे बीच में ही टोक दिया। “फायदा? कैसा फायदा? तुम्हें पता भी है कि तुम किसके बारे में बात कर रही हो? मेरी माँ एक मामूली औरत नहीं हैं। वो शहर के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज की प्रिंसिपल रही हैं। उनके अंडर में पचास प्रोफेसर काम करते थे। उनके पास सरकारी गाड़ी, ड्राइवर, चपरासी, सब कुछ था। पूरे शहर में उनका एक रुतबा है, एक सम्मान है। और तुम उन्हें पुणे ले जाकर अपने घर की बावर्ची और बच्चों की आया बनाना चाहती हो?”

विक्रम की साँसें तेज़ चल रही थीं, “पिताजी के गुज़र जाने के बाद जब मैं सिर्फ दस साल का था और कबीर पाँच का, तब माँ ने अकेले दम पर हमें पाला है। उन्होंने दिन-रात एक करके हमारी पढ़ाई-लिखाई करवाई। इस घर की एक-एक ईंट उन्होंने अपनी ईमानदारी की कमाई और पेंशन के पैसों से इसलिए जुड़वाई है ताकि कल को जब हम सब यहाँ आएं, तो हमें कोई कमी न लगे। उनका यह घर उनका अभिमान है, उनका स्वाभिमान है। उन्होंने हमें योग्य इसलिए नहीं बनाया कि बुढ़ापे में उनकी ही बहू उन्हें अपने घर का नौकर समझे। मैं उनका बेटा हूँ, उनका कर्ज़दार हूँ। अगर भविष्य में उन्हें कभी भी मेरी ज़रूरत पड़ी, तो मैं अपना सब कुछ छोड़कर उनके पास यहाँ देहरादून आकर रहूँगा, लेकिन उन्हें कभी भी पुणे में तुम्हारी सहूलियत के लिए एक कामवाली की हैसियत से नहीं ले जाऊँगा।”

विक्रम ने अंजलि की आँखों में आँखें डालते हुए बहुत ही सख्त लहज़े में कहा, “आज तुमने यह बात कह दी अंजलि, लेकिन आइंदा अगर कभी भी तुम्हारे मन में मेरी माँ के सम्मान को ठेस पहुँचाने वाला ऐसा कोई घटिया विचार आया भी, तो याद रखना, मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकता हूँ, लेकिन अपनी माँ का अपमान कभी नहीं!”

दरवाज़े के बाहर खड़ी सुमित्रा जी की आँखों से अब भी आँसू बह रहे थे, लेकिन ये आँसू दुःख के नहीं, बल्कि परम सुख और गर्व के थे। उनका सीना चौड़ा हो गया। उन्हें लगा जैसे उनकी ज़िंदगी भर की तपस्या आज सफल हो गई। उनके पति के जाने के बाद जो कड़े संघर्ष उन्होंने किए थे, आज विक्रम के इन शब्दों ने उन सारे संघर्षों की कीमत चुका दी थी। उनके मातृत्व का, उनके दूध का मान उनके बेटे ने रख लिया था।

सुमित्रा जी ने अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक शांत और सामान्य मुस्कान लाई और जानबूझकर दरवाज़े को थोड़ा ज़ोर से आवाज़ करते हुए खोला ताकि अंदर वालों को लगे कि वे अभी-अभी आई हैं।

जैसे ही वे अंदर दाखिल हुईं, विक्रम और अंजलि दोनों एकदम से सहम गए। अंजलि का चेहरा पीला पड़ चुका था और विक्रम भी थोड़ा असहज हो गया। लेकिन सुमित्रा जी ने ऐसा बर्ताव किया जैसे उन्होंने कुछ भी न सुना हो।

“मीटिंग में थोड़ा ज़्यादा ही समय लग गया। तुम लोगों ने चाय पी या मैं बना दूँ?” सुमित्रा जी ने बिल्कुल सहज स्वर में पूछा।

विक्रम ने जल्दी से खुद को संभालते हुए कहा, “नहीं माँ, हम बस आपके ही आने का इंतज़ार कर रहे थे। लाइए मैं आपके लिए चाय बना लाता हूँ।”

अंजलि नज़रे चुराते हुए चुपचाप अपने कमरे की तरफ खिसक गई। सुमित्रा जी सोफे पर बैठ गईं। उन्हें अब अपनी ढलती उम्र या अकेलेपन का कोई डर नहीं था। उनके दिल में एक असीम शांति थी, क्योंकि वे जानती थीं कि उन्होंने जिस संस्कार के बीज बोए थे, वह अब एक ऐसा मजबूत और छायादार वटवृक्ष बन चुका है, जो जीवन के किसी भी तूफ़ान में अपनी माँ के स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए हमेशा सीना ताने खड़ा रहेगा।

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