दुख का भारी पत्थर

आज माधवी और राघव की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह—सिल्वर जुबली—थी। पिछले एक हफ्ते से दोनों के बच्चे, आर्यन और शिखा, इस पार्टी की तैयारियों में दिन-रात एक किए हुए थे। शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से लेकर मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ तय हो चुका था। माधवी अपने कमरे में आईने के सामने बैठी तैयार हो रही थी। उसने वही गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी चुनी थी, जो उसे सबसे ज्यादा पसंद थी। बालों में गजरा लगाते हुए अचानक उसकी नजर आईने में अपने चेहरे पर पड़ी। इन पच्चीस सालों में चेहरे पर कुछ लकीरें जरूर आ गई थीं, लेकिन आंखों की गहराई में आज भी कुछ पुरानी यादें तैर रही थीं। बाहर से आती ढोल और संगीत की आवाजें माधवी को पच्चीस साल पीछे उस दिन में ले गईं, जब वह पहली बार इस घर में दुल्हन बनकर आई थी।

वह भी कैसा दिन था! माधवी के मन में नए घर, नए लोगों और एक नए जीवनसाथी को लेकर कितने सुनहरे सपने थे। लेकिन जैसे ही उसने इस घर की दहलीज पर कदम रखा, उसके सपनों पर जैसे किसी ने खौलता हुआ पानी डाल दिया हो। माधवी के माता-पिता एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से थे। उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर अपनी बेटी की विदाई की थी, लेकिन इस घर की उम्मीदें शायद किसी कुबेर के खजाने से जुड़ी थीं। माधवी को आज भी याद है वह पहली शाम, जब उसकी सास, कावेरी देवी, और ननद, सुचिता, ने उसके सामने ही सारा सामान खोला था। सामान देखते ही कावेरी देवी का चेहरा तमतमा गया था। उन्होंने माधवी की तरफ देखकर जो शब्द कहे थे, वे आज भी माधवी के कानों में सीसे की तरह उतरते हैं—”बस यही है? इसी दिन के लिए हमने अपने होनहार बेटे की शादी की थी? कैसे भिखारियों के घर से रिश्ता जोड़ लिया हमने। न ढंग के कपड़े, न जेवर। खाली हाथ भेज दिया अपनी बेटी को, जैसे हमारे सिर पर कोई अहसान कर दिया हो।” ननद सुचिता ने भी आग में घी डालते हुए कहा था, “भाभी, इससे अच्छे तो हमारे यहां काम करने वालों के कपड़े होते हैं। सचमुच, भइया की किस्मत फूट गई।”

माधवी उस वक्त भारी जोड़े में सिमटी हुई बैठी थी। उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गई थीं। वह बस एक आस भरी नजर से दरवाजे के पास खड़े राघव की तरफ देख रही थी। उसे लगा था कि राघव आगे आएगा, अपनी मां और बहन को रोकेगा और कहेगा कि वह माधवी को जीवनसाथी बनाकर लाया है, किसी बैंक का लॉकर नहीं। लेकिन राघव चुप था। उसकी नजरें झुकी हुई थीं। अंदर ही अंदर राघव को भी अपनी मां और बहन की बातें बहुत बुरी लग रही थीं। वह जानता था कि माधवी के पिता ने कितनी मुश्किलों से यह शादी की है। लेकिन उस समय राघव के मन में एक अजीब सा सामाजिक डर बैठ गया था। उसे लगा कि अगर उसने शादी के पहले ही दिन अपनी पत्नी का पक्ष लिया, तो पूरा परिवार और रिश्तेदार उसे ‘जोरू का गुलाम’ कहेंगे। लोग ताने मारेंगे कि आते ही বউ (बहू) ने बेटे पर जादू कर दिया। समाज और परिवार की इसी झूठी शान और मर्दानगी के दबाव में आकर राघव ने खामोश रहने का फैसला किया। लेकिन राघव यह नहीं समझ पाया कि उसकी वह खामोशी माधवी के दिल पर किसी गहरे घाव की तरह छप गई थी। वह समझ गई थी कि इस घर की भीड़ में वह बिल्कुल अकेली है।

समय बीतता गया। माधवी ने धीरे-धीरे अपने समर्पण, सेवा और प्यार से सास और ननद का दिल जीत लिया। जो कावेरी देवी उसे ताने मारती थीं, वे जीवन के अंतिम दिनों में माधवी के बिना एक घूंट पानी तक नहीं पीती थीं। राघव ने भी इन पच्चीस सालों में एक बहुत अच्छे पति और पिता की जिम्मेदारी निभाई। उसने माधवी को हर खुशी दी, उसका हर कदम पर साथ दिया। लेकिन उनके रिश्ते के बीच वह पहले दिन की खामोशी एक कांच की दीवार की तरह हमेशा खड़ी रही। राघव को अपनी उस दिन की कायरता का अहसास बहुत जल्द हो गया था। वह हर दिन उस गलती के बोझ तले दबता था, लेकिन कभी उस विषय पर बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसे लगता था कि शायद वक्त हर घाव भर देता है।

कमरे के दरवाजे पर आर्यन की दस्तक से माधवी की तंद्रा टूटी। “मां, चलिए, मेहमान आ गए हैं और पापा आपका इंतजार कर रहे हैं।” माधवी ने एक गहरी सांस ली, अपने आंसुओं को आईने के सामने ही छोड़ दिया और मुस्कुराते हुए बाहर आ गई।

पार्टी पूरे शबाब पर थी। सभी रिश्तेदार और दोस्त उन्हें बधाइयां दे रहे थे। तभी स्टेज पर राघव ने माइक अपने हाथ में लिया। हॉल में सन्नाटा छा गया। राघव ने माधवी की तरफ देखा और गहरी सांस लेते हुए कहा, “दोस्तों, आज हम अपनी शादी के पच्चीस साल का जश्न मना रहे हैं। लोग कहते हैं कि मैंने और माधवी ने एक बहुत सफल जीवन जिया है। लेकिन आज इस मौके पर, मैं आप सबके सामने एक सच कबूल करना चाहता हूँ।” माधवी हैरानी से राघव को देखने लगी।

राघव की आवाज थोड़ी भारी हो गई थी। “पच्चीस साल पहले, जब माधवी इस घर में आई थी, तो उसका स्वागत प्यार से नहीं, बल्कि लालच और तानों से हुआ था। मेरी मां और बहन ने उसके आत्मसम्मान को बहुत गहरी ठेस पहुंचाई थी। लेकिन उस दिन सबसे बड़ा गुनाहगार मैं था। मैं वहां खड़ा सब सुनता रहा, लेकिन एक शब्द नहीं बोला। मुझे डर था कि लोग मुझे ‘जोरू का गुलाम’ कहेंगे। मैंने समाज के एक खोखले डर के खातिर अपनी उस पत्नी को अकेला छोड़ दिया, जिसने मेरे लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया था। माधवी, तुमने इस घर को स्वर्ग बनाया, मेरी हर कमी को नजरअंदाज किया, लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरी उस दिन की खामोशी तुम्हें आज तक चुभती है। आज, हमारे बच्चों और इन सभी अपनों के सामने, मैं अपनी उस कायरता के लिए तुमसे माफी मांगना चाहता हूँ। मैं उस दिन एक अच्छा पति नहीं बन पाया, लेकिन तुमने मुझे एक बेहतर इंसान जरूर बना दिया। मुझे माफ कर दो माधवी।”

पूरा हॉल स्तब्ध था। माधवी की आंखों से आंसू बह निकले, लेकिन आज ये आंसू दुख के नहीं थे। पच्चीस सालों से उसके सीने पर रखा वह भारी पत्थर आज खिसक गया था। राघव ने स्टेज से उतरकर माधवी के सामने हाथ जोड़ लिए। माधवी ने आगे बढ़कर राघव के हाथों को थाम लिया और उसे गले लगा लिया। हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आज उनकी सिल्वर जुबली सिर्फ एक दिखावा नहीं थी; आज उनके रिश्ते ने अपनी पुरानी कड़वाहट को हमेशा के लिए धो दिया था।

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