उस रात कांता देवी बहुत देर तक सो नहीं पाईं। वे करवटें बदलती रहीं और पिछले एक साल का हर वो पल याद करती रहीं जब उन्होंने मीरा को बेवजह टोका था और मीरा ने बदले में सिर्फ एक शांत मुस्कान देकर बात टाल दी थी। उन्हें अहसास हुआ कि अगर मीरा चाहती तो हर बात का मुंहतोड़ जवाब दे सकती थी, लेकिन उसने हमेशा अपने आत्मसम्मान से ऊपर परिवार की शांति को रखा। कांता देवी को खुद पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी।
सुबह के सात बजते ही घर के आंगन में तुलसी के पास से कांता देवी की आवाज़ गूंजने लगती थी। उनका यह रोज़ का नियम था। पूजा की थाली सजाते हुए, चाय की चुस्कियां लेते हुए या फिर महरी से झाड़ू-पोछा करवाते हुए, उन्हें हर बात में कोई न कोई कमी निकालने की आदत सी पड़ गई थी। “अरे, ये भी कोई ढंग है काम करने का? हमारे ज़माने में तो बहुएं सुबह पांच बजे उठकर पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं। आजकल की लड़कियों को तो बस सज-धज कर ऑफिस जाने की पड़ी रहती है। घर जाए भाड़ में, इन्हें क्या मतलब!” कांता देवी की ये बड़बड़ाहट सीधे रसोई में काम कर रही उनकी बहू, मीरा के कानों तक पहुँच रही थी।
मीरा एक बहुत ही सुलझी हुई, शांत और एक निजी बैंक में काम करने वाली कामकाजी महिला थी। उसने रोज़ की तरह कांता देवी की बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने गैस बंद की, अपनी सास के लिए उनके पसंद की अदरक वाली चाय कप में छानी और बड़ी ही नम्रता से उनके सामने टेबल पर रख दी। मीरा ने जल्दी-जल्दी नाश्ता बनाया, अपना पीला सलवार सूट पहना, गले में एक बेहद साधारण सी चेन डाली और अपने पति विकास को आवाज़ देकर अपना टिफिन लेकर ऑफिस के लिए निकल गई। कांता देवी ने चाय का घूंट भरते हुए मीरा की पीठ को घूरा और बड़बड़ाती रहीं।
शाम को जब विकास ऑफिस से लौटा और अपने कमरे में कपड़े बदल रहा था, तो कांता देवी उसके पीछे-पीछे कमरे में आ गईं। उनके चेहरे पर आज सुबह से जमा हुआ गुस्सा साफ झलक रहा था।
“विकास, तू अपनी इस लाड़ली बहू को थोड़ा समझा कर क्यों नहीं रखता? इसे थोड़ा डांट कर रखा कर!” कांता देवी ने तल्ख लहज़े में कहा।
विकास ने तौलिया कुर्सी पर रखते हुए हैरानी से पूछा, “क्यों माँ? क्या हो गया? मीरा ने कुछ कहा क्या आपको?”
“यही तो सबसे बड़ी समस्या है कि वो कुछ नहीं कहती!” कांता देवी ने चिढ़ते हुए जवाब दिया। “वो बहुत ढीठ हो गई है। मैं सुबह से लेकर शाम तक घर के कामों को लेकर, उसके तौर-तरीकों को लेकर उसे टोकती रहती हूँ, लेकिन वो एक शब्द नहीं बोलती। बस अपना काम करती है और ऑफिस चली जाती है। मेरी बातों को तो जैसे वो हवा में उड़ा देती है। अगर आज वो मेरी बातों का जवाब नहीं दे रही है, तो कल को वो तेरी भी कदर नहीं करेगी। ये जो उसकी चुप्पी है ना, ये उसका घमंड है कि वो कमाती है।”
विकास अपनी माँ की बात सुनकर हल्का सा मुस्कुराया। वह अपनी माँ के स्वभाव को भी जानता था और अपनी पत्नी की समझदारी को भी। उसने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें बिस्तर पर बिठाते हुए बहुत ही शांत स्वर में बोला, “माँ, आप मीरा को गलत समझ रही हैं। वो ढीठ या घमंडी नहीं है। वो आपकी बातों का जवाब इसलिए नहीं देती क्योंकि उसे मौन रहना और घर की शांति बनाए रखना अच्छा लगता है।”
कांता देवी ने अपनी भौहें सिकोड़ीं, “इसमें कैसी शांति? मुझे तो उसका यह रवैया मेरा अपमान लगता है।”
“माँ, खुद सोचिए,” विकास ने समझाते हुए कहा, “अगर आप सुबह गुस्से में कुछ कह रही हैं और पलटकर मीरा भी उसी लहज़े में आपको जवाब देने लगे, तो क्या होगा? घर में रोज़ क्लेश होगा, तू-तू मैं-मैं होगी। आस-पड़ोस के लोग तमाशा देखेंगे। आप भी चिल्लाएंगी, वो भी चिल्लाएगी। क्या आप सच में ऐसा घर चाहती हैं? मीरा इस बात को बहुत अच्छी तरह समझती है कि बहस से किसी मसले का हल नहीं निकलता। वो आपकी उम्र और आपके रुतबे का सम्मान करती है, इसलिए चुप रह जाती है। उसकी इस खामोशी में उसका घमंड नहीं, बल्कि इस घर को जोड़े रखने की उसकी कोशिश छिपी है। अगर वो भी आपकी तरह तेज़-तर्रार और बात-बात पर ज़बान लड़ाने वाली होती, तो क्या आप उसे एक अच्छी बहू मानतीं?”
विकास की ये बातें कांता देवी के कानों में किसी ठंडे पानी की फुहार की तरह गिरीं। उन्होंने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। उन्हें हमेशा लगता था कि जो बहुएं पलटकर जवाब नहीं देतीं, वे अंदर ही अंदर कोई बड़ी साजिश रच रही होती हैं या उन्हें किसी बात की परवाह नहीं होती। लेकिन विकास के शब्दों ने उनके मन के एक बंद दरवाजे को खोल दिया था।
उस रात कांता देवी बहुत देर तक सो नहीं पाईं। वे करवटें बदलती रहीं और पिछले एक साल का हर वो पल याद करती रहीं जब उन्होंने मीरा को बेवजह टोका था और मीरा ने बदले में सिर्फ एक शांत मुस्कान देकर बात टाल दी थी। उन्हें अहसास हुआ कि अगर मीरा चाहती तो हर बात का मुंहतोड़ जवाब दे सकती थी, लेकिन उसने हमेशा अपने आत्मसम्मान से ऊपर परिवार की शांति को रखा। कांता देवी को खुद पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उनका अपना घर, जो उनके रोज़ के तानों से एक युद्ध के मैदान में बदल सकता था, वो सिर्फ उनकी बहू की समझदारी और खामोशी की वजह से एक शांत मंदिर बना हुआ था।
अगले दिन की सुबह रोज़ से बिल्कुल अलग थी। सूरज की किरणें आज कुछ ज़्यादा ही नरम लग रही थीं। मीरा रोज़ के समय पर उठी और रसोई में गई। लेकिन आज घर में अजीब सा सन्नाटा था। न तुलसी के पास से कोई आवाज़ आ रही थी, न ही कामवाली महरी को कोई डांट पड़ रही थी। मीरा को थोड़ी चिंता हुई। उसने जल्दी से चाय बनाई और अपनी सास के कमरे की तरफ गई।
कांता देवी आराम से अख़बार पढ़ रही थीं। मीरा ने दबे पांव अंदर जाकर चाय का कप मेज़ पर रखा और झिझकते हुए पूछा, “माँ जी, आपकी तबीयत तो ठीक है? आज आपने सुबह से कुछ बोला नहीं, न ही किसी बात पर मुझे टोका। कोई गलती हो गई क्या मुझसे?”
कांता देवी ने अख़बार नीचे रखा और मीरा के चेहरे को बड़े प्यार से देखा। उनके चेहरे पर आज कोई तनाव नहीं था, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। उन्होंने मीरा का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “नहीं बेटी, मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक है। दरअसल, आज मेरा कुछ भी बोलने का या शिकायत करने का मन नहीं है। मैंने कल रात बहुत सोचा और मुझे समझ आ गया कि कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। आज से मैं भी मौन की उस शांति को महसूस करना चाहती हूँ, जिसे तू रोज़ इस घर में बनाए रखती है।”
मीरा की आँखों में एक अजीब सी चमक और खुशी तैर गई। उसने अपनी सास के इस बदले हुए रूप को देखकर दिल से मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी, अगर आपके इस मौन में हम सबके लिए इतना प्यार छिपा है, तो इससे अच्छी बात और क्या होगी।”
उस दिन के बाद से उस घर में कांता देवी की तेज़ आवाज़ें कभी नहीं गूंजीं। सास और बहू के बीच अब शब्दों का नहीं, बल्कि एक गहरी और समझदारी भरी खामोशी का ऐसा पुल बन गया था, जिसने उनके रिश्ते को हमेशा के लिए एक खूबसूरत डोर में बांध दिया था।
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