भाई दूज

राघव वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसकी आँखें पथरा गई थीं। वह पलक झपकाना भूल गया था। नीती का वह बहाना इतना खोखला था कि कोई भी समझ सकता था कि वह बस राघव से मिलना नहीं चाहती थी। राहुकाल या मुहूर्त का तो बस नाम था; असली बात तो यह थी कि अब राघव के पास उस बड़ी सी कोठी के बाहर खड़ी करने के लिए कोई चमचमाती कार नहीं थी। अब उसके पास अपनी बहन के गले में पहनाने के लिए सोने की चेन नहीं थी। अब वह एक असफल इंसान था, 

कार्तिक मास की हल्की-हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी। सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छँटा भी नहीं था, लेकिन मीरा की रसोई में बर्तनों की खनक और मसालों की सोंधी महक ने पूरे घर को जगा दिया था। आज भाई दूज का पवित्र त्योहार था। वैसे तो घर में काम करने वाली बाई आती थी, लेकिन त्योहार के दिन वह भी अपने भाइयों के घर जाने के लिए छुट्टी पर थी। इसलिए घर की साफ-सफाई से लेकर रसोई के पकवानों तक का सारा जिम्मा मीरा के कंधों पर ही था। कड़ाही में पूरियाँ तलते हुए मीरा के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई थीं, लेकिन वह बिना थके काम में जुटी थी।

उधर कमरे में, उसका पति राघव आज कुछ ज्यादा ही फुर्ती में था। सुबह पाँच बजे ही उठकर उसने स्नान कर लिया था और अब अलमारी से अपने सबसे अच्छे कपड़े निकालकर पहन रहा था। राघव के चेहरे पर एक अजीब सी चमक और उत्साह था, ठीक वैसा ही उत्साह जैसा किसी छोटे बच्चे को मेले में जाने से पहले होता है। राघव का यह उत्साह स्वाभाविक भी था। वह अपनी चचेरी बहन, नीती के घर जो जाने वाला था। नीती वैसे तो राघव के सगे चाचा की बेटी थी, लेकिन जब नीती दस साल की थी, तब उसके पिता का देहांत हो गया था। उस समय राघव ने ही आगे बढ़कर अपने चाचा के परिवार की जिम्मेदारी उठाई थी। नीती की पढ़ाई से लेकर उसकी शादी तक, राघव ने एक सगे पिता और भाई से भी बढ़कर अपना फर्ज निभाया था।

नीती भी हमेशा राघव को अपना आदर्श मानती थी। जब तक राघव के पास बेशुमार दौलत थी, नीती के मुँह से ‘भैया’ शब्द कभी नहीं छूटता था। हर छोटे-बड़े मौके पर नीती और उसका परिवार राघव के घर आ धमकते थे। नीती की शादी भी राघव ने शहर के सबसे बड़े मैरिज हॉल से की थी, और पानी की तरह पैसा बहाया था। यहाँ तक कि नीती के पति के नए बिजनेस के लिए भी राघव ने अपनी गारंटी पर बैंक से लाखों का लोन दिलवाया था। राघव के लिए नीती सिर्फ बहन नहीं, बल्कि उसकी जान थी। हर भाई दूज और रक्षाबंधन पर राघव नीती के लिए सोने के आभूषण, महंगी साड़ियाँ और ढेरों उपहार लेकर जाता था। नीती भी उसका आरती उतारकर, टीका लगाकर भव्य स्वागत करती थी।

लेकिन समय का पहिया हमेशा एक सा नहीं रहता। पिछले एक साल में राघव के व्यापार को किसी की बुरी नजर लग गई थी। मार्केट में अचानक आए उतार-चढ़ाव और कुछ धोखेबाज़ साझेदारों की वजह से राघव का चमकता हुआ व्यापार मिट्टी में मिल गया। नौबत यहाँ तक आ गई कि उसे अपनी फैक्टरी बेचकर बैंक के कर्ज चुकाने पड़े। आज राघव के पास वो रुतबा, वो गाड़ियाँ और वो बैंक बैलेंस नहीं था। वह अब एक छोटी सी नौकरी करके किसी तरह अपने घर का खर्च चला रहा था।

मीरा जानती थी कि आज राघव के पास अपनी बहन को देने के लिए कोई सोने का हार या रेशमी साड़ी नहीं है। कल रात ही राघव ने अपनी एक महीने की जमा की हुई थोड़ी सी रकम से मिठाई का एक साधारण सा डिब्बा और एक सूती सूट खरीदा था। कपड़े खरीदते समय राघव की आँखें नम हो गई थीं, लेकिन उसने खुद को यह कहकर तसल्ली दी थी कि “नीती मेरी अपनी बहन है, उसे इन पैसों से क्या मतलब? वह तो बस अपने भाई का प्यार देखती है। जब वो मेरे हाथों में यह छोटा सा डिब्बा देखेगी, तो वह मेरे हालात समझ जाएगी।”

मीरा रसोई के दरवाजे से राघव को तैयार होते हुए देख रही थी। एक पत्नी होने के नाते वह राघव के इस भोलेपन पर तरस खा रही थी। मीरा जानती थी कि दुनिया कैसे बदलती है। पिछले छह महीनों में, जब से राघव पर मुसीबत का पहाड़ टूटा था, नीती ने एक बार भी फोन करके अपने भाई का हाल नहीं पूछा था। जब कभी मीरा ने फोन किया भी, तो नीती ने व्यस्त होने का बहाना बनाकर फोन जल्दी काट दिया। लेकिन राघव का दिल ये मानने को तैयार ही नहीं था कि उसकी लाडली बहन दौलत की भूखी हो सकती है।

“मीरा! अरे मेरी घड़ी कहाँ है? जल्दी दे दो, मुझे नीती के घर पहुँचना है। नौ बजे के बाद राहुकाल शुरू हो जाएगा, उससे पहले मुझे टीका लगवाना है,” राघव ने बाल संवारते हुए आवाज़ लगाई।

मीरा ने अपने हाथ पोंछे और घड़ी लाकर राघव को दे दी। “आप इतनी जल्दी में क्यों हैं? आराम से जाइएगा। उन्होंने फोन किया था क्या आपको?” मीरा ने धीरे से पूछा।

“अरे नहीं! उसे फोन करने की क्या जरूरत है? वह तो खुद सुबह से मेरा रास्ता देख रही होगी। पिछले साल जब मैं आधा घंटा लेट हो गया था, तो उसने पूरा घर सिर पर उठा लिया था। मैं बस निकल ही रहा हूँ,” राघव ने मिठाई का डिब्बा और लिफाफा हाथ में लेते हुए कहा।

राघव दरवाजे की तरफ बढ़ा ही था कि अचानक डोरबेल बज उठी। राघव ने खुद आगे बढ़कर दरवाजा खोला। सामने एक कूरियर वाला खड़ा था।

“राघव जी यही हैं?” कूरियर वाले ने एक पीला लिफाफा आगे बढ़ाते हुए पूछा।

“हाँ, मैं ही हूँ,” राघव ने लिफाफा लेते हुए हस्ताक्षर किए। कूरियर वाले के जाते ही राघव ने लिफाफे को ध्यान से देखा। उस पर भेजने वाले की जगह नीती का नाम और पता लिखा था।

मीरा भी पीछे आकर खड़ी हो गई। “किसका कूरियर है इतनी सुबह?”

राघव कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसने लिफाफे को पलटकर देखा और बुदबुदाया, “नीती ने भेजा है… लेकिन क्यों? मैं तो खुद उसके घर जा रहा हूँ।”

“खोल कर देखिए, शायद कुछ जरूरी हो,” मीरा ने कहा।

राघव ने कांपते हाथों से लिफाफा फाड़ा। अंदर से एक छोटा सा डिब्बा निकला। डिब्बे के अंदर एक सूखा नारियल, रोली की एक छोटी सी पुड़िया, कुछ अक्षत (चावल) और दस रुपये का एक नोट रखा हुआ था। यह भाई दूज का पारंपरिक टीका था, जो बहनें अपने भाइयों को लगाती हैं। लेकिन इसे इस तरह कूरियर से भेजा जाना राघव की समझ से परे था। वह अवाक होकर उस डिब्बे को देख रहा था, जैसे वह कोई भयानक वस्तु हो।

तभी राघव के मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नीती का नाम फ्लैश हो रहा था। राघव ने तुरंत फोन उठाया, उसकी आवाज़ में अभी भी एक उम्मीद थी। “हैलो… नीती? बेटा, मैं बस घर से निकल ही रहा था तेरे पास आने के लिए, और ये कूरियर…”

राघव की बात पूरी होने से पहले ही नीती ने एक बहुत ही रूखे और औपचारिक स्वर में बात काटते हुए कहा, “हाँ भैया, मैंने ही कूरियर भेजा है। आपको मिल गया ना? बस वही पूछने के लिए फोन किया था।”

“लेकिन कूरियर क्यों? मैं तो आ ही रहा था,” राघव ने टूटे हुए स्वर में पूछा।

“अरे भैया, असल में मेरे पति के कुछ क्लाइंट्स आ गए हैं और हमें अचानक शहर से बाहर एक रिजॉर्ट में जाना पड़ रहा है। वो बड़े लोग हैं ना, उन्हें मना नहीं कर सकते। उनके साथ रहना हमारे बिजनेस के लिए बहुत जरूरी है। और वैसे भी, पंडित जी ने बताया था कि टीके का शुभ मुहूर्त सुबह आठ बजे तक ही है। आप तो वैसे भी बस से आते, तो आपको पहुँचने में देर हो जाती। इसलिए मैंने सोचा कि कूरियर से टीका भेज दूँ। आप घर पर ही भाभी से कहकर माथे पर टीका लगवा लेना। चलिए, मुझे पैकिंग करनी है, बाद में बात करती हूँ।”

बिना राघव का जवाब सुने, नीती ने फोन कट कर दिया। फोन से आती ‘टूट-टूट’ की आवाज़ राघव के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थी।

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। राघव का हाथ धीरे-धीरे नीचे आ गया। उसके हाथ से वह लिफाफा और सूखा नारियल छूटकर ज़मीन पर गिर पड़े। मीरा सब कुछ देख और सुन रही थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप खड़ी रही, क्योंकि वह जानती थी कि आज राघव के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम टूट गया था।

राघव वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसकी आँखें पथरा गई थीं। वह पलक झपकाना भूल गया था। नीती का वह बहाना इतना खोखला था कि कोई भी समझ सकता था कि वह बस राघव से मिलना नहीं चाहती थी। राहुकाल या मुहूर्त का तो बस नाम था; असली बात तो यह थी कि अब राघव के पास उस बड़ी सी कोठी के बाहर खड़ी करने के लिए कोई चमचमाती कार नहीं थी। अब उसके पास अपनी बहन के गले में पहनाने के लिए सोने की चेन नहीं थी। अब वह एक असफल इंसान था, जिससे दूर रहने में ही नीती को अपनी भलाई नज़र आ रही थी।

राघव का सीना दर्द से फटने लगा। उसे चक्कर सा आने लगा। अगर मीरा ने दौड़कर उसके कंधे पर हाथ न रखा होता, तो वह शायद फर्श पर गिर जाता।

राघव की आँखों के सामने अतीत के पन्ने पलटने लगे। उसे याद आया वह दिन जब नीती की माँ (उसकी चाची) अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थीं। उनके इलाज के लिए नीती के पास एक पैसा नहीं था। तब राघव ने अपनी पुश्तैनी जमीन गिरवी रखकर अस्पताल का बिल भरा था। उसे याद आया जब नीती की शादी के समय उसके ससुराल वालों ने अचानक एक बड़ी गाड़ी की मांग कर दी थी, तो राघव ने बिना एक पल सोचे अपना एफडी (FD) तुड़वाकर गाड़ी की चाबी नीती के ससुर के हाथों में रख दी थी। उस समय नीती रोते हुए उसके गले लग गई थी और कहा था, “भैया, आप मेरे लिए भगवान हो। इस जन्म में क्या, सात जन्मों तक मैं आपका ये कर्ज नहीं चुका पाऊँगी।”

राघव सोच रहा था कि कर्ज चुकाने की बात तो दूर, आज उसी बहन ने उसे अपने घर की चौखट पर कदम रखने के लायक भी नहीं समझा। जब तक वह एक एटीएम मशीन की तरह काम कर रहा था, तब तक वह सबसे प्यारा भाई था। उसके सुख-दुख, उसकी हर जरूरत का ख्याल राघव ने अपनी जरूरतों को मारकर पूरा किया। उसने कभी मीरा की इच्छाओं पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन नीती की हर जिद पूरी की। और आज? आज जब उसे अपनी बहन के सहारे और प्यार की सबसे ज्यादा जरूरत थी, जब उसका मनोबल टूटा हुआ था, तो उसी बहन ने शुभ मुहूर्त का बहाना बनाकर उसके प्यार का मज़ाक उड़ा दिया।

“मैं कितना मूर्ख था मीरा,” राघव की आँखों से अचानक आँसू फूट पड़े। वह एक छोटे बच्चे की तरह फफक कर रोने लगा। “मुझे लगा था कि रिश्ते खून से बनते हैं, प्यार से सींचे जाते हैं। लेकिन नहीं… ये रिश्ते तो सिर्फ बैंक के खाते हैं। जब तक आपके खाते में पैसा है, तब तक लोग आपको सलाम करते हैं। आज मेरी हैसियत नहीं रही, तो मेरी बहन के लिए मैं एक बोझ बन गया। उसने मुझसे कटना ही बेहतर समझा।”

मीरा ने राघव का सिर अपने सीने से लगा लिया। वह उसके बालों में हाथ फेरते हुए बोली, “आप मूर्ख नहीं हैं जी। आपका दिल बहुत साफ है। आपने जो किया, वो एक अच्छे भाई का फर्ज था। लेकिन अब आपको सच्चाई स्वीकार करनी होगी। दुनिया की यही रीत है। बुरे वक्त में सिर्फ अपनी परछाई और सच्चा जीवनसाथी ही साथ देता है। ये रिश्तेदार तो बस उगते सूरज को सलाम करना जानते हैं।”

राघव ने ज़मीन पर गिरे उस सूखे नारियल और रोली की पुड़िया को देखा। अब उसे उसमें कोई प्यार, कोई पवित्रता नज़र नहीं आ रही थी। उसे लग रहा था जैसे नीती ने कूरियर से टीका नहीं, बल्कि उसकी गरीबी का उपहास भेजा है। वह सिर्फ एक रस्म अदायगी थी, ताकि दुनिया की नजरों में और खुद की नजरों में वह एक ‘अच्छी बहन’ बनी रहे।

राघव धीरे से उठा। उसने वह लिफाफा, रोली और नारियल उठाया और बिना कुछ कहे, उन्हें डस्टबिन में डाल दिया। यह सिर्फ एक लिफाफे का कूड़ेदान में जाना नहीं था, बल्कि यह राघव के मन से उन सभी झूठे रिश्तों और मोह-माया का अंत था, जिन्हें वह अब तक अपनी दौलत से पालता आ रहा था।

उसने मुड़कर मेज पर रखे उस साधारण से सूती सूट और मिठाई के डिब्बे को देखा जो वह नीती के लिए लाया था। राघव ने वह सूट उठाया और मीरा के हाथों में रख दिया।

“इसे तुम पहन लेना मीरा। और ये मिठाई… आज हम दोनों बैठकर खाएंगे। आज से मेरा सिर्फ एक ही परिवार है, और वो तुम हो। जिसने मेरे सबसे बुरे वक्त में मेरा हाथ नहीं छोड़ा, असल में वही मेरे प्यार और सम्मान का हकदार है।”

मीरा की आँखों में भी आँसू आ गए, लेकिन ये आँसू दुख के नहीं, बल्कि सुकून के थे। आज भाई दूज के दिन, राघव ने भली ही एक स्वार्थी बहन को खो दिया था, लेकिन उसने जिंदगी का सबसे बड़ा सच पा लिया था। उसने समझ लिया था कि रिश्तों की रेशमी डोर अक्सर दौलत के सुनहरे पानी में डुबोकर बनाई जाती है, और जब वह पानी उतरता है, तो अंदर की खोखली और खुरदरी सच्चाई सामने आ ही जाती है।

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लेखिका : बिंदा रावत

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