रेत की तरह फिसलती जिंदगी – अनीता वर्मा 

 रजत की आँखें छत को घूर रही थीं। नींद उनकी आँखों से कोसों दूर जा चुकी थी। ऐसा नहीं था कि वह पहली बार इस बड़े से कमरे में अकेले सो रहे थे।

अपने व्यापार के सिलसिले में, मीटिंग्स और विदेशी दौरों के कारण वह अक्सर हफ्तों तक घर से बाहर रहा करते थे। लेकिन आज की बात कुछ और थी। आज वह किसी टूर पर नहीं थे, बल्कि अपने ही घर में, अपने ही बिस्तर पर थे, फिर भी वह अकेलापन उन्हें किसी अजगर की तरह डस रहा था।

रजत करवटें बदलते हुए सोचने लगे कि पिछले बत्तीस सालों में कितनी ही रातें ऐसी गुजरी होंगी जब उनकी पत्नी ‘सुधा’ इस कमरे में इसी तरह अकेली सोई होगी। कितनी बार उसने उनके फोन का इंतज़ार किया होगा, कितनी बार डाइनिंग टेबल पर खाना ठंडा हुआ होगा

और कितनी बार उसने अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को यह सोचकर मार दिया होगा कि ‘रजत काम में व्यस्त हैं, उन्हें परेशान करना ठीक नहीं।’

आज जब रजत के पास समय ही समय था, तो उनके पास वो इंसान नहीं था जिसके साथ वो इस समय को बांट सकें। आज की एक रात उनके लिए काटे नहीं कट रही थी, तो सुधा ने इतने सालों तक वह अकेलापन कैसे बर्दाश्त किया होगा?

सुधा कभी शिकायत नहीं करती थी। वह स्वभाव से बहुत ही शांत और समझदार महिला थी। हां, कभी-कभी जब उसकी उदासी हद से गुजर जाती, तो वह हल्के से मुस्कुराकर बस इतना कह देती थी, “रजत, व्यापार और पैसे तो जीवन भर कमाए जा सकते हैं, पर क्या कुछ पल मेरे हिस्से के मुझे बिना मांगे नहीं मिल सकते?

कभी तो दो घड़ी मेरे पास बैठकर बात कर लिया कीजिए।” और रजत हमेशा की तरह अपना चिर-परिचित जवाब दे देते, “अरे सुधा, ये सब किसके लिए कर रहा हूँ? तुम्हारे और बच्चों के लिए ही तो! बस ये नया प्रोजेक्ट सेट हो जाए, बेटी ‘काव्या’ की शादी हो जाए और बेटा ‘रोहन’ बिज़नेस सँभालने लायक हो जाए, फिर मेरा पूरा समय सिर्फ तुम्हारा होगा।

रिटायरमेंट के बाद हम दोनों पूरी दुनिया घूमेंगे, मैं तुम्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोडूंगा।” रजत का यह खोखला आश्वासन सुनकर सुधा एक बार फिर से अपनी उम्मीदों को समेट लेती और घर-गृहस्थी के कामों में खुद को डुबो देती।

लेटे-लेटे रजत की आँखों के सामने पुरानी यादों की रील घूमने लगी। उन्हें याद आया कि कैसे अपनी शादी के लिए उन्होंने दर्जनों रिश्ते ठुकराए थे, तब जाकर सुधा उन्हें पसंद आई थी। सुधा किसी अप्सरा से कम नहीं थी। तीखे नैन-नक्श, लंबे काले बाल, और सबसे बड़ी बात, वह एक बेहतरीन शास्त्रीय गायिका थी।

शादी के शुरुआती दिनों में वह अक्सर गुनगुनाया करती थी, लेकिन रजत की व्यस्तताओं और परिवार की जिम्मेदारियों के तले उसकी आवाज़ न जाने कब दब कर रह गई, रजत ने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

शादी के बत्तीस साल कैसे पंख लगाकर उड़ गए, रजत को एहसास ही नहीं हुआ। बेटी काव्या की शादी एक बहुत ही संपन्न परिवार में हो गई थी और बेटा रोहन अब बिज़नेस के काम में उनका हाथ बंटाने लगा था। रजत को लगने लगा था कि अब उनकी सारी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी हैं।

अब बस एक-दो साल में बिज़नेस पूरी तरह रोहन को सौंपकर वह रिटायर हो जाएंगे और अपना सारा समय सुधा को देंगे। इसी सुनहरे भविष्य का सपना बुनते हुए, अतीत की यादों में खोए रजत की आँख कब लग गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला।

अचानक कमरे में एक जानी-पहचानी खुशबू फैल गई—मोगरे के फूलों की खुशबू, जो सुधा को बेहद पसंद थी। और फिर, पायल की वो मीठी रुनझुन, जो रजत के कानों में एक संगीत की तरह घुल गई। रजत की नींद अचानक खुली। उन्होंने सामने देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सुधा ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थी। उसने वही लाल रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी जो रजत ने उसे पिछली सालगिरह पर तोहफे में दी थी, लेकिन जिसे पहनने का मौका सुधा को कभी नहीं मिल पाया था। वह अपने गीले बालों को तौलिए से पोंछ रही थी और माथे पर कुमकुम की लाल बिंदी सजा रही थी।

रजत उसे एकटक, बिना पलक झपकाए देख रहे थे। उन्हें लगा जैसे समय ठहर गया हो। आईने में रजत के अवाक चेहरे को देखकर सुधा पलटी और अपनी वही मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए बोली, “क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहे हैं मुझे? जैसे पहले कभी देखा ही न हो!”

रजत की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस कांपते हाथों से सुधा को अपने पास आने का इशारा किया। सुधा जैसे ही पलंग के पास आई और किनारे पर बैठने लगी, रजत ने अचानक आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों में कसकर भींच लिया। उन्होंने सुधा को इतने जोर से गले लगाया जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किसी तिनके को पकड़ लेता है। वह सुधा के चेहरे को, उसकी आँखों को अपलक निहार रहे थे, मानो आज वो उसके चेहरे की हर लकीर, हर भाव को अपनी आत्मा में उतार लेना चाहते हों।

सुधा हैरान थी। उसने रजत के गालों को सहलाते हुए पूछा, “अरे, आज क्या बात है? आप रो क्यों रहे हैं? तबीयत तो ठीक है ना आपकी?”

रजत रुंधे हुए गले से बोले, “नहीं सुधा, कुछ ठीक नहीं है। मैं अब एक पल भी तुमसे दूर नहीं रह सकता। आज मुझे एहसास हुआ है कि मैं तुम्हारे साथ रहकर भी तुमसे कितना दूर था। जो बातें तुमने कभी अपने होठों से नहीं कहीं, वो सारी शिकायतें आज इस कमरे की दीवारों ने चीख-चीख कर मुझसे कह दी हैं। मैंने तुम्हारी पूरी जवानी, तुम्हारी हर खुशी को अपने काम की सूली पर चढ़ा दिया। लेकिन अब और नहीं… मैं आज ही कंपनी जाकर रोहन को सब कुछ सौंप दूंगा। मैं आज ही अपने काम से रिटायरमेंट ले रहा हूँ। अब मेरे जीवन का हर एक पल, मेरी हर सांस सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी है।”

सुधा ने बीच में ही उन्हें टोकते हुए कहा, “पर अभी तो आपके रिटायरमेंट में दो साल बाकी हैं। आपने तो कहा था कि नया प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद…”

“भाड़ में जाए वो प्रोजेक्ट!” रजत लगभग रोते हुए चिल्लाए, “मुझे कोई प्रोजेक्ट नहीं करना। मैंने निर्णय ले लिया है। मैं आज ही इस्तीफा दे रहा हूँ। मुझे तुम्हारे साथ रहना है, दुनिया घूमनी है, तुम्हारी वो शास्त्रीय संगीत की महफिलें सजानी हैं जिन्हें मैंने बरसों पहले छीन लिया था।”

रजत की ये बातें सुनकर सुधा की आँखें भी छलक आईं। दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में बंधे थे। रजत के आंसू सुधा के कंधों को भिगो रहे थे। सुधा को लगा मानो उसके बरसों के इंतज़ार का फल आज मिल गया हो। उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे इस एक सुनहरे पल में सिमट आई थी। वह रजत की बाहों से आजाद नहीं होना चाहती थी, लेकिन सुबह हो रही थी।

सुधा ने प्यार से रजत के बाल सहलाए और कसमसाते हुए बोली, “अच्छा, अब छोड़िए भी। सुबह हो गई है, बच्चे उठने वाले होंगे। मुझे सबके लिए नाश्ता और आपकी सुबह की चाय भी तो बनानी है।”

रजत ने न चाहते हुए भी अपनी बाहों की पकड़ ढीली कर दी। सुधा मुस्कुराती हुई उठी और कमरे के दरवाजे की तरफ जाने लगी। रजत उसे जाते हुए देख रहे थे। मन ही मन उन्होंने सोचा, “इतने साल बीत गए, पर मेरी सुधा की चाल में आज भी वही नज़ाकत है। मैं कितना मूर्ख था जो इस खूबसूरती को भूलकर पैसों के पीछे भागता रहा।”

काफी देर बीत गई। खिड़की से सुबह की तेज धूप कमरे में आ चुकी थी, लेकिन सुधा चाय लेकर नहीं लौटी। रजत की बेचैनी बढ़ने लगी। उन्होंने बिस्तर पर बैठे-बैठे ही ज़ोर से आवाज़ लगाई, “सुधा! अरे कितनी देर लगेगी? अब तक चाय नहीं बनी क्या? छोड़ो चाय, तुम बस यहाँ आ जाओ, मुझे तुम्हारे बिना एक पल भी अच्छा नहीं लग रहा।”

उनकी आवाज़ पूरे घर में गूंज गई। आवाज़ सुनकर उनकी बेटी काव्या, जो कल ही मायके आई थी, बदहवास हालत में दौड़ती हुई कमरे में आई। उसकी आँखें सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था।

“क्या हुआ पापा? आप ऐसे क्यों चिल्ला रहे हैं?” काव्या ने रुंधे हुए स्वर में पूछा।

रजत ने दरवाजे की तरफ देखते हुए झल्लाहट से कहा, “देखो ना काव्या, तुम्हारी माँ को क्या हो गया है। कब से किचन में चाय बना रही है। मैं इतनी आवाज़ें दे रहा हूँ, लेकिन सुन ही नहीं रही। जाकर कहो उसे कि मुझे चाय नहीं पीनी, बस वो मेरे पास आ जाए।”

रजत की बात सुनकर काव्या वहीं दरवाजे पर धम्म से बैठ गई और जोर-जोर से रोने लगी। “पापा… आप ये क्या कह रहे हैं?”

रजत अचकचा गए। “क्या हुआ बेटा? तू क्यों रो रही है? सुधा कहाँ है?”

काव्या ने अपने पिता की तरफ देखते हुए सिसकियाँ भरते हुए कहा, “आपने आवाज़ लगाने में बहुत देर कर दी पापा… बहुत देर कर दी। अब आपकी कोई भी आवाज़ मम्मी तक नहीं पहुँच पाएगी। होश में आइए पापा, खुद को संभालिए। आप सदमे में हैं।”

रजत का दिमाग सुन्न हो गया, “सदमा? कैसा सदमा? अभी तो वो यहीं थी, मेरे पास… उसने मुझसे बात की…”

काव्या ने फफकते हुए कहा, “पापा… कल ही तो हमने मम्मी का अंतिम संस्कार किया है। कल ही तो हार्ट अटैक से वो हमें छोड़कर चली गईं। कल ही तो आपने उन्हें अपने हाथों से मुखाग्नि दी थी। वो अब कभी लौट कर नहीं आएंगी पापा… कभी नहीं!”

काव्या के ये शब्द रजत के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उनके दिमाग की नसें जैसे फटने लगीं। अचानक उन्हें कल का वो मनहूस दिन याद आ गया—सुधा का अचेत शरीर, सफेद कफन, जलती हुई चिता और राख में तब्दील होते उनके वो सारे वादे जो उन्होंने रिटायरमेंट के बाद पूरे करने के लिए बचा कर रखे थे। जो सुधा अभी कुछ पल पहले उनके ख्यालों में ज़िंदा थी, वह दरअसल एक भ्रम था, उनके अंदर के पश्चाताप का एक अक्स था।

रजत पलंग से नीचे ज़मीन पर गिर पड़े। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया और एक ऐसी हृदय विदारक चीख उनके गले से निकली जिसने उस बड़े से घर के सन्नाटे को चीर कर रख दिया।

“नहीं सुधा! तुम मुझे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती! तुमने मुझसे वादा किया था कि हम रिटायरमेंट के बाद साथ रहेंगे। मुझे प्रायश्चित का एक मौका तो दिया होता! मैं अपना सब कुछ लुटा दूंगा, बस एक बार लौट आओ… सिर्फ एक बार!”

रजत ज़मीन पर सिर पटक-पटक कर रो रहे थे। उनकी अरबों की संपत्ति, उनका बड़ा बिज़नेस, उनका रसूख—सब कुछ आज उस ठंडी ज़मीन पर उनके आंसुओं के साथ बह रहा था। उन्होंने पूरी जिंदगी उस ‘कल’ के लिए भाग-दौड़ की थी जो कभी आया ही नहीं, और जो ‘आज’ उनके पास था, उसे उन्होंने हमेशा के लिए खो दिया था।

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मूल लेखिका : अनीता वर्मा 

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