लाल जोड़े में सजी नव्या जब कार से उतरी, तो उसके कदमों में एक नई दुनिया की आहट थी। ढोल-नगाड़ों की थाप, रिश्तेदारों की भीड़ और औरतों के मंगलगीत से घर का कोना-कोना रोशनी से नहाया हुआ था। पूरे दिन की रस्मों और सफर की भारी थकान के बावजूद नव्या की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—अपने नए जीवनसाथी, समीर के साथ जिंदगी की एक खूबसूरत शुरुआत करने की चमक। मंडप में समीर की वो हल्की सी मुस्कान और चोरी-छिपे उसे देखना नव्या को बार-बार याद आ रहा था। वह इस अनजान और शोर-शराबे से भरी भीड़ में सिर्फ उसी एक चेहरे को तलाश रही थी, लेकिन रस्मों के भंवर में दोनों को बात करने का एक पल भी नहीं मिला था। उसे लग रहा था कि शायद समीर भी उससे एकांत में मिलने और बात करने का कोई बहाना ढूँढ रहा होगा।
रात के बारह बज चुके थे। गुलाब और चमेली के फूलों की महक से सजे उस कमरे में नव्या पलंग पर बैठी थी। उसका भारी लहंगा और सोने के गहने अब शरीर पर बोझ लगने लगे थे, लेकिन दिल की धड़कनें किसी तेज दौड़ते घोड़े की तरह बेकाबू थीं। दरवाजे की हर आहट पर उसकी नजरें चौखट की तरफ उठ जाती थीं। उसने अपने मन में न जाने कितने सवाल और बातें सोच रखी थीं, जो वह अपने जीवनसाथी से कहना चाहती थी। तभी दरवाजे की कुंडी खुली। समीर ने अंदर कदम रखा। नव्या ने झिझकते और शर्माते हुए अपना घूंघट थोड़ा सा नीचे किया, उसके हाथ में रखा केसरिया दूध का गिलास हल्का सा कांपने लगा।
समीर ने दरवाजा अंदर से बंद किया, लेकिन उसकी आँखों में न तो कोई प्यार था, न कोई उत्सुकता और न ही कोई खुशी। वह पलंग के पास आने के बजाय कमरे के दूसरे कोने में जाकर सोफे के पास खड़ा हो गया और बिना नव्या की तरफ देखे, एक बेहद ठंडी और अजनबी आवाज में बोला, “देखो… मुझे नहीं पता कि तुम्हारा पूरा नाम क्या है या तुमने इस शादी को लेकर क्या-क्या सपने सजाए हैं, लेकिन मैं तुम्हें आज और अभी सच्चाई बता देना चाहता हूँ। मैं तुमसे कोई पति-पत्नी का संबंध नहीं रखना चाहता। यह शादी मेरी मर्जी से नहीं हुई है, यह बस मेरे परिवार वालों का एक इमोशनल ब्लैकमेल था। पिताजी की तबीयत खराब थी और उन्होंने कसम दी थी, इसलिए मजबूरन मुझे मंडप में बैठना पड़ा। सच तो यह है कि मैं शहर में अपनी एक दोस्त, रिया, के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हूँ। मैं प्यार उसी से करता हूँ और भविष्य में उसी से शादी भी करूंगा। तुम इस घर में मेरे माता-पिता की देखभाल करने के लिए एक बहू की तरह रह सकती हो, लेकिन मेरे दिल और मेरी जिंदगी में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।”
समीर के ये शब्द नव्या के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। उसके हाथों से छूटकर दूध का गिलास फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया, ठीक वैसे ही जैसे कुछ ही पलों में उसकी पूरी जिंदगी और उसके सारे अरमान बिखर गए थे। सफेद फर्श पर फैलता हुआ वो दूध और कांच के टुकड़े नव्या की किस्मत पर हंस रहे थे। कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो किसी श्मशान की खामोशी से भी ज्यादा खौफनाक था। समीर बिना कोई माफी मांगे या सफाई दिए, अलमारी से एक तकिया निकालकर सोफे पर जाकर लेट गया और उसने करवट बदल ली।
नव्या पूरी रात उसी सजे हुए बिस्तर के एक कोने में पत्थर की मूरत बनी बैठी रही। उसके गालों पर सूख चुके आँसू और आँखों में तैरता हुआ खालीपन उसकी बर्बादी की गवाही दे रहे थे। वह सोच रही थी कि आखिर उसकी गलती क्या थी? क्या उसने यही दिन देखने के लिए अपने माता-पिता का घर छोड़ा था? क्या एक औरत की जिंदगी कोई खिलौना है जिसे कोई भी अपने झूठे सम्मान या पारिवारिक दबाव के लिए इस्तेमाल कर सकता है?
अगली सुबह सूरज की किरणें एक नया दर्द लेकर आईं। नव्या ने खुद को समेटा। उसने तय किया कि वह रिश्तेदारों की भीड़ में अपने स्वाभिमान का तमाशा नहीं बनने देगी। वह तैयार होकर बाहर आई। पूरे दिन उसने एक आदर्श और खुशहाल बहू होने का नाटक किया। हर कोई उसकी सुंदरता और संस्कारों की तारीफ कर रहा था, लेकिन कोई उसके अंदर चल रहे उस तूफान को नहीं देख पा रहा था जो उसे तिल-तिल कर मार रहा था। समीर भी सबके सामने ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत पति हो। उसका यह दोहरा रवैया नव्या को और भी ज्यादा चुभ रहा था।
चार दिन बाद, जब घर से सारे मेहमान विदा हो गए और घर में शांति छा गई, तो नव्या ने एक बड़ा फैसला लिया। वह समीर के माता-पिता के कमरे में गई। समीर भी वहीं मौजूद था। नव्या ने शांत लेकिन बेहद दृढ़ आवाज में कहा, “माँ जी, बाबूजी, आपने अपने बेटे की जिद के आगे हार मानकर एक अनजान लड़की की जिंदगी दांव पर लगा दी। आप जानते थे कि समीर किसी और से प्यार करता है और उसी के साथ रहता है, फिर भी आपने मुझे इस धोखे के रिश्ते में बांध दिया। समाज के डर और अपने झूठे रुतबे के लिए आपने मेरी बलि चढ़ा दी। समीर ने मुझे पहली ही रात बता दिया कि वह मेरे साथ नहीं रहना चाहता। मैं यहाँ कोई उम्रकैद की सजा काटने या इस घर की मुफ्त की दासी बनने नहीं आई थी। मेरा भी एक वजूद है, मेरा भी एक सम्मान है।”
समीर के माता-पिता स्तब्ध रह गए, उनका सिर शर्म से झुक गया। समीर भी नव्या के इस निडर रूप को देखकर हैरान था, उसे लगा था कि वह एक आम लड़की की तरह रो-धोकर इस अन्याय को अपनी नियति मान लेगी। “मैं यह घर और यह खोखला रिश्ता छोड़कर जा रही हूँ,” नव्या ने आगे कहा। “मैं उस इंसान के साथ एक छत के नीचे नहीं रह सकती जो मुझे एक इंसान ही नहीं समझता। आप लोगों ने भले ही मेरे सपने तोड़े हों, लेकिन आप मेरी हिम्मत नहीं तोड़ सकते।” नव्या ने अपने गले से मंगलसूत्र निकाला और मेज पर रख दिया। वह अपना सामान लेकर उस घर से निकल गई, लेकिन इस बार उसके कदमों में एक नई मजबूती थी। वह अब किसी की बेचारी पत्नी नहीं, बल्कि अपने भाग्य की निर्माता खुद बनने जा रही थी। उसने समाज की उन बेड़ियों को हमेशा के लिए तोड़ दिया था जो एक औरत को घुट-घुट कर जीने पर मजबूर करती हैं।
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क्या नव्या का यह फैसला सही था? क्या समाज के झूठे सम्मान और पारिवारिक दबाव के लिए दो जिंदगियों को बिना प्यार के एक छत के नीचे बांध देना जायज है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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