कौशल्या देवी अपने बहुमंजिला इमारत की बालकनी में बैठी शून्य में ताक रही थीं। सामने शहर की चमचमाती रोशनियां थीं, लेकिन उनके भीतर एक अजीब सा अंधेरा पसरा हुआ था। उनके हाथ में फोन था, जिस पर अभी-अभी उनकी बेटी रितु का कॉल कटा था। रितु की बातें उनके कानों में किसी विषैले बाण की तरह चुभ रही थीं। “माँ, तुम वहां शहर में रोहन और मेघा की नौकरानी बनकर रह गई हो। उन दोनों को अपनी नौकरी और पार्टियों से फुर्सत मिले, तब तो वो तुम्हारा हाल पूछेंगे। उन्होंने तुम्हें वहां सिर्फ इसलिए रखा है ताकि उनके पीछे से घर सुरक्षित रहे और उनके आने पर गरम खाना मिल जाए। मैं तो कहती हूँ, अपने उस पुश्तैनी गांव वाले घर में वापस चली जाओ। कम से कम वहां अपनी मर्जी की मालकिन तो रहोगी।”
कौशल्या देवी ने लंबी सांस ली। रितु की बातें कहीं न कहीं उनके मन के उस घाव को कुरेद रही थीं जो पिछले कई महीनों से रिस रहा था। उनके पति के देहांत के बाद, उनका इकलौता बेटा रोहन उन्हें अपने साथ मुंबई ले आया था। शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था, लेकिन धीरे-धीरे रोहन और उसकी पत्नी मेघा की व्यस्त जिंदगी में कौशल्या देवी हा हाशिये पर चली गईं। पूरा दिन अकेले टीवी देखना, शाम को मेघा के आने पर उसके निर्देशों के अनुसार रसोई में उसकी मदद करना और रात को चुपचाप सो जाना। यही उनकी दिनचर्या बन गई थी।
तभी रितु ने फोन पर एक और बात छेड़ी थी, “वैसे माँ, मैंने सुना है रोहन पिछले हफ्ते गांव गया था। कहीं उसने पिताजी वाला घर अपने नाम तो नहीं करवा लिया? तुम जरा आंखें खोलकर रखना। आजकल के बेटे-बहुओं का कोई भरोसा नहीं। कहीं ऐसा न हो कि गांव का घर भी तुम्हारे हाथ से निकल जाए और यहां मुंबई में भी तुम्हें धक्के खाने पड़ें।” कौशल्या ने अनमने ढंग से कह दिया था, “मुझे क्या पता बेटी, वो कह रहा था कि बारिश में छत टपकने लगी थी, उसी की मरम्मत के लिए गया था।”
कौशल्या देवी इन ख्यालों में खोई ही थीं कि पीछे से मेघा की आवाज आई, “माँ जी, चलिए अंदर आ जाइए। खाना लग गया है।” आवाज में एक रूखापन और थकान थी, जो रोज ऑफिस से लौटने के बाद मेघा के चेहरे पर छाई रहती थी। कौशल्या ने एक भारी मन से फोन सोफे पर रखा और डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ गईं। मेज पर मेघा ने खाना परोसा था। प्लेट में लौकी की उबली हुई सब्जी, बिना घी की दो सूखी रोटियां और पतली दाल देखकर कौशल्या देवी का मन खिन्न हो गया।
उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “यह क्या है मेघा? मैं कोई बीमार हूँ जो रोज मुझे यह घास-फूस खाने को दे देती हो? तुम दोनों के लिए तो मलाई कोफ्ता और पराठे आए हैं, और मेरे लिए यह उबला हुआ खाना? अगर तुम्हें मुझे खाना खिलाने में इतनी ही तकलीफ है, तो साफ कह दो, मैं अपने गांव वापस चली जाऊंगी। कम से कम वहां रूखी-सूखी रोटी इज्जत के साथ तो खा सकूंगी।”
मेघा ने एक पल के लिए अपनी सास को देखा। उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जिसे कौशल्या पढ़ नहीं पाईं। वह कुछ बोलने ही वाली थी कि रोहन कमरे से बाहर आ गया। उसने अपनी माँ की बातें सुन ली थीं। रोहन ने शांत स्वर में कहा, “माँ, आप बेवजह मेघा पर गुस्सा कर रही हैं। उसने जो भी बनाया है…”
“हाँ-हाँ, तू तो अपनी पत्नी का ही पक्ष लेगा,” कौशल्या देवी ने बात बीच में ही काट दी। “मैं तो तुम लोगों के लिए बस एक बोझ हूँ। घर की चौकीदारी करने वाली एक बूढ़ी औरत, जिसकी कोई अहमियत नहीं है। मेरी रितु सच ही कहती है, तुम लोगों ने मुझे अपने स्वार्थ के लिए यहां रखा है।” यह कहकर कौशल्या देवी बिना खाए ही अपने कमरे में चली गईं और जोर से दरवाजा बंद कर लिया।
रोहन और मेघा खामोश खड़े रहे। कमरे में जाकर कौशल्या देवी बिस्तर पर लेट गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्हें अपने स्वर्गीय पति की बहुत याद आ रही थी। उन्हें लग रहा था कि उनकी बेटी रितु ही इस दुनिया में उनका असली दर्द समझती है। रितु कितनी फिक्रमंद है उनके लिए। वह रोज फोन करती है, उनका हाल पूछती है और उन्हें रोहन-मेघा की चालाकियों से आगाह करती है।
रात काफी गहरी हो चुकी थी। कौशल्या देवी को नींद नहीं आ रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर वैसे भी नींद आंखों से रूठ ही जाती है और आज तो मन भी बहुत अशांत था। उन्हें प्यास लगी, तो वह पानी पीने के लिए दबे पांव रसोई की तरफ गईं। रसोई से लौटते वक्त रोहन और मेघा के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था और अंदर से धीमी-धीमी आवाजें आ रही थीं। कौशल्या देवी के कदम वहीं ठिठक गए।
अंदर मेघा कह रही थी, “रोहन, मुझे आज बहुत बुरा लगा। माँ जी को लगा कि मैंने जानबूझकर उन्हें ऐसा खाना दिया। काश हम उन्हें सच बता पाते।”
रोहन की थकी हुई आवाज आई, “हम क्या कर सकते हैं मेघा? डॉक्टर माथुर ने साफ कहा है कि माँ का दिल बहुत कमजोर हो चुका है। उनका कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर पर है। अगर हमने उन्हें बताया कि उन्हें दिल की गंभीर बीमारी है और कभी भी स्ट्रोक आ सकता है, तो वह डर के मारे ही आधी हो जाएंगी। उन्हें बिना बताए ही हमें उनका परहेज करवाना होगा। उन्हें लगता है कि तुम उन्हें जानबूझकर उबला खाना देती हो। मुझे तुम्हारी फिक्र होती है मेघा, तुम ऑफिस भी संभालती हो और माँ के लिए अलग से बिना तेल-मसाले का खाना भी बनाती हो, फिर भी उनके ताने सुनती हो।”
मेघा ने बीच में टोकते हुए कहा, “तानों की कोई बात नहीं रोहन, वह माँ हैं। बुजुर्ग अक्सर बच्चों की तरह हो जाते हैं। मुझे उनके गुस्से से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन मुझे रितु दीदी की बातों से बहुत डर लगता है। वह रोज फोन करके माँ जी को भड़काती हैं।”
“हाँ, दीदी का तो अलग ही एजेंडा चल रहा है,” रोहन ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा। “तुम्हें पता है मेघा, जब मैं पिछले हफ्ते गांव गया था, तो दीदी का फोन आया था। वह कह रही थीं कि गांव वाला घर बिकवा कर पैसे आधे-आधे बांट लेते हैं। जब मैंने कहा कि वह घर माँ की आखिरी निशानी है और पिताजी ने बड़ी मेहनत से बनवाया था, तो दीदी लड़ने लगीं।”
“तो फिर गांव के घर का क्या हुआ?” मेघा ने पूछा।
“मैंने वकील से मिलकर उस पूरे घर और जमीन की रजिस्ट्री माँ के नाम करवा दी है,” रोहन ने बताया। “पिताजी ने जो कर्जा लिया था, वह मैंने अपने प्रोविडेंट फंड से चुका दिया है। अब उस घर पर सिर्फ और सिर्फ माँ का हक है। मैंने वहां ठेकेदार को पैसे भी दे दिए हैं ताकि घर की पूरी मरम्मत हो जाए। जब माँ सर्दियों में वहां जाना चाहेंगी, तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। दीदी को लगता है कि मैं वह घर हथियाना चाहता हूँ, जबकि मैं तो बस यह चाहता हूँ कि माँ को कभी यह महसूस न हो कि वो बेघर हो गई हैं। उनके जीते जी उस संपत्ति पर कोई आंख नहीं उठा सकता।”
मेघा ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने बिल्कुल सही किया रोहन। कल जब रजिस्ट्री के कागज आ जाएंगे, तो हम माँ जी को सरप्राइज देंगे। शायद तब उन्हें यकीन हो जाए कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं।”
दरवाजे के बाहर खड़ी कौशल्या देवी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। उनके पैरों तले से मानो जमीन खिसक गई थी। यह वो क्या सुन रही थीं? जिस बेटी को वह अपना सबसे बड़ा हितैषी समझती थीं, वही उनके पुश्तैनी घर को बिकवा कर पैसे हड़पना चाहती थी? और जिस बहू को वह डायन और न जाने क्या-क्या समझ बैठी थीं, वह उनके दिल की बीमारी को छुपाकर उन्हें बचाने के लिए रोज उनके ताने सह रही थी? उनका अपना बेटा उनकी हिफाजत के लिए अपनी जमापूंजी लुटा रहा था और उन्होंने उसे क्या-क्या नहीं कहा!
कौशल्या देवी के आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई। लेकिन ये दुख के आंसू नहीं, पश्चाताप के आंसू थे। वह चुपचाप अपने कमरे में लौट आईं। रात भर उन्हें नींद नहीं आई। वह अपने उस व्यवहार को कोसती रहीं जो उन्होंने मेघा के साथ किया था। उन्हें समझ आ गया था कि मीठा बोलने वाले हमेशा सगे नहीं होते और कड़वे घूंट पिलाने वाले हमेशा पराए नहीं होते।
अगली सुबह जब मेघा रसोई में चाय बना रही थी, तो उसे अचानक पीछे से किसी ने गले लगा लिया। उसने पलटकर देखा तो कौशल्या देवी खड़ी थीं। उनकी आंखें सूजी हुई थीं, लेकिन चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
“माँ जी, आप… क्या हुआ? आपकी तबीयत तो ठीक है?” मेघा घबरा गई।
कौशल्या देवी ने मेघा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मेरी तबीयत तो कल तक बहुत खराब थी बेटी, लेकिन आज से बिल्कुल ठीक हो गई है। मुझे माफ कर दे मेघा। मैंने तुझे समझने में बहुत बड़ी भूल कर दी। वो उबला हुआ खाना सिर्फ मेरी सेहत के लिए नहीं था, वो तो तेरी ममता थी जो मेरे लिए फिक्रमंद थी।”
मेघा समझ नहीं पाई कि अचानक माँ जी को क्या हो गया। तभी रोहन बाहर आया। कौशल्या देवी ने आगे बढ़कर रोहन का माथा चूम लिया। “तूने मेरे लिए अपने जीवन की कमाई लगा दी रोहन, और मैंने तुझे स्वार्थी समझ लिया। मुझे सब पता चल गया है बेटा, मेरी बीमारी के बारे में भी और गांव वाले घर के बारे में भी।”
रोहन और मेघा दोनों हैरान थे। रोहन ने कहा, “माँ, आप परेशान मत होइए, हम हैं न…”
“अब मुझे कोई परेशानी नहीं है,” कौशल्या देवी ने दृढ़ता से कहा।
उसी समय कौशल्या देवी का फोन बजा। स्क्रीन पर ‘रितु’ का नाम चमक रहा था। कौशल्या देवी ने फोन उठाया।
उधर से रितु की मीठी आवाज आई, “गुड मॉर्निंग माँ! क्या कर रही हो? उस मेघा ने नाश्ते में फिर से कोई रूखा-सूखा दे दिया क्या? और रोहन से पूछा तुमने गांव के घर के बारे में?”
कौशल्या देवी ने इस बार अपनी आवाज में एक अलग ही मजबूती लाते हुए कहा, “हाँ रितु, मेरी रोहन से बात हो गई है। उसने मुझे गांव के घर की रजिस्ट्री के कागजात सौंप दिए हैं। पूरा घर मेरे नाम पर है, और रोहन ने अपने पैसों से पिताजी का सारा कर्जा भी उतार दिया है। और हाँ, रही बात मेघा के खाने की, तो मेरी बहू मुझे वो खिलाती है जिससे मेरी जान बच सके, वो जहर नहीं घोलती मेरी जिंदगी में, जैसा तू मेरे कानों में घोलने की कोशिश कर रही है।”
फोन के उस पार एकदम सन्नाटा छा गया। रितु के पास कोई जवाब नहीं था।
“अब मुझे बार-बार फोन करके मेरे बेटे-बहू के खिलाफ भड़काने की जरूरत नहीं है रितु। मुझे अपने और पराए की पहचान हो गई है,” यह कहकर कौशल्या देवी ने फोन काट दिया और हमेशा के लिए रितु का नंबर ब्लॉक कर दिया।
उन्होंने मुड़कर मेघा की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “चल बहू, आज तेरी इस सास के लिए लौकी का सूप बना। मुझे अपनी इस असली दुनिया में अभी और बहुत साल जीना है।”
मेघा और रोहन के चेहरों पर एक खूबसूरत मुस्कान खिल उठी। उस दिन शहर के उस छोटे से फ्लैट में एक ऐसा अपनापन महक रहा था, जिसने सारे गिले-शिकवों की कड़वाहट को हमेशा के लिए मिटा दिया था।
आपको क्या लगता है, क्या रितु जैसी बेटियों को माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए? और क्या बुढ़ापे में माता-पिता को बच्चों की नीयत पर इतनी जल्दी शक करना चाहिए? अपने विचार हमें जरूर बताएं!
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