आलोक एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर था। उसकी ज़िंदगी सुबह मोबाइल के अलार्म से शुरू होती थी और रात को लैपटॉप की स्क्रीन बंद होने पर खत्म होती थी। अपनी माँ, सुमित्रा देवी को गाँव में अकेला न छोड़कर वह शहर अपने साथ तो ले आया था, लेकिन उन्हें देने के लिए उसके पास सब कुछ था, सिवाय ‘समय’ के। सुमित्रा देवी का पूरा दिन उस बड़े से वातानुकूलित फ्लैट की बंद बालकनी से नीचे सड़क पर दौड़ती अजनबी गाड़ियों को गिनते हुए बीत जाता। गाँव की खुली चौपालों और पड़ोसियों की बतकही के बीच जीवन बिताने वाली सुमित्रा देवी के लिए शहर का यह सन्नाटा किसी सज़ा से कम नहीं था।
आज आलोक का प्रमोशन हुआ था और उसे कंपनी की तरफ से एक भारी बोनस मिला था। रविवार का दिन होने के बावजूद वह अपने कमरे में जल्दबाजी में कोट पहन रहा था और फोन पर किसी विदेशी क्लाइंट से बात कर रहा था। तभी सुमित्रा देवी धीरे-धीरे अपने कांपते कदम रखती हुई उसके कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी, जिसे आलोक ने पिछले कई महीनों से गौर ही नहीं किया था।
आलोक ने फोन कान से लगाए हुए ही माँ को देखा और इशारे से अंदर आने को कहा। फोन कटने के बाद वह अपना ब्रीफकेस जमाते हुए बोला, “माँ, आज मुझे बहुत बड़ा बोनस मिला है। बताओ तुम्हें क्या चाहिए? गाँव वाले घर की मरम्मत करवा दूँ? कोई सोने की चेन बनवा दूँ? या वो बनारसी साड़ी मंगा दूँ जो तुमने पिछले हफ्ते टीवी पर देखी थी? तुम बस हुक्म करो माँ, तुम्हारा बेटा अब इतना काबिल हो गया है कि दुनिया की कोई भी महंगी से महंगी चीज़ तुम्हारे कदमों में रख सकता है।”
सुमित्रा देवी की झुर्रियों भरी आँखों में एक सूनापन तैर गया। उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से आलोक के माथे को छुआ। उनका स्पर्श बहुत ठंडा था, जैसे उनके अंदर की सारी गर्माहट और जीवन की आस उस आलीशान घर के अकेलेपन ने सोख ली हो।
सुमित्रा देवी ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही धीमी, लेकिन दर्द में डूबी हुई आवाज़ में कहा, “बेटा आलोक, मुझे इस उम्र में अब किसी भी भौतिक चीज़ की लालसा नहीं रही। तेरे इस आलीशान घर में मुझे किसी भी चीज़ की कमी नहीं है, यहाँ तो बिना मांगे ही सब हाज़िर हो जाता है। फिर भी तू इतनी जिद्द कर रहा है ना, तो एक काम कर। तेरे इस इतने बड़े शहर में, जहाँ बड़े-बड़े मॉल हैं, जहाँ सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब बिकता है… अगर उन दुकानों में ‘फुर्सत के कुछ पल’ मिल जाएं, तो मेरे लिए लेते आना। बस वही चाहिए मुझे।”
आलोक एकदम से रुक गया। वह हैरान होकर अपनी माँ का मुंह देखने लगा। उसके हाथ से गाड़ी की चाबी छूटकर बिस्तर पर गिर गई।
सुमित्रा देवी की आँखों से अब आंसुओं की धार बह निकली थी। उन्होंने रुंधे हुए गले से आगे कहा, “बेटा, मेरी ज़िंदगी की शाम अब ढल चुकी है। जीवन के दिन पूरे हो रहे हैं और अब मैं सिर्फ उस अनंत रात के इंतज़ार में हूँ। और सच कहूँ आलोक? मुझे अब इस गहराते अंधेरे से बहुत डर लगने लगा है। पल-पल मेरी तरफ बढ़ रही मौत की आहट को महसूस करके मेरी रूह कांप जाती है। मैं जानती हूँ कि मौत एक शाश्वत सत्य है, इसे कोई नहीं टाल सकता। जो इस दुनिया में आया है, उसे एक न एक दिन जाना ही है। पर बेटा… इस अकेलेपन से मुझे बहुत घबराहट होती है। दिन भर इस बंद घर में ये महंगी दीवारें मुझे खाने को दौड़ती हैं। जब तू काम पर चला जाता है, तो मेरी अपनी परछाई भी मुझसे बात नहीं करती। ऐसे में मौत का डर और भयानक लगने लगता है।”
कमरे में अब एक भारी सन्नाटा पसर गया था। आलोक बुत बनकर खड़ा था और अपनी माँ के दिल से फूटते उस लावे को महसूस कर रहा था जिसे उसने कभी देखने की कोशिश ही नहीं की थी।
सुमित्रा देवी ने अपने आंसुओं को साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए कहा, “इसलिए बेटा, जब तक मैं तेरे इस घर में हूँ, अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी के कीमती पलों में से कुछ पल निकालकर मेरे पास बैठ जाया कर। मेरे इस बुढ़ापे का अकेलापन थोड़ा सा ही सही, अपने साथ बाँट लिया कर। अगर तू दिन में बस एक बार मेरे पास आकर बैठ जाएगा ना, तो मेरे जीवन की इस ढलती शाम में बिना दीये जलाए ही रोशनी हो जाएगी। कितने साल हो गए आलोक, जब तूने अपनी माँ को गले लगाया था? जब तू छोटा था, तो हर छोटी-छोटी बात पर मुझसे लिपट जाता था, मेरे आँचल में छुप जाता था। आज तू इतना बड़ा हो गया कि तुझे मेरा स्पर्श ही याद नहीं रहा।”
यह कहते-कहते सुमित्रा देवी पास रखे सोफे पर बैठ गईं और उन्होंने अपनी दोनों बाहें फैला दीं। “एक बार फिर से आ ना मेरे लाल… मेरी इस खाली गोद में अपना सिर रख दे। मैं अपनी इस ममता से भीगी हथेली से तेरे सिर को सहलाना चाहती हूँ। एक बार फिर से मेरे इस बूढ़े और थके हुए हृदय को ये महसूस करने दे कि मेरे अपने मेरे बहुत करीब हैं, ताकि जब मौत मुझे अपने साथ ले जाने के लिए गले लगाने आए, तो मैं डरूँ नहीं, बल्कि मुस्कुरा कर उसके गले लग सकूं। क्या पता बेटा… अगली गर्मियों की छुट्टियों तक तेरी ये माँ इस घर में रहे या ना रहे…”
आलोक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसे एक गहरी, अंधी नींद से झकझोर कर जगा दिया हो। बैंक के खाते में पड़े लाखों रुपये, उसकी सफलता, उसका रुतबा, आज उसे सब मिट्टी के भाव लगने लगा। उसे एहसास हुआ कि उसकी माँ को एयर कंडीशनर की ठंडी हवा नहीं, बल्कि उसके हाथों की गर्माहट चाहिए। उसे पैसे से खरीदे गए तोहफे नहीं, बल्कि वह बचपन वाला आलोक चाहिए था।
वह दौड़कर अपनी माँ के पास गया और उनके घुटनों के पास ज़मीन पर बैठकर अपना सिर उनकी गोद में छुपा लिया। वह एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो माँ, मैं अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है,” आलोक सिसकते हुए बोला।
सुमित्रा देवी के कांपते हाथ जब आलोक के बालों से गुज़रे, तो उन दोनों को लगा जैसे उनका खोया हुआ संसार वापस मिल गया हो। आलोक ने उसी वक्त अपना फोन उठाया और ऑफिस कॉल करके अपनी मीटिंग रद्द कर दी। उस दिन उसने अपनी माँ के लिए कोई महंगा तोहफा नहीं खरीदा, बल्कि उन्हें वो ‘फुर्सत के पल’ दिए, जिनकी कीमत दुनिया का कोई भी अमीर इंसान नहीं चुका सकता।
दोस्तों, क्या हम भी अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में तरक्की की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अपने माता-पिता को भूल गए हैं? क्या हम उन्हें वो वक्त दे पा रहे हैं जिसके वे असली हकदार हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : गरिमा चौधरी
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