“अरे सुधा दीदी, ज़रा फोन में देखिए तो, कल्याणी की बहू अंजलि ने अपनी सास के साथ की फोटो लगाकर स्टेटस में लिखा है- ‘मिस यू माँ, आपकी जगह कोई नहीं ले सकता।’ अब आप ही बताइए, क्या कभी किसी बहू को सास के मरने का सच में कोई दुख होता है? ये सब तो बस दुनिया को दिखाने के चोचले हैं। अंदर ही अंदर तो खुश हो रही होगी कि चलो, बुढ़िया मरी, अब घर में उसी का राज चलेगा। सास नाम की बला टली, तो अब फेसबुक और व्हाट्सएप पर आदर्श बहू बनने का नाटक कर रही है।” घर के एक कोने में बैठी बुआ सास बिमला जी ने मुंह बनाते हुए अपनी देवरानी सुधा से कहा।
सुधा जी ने भी हामी भरते हुए अंजलि की दोनों ननदों, शिवानी और पल्लवी की तरफ इशारा किया, “सही कह रही हो जीजी। असली दुख तो बेचारी इन बेटियों को है। देखो तो, रो-रोकर दोनों का बुरा हाल है। माँ का जाना क्या होता है, ये तो बेटियां ही समझ सकती हैं। बहू तो बस रस्म अदायगी कर रही है।”
घर के बीचों-बीच सफेद चादर बिछी थी। पूरा घर रिश्तेदारों, पड़ोसियों और जान-पहचान वालों से भरा हुआ था। आज ही अंजलि की सास, सुमित्रा देवी का देहांत हुआ था। घर के आंगन में सुमित्रा देवी की दोनों बेटियां, शिवानी और पल्लवी पछाड़ें खा-खाकर रो रही थीं। घर की बुजुर्ग औरतें और रिश्तेदार उन्हें गले लगाकर सांत्वना दे रहे थे। कोई कह रहा था, “चुप हो जा बेटी, विधि के विधान को कौन टाल सकता है।” तो कोई उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कह रहा था, “हिम्मत रख, तेरी माँ जहां भी होगी, तुझे रोता देखकर उसे दुख ही होगा।” घर में हर कोई बेटियों के छलकते आंसुओं को देख पा रहा था, उनके दुख को महसूस कर पा रहा था।
लेकिन इन सबके बीच, उस बड़े से घर की रसोई में एक और औरत थी, जिसकी आँखों से आंसू तो बह रहे थे, लेकिन उसके रोने की आवाज़ किसी के कानों तक नहीं पहुंच रही थी। वह थी सुमित्रा देवी की इकलौती बहू, अंजलि। सुबह से लेकर अब तक अंजलि एक पल के लिए भी बैठ नहीं पाई थी। कभी रिश्तेदारों के लिए चाय बनाना, कभी बाहर बैठे लोगों के लिए पानी भिजवाना, तो कभी पंडित जी द्वारा बताए गए अंतिम संस्कार के सामान की लिस्ट तैयार करना। अंजलि की आँखें सूजकर लाल हो चुकी थीं। बार-बार आंसुओं की धार उसकी गालों को भिगो रही थी, जिसे वह जल्दी से अपने साड़ी के पल्लू से पोंछ लेती, ताकि कोई उसे काम में कोताही बरतते हुए न देख ले।
किसी एक रिश्तेदार ने भी रसोई में जाकर अंजलि के कंधे पर हाथ रखकर यह नहीं कहा कि “बहू, तू भी थोड़ी देर बैठ जा, रो ले अपनी माँ के लिए।” किसी ने उससे नहीं पूछा कि सुबह से उसने एक घूंट पानी भी पिया है या नहीं। बाहर बैठी बुआ जी और ताई जी बीच-बीच में आवाज़ लगा देतीं, “बहू, देखना बाहर वालों के लिए चाय कम न पड़ जाए! और हां, पंडित जी के लिए जो सीधा (दान का कच्चा राशन) निकालना है, उसमें कोई कमी नहीं होनी चाहिए। सुमित्रा ने हमेशा शान से दान-पुण्य किया है, उसके जाने के बाद हमारी नाक मत कटवा देना।”
अंजलि बिना कुछ कहे बस सिर हिला देती और फिर से काम में जुट जाती। उसका गला रुंधा हुआ था। उसे रह-रहकर अपनी सासू माँ की याद आ रही थी। दुनिया के लिए सुमित्रा देवी एक सास रही होंगी, लेकिन अंजलि के लिए वे उसकी सगी माँ से बढ़कर थीं। अंजलि जब शादी करके इस घर में आई थी, तो वह बहुत सहमी हुई थी। शादी के कुछ साल पहले ही अंजलि ने अपनी सगी माँ को खो दिया था। एक नए घर, नए लोगों के बीच वह खुद को बहुत अकेला महसूस करती थी। लेकिन सुमित्रा देवी ने पहले दिन से ही उसे बहू नहीं, अपनी तीसरी बेटी मान लिया था।
अंजलि को याद आया कि कैसे उसकी पहली रसोई के दिन जब उससे खीर थोड़ी जल गई थी, तो उसकी ननदें शिवानी और पल्लवी मुंह बनाकर उठ गई थीं। लेकिन सुमित्रा देवी ने खुद वह जली हुई खीर बड़े चाव से खाई थी और सबको डांटते हुए कहा था, “मेरी अंजलि ने इतने प्यार से बनाया है, मुझे तो इसमें अमृत का स्वाद आ रहा है।” जब अंजलि बीमार पड़ती, तो सुमित्रा देवी अपनी बेटियों को तो उनके ससुराल विदा कर देतीं, लेकिन अंजलि के सिरहाने रात-रात भर जागकर ठंडे पानी की पट्टियां रखती थीं। “मेरी बच्ची की माँ नहीं है, तो क्या हुआ? जब तक मैं ज़िंदा हूँ, मेरी बेटी को किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होगी,” सुमित्रा देवी अक्सर यही कहती थीं।
आज वही सुमित्रा देवी हमेशा के लिए शांत हो गई थीं। अंजलि का दिल चीख-चीख कर रोना चाहता था। वह चाहती थी कि कोई उसे भी गले लगाए, कोई उसे भी ढांढस बंधाए। लेकिन समाज के बनाए नियमों के अनुसार, दुख जताने का अधिकार सिर्फ खून के रिश्तों को था। बहू को तो बस व्यवस्था संभालनी थी।
दोपहर ढलने को थी। सुमित्रा देवी की दोनों बेटियां, शिवानी और पल्लवी अब थक कर एक कोने में बैठ गई थीं। बुआ जी ने तुरंत अपनी एक रिश्तेदार को भेजकर दोनों के लिए चाय और जूस मंगवाया। “अरे बेचारी बच्चियां सुबह से भूखी-प्यासी रो रही हैं, थोड़ा जूस पी लेंगी तो जान में जान आएगी।” तभी अंजलि एक बड़ी सी ट्रे में सबके लिए चाय लेकर बाहर आई। उसे देखते ही सुधा जी बोल पड़ीं, “बहू, ज़रा रसोई वाली ताई को बोलना कि शाम के खाने में लौकी की सब्ज़ी और सादी दाल ही बनाए। और हां, ध्यान रखना कि कोई मेहमान बिना खाए न जाए।”
अंजलि ने ट्रे मेज पर रखी और चुपचाप हामी भरकर वापस रसोई की तरफ मुड़ गई। किसी की भी नज़र अंजलि के उतरे हुए चेहरे और कांपते हाथों पर नहीं गई। अंजलि को याद आ रहा था कि जब भी घर में कोई पूजा या कार्यक्रम होता था, तो सुमित्रा देवी सबसे पहले अंजलि को अपने पास बिठाकर अपने हाथों से खाना खिलाती थीं। “मेरी बहू सुबह से काम में लगी है, पहले मेरी बेटी खाएगी, मेहमानों का क्या है, वो तो खाते रहेंगे,” सुमित्रा देवी हमेशा यही कहती थीं। आज उनकी अनुपस्थिति ने अंजलि को इस भीड़ भरे घर में नितांत अकेला कर दिया था।
दिन बीतते गए और सुमित्रा देवी के तेरहवीं (शांति पाठ) का दिन आ गया। इन तेरह दिनों में अंजलि एक मशीन की तरह काम करती रही। रिश्तेदारों का आना-जाना, ब्राह्मणों का भोजन, दान-पुण्य की व्यवस्था—सब कुछ अंजलि ने बिना उफ किए संभाला। उसकी आँखें अंदर धंस गई थीं और चेहरा पीला पड़ गया था। शिवानी और पल्लवी अपने कमरों में मातम मनाती रहीं और अंजलि रसोई की आग में अपने आंसुओं को सुखाती रही।
शांति पाठ के दिन, सभी रिश्तेदार और समाज के लोग इकट्ठा हुए थे। पंडित जी ने विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई। पूजा के बाद एक रस्म थी, जिसमें मृत आत्मा की शांति के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं और गहनों को बेटियों और परिजनों में बांटा जाना था। सुमित्रा देवी के कमरे से उनके संदूक और अलमारियां खोली गईं। उनकी कीमती बनारसी साड़ियां, सोने के कंगन, गले का हार और चांदी के बर्तन बाहर निकाले गए।
बुआ जी ने आगे बढ़कर कहा, “सुमित्रा की ये सब चीज़ें उसकी बेटियों की हैं। शिवानी और पल्लवी, तुम दोनों अपनी माँ की निशानियां आपस में बांट लो।” दोनों बेटियां आंसुओं से भरी आँखों के साथ अपनी माँ की साड़ियां और गहने देखने लगीं। शिवानी ने सोने के कंगन उठा लिए और पल्लवी ने भारी रेशमी साड़ियां। रिश्तेदारों में सुगबुगाहट होने लगी कि देखो, सुमित्रा कितना कुछ छोड़कर गई है।
तभी पंडित जी ने कहा, “इन सब चीज़ों के अलावा, मृतक की आत्मा की शांति के लिए उनका सबसे प्रिय सामान भी किसी योग्य व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए। क्या सुमित्रा जी की कोई ऐसी चीज़ है जिससे उन्हें सबसे ज्यादा लगाव था?”
सब लोग एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। शिवानी ने कहा, “माँ को अपने उन पुराने सोने के झुमकों से बहुत लगाव था, जो नानी ने उन्हें दिए थे। वो तो उन्होंने मुझे ही देने को कहा था।”
तभी भीड़ को चीरते हुए अंजलि आगे आई। उसके हाथों में एक पुरानी सी, फटे कवर वाली डायरी और एक ऊनी शॉल था। ये वही शॉल था जिसे सुमित्रा देवी सर्दियों में दिन-रात ओढ़े रहती थीं। अंजलि ने कांपते हाथों से वह डायरी और शॉल पंडित जी के सामने रख दिया।
“पंडित जी, माँ जी का सबसे प्रिय सामान यह डायरी है जिसमें वे रोज़ रात को भगवान के भजन और अपने मन की बातें लिखती थीं, और यह शॉल जिसे ओढ़कर वे अक्सर मुझे अपने सीने से लगा लिया करती थीं,” अंजलि की आवाज़ पहली बार उस घर में इतनी स्पष्ट और तेज गूंजी थी।
बुआ जी ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा, “बहू! आज के दिन भी तुम अपना हक जताने आ गई? बेटियों का हक होता है माँ की निशानियों पर। ये रद्दी डायरी और पुराना शॉल लेकर तुम क्या साबित करना चाहती हो?”
अंजलि ने सिर उठाया, उसकी आँखों में आंसू थे लेकिन आज उनमें एक अजीब सी चमक और आत्मविश्वास था। “बुआ जी, मैंने कभी माँ जी के गहनों या रेशमी साड़ियों पर अपना हक नहीं जताया। वो सब दीदी लोगों का है और उन्हें ही मुबारक हो। लेकिन मेरी माँ की असली निशानी ये डायरी है, जिसमें उनके विचार, उनके आशीर्वाद और उनकी दुआएं हैं। मैं बस यही चाहती हूँ।”
पंडित जी ने सम्मानपूर्वक वह डायरी उठाई। अचानक उसमें से एक मुड़ा हुआ कागज़ नीचे गिर पड़ा। पंडित जी ने वह कागज़ उठाया और उसे पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते पंडित जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने भरी सभा में वह कागज़ पढ़ने की अनुमति मांगी।
“ये सुमित्रा जी का लिखा हुआ एक पत्र है, जो उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले लिखा था,” पंडित जी ने भारी आवाज़ में पढ़ना शुरू किया:
‘मैं जानती हूँ कि मेरा समय अब पूरा हो रहा है। मेरी दोनों बेटियां, शिवानी और पल्लवी, मेरे कलेजे का टुकड़ा हैं। भगवान उन्हें हमेशा खुश रखे। मैंने अपनी हैसियत के हिसाब से उनके लिए गहने और कपड़े बनवा दिए हैं, जो मेरे जाने के बाद उन्हें दे दिए जाएं। लेकिन, आज मैं एक बात साफ करना चाहती हूँ। दुनिया कहती है कि बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। पर मेरी अंजलि ने इस बात को गलत साबित कर दिया। जब मैं बीमार पड़ी, तो मुझे बिस्तर पर करवट दिलाने से लेकर मुझे अपने हाथों से खाना खिलाने तक, मेरी अंजलि ने मेरे सगे बेटे-बेटियों से बढ़कर मेरी सेवा की है।
मुझे अपनी बेटियों से प्यार है, लेकिन मेरी आत्मा अंजलि में बसती है। मेरे जाने के बाद शायद समाज के लोग उसे मेरी मौत का दुख मनाने का भी समय न दें, क्योंकि उस पर घर संभालने की ज़िम्मेदारी होगी। लोग शायद उसके आंसुओं पर सवाल उठाएं। इसलिए मैं अपनी सबसे कीमती चीज़, अपना ये पुराना शॉल और अपनी डायरी अपनी अंजलि के नाम करती हूँ। ये शॉल जब भी वो ओढ़ेगी, उसे मेरा स्पर्श महसूस होगा। और मेरी अंजलि, तू रोना मत। तेरी माँ हमेशा तेरे साथ है।’
पत्र खत्म होते ही पूरे घर में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे वक़्त ठहर गया हो। शिवानी और पल्लवी के हाथों से गहने और साड़ियां छूटकर नीचे गिर गईं। दोनों दौड़कर अंजलि के गले लग गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। “हमें माफ कर दे भाभी! माँ चली गई और हम सिर्फ अपने दुख में अंधे हो गए। हमने एक बार भी नहीं सोचा कि तुमने भी तो अपनी माँ को खोया है। तुम सुबह से रात तक खटती रही और हमने तुम्हें एक घूंट पानी तक नहीं पूछा।”
बुआ जी, सुधा जी और बाकी सभी रिश्तेदार, जो कुछ देर पहले तक अंजलि पर ताने कस रहे थे, शर्म से अपनी नज़रें झुकाए खड़े थे। उन्हें एहसास हो गया था कि दुख का कोई एक रंग नहीं होता। बेटियां अगर दहाड़ें मारकर अपना दुख व्यक्त करती हैं, तो एक बहू अपने आंसुओं को पीकर, जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने दुख को चुपचाप सहती है।
अंजलि ने वह शॉल अपने कंधों पर ओढ़ लिया। उसे सच में ऐसा लगा जैसे सुमित्रा देवी ने उसे अपने सीने से लगा लिया हो। आज अंजलि खुलकर रो रही थी, लेकिन ये आंसू दर्द के नहीं, उस सम्मान और प्यार के थे जो उसकी सासू माँ ने जाते-जाते उसे दुनिया के सामने दिला दिया था। समाज चाहे जो कहे, लेकिन एक सास और बहू के बीच के उस पवित्र रिश्ते ने आज रूढ़िवादी सोच की हर दीवार को ढहा दिया था। अंजलि जान गई थी कि उसकी माँ कहीं नहीं गई, वह हमेशा के लिए उस डायरी, उस शॉल और सबसे बढ़कर, उसके दिल में हमेशा के लिए अमर हो गई है।
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