सिल्क की साड़ी – सुदर्शन सचदेवा

दुकान में रंग-बिरंगी सिल्क की साड़ियाँ रोशनी में ऐसी दमक रही थीं, मानो इंद्रधनुष धरती पर उतर आया हो। कहीं आसमानी रंग था, कहीं पिस्ता हरा, कहीं बैंगनी, कहीं सुनहरी कढ़ाई वाली रेशमी साड़ी। हर साड़ी अपनी ओर बुला रही थी।

दुकानदार ने मुस्कुराकर पूछा, “मैडम, कौन-सा रंग दिखाऊँ?”

मैंने बिना एक पल गँवाए कहा, “लाल रंग की सिल्क की साड़ी।”

वह मुस्कुराया, “हर बार लाल ही क्यों? आजकल तो लोग पेस्टल शेड्स ज़्यादा पसंद करते हैं।”

मैं भी मुस्कुरा दी, पर उस मुस्कान के पीछे बरसों पुरानी एक कहानी छिपी थी। सच तो यह था कि मुझे लाल रंग की साड़ी पसंद नहीं थी, मुझे तो लाल रंग से जुड़ी वह स्मृति पसंद थी, जो हर बार मेरे मन को माँ की गोद तक पहुँचा देती थी।

मैं तब शायद दस वर्ष की रही होऊँगी। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। माँ के पास गिनती की साड़ियाँ थीं। उनमें से एक लाल सिल्क की साड़ी थी, जिसे वह केवल बहुत विशेष अवसरों पर पहनती थीं—दीवाली, किसी की शादी, या फिर मेरे स्कूल का वार्षिक समारोह।

मुझे आज भी याद है, जब माँ उस साड़ी को अलमारी से निकालतीं, तो सबसे पहले उसे हथेलियों से सहलातीं। फिर धीरे-धीरे उसकी सलवटें ठीक करतीं। ऐसा लगता था जैसे वे कोई कपड़ा नहीं, अपनी सबसे प्यारी यादों को सँवार रही हों।

मैं उनकी पल्लू पकड़कर घूमती रहती। माँ हँसकर कहतीं, “देखना, जब तुम बड़ी हो जाओगी, तब तुम्हारे लिए भी ऐसी ही लाल सिल्क की साड़ी लाऊँगी।”

मैं खिलखिलाकर कहती, “नहीं माँ, आपकी वाली ही पहनूँगी।”

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा। पढ़ाई, नौकरी, विवाह… ज़िंदगी बदलती गई। पर एक दिन ऐसा भी आया, जब माँ हमेशा के लिए आँखों से ओझल हो गईं। उनके जाने के बाद घर की अलमारी खोली गई। कपड़े बाँटे जाने लगे। उसी अलमारी के कोने में तह करके रखी हुई वह लाल सिल्क की साड़ी भी मिली।

मैंने उसे सीने से लगा लिया। उस साड़ी में आज भी माँ की हल्की-सी खुशबू जैसे कहीं छिपी हुई थी। आँसू अनायास बह निकले। लगा जैसे माँ कह रही हों—”रो मत, मैं यहीं हूँ।”

उस दिन मैंने किसी को वह साड़ी छूने तक नहीं दी। वह मेरे लिए रेशम का कपड़ा नहीं, माँ के स्पर्श की आख़िरी निशानी थी।

सालों बाद जब भी किसी दुकान में जाती हूँ और रंग-बिरंगी साड़ियाँ देखती हूँ, मेरी नज़र सबसे पहले लाल रंग पर ही ठहर जाती है। लोग समझते हैं कि यह मेरी पसंद है, लेकिन उन्हें क्या पता कि यह रंग मेरे जीवन का सबसे अनमोल रिश्ता समेटे हुए है।

लाल रंग मुझे सुहाग का नहीं, माँ के त्याग का प्रतीक लगता है। उसमें मुझे उनकी ममता दिखाई देती है, उनका संघर्ष दिखाई देता है, उनके अधूरे सपने दिखाई देते हैं। उस लाल रंग में मेरे बचपन की हँसी है, त्योहारों की रौनक है, रसोई से आती खीर की खुशबू है और माँ की हथेली का स्नेह है।

मैंने अपने जीवन में कई महँगी साड़ियाँ खरीदीं, पर हर बार लाल रंग ही चुना। लोग कहते हैं, “तुम्हारे पास तो पहले से इतनी लाल साड़ियाँ हैं।”

मैं मुस्कुरा देती हूँ।

कैसे बताऊँ कि मैं साड़ियाँ नहीं खरीदती, हर बार माँ की एक नई याद घर ले आती हूँ।

आज मेरी बेटी भी बड़ी हो गई है। पिछले सप्ताह उसने मेरी अलमारी खोलकर पूछा, “माँ, आपको लाल रंग ही इतना क्यों पसंद है?”

मैंने उसे वह पुरानी लाल सिल्क की साड़ी दिखाई। उसकी तह खोलते हुए मेरी आँखें भीग गईं।

मैंने कहा, “बेटी, कुछ रंग आँखों को अच्छे लगते हैं, और कुछ रंग आत्मा में बस जाते हैं। यह लाल रंग मेरे लिए सिर्फ़ रंग नहीं, मेरी माँ की मुस्कान है।”

बेटी ने साड़ी को माथे से लगाया और धीरे से बोली, “माँ, अब समझ गई… कुछ विरासतें सोने-चाँदी की नहीं होतीं, भावनाओं की होती हैं।”

उसकी बात सुनकर लगा जैसे माँ कहीं दूर बैठी मुस्कुरा रही हों।

उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि लाल रंग की असली चमक रेशम में नहीं होती, वह उन रिश्तों में होती है जो समय बीत जाने पर भी कभी फीके नहीं पड़ते। सच तो यह है कि हर सिल्क की साड़ी सुंदर होती है, लेकिन जिस साड़ी में अपनों का प्यार, त्याग और स्मृतियाँ बुनी हों, वही जीवन की सबसे अनमोल साड़ी बन जाती है।

कभी-कभी लोग पूछते हैं, “तुम्हें लाल रंग इतना क्यों पसंद है?”

मैं मुस्कुरा देती हूँ। क्या कहूँ उनसे? यह पसंद आँखों ने नहीं चुनी, इसे तो मेरे दिल ने संजोया है।

मेरे लिए लाल रंग किसी फैशन का रंग नहीं, माँ के आँचल का रंग है। उस सिंदूरी बिंदी का रंग है, जिसे लगाकर वह पूरे घर में उजाला बिखेर देती थीं। उस साड़ी का रंग है, जिसके पल्लू से उन्होंने न जाने कितनी बार मेरे आँसू पोंछे, मेरे माथे का पसीना सुखाया और मेरे सपनों को सहलाया।

आज माँ साथ नहीं हैं, पर जब भी मैं लाल सिल्क की साड़ी पहनती हूँ, आईने में अपना चेहरा नहीं देखती। मुझे लगता है जैसे मेरे पीछे खड़ी माँ मुस्कुरा रही हैं और कह रही हैं—”देख, तुझ पर भी लाल रंग कितना खिलता है।”

उस पल मेरी आँखें नम हो जाती हैं, लेकिन होंठ मुस्कुरा उठते हैं। क्योंकि कुछ लोग दुनिया से चले जाने के बाद भी कहीं नहीं जाते। वे हमारी यादों में, हमारी आदतों में, हमारी पसंद में और हमारी हर मुस्कान में बस जाते हैं।

शायद इसलिए… रंग तो दुनिया में हजार हैं, मगर मेरी अलमारी में आज भी सबसे ख़ास जगह लाल सिल्क की साड़ी की ही है।❤️❤️

सुदर्शन सचदेवा

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