मीरा का विवाह हुए चार वर्ष बीत चुके थे। इन चार सालों में उसने अपने ससुराल को इस कदर अपना लिया था कि मायके की यादों को उसने दिल के एक कोने में कहीं बहुत गहरे समेट कर रख दिया था। दिल्ली के इस बड़े से घर में हर कोई मीरा के काम और उसके सलीके की तारीफ करता नहीं थकता था। उसकी सास, सुमित्रा जी, का रुतबा पूरे घर में चलता था और मीरा उनकी हर आज्ञा का पालन एक आदर्श बहू की तरह करती थी। सुमित्रा जी का मायका और उनके नाते-रिश्तेदार अक्सर इस घर में आते-जाते रहते थे। कभी सुमित्रा जी की बहनें (मीरा की मौसी सास) गर्मियों की छुट्टियां बिताने आ जातीं, तो कभी उनकी ननदें शहर में खरीदारी या इलाज के बहाने हफ्तों तक यहीं डेरा डाले रहतीं।
मीरा के लिए यह सब बहुत सामान्य था। वह सुबह पाँच बजे उठकर मौसी सास के लिए बिना चीनी की चाय बनाती, ननद के बच्चों के लिए उनकी फरमाइश का नाश्ता तैयार करती और सुमित्रा जी की सहेलियों के आने पर तरह-तरह के पकवान बनाकर उनकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ती। मीरा के इस निस्वार्थ सेवा भाव को देखकर सभी कहते कि सुमित्रा जी को तो साक्षात अन्नपूर्णा और श्रवण कुमार जैसी बहू मिल गई है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक बहुत बड़ा और खामोश खालीपन था, जिसे सिर्फ मीरा की आँखें ही देख पाती थीं। इन चार सालों में, मीरा के मायके से कभी कोई उसके घर आकर नहीं रुका था। ऐसा नहीं था कि मीरा के माता-पिता उससे प्यार नहीं करते थे या वे बहुत दूर रहते थे। वे पास के ही शहर में रहते थे, लेकिन जब भी आते, बस दो-तीन घंटे के लिए ही आते। वे ड्राइंग रूम के सोफे के किनारे पर संकोच से बैठे रहते, सुमित्रा जी और मीरा के पति समीर से औपचारिक बातें करते, मीना के हाथ की बनी चाय पीते और शाम ढलने से पहले ही यह कहकर निकल जाते कि “अरे नहीं समधिन जी, बेटी के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए, रात रुकना तो बहुत दूर की बात है।”
मीरा का दिल उस वक्त अंदर ही अंदर रो पड़ता था। वह देखती थी कि कैसे मौसी सास और ननदें इस घर में अपने पूरे अधिकार के साथ रहती हैं, डाइनिंग टेबल पर जोर-जोर से हंसती हैं और घर के हर फैसले में अपनी राय देती हैं। वहीं, जिन माता-पिता ने मीरा को जन्म दिया, उसे पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाया, वे उसी के घर में एक अजनबी और सहमे हुए मेहमान की तरह आते थे। क्या शादी के बाद बेटी के घर पर माता-पिता का कोई हक नहीं रह जाता?
एक बार सुमित्रा जी की छोटी बहन, कांता मौसी, अपने घुटनों के इलाज के लिए पूरे एक महीने के लिए उनके घर आकर रुकीं। मीरा दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहती। इसी दौरान मीरा को हल्का बुखार आ गया। बेटी की तबीयत खराब होने की खबर सुनकर मीरा के बूढ़े माता-पिता उससे मिलने आए। वे अपने साथ मीरा की पसंद के फल और घर की बनी कुछ मिठाइयां लाए थे। हमेशा की तरह, वे हाल-चाल पूछकर और थोड़ी देर बैठकर वापस जाने के लिए खड़े हो गए।
तभी सोफे पर आराम से बैठी कांता मौसी ने एक ऐसा तंज कसा, जिसने मीरा के सब्र का बांध तोड़ दिया। मौसी ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “क्या बात है समधी जी, आप लोग तो आते हैं और ऐसे भागते हैं जैसे हम यहाँ आपको काट खाने को बैठे हों। अपनी ही बेटी का घर है, कभी दो-चार दिन रुकिए। या फिर आपको हमारी खातिरदारी पर शक है? देखिए, मेरी बहन का घर मेरे लिए तो मेरे मायके जैसा ही है, मैं तो महीने भर से मजे से रह रही हूँ।”
मीरा के पिता ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया और फीकी हँसी हँसते हुए बोले, “नहीं बहन जी, ऐसी कोई बात नहीं है। बस… बेटी के घर ज्यादा बोझ नहीं बनना चाहिए। दामाद जी को असुविधा होगी।”
यह सुनकर मीरा के सीने में जैसे किसी ने खंजर घोंप दिया हो। असुविधा? किस बात की असुविधा? जब ससुराल के दर्जनों लोग हफ्तों यहाँ रहते हैं, तब तो किसी को असुविधा नहीं होती। जब वह रात के बारह बजे तक रसोई में सबके लिए रोटियां सेंकती है, तब तो कोई नहीं सोचता कि उसे असुविधा होगी। फिर उसके बूढ़े माता-पिता के एक रात रुकने से घर का नियम कैसे टूट जाएगा?
जैसे ही मीरा के पिता ने अपना झोला उठाया और दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया, मीरा अचानक उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें लाल थीं और बुखार से तपते शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा आ गई थी।
“पापा, आज आप लोग कहीं नहीं जाएंगे,” मीरा की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और दृढ़ता थी कि पूरा कमरा सन्न रह गया।
सुमित्रा जी ने आँखें तरेरते हुए कहा, “ये क्या ज़िद है बहू? समधी जी को देर हो रही है, उन्हें जाने दो। उनका अपना घर है।”
मीरा पलटी और सुमित्रा जी की आँखों में सीधा देखते हुए बोली, “माँ जी, क्या यह मेरा घर नहीं है? जब कांता मौसी यहाँ आती हैं, तो इस घर की रौनक बढ़ जाती है। मुझे उनकी सेवा करने में कोई परेशानी नहीं होती, क्योंकि मैं उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानती हूँ। लेकिन जब मेरे माता-पिता यहाँ आते हैं, तो उन्हें पराया क्यों महसूस कराया जाता है? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं एक बेटी हूँ?”
समीर भी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, “मीरा, तुम ये क्या कह रही हो? पापा जी को बुरा लगेगा।”
“बुरा तो मुझे लग रहा है समीर,” मीरा के आंसुओं ने अब उसकी आँखों की दहलीज पार कर ली थी। “इन चार सालों में मैंने इस घर को अपना खून-पसीना दिया है। मैंने इस घर की हर ईंट को अपने प्यार से जोड़ा है। अगर एक बेटे के घर पर उसके माता-पिता का हक होता है, तो एक बेटी के घर पर उसके माता-पिता का हक क्यों नहीं हो सकता? ‘बेटी के घर का पानी नहीं पीते’—यह कैसा खोखला आदर्श है माँ जी? जो बेटी अपना सब कुछ छोड़कर इस घर को संवार रही है, क्या उसके माता-पिता उस छत के नीचे एक रात चैन की नींद नहीं सो सकते जिसे उनकी बेटी ने अपना जीवन दिया है?”
कमरे में एक भारी खामोशी छा गई। कांता मौसी के चेहरे का रंग उड़ चुका था। सुमित्रा जी अवाक रह गई थीं। उन्होंने पहली बार मीरा के इस रूप को देखा था—एक आज्ञाकारी बहू के पीछे छिपी एक आहत बेटी। मीरा के पिता की आँखों से भी बेतहाशा आंसू बह रहे थे। वे अपनी बेटी के इस दर्द को समझ तो रहे थे, लेकिन समाज की बेड़ियों ने उनके होंठ सिल रखे थे।
समीर ने गहरी सांस ली। उसे अपनी गलती और समाज के इस दोहरेपन का गहरा एहसास हुआ। वह आगे बढ़ा और उसने अपने ससुर के हाथों से झोला ले लिया। “मीरा बिल्कुल सही कह रही है पापा जी। यह घर जितना मेरा और माँ का है, उतना ही मीरा का भी है। और इस नाते यह आपका भी घर है। आज से यह ‘बेटी के घर का पानी नहीं पीना’ वाला नियम इस घर में नहीं चलेगा। आपको रुकना होगा, आज भी और आगे भी।”
सुमित्रा जी की भी अंतरात्मा जाग उठी थी। उन्होंने आगे बढ़कर समधन के हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दीजिए। सदियों से चली आ रही इन झूठी रस्मों ने हमारी सोचने की शक्ति ही खत्म कर दी थी। आज मेरी बहू ने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह आपकी ही बेटी का घर है, और यहाँ आपका पूरा अधिकार है।”
उस रात, मीरा ने बुखार के बावजूद अपने हाथों से अपने माता-पिता के लिए खाना बनाया। जब उसने अपने पिता को अपने ही डाइनिंग टेबल पर सुकून से खाना खाते और अपनी माँ को अपने घर के एक कमरे में चैन से सोते देखा, तो उसे लगा जैसे आज उसका विवाह सही मायनों में पूरा हुआ हो। आज वह सिर्फ इस घर की बहू नहीं थी, बल्कि इस घर की मालकिन बन गई थी, जिसने अपने माता-पिता के लिए उनका खोया हुआ सम्मान और अधिकार वापस पा लिया था।
क्या आपको भी लगता है कि समाज के इस पुराने नियम को अब बदल जाना चाहिए? क्या एक बेटी के माता-पिता का अपनी बेटी के घर पर कोई अधिकार नहीं होता? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।
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