कन्यादान

मास्टर दीनानाथ की बड़ी बेटी सुरभि की हल्दी थी। दीनानाथ जी पेशे से एक ईमानदार शिक्षक थे और जीवन भर की पूंजी लगाकर उन्होंने अपनी दोनों बेटियों, सुरभि और नव्या को उच्च शिक्षा दिलाई थी। सुरभि एक जानी-मानी आर्किटेक्ट थी, और नव्या अभी वकालत की पढ़ाई कर रही थी। दीनानाथ जी का हमेशा से यह मानना था कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं, और उन्होंने अपनी बेटियों की परवरिश भी बिल्कुल उसी सांचे में की थी। सुरभि का रिश्ता शहर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी, सेठ गिरधारी लाल के बेटे आकाश से तय हुआ था। शुरुआत में सब कुछ बहुत ही आदर्श लग रहा था। गिरधारी लाल ने बड़े मीठे शब्दों में कहा था कि उन्हें तो बस एक पढ़ी-लिखी, संस्कारी बहू चाहिए, जो उनके घर को रोशन कर सके। उन्हें मास्टर जी से एक पैसे की भी चाहत नहीं है।

लेकिन, जैसे-जैसे शादी की तारीख नजदीक आती गई, गिरधारी लाल के मीठे शब्दों के पीछे छिपा लालच बाहर आने लगा। तिलक की रस्म के ठीक एक दिन पहले, गिरधारी लाल अपने कुछ खास रिश्तेदारों के साथ मास्टर दीनानाथ के घर पहुंचे। बैठक में चाय-नाश्ते के दौरान उन्होंने बड़ी ही चालाकी से बात घुमाई। उन्होंने कहा, “मास्टर जी, वैसे तो हमें कुछ नहीं चाहिए, लेकिन आजकल समाज में नाक बनाए रखना भी जरूरी है। हमारे यहाँ हर रिश्तेदार महंगी गाड़ियों में आता है। आकाश के लिए अगर एक बड़ी एसयूवी (SUV) गाड़ी और शहर वाले फ्लैट की चाबी आप अपनी खुशी से दे दें, तो रिश्तेदारों में हमारी भी इज्जत रह जाएगी। आखिर ये सब आप अपनी ही बेटी को तो दे रहे हैं।”

ये शब्द दीनानाथ जी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। उन्होंने जीवन भर ईमानदारी की रोटी खाई थी। शादी के बाकी खर्चों के लिए ही उन्होंने अपना प्रोविडेंट फंड तक निकाल लिया था। अब इस नई मांग को पूरा करना उनके लिए असंभव था। उन्होंने हाथ जोड़कर गिरधारी लाल को अपनी हैसियत का वास्ता दिया और कहा कि वे अपनी हैसियत से बढ़कर शादी में खर्च कर रहे हैं, लेकिन इतनी बड़ी मांग पूरी नहीं कर पाएंगे। इस पर गिरधारी लाल की पत्नी तमतमाते हुए बोलीं, “मास्टर जी, बेटी का बाप होकर इतनी अकड़ अच्छी नहीं होती। अगर हमारी ये छोटी सी बात नहीं मान सकते, तो हम भी यह बारात आपके दरवाजे पर लाने को मजबूर नहीं हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। दरवाजे के पीछे खड़ी सुरभि ने सब कुछ सुन लिया था। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन वो आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस अपमान के थे जो उसके पिता को सहना पड़ रहा था। वो तेजी से कदम बढ़ाती हुई बैठक में आ गई। दीनानाथ जी ने अपनी बेटी का तमतमाता चेहरा देखा, और उसी पल उनके अंदर का वो लाचार पिता, जो समाज के डर से दब रहा था, अचानक एक शेर की तरह जाग उठा। उन्होंने सुरभि के कंधे पर हाथ रखा और उसकी आंखों में देखा। उन्हें अपनी ही दी हुई वो शिक्षा याद आ गई जिसमें उन्होंने अपनी बेटियों को कभी सिर न झुकाना सिखाया था। आज अगर वो झुक जाते, तो उनकी बेटी जीवन भर उस घर में सिर उठाकर नहीं जी पाती।

दीनानाथ जी सीधे खड़े हुए। उनकी आंखों में अब कोई मजबूरी या डर नहीं था। उन्होंने गिरधारी लाल और उनके रिश्तेदारों की तरफ देखा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “गिरधारी लाल जी, आपने सच कहा। मैं अपनी हैसियत के हिसाब से अपनी बेटी को विदा कर रहा था, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा था कि आप मेरी बेटी को नहीं, बल्कि मेरे बैंक बैलेंस को अपनी बहू बनाना चाहते हैं। जो लोग आज एक गाड़ी और एक फ्लैट के लिए मेरी बेटी का सौदा कर रहे हैं, वो कल को किसी और चीज के लिए मेरी बेटी को जलील नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है?”

गिरधारी लाल गुस्से से लाल-पीले हो गए। उन्होंने कहा, “मास्टर जी, आप होश में तो हैं? अगर यह रिश्ता टूट गया तो आपकी बेटी कुंवारी बैठी रह जाएगी। समाज में कोई उससे शादी नहीं करेगा। सोच-समझकर बोलिए!”

दीनानाथ जी के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों, सुरभि और नव्या को अपने दोनों तरफ खड़ा किया और एक ऐसी दहाड़ के साथ बोले जिसने उस बैठक के सन्नाटे को चीर कर रख दिया, “एक बात और जान लो और सुन लो हमारी, बेटियाँ हमारा गुरूर हैं वो जब जिससे कहेंगी और जहाँ हमारी बेटियों को सम्मान मिलेगा वहीं होगा उनका ब्याह वो भी बिना दहेज के, यही हमारा अंतिम फैसला है।”

यह सुनते ही गिरधारी लाल और उनके रिश्तेदार वहां से पैर पटकते हुए उठकर चले गए। घर में कोहराम मच गया। कुछ पुराने ख्यालात के रिश्तेदार मास्टर जी को कोसने लगे कि उन्होंने अपनी ऐंठ में अपनी ही बेटी का घर उजाड़ दिया। लेकिन दीनानाथ जी ने किसी की परवाह नहीं की। उन्होंने मुड़कर सुरभि को देखा। सुरभि ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले से लगा लिया और फफक-फफक कर रो पड़ी। उसने रोते हुए कहा, “पापा, मुझे आप पर गर्व है। आपने मुझे उस घर में जाने से बचा लिया जहां मेरी कोई कीमत नहीं थी।”

नव्या ने भी अपनी बहन और पिता को गले लगा लिया। मास्टर दीनानाथ के लिए वह पल किसी भी कन्यादान से बहुत बड़ा था। उन्होंने आज अपनी बेटी का हाथ किसी लालची के हाथ में सौंपने के बजाय, उसका हाथ उसके खुद के स्वाभिमान के साथ बांध दिया था। उस दिन उस घर में शादी की शहनाइयां तो नहीं बजीं, लेकिन एक पिता और उसकी बेटियों के अटूट विश्वास और स्वाभिमान का ऐसा विजयनाद गूंजा, जिसे शायद ही वो समाज कभी भूल पाएगा।

आपकी क्या राय है?

एक पिता के रूप में मास्टर दीनानाथ का यह फैसला आपको कैसा लगा? क्या समाज के डर से बेटियों को ऐसे घरों में ब्याह देना सही है जहाँ केवल दहेज को ही सम्मान माना जाता है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लेखिका : स्वाति शुक्ला

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