मुझे माफ कर दो नीरजा

फोन की घंटी बजी तो सुलोचना जी ने जल्दी से गैस की आंच धीमी की और पल्लू से हाथ पोंछते हुए फोन उठाया। स्क्रीन पर लंदन का नंबर चमक रहा था। सुलोचना जी के चेहरे पर एकाएक एक मीठी सी मुस्कान तैर गई। “हैलो विकास बेटा, जीते रहो! कैसे हो तुम? आज चार महीने बाद लंदन से अपनी इस माँ की याद कैसे आ गई? वहां पहुँचकर तो तुम दोनों ऐसे खो गए कि तुमने पलटकर हमारी खबर ही नहीं ली,” सुलोचना जी ने एक प्यार भरे उलाहने के साथ बात शुरू की। उन्हें उम्मीद थी कि दामाद भी उसी गर्मजोशी से जवाब देगा, लेकिन दूसरी तरफ से किसी दुआ-सलाम या औपचारिकता की कोई आवाज नहीं आई।

विकास की आवाज में एक अजीब सा रूखापन और खीज थी। उसने बिना कोई भूमिका बांधे सीधे मुद्दे की बात कह डाली, “मम्मी जी, आपकी बेटी ने तो घर को जैसे कोई होटल समझ लिया है। वो आजकल घर का खाना ही नहीं बनाती।”

सुलोचना जी एक पल के लिए ठिठक गईं। उनकी मुस्कान गायब हो गई और दिल में एक अजीब सी घबराहट होने लगी। “क्या मतलब बेटा? क्या मेरी नीरजा की तबीयत तो ठीक है? उसे कोई परेशानी तो नहीं है?” एक माँ का चिंतित हृदय तुरंत अनहोनी की आशंका से भर उठा।

“तबीयत को क्या होना है मम्मी जी! वो बिल्कुल भली-चंगी है,” विकास ने चिढ़ते हुए कहा। “बस उसे अब अपनी नौकरी और लैपटॉप के अलावा कुछ नहीं दिखता। मैं भी तो दिन भर ऑफिस में खटता हूँ, दिमाग खपाता हूँ। लेकिन जब शाम को थका-हारा बर्फबारी में घर आता हूँ, तो उम्मीद करता हूँ कि कम से कम अपनी पत्नी के हाथ का बना दो रोटी और गर्म दाल मिल जाए। पर आपकी लाडली या तो मुझे सैंडविच पकड़ा देती है या फिर बाहर से कुछ ऑर्डर कर देती है। आखिर एक आदमी कितनी बार बाहर का खाना खाए? मेरी भी तो कोई बर्दाश्त की सीमा है। आप ही समझाइए अपनी बेटी को कि शादीशुदा जिंदगी ऐसे नहीं चलती।” विकास की शिकायतें किसी टूटे हुए बांध के पानी की तरह बह रही थीं।

फोन के इस पार कुछ देर के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। विकास को लगा कि शायद नेटवर्क चला गया है। “हैलो? मम्मी जी, आप सुन रही हैं न?”

“हाँ बेटा, मैं सुन रही हूँ,” सुलोचना जी की आवाज अब बेहद शांत, लेकिन असाधारण रूप से गंभीर थी। “विकास, जब तुम पहली बार हमारे घर नीरजा का हाथ मांगने आए थे, तो तुमने क्या कहा था? तुमने कहा था कि तुम्हें एक जीवनसाथी चाहिए, कोई गृहणी नहीं जो सिर्फ घर संभाले। तुमने ही नीरजा का हौसला बढ़ाया था कि वो लंदन जाकर भी अपने आईटी करियर को जारी रखे। याद है तुम्हें?”

“हाँ मम्मी जी, वो सब ठीक है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वो घर की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ ले,” विकास ने अपनी सफाई दी।

“बेटा, जिम्मेदारियां सिर्फ एक तरफा नहीं होतीं,” सुलोचना जी ने गहरी सांस ली। “तुम अपने सपनों के शहर लंदन गए, जहाँ तुम्हारा ऑफिस है, तुम्हारे कलीग्स हैं, तुम्हारी जानी-पहचानी दुनिया का विस्तार है। पर नीरजा? नीरजा ने तुम्हारे सपनों के लिए अपनी पूरी दुनिया छोड़ दी। अपना देश, अपना शहर, अपने दोस्त और अपना वो घर जहाँ उसे एक गिलास पानी भी खुद नहीं लेना पड़ता था। वहां न तो उसकी मदद के लिए कोई कामवाली है, न बात करने के लिए कोई सहेली। वो उस अंजान देश में, उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में नौ घंटे ऑफिस का काम करती है और फिर तुम चाहते हो कि वो मशीन की तरह रसोई में जाकर तुम्हारी थकान मिटाने के लिए पकवान बनाए?”

विकास के पास कोई जवाब नहीं था। वो चुपचाप फोन कान से लगाए सुन रहा था।

सुलोचना जी की आवाज में अब एक हल्का सा कंपन था, “बेटा, कल ही मेरी नीरजा से बात हुई थी। वो फोन पर फूट-फूट कर रो रही थी। कह रही थी कि वो डिप्रेशन में जा रही है। उसे होमसिकनेस हो गई है। जब वो ऑफिस की थकान से टूटकर गिरती है, तो उसे एक कप चाय बनाकर देने वाला कोई नहीं होता। वो बाहर से खाना इसलिए नहीं मंगाती कि वो कामचोर है, बल्कि इसलिए मंगाती है क्योंकि उसके अंदर खड़े होने की भी हिम्मत नहीं बचती। और तुम… तुम उसके उस मानसिक संघर्ष को, उसके अकेलेपन को समझने के बजाय, उसे उसकी बनाई हुई रोटियों से तौल रहे हो? दांपत्य जीवन एक दो-पहिया गाड़ी है विकास। जब एक पहिया धंसने लगे, तो दूसरे को जोर लगाना पड़ता है, शिकायत नहीं करनी पड़ती।”

सुलोचना जी ने फोन काट दिया। लेकिन उनकी बातें विकास के दिमाग में किसी हथौड़े की तरह गूंज रही थीं। उसने मुड़कर बेडरूम की तरफ देखा। नीरजा लैपटॉप गोद में रखे हुए ही बिस्तर पर सो गई थी। उसके चेहरे पर थकान के गहरे निशान थे और आँखों के नीचे हल्के काले घेरे पड़ गए थे। पहली बार विकास ने उस अजनबीपन और उस डर को महसूस किया जो नीरजा इतने महीनों से अकेले सह रही थी। उसे खुद पर बेहद शर्म आई।

बिना कोई शोर किए, विकास ने नीरजा की गोद से लैपटॉप हटाकर टेबल पर रखा और उसे अच्छे से कंबल ओढ़ा दिया। वह दबे पाँव रसोई में गया। उसने कभी ठीक से खाना नहीं बनाया था, लेकिन आज उसने इंटरनेट पर देखकर खिचड़ी चढ़ाई और साथ में कड़क अदरक वाली चाय बनाई।

जब कुकर की सीटी बजी, तो नीरजा हड़बड़ा कर उठी। वह भागती हुई रसोई में आई, “अरे विकास, तुम आ गए? मुझे नींद आ गई थी, तुमने मुझे उठाया क्यों नहीं? मैं अभी कुछ…”

नीरजा की बात बीच में ही रह गई जब उसने देखा कि विकास ने डाइनिंग टेबल पर प्लेटें लगा दी हैं और दो कप चाय से भाप उठ रही है। विकास ने आगे बढ़कर नीरजा के दोनों हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दो नीरजा। मैं तुम्हारा पति कम और एक स्वार्थी बॉस ज्यादा बन गया था। मैंने तुम्हारे हिस्से की परेशानी को कभी समझा ही नहीं। आज के बाद इस घर की रसोई सिर्फ तुम्हारी नहीं, हमारी होगी।”

नीरजा की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन यह आँसू थकान के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जो अपनों के साथ खड़े होने पर मिलता है। बाहर लंदन की सर्द हवाएं चल रही थीं, लेकिन उस छोटे से फ्लैट के अंदर आज पहली बार एक असली घर की गर्माहट महसूस हो रही थी।

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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