ये इस घर की *कुलकलंकिनी* नहीं है। साहिल ने रीमा का हाथ पकड़ते हुए बोला।
तो फिर क्या है? उनकी मां ने गुस्से में बोला।
साहिल बोला “आप लोग हर बार दीदी से ऐसे क्यों बात करते हो, और आखिर वेस्टर्न कपड़े पहन ने से कोई कुलकलंकिनी कैसे हो सकता है?” साहिल ने अपनी मां को बोला।
“ये सब कपड़ों की वजह से ही होता है, जो आए दिन हमारे घर के पास लड़के घूमते रहते है, सब इसकी वजह से है और कुछ नहीं है।”
अपनी बात पूरी करते हुए उनकी मां बोली “जब खुद सुनोगे की गली वाले क्या क्या बोलते रहते है रीमा के बारे में तब तुझे समझ आएगा।”
साहिल ने थोड़ी ऊंची आवाज में बोला “मां, लोगों का काम है, बातें करना, कीचड़ उछालना और दूसरों को ताकते रहना और कमियां निकालते रहना लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं ना कि हम अपनी मर्जी से जीना छोड़ देंगे।”
उनकी मां बोली “बस अब बहुत हो गया, मुझे कुछ नहीं सुनना। मैने कह दिया मतलब कह दिया।”
साहिल बोलने ही वाला था कि रीमा ने रोक लिया और फिर मां के जाने के बाद बोली “साहिल, मेरा हमेशा से साथ देने के लिए शुक्रिया, पर मुझे नहीं लगता कि मां कभी समझेगी। उनको बस इसी चीज से फर्क पड़ता है कि दुनिया क्या सोच रही है। उनको मेरे ज़सबात से कोई मतलब नहीं है।”
साहिल ने अपनी बहन को गले लगाते हुए बोला “दीदी, देखना मैं कोई ना कोई तरीका ढूंढ लूंगा कि जिससे मां को समझ आ जाएगा कि कपड़ों की कोई गलती नहीं होती है और ना ही किसी आज की लड़की की, कमी है तो उनकी जिनकी नीयत ही खराब होती है।”
इस सब के बाद रीमा अपने ऑफिस चली गई और साहिल अपना कॉलेज। उन दोनों के पिताजी के जाने के बाद उनकी मां ने ही उन्हें संभाला था लेकिन सबसे ज्यादा साहिल को रीमा का और रीमा को साहिल का था। रोज़ रोज़ किसी ना किसी बात पर घर में कलेश होता रहता था, जिससे कई बार बचने के लिए वो दोनों घर भी देर से आते थे।
एक दिन साहिल ने देखा कि कोई लड़की जा रही है और सूट सलवार में है लेकिन फिर भी लड़के उसे छेड़ रहे है। साहिल ने उस लड़की की मदद की और उन लड़कों को पुलिस के हवाले करवाया।
घर आते आते, साहिल के दिमाग में एक तरकीब आई।
कुछ के बाद उसकी वो तरकीब करने का मौका भी मिला।
उनकी मां को बाजार जाना था तो उन्होंने रीमा को बुलाया और वो रीमा को देख कर हैरान हो गई, वो बुर्के में थी। उसकी मां ने बोला “ये क्या पहना है तुमने?”
उधर से रीमा बोली “आपने ही तो बोला था कि पूरे कपड़े पहन ने चाहिए, अब आपको कोई भी पड़ोसी कुछ नहीं बोलेगा।”
उनकी मां को देरी हो रही थी इसीलिए उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और वो बाजार चले गए।
वहां बाजार में एक जगह दोनों सब्ज़ी लेने रुके थे। तभी वहां पर बाइक पर एक लड़का आया और रीमा को छेड़ने की कोशिश की, तब भी उसकी मां ने उसी को बोला “देख ले तेरी वजह से अब ये बाजार में छेड़ने लग गए है।” तभी उस से आगे कुछ उसकी मां बोले उस से पहले ही रीमा ने बुर्खा ऊपर किया और उसकी मां और वहां पर खड़े सब यह देख कर ढंग रह गए कि वो रीमा नहीं साहिल था जो बुरखे में था।
उसकी मां का सर और वहां पर और सभी लोगों का सर झुक गया और तब उसकी मां को एहसास हुआ कि वो इतने समय से रीमा के साथ गलत करती आ रही थी।
साहिल ने सारी बात अपनी मां को बताई और बोला “मां, अब तो आपको समझ आ गया होगा ना कि गलती दीदी की नहीं थी न ही उनके कपड़ों की।” आज मैं था आपके साथ लेकिन उनको क्या लगा कि बुरका पहना है तो लड़की ही होगी, जिस से पता चलता है कि लोगों की सोच में कमी है।
उनकी मां को अपने कहे हर शब्दों पर पछतावा था और उन्होंने रीमा से माफी भी मांगी और फिर कभी आगे से नहीं टोका बस सावधानी रखने को कहा।
साथ ही में अब जब भी कोई मोहल्ले वाले बोलते तो वो हमेशा अपनी बेटी की ढाल बनकर आगे रहती और रीमा को पूरी आजादी दी कि वो अपने तरीके से जिंदगी जिये।
लेखिका
तोषिका