कुलकलंकिनी – बीना शुक्ला अवस्थी

पूरे गांव में  हलचल मची थी। लोग डॉक्टर दामिनी को देखने दौड़े आ रहे थे। अस्पताल के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी, सब एक झलक दामिनी को देखना चाहते थे लेकिन अस्पताल में पता नहीं क्यों आज पुलिस लगा दी गई थी और डॉक्टर दामिनी कुर्सी पर बैठी कई वर्ष पीछे जाकर गुम हो गई थीं।

हाई स्कूल तक पढ़ाई करने के बाद ही दामिनी की पढ़ाई बन्द करवा दी गई। उसके गांव में आगे का स्कूल था ही नहीं। 

स्कूल के अध्यापकों ने घर आकर भी सबको समझाने की बहुत कोशिश की – ” आजकल लड़कियों के आगे बढ़ने के तमाम रास्ते खुल गये हैं। इसकी प्रतिभा को ऐसे बरबाद मत करिये, आप लोगों का नाम रोशन करेगी।” 

” हमें नहीं नाम रोशन करवाना है, इतना पढ लिया बहुत है। अब जल्दी से जल्दी शादी करेंगे, वहॉ जाकर जो मन आये करे।” पिता से पहले भाई बोल पड़ा।

उसकी कक्षाध्यापिका रुचिरा ने उसे सहलाते हुये कहा – ” मेरे मम्मी पापा कानपुर में रहते हैं। आप सहमति दें तो यह उनके पास रहकर पढ़ लेगी। इसके नम्बर इतने अच्छे हैं कि इसे छात्रवृत्ति मिल जायेगी। आप लोगों को खर्चे की चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी।” 

” सयानी लड़की को हम अकेले अपने रिश्तेदारों के यहॉ नहीं भेजते हैं। फिर किसी दूसरे के घर क्यों भेजें? हमें समाज में अपनी नाक नहीं कटवानी है? कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन जवाब देगा?” 

” इसका भविष्य मत बरबाद कीजिये।” 

” बेटी मेरी है, उसके भविष्य के बारे में हमसे अच्छा कोई नहीं सोच सकता? आप जाइये और मेरी लड़की को बरगलाने की कोशिश मत करिये।”

उसके बाद भी रुचिरा ने बहुत प्रयत्न किया तो उसे अपमानित करके घर से भगा दिया गया और दामिनी की शीघ्र शादी के लिये लड़का देखा जाने लगा।

दामिनी का आगे पढ़ने का बहुत मन था लेकिन पिता और भाई के साथ ही मॉ और दादी ने भी उसकी इच्छा को कोई महत्व नहीं दिया – ” इतना पढ लिया बहुत है। कौन सा पढ लिखकर कलक्टर बन जायेगी। गांव की सभी लड़कियां इतना ही पढ़ी हैं। तुम कोई अनोखी नहीं हो। घर के काम धन्धे सीखो, वही काम आयेगा नहीं तो हम लोगों की नाक कटेगी।” 

दामिनी रोकर रह गई, क्या करती? शीघ्र ही उसकी शादी प्रदीप से हो गई। कीर्ति ने भी अपने मन को मारकर नियति को स्वीकार कर लिया। 

प्रदीप के घर में दो भाई थे। कम उम्र में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण संदीप ही घर का मुखिया बन गया। प्रदीप संदीप से आठ वर्ष छोटा था। पिता की मृत्यु के समय वह केवल दस वर्ष का था। उसके लिये उसके भइया ही सब कुछ थे। पिता की छाया से वंचित प्रदीप को इतना प्यार दुलार दिया गया कि वह हमेशा अपने को बच्चा ही समझता रह गया। उस पर कभी कोई जिम्मेदारी डाली ही नहीं गई। 

वह छोटा दुलारा बेटा बनकर रह गया। खुद कभी कोई निर्णय लेने की क्षमता उसमें विकसित ही नहीं हुई। जो उससे करने को कह दिया जाता, वह कर देता। पैसे की कमी नहीं थी, उनके पास काफी खेती थी, एक आटे की चक्की भी थी जो घर से थोड़ी दूरी पर थी। सास थीं लेकिन छोटी उम्र में ही घर की व्यवस्था सम्हालने के कारण घर पर पूरा नियंत्रण संदीप का था । 

जेठानी रजनी ने विवाह के बाद से ही घर की सत्ता अपने हाथ में ले ली।सास वही करती थीं जो उनके बड़े बेटा बहू चाहते थे। संदीप और रजनी के दो बेटियां थीं, जिनका बहाना बनाकर रजनी धीरे धीरे घर के सारे कामों का भार दामिनी पर डालती चली गई। बड़े शान से सबके सामने इठलाते हुये कह देती – ” इतने दिन मैंने अकेले पूरे घर और प्रदीप को सम्हाला है। अब मेरे आराम के दिन है, घर के कामों की जिम्मेदारी अब कीर्ति की है।” 

विवाह बाद दामिनी ने अनुभव किया कि उसके पति को प्यार और दुलार के नाम पर अपाहिज बना दिया गया है लेकिन उसे विश्वास था कि अपने प्यार और विश्वास से धीरे-धीरे प्रदीप को बदल लेगी। 

इतनी जल्दी यदि दामिनी कुछ कहने का प्रयास करती तो प्रदीप को यही लगता कि दामिनी घर में फूट डालकर अपना वर्चस्व चाहती है। यद्यपि प्रदीप के पास पैसे रुपये अधिक नहीं रहते थे लेकिन प्यार की दौलत से उसने दामिनी को मालामाल कर दिया था। घर के सब काम करके जब वह थकी हारी अपने कमरे में आती तो प्रदीप की मजबूत बाहें, प्यार से लरजती छलकती ऑखें पाकर सब कुछ भूल जाती। दामिनी के आगे पढ़ने की इच्छा को जानकर भी कुछ नहीं कर पाता लेकिन उसे आश्वासन अवश्य देता – ” घर में कोई नहीं मानेगा। एक दो साल बाद मैं तुम्हें इण्टरमीडियट का प्राइवेट फार्म भरवा दूंगा। किताबें भी ला दूंगा, तुम चुपके चुपके पढ़ाई करती रहना। किसी को पता भी नहीं चलेगा।”

फिर दामिनी के उदास चेहरे को हथेलियों में भरकर कहता – ” इस तरह उदास मत होओ, अपने बच्चों को हम खूब पढ़ायेंगे। ” दामिनी निहाल हो जाती।

शादी का एक वर्ष होने वाला था। उस दिन बहुत बारिश हुई थी, प्रदीप अपने खेतों तक गया लेकिन वापस लौट कर नहीं आया। खेत में उसे किसी जहरीले सांप ने काट लिया।

प्रदीप की मृत्यु से दामिनी पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा – ” कलंकिनी, अभागिन खा गई मेरे बच्चे को।” 

” अम्मा, अभी इसे घर से बाहर फेंकों। मनहूस मेरे बच्चे जैसे देवर को मार डाला इसने।” 

रोते हुये रजनी ने आवेश में दामिनी को दोनों हाथों से पीटना शुरू कर दिया – ” अपने बेटे की तरह इतने दुलार से पाला था। जब से ब्याह कर आई थी  ” भाभी – भाभी ” कहते हुये साथ साथ घूमता रहता था, इस कुलच्छिनी के कारण घर बरबाद हो गया।”

दामिनी की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके साथ अचानक यह क्या हो गया? एक तो प्रदीप का हमेशा के लिये साथ छूट गया, उस पर दुनिया समाज के ताने।

मायके से भाई भाभी आये थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि बेटी की तरह मेहमान बनकर जब चाहे आ सकती है लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी आप लोगों की हैं। हम लोगों ने ब्याह कर दिया अब यह आपके घर की बहू है। प्रदीप नहीं रहे तो क्या ससुराल तो इसका यही है। इसका अधिकार इसी घर पर है। आप लोगों की सेवा इसका धर्म है। हम लोग इसे घर बैठाकर क्या करेंगे?

अब तो सबको खुली छूट मिल गई। बिना पैसे की नौकरानी जिसे शान्ति की दो रोटी भी नसीब नहीं थीं। माता पिता से भी उसने कहा – ” मेरी पढ़ाई पूरी करवा दो। मैं किसी पर बोझ नहीं बनूंगी, कोई नौकरी कर लूंगी।”

लेकिन दोनों परिवारों ने उसकी एक न सुनी – ” तुम्हें क्या कमी है? सबके साथ मिलकर रहोगी तो धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा।” 

सास ने भी कहा – ” इतना सब है मेरे घर में। क्या हम अपनी बहू से नौकरी करवा कर समाज में अपने मुंह पर कालिख लगवायेंगे? लोग क्या कहेंगे कि एक बहू को भी नहीं खिला पाये।” 

दामिनी कुछ नहीं कर पाई और ससुराल रूपी चक्की में पिसने लगी। धीरे धीरे उसे अनुभव हुआ कि संदीप की नजर बदलने लगी है। वह बहाने से उसके शरीर को इधर-उधर से स्पर्श कर देते थे। पहले तो उसे अपना भ्रम लगा लेकिन जब वह जरा भी अकेली होती तो उसके सामने अपने नीचे के कपड़े खिसका कर भद्दे भद्दे इशारे करते।

आखिर हारकर उसने रजनी और सास के सामने कहा तो संदीप ने उस पर तरह तरह के लांछन लगाने शुरू कर दिये। यहॉ तक कह दिया कि दामिनी खुद उस पर डोरे डाल रही है।

सास ने उसे थप्पड़ मारते हुये कहा – ” मेरा एक लड़का तो मारकर खा गई और दूसरे पर कलंक लगा रही है जिससे वह भी शर्म के कारण कहीं जाकर मर जाये।

जिठानी ने उसके बाल पकड़ कर दीवार पर पटक दिया – ” मेरे पति पर कलंक लगाने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? मायके में तो कोई पूंछता नहीं है और हम लोग प्रदीप के बाद भी अपने घर में रखे हैं तो यह नाटक कर रही हो। आज के बाद कभी मेरे पति के बारे में कुछ भी उल्टा सीधा कहा तो जान से मार दूंगी तुम्हें।”

संदीप कुटिलता से मुस्कराते हुये चले गये। अब संदीप की हिम्मत और बढ़ गई – ” कोई मुफ्त में किसी के लिये कुछ नहीं करता। अगर तुम्हें खिलाऊंगा पहनाऊंगा तो वसूल भी करूंगा। सोंच लो, आसानी से मान जाओगी तो तुम भी खुश रहोगी और मैं भी वरना मुझे जबरदस्ती करनी भी आती है। तुम्हारी बात कोई नहीं मानेगा।” 

दामिनी पिता जैसे जेठ से अपने आप को बचा नहीं पा रही थी। वह जानती थी कि बाहर वालों से खुद को सुरक्षित रखना फिर भी आसान है लेकिन घर के लोग ही जब दुश्मन बन जायें तो क्या करें?

मायके वाले इस डर से उसे बुलाते नहीं थे कि ऐसा न हो दामिनी नाम की मुसीबत हमेशा के लिये उनके गले पड़ जाये। कोई भी नहीं था उसका।

उसे बार बार अपनी रुचिरा दीदी की याद आती लेकिन उसे पता नहीं था कि अब रुचिरा कहॉ है क्योंकि उसके गांव से उनका ट्रांसफर हो चुका था। 

एक बार जिठानी अपनी दोनों बेटियों को लेकर मायके गई थीं। संदीप ने उससे सुबह ही कह दिया था कि रात में अम्मा के सोने के बाद उसके कमरे में आ जाये, वरना वह जबरदस्ती उसके कमरे में चला आयेगा फिर उसके साथ जो होगा उसके लिये वह खुद जिम्मेदार होगी।

दिन भर दामिनी रात के लिये सोंच सोंचकर कांपती रही। वह समझ गई कि आज वह किसी भी तरह प्रदीप की अमानत बचा नहीं पायेगी और एक बार यह सिलसिला शुरू हो गया तो इस नर्क जैसी जिन्दगी से वह कभी निकल नहीं पायेगी। कहते हैं विपत्ति सामने देखकर व्यक्ति आश्चर्यजनक निर्णय ले लेता है।

खाना बनाकर उसने सास को खिला दिया। संदीप अभी खेत से वापस आकर अपनी आटे वाली चक्की पर था। उसने सास से कहा – ” अम्मा, पेट में हल्का सा दर्द हो रहा है। लगता है शौच के लिये जाना पड़ेगा।” 

” रजनी भी नहीं है, अकेले कैसे जाओगी? संदीप नाराज होगा। कितनी बार कहा कि घर में शौचालय बनवा लो लेकिन बड़ी बहू मानती ही नहीं है। कहती है कि इसी बहाने बाहर निकलने को मिल जाता है और चार स्त्रियों से मुलाकात बातचीत भी हो जाती है। मैं तो घर में शौचालय कभी नहीं बनने दूंगी।” 

” मैं अधिक दूर नहीं जाऊंगी और जेठजी के आने के पहले लौट आऊंगी।” 

” अच्छा जाओ लेकिन जल्दी आ जाना।” 

दामिनी जल्दी से कमरे में गई और अपने पास के सारे पैसे ब्लाउज के अन्दर रख लिये। जेवर उसके पास कुछ थे ही नहीं। वह सब तो प्रदीप के बाद ही उससे छीन लिये गये थे।

हाथ में लोटा लिये घूंघट डाले खेतों की फसल में छुपते हुये वह बस स्टॉप पर आई तो एक बस जाने के लिये तैयार खड़ी थी। जल्दी से लोटा फेंककर बिना सोचे समझे उसमें बैठ गई। वह जल्दी से जल्दी वहां से दूर जाना चाहती थी। 

कंडक्टर ने जब टिकट के लिये पूंछा तो उसे पता चला कि वह बस सुल्तानपुर जा रही है। उसने सुल्तानपुर का टिकट ले लिया। रास्ते में उसे पता चला कि यह बस कानपुर से होते हुये सुल्तानपुर जायेगी। कानपुर का नाम सुनते ही उसे रुचिरा दीदी और उनके माता-पिता की याद आ गई लेकिन उसे केवल उनके पिता का नाम मालूम था और यह भी जानती थी कि कानपुर, किदवई नगर के महिला डिग्री कॉलेज के पास उनका घर है। 

एक बार अपनी किस्मत आजमाने के लिये उसने कानपुर में उतरने का निश्चय किया। अनजान शहर में अधूरे पते को लेकर वह एक अजनबी परिवार से सहायता की आशा कर रही थी जिसे अपने परिवार ने ही प्रताड़ित किया। 

बस स्टॉप पर उतर कर उसने किदवई नगर का एक आटो किया। चौराहे पर आकर जब आटो वाले ने पूॅछा कि उसे कहॉ जाना है तो उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह आटो वाले से क्या कहे? इसलिये वह चौराहे पर ही उतर गई। कल सुबह जिठानी के जाने के बाद से उसने डर के कारण कुछ खाया नहीं था, इसलिये भूख से चक्कर आ रहे थे। 

अधिक पैसे तो उसके पास थे नहीं इसलिये उसने दो समोसे खाकर पानी पिया। उसी दुकानदार से उसने महिला डिग्री कॉलेज का पता पूंछा। दुकानदार सज्जन व्यक्ति था, उसने खुद एक रिक्शे वाले को बुलाकर उससे दामिनी को महिला डिग्री कॉलेज छोड़ने को कहा।

डिग्री कॉलेज तक पहुंचने के बाद उसने रुचिरा दीदी और उसके पापा का नाम बताकर पूॅछना शुरू किया। पहले तो कुछ पता नहीं चला लेकिन करीब बीस मिनट भटकने के बाद एक काम वाली बाई ने बताया कि वह उनके घर में काम करती है और अभी उन्हीं के घर जा रही है।

बाई के साथ आ तो गई लेकिन न रुचिरा के माता-पिता उसे जानते थे और न वह उन्हें।

बाई ने उन्हें बताया – ” यह बिटिया आपको ढूंढ रही थी।” 

” आप कौन हो बेटा? मुझे याद नहीं आ रहा है।” 

” आप मुझे नहीं जानते, मुझे रुचिरा दीदी से मिलना है।” 

” रुचिरा की तो शादी हो गई है, वह ससुराल में है।” 

दामिनी के तो पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई लेकिन उन दम्पति ने दामिनी के बैठाया, उसे चाय नाश्ता करवाने के बाद कहा – ” रुचि को फोन से बता दिया है, वह शाम को तुमसे मिलने आयेगी। उसकी शादी इसी शहर में हुई है। अभी स्कूल में थी, लौटते समय आयेगी। तब तक तुम आराम कर लो, थकी होगी।” 

दामिनी की ऑखों से ऑसू गिरने लगे। जाने कितने दिन बाद किसी ने उससे इतने प्यार से बात की थी। एक अजनबी लड़की को बिना किसी सामान और बिना परिचय के आया हुआ देखकर उन्हें इतना तो समझ में आ ही गया कि इसके साथ कुछ गंभीर घट चुका है। इसलिये उन्होंने उससे कुछ पूॅछना उचित नहीं समझा। रुचि आयेगी तो खुद ही पूॅछ लेगी। 

इतने दिन के मानसिक तनाव से जरा सी राहत मिलते ही दामिनी लेटी तो दूसरे कमरे से आती रुचिरा की आवाज सुनकर हड़बड़ाती हुई उठ गई। 

बाहर आई तो रुचिरा ने उठकर दोनों बांहें फैला दी। दामिनी रुचिरा की बाहों में सिमटकर फूट फूटकर रो पड़ी। रुचिरा ने उसे रोने दिया, उसे दामिनी से इस साहस की जरा भी उम्मीद नहीं थी। 

थोड़ा सम्हलने के बाद उसने तीनों लोगों के सामने सारी बातें बताईं तो सब अवाक रह गये – ” दीदी, मैं आप लोगों के घर में नौकरानी बनकर रह लूंगी। कोई छोटा मोटा काम कर लूंगी। बाई का काम भी कर सकती हूॅ लेकिन अब न माता पिता के पास जाऊंगी और न ससुराल।” 

” तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है। रुचि चली गई तो भगवान ने हम लोगों के बुढ़ापे का सहारा दूसरी बेटी भेज दी।” 

जब कुछ दिन बाद दामिनी सामान्य हुई तो रुचिरा ने उससे पूंछा – ” क्या अब भी तुम पढ़ाई करना चाहती हो?” 

” चाहती तो हूॅ लेकिन कैसे संभव है। मेरे पास हाई स्कूल का प्रमाण पत्र भी नहीं है और न ही मैं जाकर ला सकती हूॅ।” 

रुचिरा सोच में पड़ गई – ” तुम्हें अपना रोल नम्बर याद है?” जबकि दामिनी ऐसी विषम परिस्थितियों के कारण अपना रोल नम्बर भी भूल गई थी लेकिन रुचिरा ने हार नहीं मानी। 

अपने किसी परिचित से कहकर उसने दामिनी के गांव के स्कूल से उसका रोल नम्बर मंगवाया फिर उत्तर प्रदेश बोर्ड से दामिनी के हाई स्कूल प्रमाण पत्र की दूसरी प्रति मंगवा ली।‌

दामिनी को किदवई नगर के इण्टर कॉलेज में प्रवेश दिलवा दिया गया।‌ रुचिरा के मम्मी पापा ने दामिनी को अपनी बेटी मान लिया। रुचिरा भी अपने माता-पिता के अकेलेपन से निश्चिन्त हो गई। 

दामिनी को स्कूल से छात्रवृत्ति तो मिलती ही थी। रुचिरा भी भरपूर सहायता करती थी। जहां चाह वहां राह निकल आती है। अपने संघर्ष के लिये साहस करके खड़े होने पर ईश्वर स्वयं मार्ग प्रशस्त करते हैं।

समय रुकता नहीं है बल्कि संघर्षों में तपाकर व्यक्ति को कुन्दन बना देता है और एक दिन दामिनी के शरीर पर सफेद कोट आ गया, उसके नाम के साथ डॉक्टर लग गया।

जब काफी देर बाद दामिनी लौटकर नहीं आई तो उसकी सास को चिन्ता होने लगी – ” कहा था कि जल्दी लौट आना। न जाने कहॉ जाकर मर गई। संदीप आयेगा तो गुस्सा करेगा।

जब काफी देर हो गई तो सास ने पड़ोस के बच्चे को भेजकर संदीप को बुलवाया। पहले तो संदीप मॉ पर ही बहुत चिल्लाया। फिर टार्च लेकर ढूंढने निकल गया, बहुत ढूंढने पर कोई पता नहीं चला। चूंकि दामिनी घूंघट करके निकली थी और शाम का झुटपुटा भी फैल गया था तो किसी ने दामिनी पर ध्यान नहीं दिया। खेतों के बीच से आगे बढ़ती चली गई थी फिर भी एक लड़के ने बताया कि उसने हरी साड़ी में घूंघट डाले एक स्त्री को बस स्टॉप की ओर जाते देखा था। 

संदीप ने गांव के कुछ दूसरे लोगों के साथ बस स्टॉप पर जाकर देखा तो वहां उसके घर का लोटा पड़ा मिल गया। सबको यही लगा कि दामिनी भागकर अपने मायके चली गई है क्योंकि इस बीच तमाम बसें आईं और चली गई थीं।  संदीप समझ गया कि दामिनी उसकी चेतावनी के कारण ही घर से भाग गई है। 

अंधेरा बढ़ रहा था, सबने मिलकर तय किया कि कल संदीप गांव वालों के साथ दामिनी के मायके जायेगा और सबके सामने पूॅछेगा कि इस तरह बिना बताये क्यों भाग कर आई? उससे कहती तो वह खुद भेज देता। अगर दामिनी उसकी चेतावनी के सम्बन्ध में कुछ कहेगी तो वह उस पर ही झूठा इल्जाम लगा देगा।‌

दूसरे दिन जब सुबह चार मोटरसाइकिल दामिनी के घर के दरवाजे पर आकर रुकीं तो आस पड़ोस के लोग भी हतप्रभ रह गये। उसके पिता और भाई की समझ में न आया कि इतनी सुबह दामिनी के जेठ इतने लोगों को लेकर क्यों आये हैं। 

” आओ, बेटा, इतने सुबह? सब ठीक है ना।” 

” यह हमसे क्यों पूॅछ रहे हैं? अपनी लड़की से पूॅछिये।” 

” क्या किया है दम्मो ने?” 

” पहले उसे बाहर बुलाइये, सबके सामने जवाब देगी। अगर उसे हमारे घर में नहीं रहना है तो कोई जबरदस्ती नहीं है। अपनी लड़की अपने पास रखिये।” 

” कैसी बातें कर रहे हो बेटा? दम्मो तो तुम्हारे घर में ही है।” 

यह सुनकर सब चौंक गये – ” क्या वह यहॉ नहीं है?” 

फिर संदीप और बाकी लोगों ने सारी बात बताई। संदीप ने मौके का फायदा उठाया – ” लगता है कि अपने किसी यार के साथ हमारे दोनों परिवारों के मुॅह पर कालिख पोतकर भाग गई। रजनी के घर में न होने के कारण उसे मौका मिल गया। अब अगर मिल भी गई तो ऐसी कुल कलंकिनी बहू को हम अपने घर में नहीं रखेंगे।” 

” आप क्या, हम खुद नहीं रखेंगे उस कुल कलंकिनी को।” ” मुझे तो मिल जाये तो उसे जान से मार दूॅ।” दामिनी का भाई बोला।

धीरे धीरे पूरे गांव क्या आसपास के गांवों में भी यह बात फैल गई। सबने एक स्वर में दामिनी को कुल कलंकिनी घोषित कर दिया।‌ 

दामिनी की मॉ ने तो यहॉ तक कह दिया कि यदि पता होता कि बड़ी होकर ऐसा करेगी तो पैदा होते ही जहर दे देती। पुलिस में रिपोर्ट लिखाने की भी जरूरत नहीं समझी गई। 

साल बीतते गये लेकिन दामिनी का कोई पता नहीं चला और वह कुल कलंकिनी कुलच्छिनी डॉक्टर बनकर अस्पताल में आकर बैठ गई है। 

कुछ लोगों ने दामिनी की झलक देख ली थी और सबको बता रहे थे – ” नई डॉक्टर वही कुल कलंकिनी है जो दो परिवारों के मुंह पर कालिख पोतकर भाग गई थी।” 

बाहर की फुसफुसाहट दामिनी के कानों में भी पड़ रही थीं, उसे पता था कि यही सब होगा लेकिन वह किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। आखिर अस्पताल के बाहर दो कारें आकर रुकीं। 

उनसे उतरे कुछ लोग – रुचिरा, रुचिरा के पति और उसके मम्मी पापा साथ ही गांव के थाने की पुलिस।

दामिनी अस्पताल से निकल कर बाहर आ गई। उसने भीड़ पर एक नजर डाली। उसने देखा कि भीड़ में उसके घर वालों के अतिरिक्त संदीप और रजनी भी आ गये थे। 

रुचिरा ने दामिनी का हाथ पकड़ लिया – ” पूरे गांव वालों के सामने सच्चाई बताओ।” 

दामिनी ने शुरू से आखिरी तक सब कुछ बताते हुये कहा – ” हमारे समाज अगर लड़की घर छोड़कर जाती है तो मान लिया जाता है कि वह किसी लड़के के साथ ही भागी होगी। उसकी सच्चाई और परिस्थितियों को जानने का प्रयास कोई नहीं करता है। उसे कुल कलंकिनी कह दिया जाता है। मैं चाहती तो कभी यहॉ नहीं आती लेकिन मैंने अपनी पहली पोस्टिंग इसी गांव में मांगी थी। यह गांव मेरी जन्मभूमि है, यहीं पर मुझे रुचिरा दीदी मिली थीं जो मेरे लिये किसी भगवान से कम नहीं हैं। आप लोग ही बताइये, क्या करती मैं? ससुराल में रहने की शर्त थी अपने जेठ की रखैल बनकर रहना और आजीवन प्रताड़ना सहना और मायके में कोई मुझे रखने को तैयार नहीं था।” 

सबकी नजरें संदीप की ओर घूम गईं जो रजनी का हाथ पकड़कर भीड़ से निकलने का प्रयास कर रहे थे। भीड़ उनकी ओर बढ़ने लगी तो दामिनी फिर बोली – ” जाने दीजिये उन्हें। अब मेरा उनसे कोई संबंध नहीं है। मुझे केवल आप सबको सच्चाई बतानी थी ताकि आप लोग दुबारा बिना सच्चाई जाने अपनी बेटी को कुल कलंकिनी न कहें।” 

अपने भाई भाभी और माता पिता को ऑखों में ऑसू लिये अपनी ओर बढता देखकर उसने हाथ के इशारे से रोक दिया – ” अगर आप लोग मुझे सहारा दे देते तो शायद ससुराल वाले भी अत्याचार न कर पाते। मैं अब न किसी की बेटी हूॅ और न बहू। अब मेरा परिवार रुचिरा दीदी और उनके मम्मी पापा हैं। इस गांव में मैं केवल डॉक्टर दामिनी हूॅ, इसलिये मुझसे केवल मेरे रोगी ही मिल सकते हैं।”

दामिनी के माता-पिता में इतनी हिम्मत शेष नहीं बची थी कि वे अपनी कुल कलंकिनी बेटी को गले से लगा लें।

बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर 

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