सुबह की पहली किरण आँगन में उतर आई थी, लेकिन घर के भीतर पसरा सन्नाटा किसी अमावस्या की रात जैसा था। तुलसी के चौरे पर रखा दीपक बुझ चुका था और उसके पास बैठी शारदा की आँखों में भी जैसे उजाला समाप्त हो गया था।
उसने धीरे से अपने माथे का सिंदूर छुआ। वर्षों से इस घर की चौखट को मंदिर मानकर उसने हर रिश्ते को पूरे मन से निभाया था। सास की सेवा में कभी कमी नहीं रखी, ससुर को पिता का सम्मान दिया, पति के हर सुख-दुख में साथ खड़ी रही। फिर भी आज उसी घर की दीवारों से एक शब्द बार-बार टकराकर उसके कानों में चुभ रहा था
—”कुलंकुलंकिनी!”
यह शब्द किसी अजनबी ने नहीं, बल्कि उसी परिवार के लोगों ने उसके लिए कह दिया था।
कुछ दिन पहले उसके देवर के व्यापार में भारी घाटा हुआ था। घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई। उसी समय शारदा को पता चला कि उसके दिवंगत पिता की छोड़ी हुई पैतृक ज़मीन का एक छोटा-सा हिस्सा अब भी उसके नाम था।
वह बिना किसी को बताए अपने मायके गई। ज़मीन बेचकर जो धन मिला, वह चुपचाप घर लाकर ससुर के हाथों में रख दिया।
“बाबूजी, इससे शायद घर संभल जाए।”
ससुर की आँखें भर आईं, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
उधर गाँव में किसी ने देख लिया कि शारदा कई दिनों तक मायके में रही थी। बस फिर क्या था! बातों में रंग भरते देर नहीं लगी।
“इतने पैसे अचानक कहाँ से आए?”
“कहीं कोई छिपा हुआ रिश्ता तो नहीं?”
“घर की बहू अकेले शहर जाती है… कुछ तो बात होगी।”
अफवाहें हवा से भी तेज़ दौड़ने लगीं।
घर के बाहर लोग फुसफुसाते, भीतर रिश्तों की नज़रें बदलने लगीं। सबसे अधिक चोट तब लगी, जब उसकी जेठानी ने ताने में कह दिया—
“हमारे कुल की लाज तो अब भगवान ही बचाए।”
शारदा ने कोई सफाई नहीं दी। उसे लगा, जिस विश्वास को शब्दों की ज़रूरत पड़े, वह विश्वास अधूरा होता है।
दिन बीतते गए। एक दिन तहसील से ज़मीन की बिक्री के कागज़ लेकर अधिकारी घर पहुँचे। कुछ औपचारिक हस्ताक्षर बाकी थे।
तभी पूरे परिवार के सामने सच्चाई खुल गई।
ससुर ने काँपते हाथों से कागज़ उठाए और भर्राई आवाज़ में बोले—
“जिस बहू पर तुम सबने शक किया, उसने अपने पिता की आखिरी निशानी बेचकर इस घर की डूबती नाव बचाई है।”
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि घड़ी की टिक-टिक भी भारी लगने लगी।
पति की आँखें झुक गईं। जेठानी की जुबान जैसे पत्थर बन गई। जिन लोगों ने उसे कुलंकुलंकिनी कहा था, वे अपनी ही नज़रों में छोटे हो चुके थे।
शारदा ने किसी से शिकायत नहीं की। उसने केवल इतना कहा—
“स्त्री जब अपने लिए कुछ करती है, तो उसे स्वार्थी कहा जाता है। और जब परिवार के लिए चुपचाप सब कुछ न्योछावर कर देती है, तब भी लोग उसके त्याग से पहले उसके चरित्र पर प्रश्न उठा देते हैं।”
उसकी बात सुनकर ससुर आगे बढ़े। उन्होंने पहली बार सबके सामने बहू के सिर पर हाथ रखा और बोले—
“कुल पर कलंक तुम नहीं, हमारी सोच थी। कुलंकुलंकिनी हमारी बहू नहीं, वह मानसिकता है जो बिना सत्य जाने किसी स्त्री के सम्मान को कुचल देती है।”
शारदा की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन वे हार के आँसू नहीं थे। वे उस सत्य की जीत के आँसू थे जिसने देर से ही सही, अपना स्थान बना लिया था।
उस दिन के बाद शारदा के लिए घर की चौखट पहले जैसी नहीं रही। अब वह केवल बहू नहीं थी, बल्कि उस घर की आत्मा थी। और परिवार ने भी समझ लिया कि किसी स्त्री का सबसे बड़ा आभूषण उसके गहने नहीं, उसका चरित्र होता है—जिसे अफवाहों से नहीं, उसके कर्मों से परखा जाना चाहिए।
सुदर्शन सचदेवा