एक नया सवेरा

“मां जी, मेरी अपने घर पर तफ्सील से बात हो गई है। मेरे बाबूजी और परिवार वाले इस रिश्ते के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उन्हें कोई भी आपत्ति नहीं है। बस अब आप किसी तरह काव्या को समझा लीजिए…” अभिनव ने बहुत ही संकोच लेकिन एक गहरे विश्वास के साथ सुभद्रा जी से कहा।

सुभद्रा जी ने एक लंबी, गहरी सांस ली। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और आंसुओं की नमी दोनों एक साथ तैर गए। अभिनव उनके स्वर्गीय बेटे, सुशांत का बहुत करीबी दोस्त और ऑफिस में सहकर्मी था। सुशांत को एक सड़क दुर्घटना में गए तीन साल बीत चुके थे, लेकिन उसकी पत्नी काव्या आज भी उसी भयानक सदमे और दर्द के अंधेरे में जी रही थी।

सुभद्रा जी धीरे-धीरे कदमों से काव्या के कमरे की तरफ गईं। काव्या एक कोने में बैठी अपने सात साल के बेटे आरव और पांच साल की बेटी रिया को होमवर्क करवा रही थी। उसका चेहरा जो कभी गुलाब की तरह खिलता था, अब पीला और बेजान पड़ चुका था। आँखों के नीचे पड़े गहरे काले घेरे उसकी उन अनगिनत रातों की गवाही दे रहे थे जो उसने रोते हुए काटी थीं। सुभद्रा जी ने पास जाकर काव्या के सिर पर बहुत ही वात्सल्य और प्यार से हाथ फेरा।

“काव्या बेटा, मेरी अभिनव से बात हुई है। उसके घर वाले इस रिश्ते के लिए राज़ी हैं। तू बस एक बार अपने मन से यह सारा बोझ उतार दे और हाँ कह दे…”

यह सुनते ही काव्या ने झटके से किताब बंद की और उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। “मां, आप बार-बार फिर वही बात क्यों करती हैं? अगर मेरी किस्मत में पति का सुख होता, तो सुशांत मुझे ऐसे बीच सफर में अकेला क्यों छोड़ जाते? मैं इन बच्चों के सहारे अपनी बाकी की ज़िंदगी आराम से काट लूंगी। मुझे अपनी जिंदगी में कोई नया रिश्ता, कोई नया इंसान नहीं चाहिए। वैसे भी यह समाज क्या कहेगा?”

सुभद्रा जी का दिल काव्या की यह बातें सुनकर तड़प उठा। उन्होंने अपनी इस मासूम बहू का चेहरा अपने कांपते हाथों में लिया और भर्राई हुई लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “दुनिया और समाज का काम तो सिर्फ ताने देना है बेटा, पर जब रात के अंधेरे में तू अकेले रोती है, तब तेरा दुख बांटने कोई नहीं आता। जो हो गया, उसे हम अपने आंसुओं से भी नहीं बदल सकते। तू सोचती है कि मैं एक सास हूँ और अपनी ज़िम्मेदारी से भागना चाहती हूँ? पगली, मैंने अपना जवान बेटा खोया है। मेरा कलेजा आज भी सुशांत के लिए उसी तरह रोता है। लेकिन मैं एक माँ भी हूँ, और मैंने तुझे कभी बहू नहीं, बल्कि अपनी कोख से जन्मी बेटी माना है।”

सुभद्रा जी ने अपने आंसू पोंछे और आगे कहा, “आज मैं तेरे साथ हूँ, तेरे मायके में तेरे बूढ़े माता-पिता हैं जो तेरी फिक्र करते हैं। लेकिन बेटा, कल जब हम सबकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो जाएंगी, तब तेरा और इन मासूम बच्चों का क्या होगा? मैं तुझे उम्र भर ऐसे एक सफेद चादर में घुट-घुट कर जीते हुए नहीं देख सकती। अभिनव एक बहुत ही सुलझा हुआ और नेक इंसान है। वह तुझे और इन बच्चों को अपनी किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि पूरे दिल और सम्मान के साथ अपनाना चाहता है। ऐसी सच्ची भावना और ऐसा मौका जीवन में बार-बार नहीं मिलता। तू अपने अतीत की परछाइयों से बाहर निकल, एक नई काव्या बन और इस नई शुरुआत को गले लगा।”

सुभद्रा जी के लगातार समझाने, उनके अथाह प्रेम और अभिनव के उस निस्वार्थ समर्पण ने आखिरकार काव्या के मन में जमी उस बर्फ को पिघला दिया। बहुत ही सादे तरीके से, एक छोटे से मंदिर में कुछ खास रिश्तेदारों और दोस्तों की मौजूदगी में अभिनव और काव्या विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। समाज के कुछ संकीर्ण सोच वाले लोगों ने दबी जुबान में ताने भी कसे कि ‘कैसी सास है जो खुद अपनी बहू की दूसरी शादी करा रही है’, लेकिन सुभद्रा जी ने किसी की रत्ती भर भी परवाह नहीं की। उन्होंने पूरे गर्व के साथ खुद अपनी ‘बेटी’ का कन्यादान किया और उसे एक नए जीवन के लिए विदा किया।

इस बात को अब कई महीने बीत चुके थे। आज सुबह से ही सुभद्रा जी के घर में एक अलग ही रौनक और चहल-पहल थी। वे सुबह पांच बजे से ही रसोई में पूरी तरह से व्यस्त थीं। चूल्हे पर काव्या की पसंद की गाढ़े दूध वाली खीर उबल रही थी, एक तरफ गरमागरम पूरियां तली जा रही थीं और पूरे घर में पकवानों की वो खुशबू फैली थी जो किसी बहुत बड़े त्योहार का एहसास दिला रही थी। आज काव्या शादी के बाद पहली बार बच्चों और अभिनव के साथ घर आ रही थी।

सुभद्रा जी बार-बार दालान में जाकर दरवाज़े की तरफ देखतीं और फिर अपने काम में लग जातीं। उनका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। तभी बाहर से बच्चों के खुशी से चिल्लाने की आवाज़ आई… “दादी… ओ दादी!”

यह मीठी आवाज़ सुनते ही सुभद्रा जी के चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान खिल उठी जो पिछले तीन सालों से कहीं गहरे दुख में खो गई थी। वे जल्दी-जल्दी अपने पल्लू से हाथ पोंछती हुई बाहर की तरफ दौड़ीं।

दरवाजे पर आरव और रिया खड़े थे। वे दोनों दौड़कर अपनी दादी की टांगों से लिपट गए। सुभद्रा जी ने दोनों को माथे पर चूमकर कसकर गले से लगा लिया। तभी उनकी नज़र सामने पड़ी और उनके कदम वहीं ठिठक गए।

सामने काव्या खड़ी थी। पीले रंग की एक बेहद खूबसूरत साड़ी, माथे पर लाल बिंदी, मांग में चमकता हुआ सिंदूर और चेहरे पर एक अजीब सा तेज़। लेकिन इन सबसे भी ज्यादा खूबसूरत थी काव्या के चेहरे की वो सच्ची चमक और मुस्कान, जो एक लंबे अरसे से उस चेहरे से गायब थी। आज वह एक मुरझाई हुई, डरी हुई विधवा नहीं लग रही थी, बल्कि अभिनव के सच्चे प्यार और सम्मान के रंग में डूबी हुई एक खुशहाल पत्नी और एक आत्मविश्वासी माँ लग रही थी। उसके चेहरे का वह सुकून चीख-चीख कर बता रहा था कि सुभद्रा जी का वह कड़ा फैसला बिल्कुल सही था।

काव्या की आँखें छलक आईं। वह आगे बढ़ी और मुस्कुराते हुए सीधे अपनी सास, अपनी उस सच्ची माँ के गले लग गई। “मां… मैं कब से आप लोगों की राह देख रही थी। आपकी बहुत याद आती है,” काव्या ने सुभद्रा जी के कंधे पर अपना सिर रखते हुए कहा।

सुभद्रा जी ने भी अपनी इस बेटी को अपनी बाहों में कस लिया। उनके आंसू काव्या के बालों में गिर रहे थे—ये वो आंसू थे जिनमें कोई शिकायत नहीं, बल्कि एक अथाह सुकून था।

तभी पीछे खड़े अभिनव ने नकली सा गुस्सा और बच्चों सा मुंह बनाते हुए कहा, “वाह मां जी! सारा प्यार और लाड़ बस अपनी बेटी और इन बच्चों के लिए ही बचा कर रखा है? मुझे तो आप जैसे बिल्कुल भूल ही गईं। इस नालायक बेटे के लिए आपकी बाहों में कोई जगह नहीं है क्या?”

अभिनव की इस प्यारी सी शिकायत और उसका मुंह बना हुआ देखकर वहां खड़े सभी लोग जोर से खिलखिला कर हंस पड़े। घर का वो आंगन, जो सुशांत के जाने के बाद एक भयानक खामोशी में डूब गया था, आज फिर से सच्चे ठहाकों और खुशियों से गूंज उठा था।

“अरे तू तो मेरा सबसे प्यारा बेटा है,” सुभद्रा जी ने हंसते हुए आगे बढ़कर अभिनव को भी अपने पास खींचा और अपनी खुशियों को अपनी बाहों में समेट लिया। एक माँ ने आज समाज की रूढ़ियों को हराकर अपने परिवार के लिए एक नया सवेरा लिख दिया था।

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