पापा- पापा, अगले शुक्रवार को सुबह सुबह हम सब कश्मीर घूमने के लिए चल रहे हैं,आप वहां के हिसाब से कपड़े रख लेना।मैने वहां सब व्यवस्था कर दी है,यहां से फ्लाइट से श्रीनगर वहां कार बुक कर दी है,होटल बुक हो गये है।
एक सांस में मुन्ना ने बड़े ही उत्साहित रूप में सब कुछ बता दिया।
हरबंस कौल अपने मुन्ना को अचरज भरी निगाहों से देखने लगे।कश्मीर जाने का उसका उत्साह अपने चरम पर था।
पापा आपने ही तो बताया था कि मैं तब एक डेढ़ वर्ष का ही रहा हूंगा तब आप यहां दिल्ली आ गए थे।फिर वहां आतंकवाद पनप गया,पर मन में तो एक बार अपनी जन्मभूमि देखने की इच्छा तो थी ही,अब सब वहां सामान्य है, इसलिये अपनी आकांक्षा अब पूरी होगी, हैं ना पापा।
हरबंस जी की आँखों में बरबस ही पानी आ गया,वो कुछ बोल नहीं पाए, उनके कानों में सलोनी की चीख गूँज उठी।वे मुन्ना को अपनी बेबसी और दुःखी अतीत का भागीदार नहीं बनाना चाहते थे।बस आगे बढ़कर उन्होंने मुन्ना के हाथों को अपने हाथों में लेकर धीरे से दबा दिया।
कश्मीर कार्यक्रम की सूचना अपनी मां तथा पत्नी को देने मुन्ना घर में अंदर चला गया।घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई थी।बस उसकी मां जरूर आँखे फाड़ मुन्ना को देख रही थी। हरबंस जी ने अपनी पत्नी को चुप रहने इशारा कर दिया।पूरे 31 वर्ष बाद कश्मीर जाएंगे,पता नहीं अब कैसी फ़िज़ा होगी?पर मुन्ना के चेहरे की खुशी को दरकिनार भी तो नहीं किया जा सकता,सोचते सोचते हरबंस कौल 31वर्ष यानि 1990 से पहले के अपने कश्मीर में ख्यालो में पहुंच गए।
हरबंस कौल श्रीनगर में कोई मामूली हस्ती नहीं थे,बड़े लोगों में उनका नाम चलता था।ठसक के साथ रहते थे। पहाड़ी पर स्थित आलीशान बंगला और कालीन तथा पश्मीना के शॉल आदि बनाने की उनकी इंडस्ट्री थी।लगभग सब प्रोडक्शन विदेशों में ही जाती थी।उच्च श्रेणी के कालीन बनते थे,6-7 महीने एक एक कालीन के निर्माण में लग जाते थे,उस समय एक एक कालीन की कीमत एक लाख रूपये होती थी।कारीगर आते सारे सारे दिन कालीनों की बुनाई हाथों से करते।उनकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली थी।परिवार में एक बड़ी बेटी सलोनी थी,जो स्कूल में पढ़ रही थी।दूसरी औलाद का सुख उन्हें नहीं मिल पा रहा था।पति पत्नी दोनों मन्नते माँगते। आखिर 15वर्ष के अंतराल के बाद उनके घर में खीर भवानी की कृपा से मुन्ना का आगमन हो गया।पूरे बंगले में हर्ष की लहर दौड़ गई।खूब बड़ी दावत दी गई।संगीत की व्यवस्था की गई।
सारी व्यवस्था वसीम ने संभाली हुई थी।पूरे उत्साह से वह दौड़ धूप कर रहा था।लगता ही नहीं था वसीम उनका मुलाजिम है।घर का सदस्य जैसा ही तो था।सलोनी हालांकि उससे उम्र में छोटी थी,पर वह उसे आपा ही कहता।कहता आपा ने मुझे दस्तखत करना तक सिखा दिया तो उस्ताद हुईं ना,इसीलिये बाबू जी ये तो मेरी आपा है,आपा यानि बड़ी बहन।
सलोनी को स्कूल से लाना, बाजार ले जाना सब वसीम ही करता।घर और फैक्ट्री का कोई काम ऐसा नहीं था जो क्या मजाल वसीम के बिना पूरा हो जाए।वसीम को हरबंस जी एक तरह से अपना बेटा ही मानते थे।
कुछ दिनों से घाटी की फिजा बदलने लगी थी।हवा में जहर घुलने लगा था।पहले वाला प्यार मोहब्बत,अपना पन अब मात्र दिखावा होता जा रहा था।पर वसीम पहले की तरह ही हरबंस जी के घर का पहरुआ बना रहा। हरबंस जी को वसीम पर गर्व था।
अचानक 19 जनवरी 1990 की वह भयावह रात आ गई,जिसकी किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी। लाउड स्पीकर से हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने का पैगाम दे दिया गया था,साथ ही जवान बहु बेटी को वही छोड़कर।अपने पराये हो चुके थे।वहशी हो चुके थे। हड़बड़ाए से हरबंस जी लाउड स्पीकर से फरमान सुनकर घर की ओर भाग लिए, फैक्ट्री को यूं ही छोड़कर।घर के दरवाजे वसीम खड़ा मिला।आज हरबंस जी वसीम को देख सहम से गए।वसीम आगे बढ़ कर हरबंस जी की ओर आया और बोला बाबूजी फिजा खराब हो गई है,लाखों लोग जा रहे हैं,जाना तो आपको भी पड़ेगा।पर आप बेफिक्र रहो,मै आपको सही सलामत यहां से निकालने में मदद करूंगा,आप बिल्कुल भी चिंता न करे। हरबंस जी को सुकून मिला, अपना वसीम औरो जैसा नहीं निकला,उन्होंने आगे बढ़ कर वसीम को गले से लगा लिया।उधर घर से नगदी,जेवर आदि लेकर मुन्ना को गोद में लिए सलोनी के साथ उनकी पत्नी भी बाहर निकल आई। हरबंस जी ने वसीम की ओर अहसान भरी नजरों से देख चलने का उपक्रम किया ही था कि वसीम बोले बाबूजी जा रहे हो,अब जिंदगी में आगे क्या मिल पाओगे,आपकी इतनी खिदमत की है कुछ नजराना तो देकर जाओ ना बाबूजी।अपना सब कुछ फैक्ट्री, बंगला सब कुछ छोड़कर जाते हुए हरबंस जी ने फिर भी अपने हाथ की हीरे की अंगूठी वसीम की ओर बढ़ा दी।वसीम अट्टहास कर उठा,उसका यह रूप हरबंस जी पहली बार देख रहे थे।अरे बाबूजी,इस अंगूठी की क्या कीमत,अब तो यह बंगला,आपकी फैक्ट्री सब मेरी ही है,बस नजराना में सलोनी को देकर जाओ ना। हरबंस जी मानो आसमान से गिर पड़े,वसीम जो सलोनी को आपा कहता था,आज वह उसकी ही डिमांड कर रहा है।पहले वाला समय होता तो वे वसीम की खाल खिंचवा देते,पर अब तो वे खुद निरीह से खड़े थे। रिश्तों की जमा पूंजी लुट चुकी थी, अंदर ही अंदर खून भी खोल रहा था,पर कुछ न कर सकने की स्थिति में वे वसीम की चिरौरी करने लगे।अरे वसीम सलोनी तो तेरी बहन जैसी है तू कैसी बात कर रहा है?वसीम बेहयाई से बोला बहन जैसी ही तो थी,बहन थोड़े ही है,चिंता न करो बाबूजी मै सलोनी को शहज़ादी की तरह रखूंगा। एकाएक हरबंस जी चिंघाड़ उठे व-सी- म, जबान संभाल।तेरी जुबान पर सलोनी का नाम भी कैसे आया,अहसान फरामोश।
तड़ाक एक तमाचा हरबंस जी के मुंह पर पड़ा।वे अचरज भरी निगाहों से वसीम के इस बदलाव को देख रहे थे,समझ नहीं आ रहा था, क्या करे क्या न करे। उधर भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा था,मार काट,चीख पुकार बढ़ती जा रही थी। हरबंस वसीम से अपने परिवार को भागने के लिए उससे गुहार कर रहे थे,वसीम ने आगे बढ़ कर सलोनी का हाथ पकड़ लिया,और बोला अब जाओ बाबूजी बेफिक्र जाओ।
सलोनी ने एक झटके से वसीम से अपना हाथ छुड़ाया और दौड़ पड़ी।वसीम जोर जोर से हंस कर कह रहा था,सब इलाका अब उनका है अब कहां जाओगी मेरी जान।
सलोनी ने दौड़कर पहाड़ी से छलांग लगा दी,एक चीख के साथ सलोनी ने अपना बलिदान देकर अपने परिवार की राह आसान कर दी। हरबंस जी अपनी पत्नी और मुन्ना के साथ किसी प्रकार बचते बचाते निकलने में सफल हो तो गए,पर सलोनी ऐसे चली जाएगी,इसकी तो कल्पना तक उन्होंने नहीं की थी।
हरबंस जी की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे,वे मुन्ना को क्या बताते कि उसकी बहन ने किस परिस्थिति में अपनी जान दे दी थी,आज उसी कश्मीर में चलने की बात मुन्ना कर रहा था। उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में फिर सोचा भी नहीं था।पर धारा 370 हटने के बाद वहां के सामान्य हालात की खबरें आने पर उन्हें अपनी फैक्ट्री,अपना आलीशान बंगला जरूर याद आता।फिर झटके से वे उन यादों को बिसरा देते।अपनी मेहनत और मुन्ना के कारोबार सम्भाल लेने पर उन्होंने दिल्ली में अपनी पोजीशन बना ली थी,उन्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं थी।मुन्ना के कश्मीर जाने की पेशकश वो ठुकरा नहीं सके। उन्होंने चलने की स्वीकृति दे दी।
एयरपोर्ट पर हवाई जहाज लैंड कर गया,10 मिनट बाद जैसे ही सब प्लेन से बाहर आए, हरबंस जी ने झुककर जमीं पर हाथ छू कर माथे से लगा लिया वर्षों बाद जन्म भूमि पर उनके पावं पड़े थे,सबकुछ भूल वे चारों ओर निहार रहे थे।कुछ भी नहीं बदला था,वे ही सुरम्य दृश्य,सुहावना मौसम,सब कुछ वही,बदला था तो तब यहां का मानुष बदला था।एयरपोर्ट के बाहर कार टैक्सी खड़ी थी,उसमें बैठ पहले सीधे पहलगाम गए,पूरे दो दिन रहने के बाद श्रीनगर आ गए, डल झील में हाउस बोट में रात्रि में रहे।अगले दिन लाल चौक गए।आज लाल चौक पर तिरंगा लहरा रहा था।इन तीन दिनों में हरबंस जी ने महसूस किया कि सब कारोबार होटल हो या बाजार सब मुस्लिम समुदाय के हाथ में था,कारण भी यह था 1990में सब कश्मीरी पंडित,हिंदू यहां से पलायन कर गए थे।अब सब स्थान पर हरबंस जी कश्मीरियत की झलक देख रहे थे,निहायत सलीके सब पेश आ रहे थे,अपने पन का अहसास फैला पड़ा था।पता नहीं यह व्यापारिक मजबूरी थी या फिर यहां दिलों में परिवर्तन आ गया था। हरबंस जी को पुराने दिन जो यहां बिताए थे उनमें और अब में कोई अंतर नहीं लग रहा था।अचानक मुन्ना बोला पापा आप बताते थे कि यहां हमारी फैक्ट्री हुआ करती थी,चलो पापा वहां चलते हैं,देखते है अब भी फैक्ट्री चल रही है या बंद हो गई।आप पुरानी यादें ताजी करना और हम अपने अतीत को देखेंगे। इच्छा हरबंस जी की भी थी,पर वसीम के अमानुषिक व्यवहार याद आने के कारण उनका मन खट्टा हो गया,पर वे मुन्ना की बात टाल नहीं सके।
फैक्ट्री चल रही थी,गार्ड अंदर ले गया। वेटिंग हाल में पहुंच कर सब चौंक पड़े,वही एक कोने में हरबंस जी का सलोनी के साथ का एक स्टेचू लगा था,उसे करीने से सजाया गया था।तभी एक युवक जिसके चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी थी,वह लपक कर आया और हरबंस जी के पांव छू लिये।सभी आश्चर्यचकित थे,यह क्या है?तभी वह युवक बोला बाबूजी ताज्जुब मत करो,बस हमें माफ कर दो,यह सब आपका था,आपका ही रहेगा,लौट आओ बाबूजी। हरबंस जी ने उस युवक के कंधे पर हाथ रख दिया,आँखो के पानी को किसी तरह रोक उन्होंने उस युवक की ओर देखा।
बाबूजी वसीम मेरे अब्बा हुजूर हैं, मेरा नाम अब्दुल है,उन्होंने ही हिदायत दी और कहा भी है, बताया भी है कि हरबंस जी हमारे सरपरस्त रहे हैं,यह सब धन दौलत सब उनकी है।अबू कह रहे थे,हम अहसान फरामोश और वहशी निकले, अपनो के साथ ही वहशीपन कर बैठे।बाबूजी आप अब्बू के पास चलो वे भी आपसे माफी मांगना चाहते हैं।सब कुछ अविश्वसनीय सिनेमाई अंदाज में घट रहा था,बिना कुछ सोचे हरबंस जी व मुन्ना,अब्दुल के साथ वसीम से मिलने भी चल दिए। रास्ते भर वसीम का उस रात का क्रूर अट्टहास भरा चेहरा और अपनी सलोनी का पहाड़ी से कूद जाना,मन में वितृष्णा पैदा कर रहा था
अब्दुल उसी बंगले में ले आया जो कभी हरबंस जी का हुआ करता था।बंगले को देख हरबंस जी भाव विभोर हो गए।उनके कदम अपने आप अंदर की ओर बढ़ चले।दौड़ कर अब्दुल अंदर गया जोर से चिल्लाया, अब्बू देखो तो कौन आए हैं,अपने बाबूजी आ गए अब्बू।
अंदर कमरे में एक पलंग पर लकवाग्रस्त हड्डियों का ढांचा पड़ा था,गौर से देखने पर पता चला अरे ये तो वसीम है।वसीम ने धीरे से आँखें खोली अब्दुल के सहारे से कुछ उठकर उसने हरबंस जी के पैर पकड़ लिये।बाबूजी मुझे माफ कर दो।मै लाउड स्पीकर के एनाउंसमेंट से तथा बिरादरी के जमघट से बहक गया था।मै तब से एक रात भी चैन से नहीं सो पाया हूं,बाबूजी मेरी आंखों के सामने मेरी आपा सलोनी मेम पहाड़ी से कूद गई।मै जीते जी जह्नूम चला गया।बाबूजी सब बंगला,फैक्ट्री सब संपत्ति आपकी ही है,बाबूजी,अब्दुल आपका चाकर बन कर रहेगा।बाबूजी अब यही आकर अपनी अमानत संभाल लो,बाबूजी।
श्रीनगर से लौटते हरबंस जी सोच रहे थे,अपनी जन्म अपनी कर्म भूमि में वापस आना किसे अच्छा नहीं लगेगा,पर अबकी बार फिर यदि लाउड स्पीकर की अजान से,बिरादरी के जमघट के इरादों से अब्दुल बदल गया तो?? रिश्तों की जमा पूंजी क्या अब मिल सकेगी?
इस प्रश्न को लेकर हरबंस कौल दिल्ली लौट आये। अब मन को तसल्ली थी,मरने से पहले वे अपनी जन्म भूमि और अपने घर को एक बार देख आए हैं।
अप्रकाशित, स्वरचित
बालेश्वर गुप्ता,नोएडा
#रिश्तों की जमा पूंजी पर आधारित