भाई, मै तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूँ – मंजू ओमर

यह  घर यह प्रॉपर्टी और घर का सारा रुपया पैसा पर बेटे का हक होता है बेटियों का नहीं समझी सिया। तुमने मां को रख लिया इसका मतलब यह नहीं सारी प्रॉपर्टी पर हक तुम्हारा हो गया सूरज बोला। मैं तुम्हारी तरह स्वार्थी नहीं हूं भाई जो मैं यहां पैसे या प्रॉपर्टी के लालच में मां को लेकर आएंगे। वह तो मां बेसहारा हो गई थी

उनका कोई देखने सुनने वाले नहीं था, चल फिर नहीं सकती थी इसलिए लेकर आई हूं यहां। जब तक दीपक था तब तक तो मां की सेवा करता था, अब उसके अचानक चले जाने से मां बेसहारा हो गई थी कौन उनकी देखभाल करता। हम दोनों बहनों का भी अपना परिवार है उसको भी देखना है। अब हम लोग अपने पति और बच्चे घर को छोड़कर अकेले यहां मां के पास नहीं रह सकते ना। अब दीपक के न रहने पर मां की जिम्मेदारी तुम्हारी बनती थी,

लेकिन तुम तो अपनी जिम्मेदारी से भाग गए,और अब याद आ रही है घर की प्रॉपर्टी रुपया पैसा। भाई हम लोग इतने स्वार्थी नहीं है जो प्रॉपर्टी के चक्कर में मां को यहां ले आए हैं । उसका पैसा रूपया सब मां के अकाउंट में जमा है हम लोगों ने नहीं लिया है इतने स्वार्थी नहीं है। अब माँ जिसको देना चाहेंगी देंगी। 

          मां भी नहीं चाहती इस बुढ़ापे में बेटियों के ससुराल में रहे। कभी उनके घर का गिलास पानी भी नहीं पिया लेकिन क्या करें वह भी मजबूर है। किसके सहारे रहती। तुमसे तो कहा था की माँ की देखभाल करो तो तुम जान छुड़ाकर भाग गए । कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता और जब बात रूपए पैसे की  प्रॉपर्टी की आई तो आ गए

हिस्सा बंटाने।भाई हम दोनों बहने इतने स्वार्थी नहीं  है। वैसे चिंता है तो ले मां को साथ रखो और रहो उनके साथ। और उनकी  सेवा करो । पैसे लेने से सब आ जाते हैं लेकिन बात जिम्मेदारी उठाने की आती है तो सब भाग खड़े होते हैं। 

       रमा जी के परिवार मे उनके पति सुंदर बाबू ओर दो बेटियां और दो बेटे थे। घर मे सुंदर बाबू के तीन बडे और भाई भी थे । सभी एक ही घर मे रहते थे। हाँ सबके हिस्से अलग अलग थे। सुंदर बाबू के पिता जी अभी थे। और वो बलदेव प्रसाद एक सुलझे हुए और गांव के सम्मानित व्यक्ति थे।

पंचायत मे भी हिस्से दारी थी उनकी। सुंदर बाबू के पिता जी बलदेव प्रसाद चाहते थे कि सभी लडके अपना अच्छे से कोई काम धंधा करे और ठीक से जिंदगी बसर करे। गाँव मे पहले पढाई की ज्यादा सुविधा नहीं होती थी तो बेसिक सी पढाई लिखाई हो जाती थी।

गाँव मे कुछ खैती बाडी थी और बड़ा सा घर था। समय रहते ही बलदेव जी ने सबको उनका हिस्सा दे दिया था और बोल दिया था तुम लोग अपने हिसाब से जो कुछ काम धंधा करना चाहते हो कर सकते हो, और मुझसे जिसकी जो मदद होगी मै कर दूगां। इसमें सुंदर के सबसे बडे भाई ने खेती की जगह पर खेती करने लगे थे। उसी मे खुश थे।

उनके एक बेटी थी जिसकी शादी हो चुकी थी और दोनों पति पत्नी खुश थे। उनके लिए वही र्पयाप्त था। बलदेव जी के दूसरे बेटे ने वही पर पेंट और डिस्टेंपर की दुकान खोल ली। और सुंदर बाबू ने कपड़े की दुकान खोल दी। और एक भाई किसी फैक्ट्री मे नौकरी करता था। सुंदर बाबू का मन काम धंधा मे लगता न था, बस इधर उधर घूमते रहते थे। घर परिवार पर भी ध्यान नही देते थे। लडके लडकियां क्या पढ रहे है क्या नही उनको कुछ मतलब नहीं होता था।

बच्चों को जो बेसिक शिक्षा मिलनी चाहिए थी वह भी नहीं मिली। बीच बीच में जब भी जरूरत पड़ती पैसे की तो पिता जी से मांगने चले जाते और न देने पर गाली गलौज करते। सब मिलाकर उनकी आदत सही न थी। 

           दूसरे भाई जिन्होंने पेंट की दुकान खोली थी अच्छी मेहनत की और बिजनेस अच्छा चल गया। उनकी दोनों बेटे भी काम में लग गए। और यहां सुंदर जी के यहां दोनों बेटे पढ़ ना पाए और ना कुछ कर पाए। बड़ी बेटी की शादी बलदेव जी ने कुछ पैसे लगाकर कर दी थी।

सुंदर का बड़ा बेटा 15 साल का हो गया था। वह भी गलत संगत जो पड़ गया था। एक बार दोस्तों के साथ पिक्चर देखने गया वहां हाल में इसके कुछ दोस्तों ने किसी महिला की सोने की चेनखीच ली उसमें  उसमें सुंदर के बड़े बेटे का नाम भी आ गया वह घर से भाग गया और वहां तक वापस नहीं लौटा। 

        इधर घर में सुविधाओं की कमी थी पैसा नहीं था ।ऊपर का हिस्सा रहने को मिला था। और एक दिन पता लगा की सुंदर बाबू को कोई गंदी बीमारी हो गई है और वह इस दुनिया से चले गए

अब दूसरा बेटा दीपक बड़ा हो गया था तो घर चलाने के लिए दुकान पर बैठने लगा। सुंदर की दूसरी बेटी सुनीता की शादी किसी तरह उसके मामा लोग लोगों ने पैसा लगाकर करा दिए। रमा जी को भी जरूरत पड़ने पर उनके भाई लोग कभी कभार कुछ पैसे भेज दिया करते थे। 

            रामा देवी को थायराइड और अनेक तरह की बीमारियों ने घेर लिया था। शरीर बहुत भारी हो गया था और इलाज नहीं हो पा रहा था। अब स्थिति यह हो गई थी कि वह  न तो चल पाती थी ना कोई काम कर पाती थी। छोटा बेटा साथ रहता था  वो ही देखभाल करता था बस ऐसे ही चला रह चल रहा था।

लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था, 45 साल की उम्र में बेटा एक दिन सोया तो हमेशा के लिए सो गया उठा ही नहीं। अब रामा देवी की दुनिया ही उजड गई। क्या करें किस सहारे रहे। हां इस बीच बड़ा बेटा सूरज कभी कभारआने लगा था। 

              जब फोन पर बड़े बेटे सूरज को छोटे भाई की मृत्यु की खबर दी गई तो वह दो दिन वापस आया,,और 2 दिन रहकर जाने लगा। तो बहनों ने कहा अब यहीं रहो और मां की देखभाल करो। लेकिन वह साफ कर दिया कि मैं नहीं कर सकता मैं तो जा रहा हूं । और चला गया मां को छोड़कर । अब कभी घर में कोई जिम्मेदारी उठाई नहीं है तो अब कैसे उठाएंगे। अब रमा देवी  घर पर परेशान होती क्या करें बेटा स्वार्थी निकल  गया।

लेकिन फिर  दोनों बेटियों ने सहारा दिया। उनको घर से निकाल कर अपने घर किसी तरह ले आई । जिन बेटियों के घर में कभी एक गिलास पानी नहीं पिया था अब रामादेवी उन बेटियों के घर पर रह रही है। और फिर रामादेवी का जो घर था और दुकान था उसको बेचकर उन्होंने कुछ पैसे बेटियों को हाथ में दे दिया और कुछ अपने पास रख लिए। 

         इन्हीं पैसों की वजह से बड़ा बेटा सूरज आया और अपना हक जताने लगा ।।फिर रमादेवी ने कहा तुमने अपनी जिम्मेदारी तो निभाई नहीं घर से भाग गया मुझे छोड़कर । अब हमारी बेटियां कर रही है तो तू उन्हें  स्वार्थी कह रहा है, नहीं है स्वार्थी बेटियां । वह सहारा ना देती तो मैं तो जीते जी मर जाती । जा यहां से अब कभी अपनी सूरत मत दिखाना । मेरे पास जो कुछ भी है बेटियों को ही दे जाऊंगी तेरी लिए कुछ नहीं है समझा। और फिर सूरज अपना सा मुंह लेकर चल रह गया

        दोस्तों जहां बेटे साथ नहीं देते तो बेटियां आगे आती है तो लड़के कहते हैं की बहन स्वार्थी हैं।।पैसा लेने के लिए माँ को रख लिया ।।स्वार्थी कैसे है मां-बाप है तो यदि वह अकेले हैं बेसहारा है तो बेटियां उन्हें अकेले कैसे छोड़दे  हैं कोई तो साथ देगा ना चाहे बेटियां हो तो क्या हुआ

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

26 जून

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