मुझे माफ़ कर दो 

राघव और काव्या की सगाई हुए अभी मुश्किल से तीन महीने ही बीते थे। यह वह समय था जब दो अजनबी एक-दूसरे की आदतों, पसंद और नापसंद को समझने की कोशिश कर रहे थे। दोनों परिवारों की रजामंदी से यह रिश्ता तय हुआ था, इसलिए शुरू से ही उन दोनों को मिलने-जुलने की पूरी आज़ादी थी। वीकेंड पर कभी कॉफी पीने जाना, कभी शादी की शॉपिंग के लिए घंटों बाज़ारों में घूमना और कभी यूं ही लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाना—ये सब उनके लिए आम बात हो गई थी। काव्या के माता-पिता ने भी कभी उनके इस तरह मिलने पर कोई ऐतराज़ नहीं जताया था। आख़िरकार, कुछ महीनों बाद वे हमेशा के लिए एक होने वाले थे।

काव्या को सूफी संगीत का बहुत शौक था। शहर में एक बहुत मशहूर सूफी गायक का कॉन्सर्ट होने वाला था और राघव ने बड़ी मुश्किल से वीआईपी पास का इंतज़ाम किया था। वह काव्या को सरप्राइज़ देना चाहता था। शाम को जब वह पूरी तरह तैयार होकर काव्या के घर पहुंचा, तो वहां का माहौल कुछ बदला-बदला सा लगा। ड्राइंग रूम में काव्या के ताऊजी बैठे थे, जो गांव से अचानक शहर आ गए थे। काव्या के पिता, जो हमेशा राघव का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से करते थे, आज नज़रे चुरा रहे थे।

राघव ने उत्साह से पास दिखाते हुए कहा कि वे कॉन्सर्ट के लिए लेट हो रहे हैं। अचानक ताऊजी ने अपना चश्मा नाक पर टिकाते हुए गंभीर आवाज़ में कहा, “हमारे परिवारों में सगाई का मतलब शादी नहीं होता, बेटा। जब तक सात फेरे न हो जाएं, कुंवारी लड़कियों का इस तरह रात-बिरात अपने मंगेतर के साथ घूमना हमारी मर्यादा के ख़िलाफ़ है।”

राघव स्तब्ध रह गया। उसने सवालिया नज़रों से काव्या के पिता की ओर देखा, लेकिन उन्होंने मजबूरी में सिर झुका लिया। काव्या अंदर कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी रो रही थी। जिस घर में कल तक सब कुछ सामान्य था, वहां अचानक इस ‘परंपरा’ ने कहां से जन्म ले लिया? राघव का स्वाभिमान आहत हुआ। वह कुछ नहीं बोला, बस चुपचाप वहां से मुड़ा। घर से बाहर निकलते ही उसने गुस्से में दोनों वीआईपी पास के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और हवा में उड़ाता हुआ अपनी गाड़ी में बैठ गया।

“क्या हुआ, कॉन्सर्ट देखने नहीं गए तुम दोनों? काव्या की तबीयत तो ठीक है न?” घर में कदम रखते ही राघव की माँ, सुमित्रा जी ने उसे अकेले और गुस्से में लौटते देखकर पूछा।

“नहीं माँ, असल में उनके घर की महान परंपरा इसकी इजाज़त नहीं देती,” राघव ने कटाक्ष करते हुए जूते उतारे।

“कैसी परंपरा की बात कर रहा है तू? कुछ दिन पहले ही तो तुम दोनों नाहरगढ़ गए थे।” सुमित्रा जी ने हैरानी से पूछा।

“यही कि शादी से पहले उनकी संस्कारी बेटी अपने मंगेतर के साथ रात में बाहर नहीं जा सकती। ताऊजी आ गए हैं उनके घर, और अचानक से पूरे घर को संस्कारों का बुखार चढ़ गया है।” राघव ने सोफे पर धम्म से बैठते हुए कहा, “अगर इतना ही परंपराओं का शौक था, तो पहले दिन ही बता देना चाहिए था। मुझे कोई शौक नहीं था उनके घर जाकर इस तरह अपना अपमान करवाने का।”

सुमित्रा जी सब कुछ समझ गईं। उन्होंने एक गिलास पानी राघव की तरफ बढ़ाया और उसके पास बैठ गईं। “बेटा, जब इंसान गुस्से में होता है तो उसे सिर्फ अपना अपमान दिखाई देता है। क्या तूने एक पल के लिए भी यह सोचा कि काव्या पर क्या बीत रही होगी?”

राघव ने मुंह फेर लिया। “वह भी तो अपने पिता से कुछ कह सकती थी।”

“यही तो तुम्हारी पीढ़ी की नासमझी है,” माँ ने प्यार से राघव के सिर पर हाथ फेरा। “तुम सोचते हो कि हर बात पर बगावत करना ही सही है। काव्या के पिता ने तुम्हारी सगाई अपनी मर्ज़ी से की, तुम्हें पूरी आज़ादी दी। लेकिन परिवार में कुछ बड़े-बुज़ुर्ग होते हैं, जिनकी सोच पुराने ज़माने की होती है। एक पिता जब अपनी बेटी का रिश्ता करता है, तो वह समाज और परिवार दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। ताऊजी के सामने अगर वे काव्या को तुम्हारे साथ भेज देते, तो ताऊजी काव्या को ही ताने देते। उन्होंने काव्या को तुम्हारे साथ जाने से नहीं रोका, बल्कि अपनी बच्ची को अपनों के ही तानों से बचाया है।”

माँ की बातों ने राघव के गुस्से पर ठंडे पानी का काम किया। उसका ध्यान काव्या के उस रुआंसे चेहरे पर गया, जो उसने दरवाज़े की ओट में देखा था।

“रिश्ते हठ से नहीं, समझदारी से निभाए जाते हैं। जो लड़की तुम्हारे लिए अपना पूरा घर छोड़कर आ रही है, क्या तुम उसके परिवार की एक छोटी सी बंदिश को अपने अहंकार से बड़ा मान लोगे?” सुमित्रा जी ने समझाते हुए कहा।

रात को राघव के फोन की स्क्रीन पर काव्या का नाम चमक उठा। राघव ने तुरंत फोन उठाया। उधर से सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आ रही थी। “मुझे माफ़ कर दो राघव,” काव्या रोते हुए बोली। “मैं तुम्हारे साथ जाना चाहती थी, लेकिन ताऊजी के सामने पापा कुछ बोल नहीं पाए। मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि तुम्हारा मूड ख़राब हो गया और तुम्हारी मेहनत बेकार गई।”

“रो क्यों रही हो पगली?” राघव की आवाज़ में अब कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ठहराव था। “माँ ने मुझे समझा दिया है। मैं तुम्हारे परिवार की स्थिति समझ सकता हूँ। कॉन्सर्ट तो हम शादी के बाद भी देख लेंगे। तुम्हारे पापा का सम्मान मेरे लिए किसी भी कॉन्सर्ट से बढ़कर है।”

अगले दिन राघव काव्या के घर दोबारा गया, लेकिन इस बार किसी शिकायत के साथ नहीं, बल्कि ताऊजी के लिए उनके मनपसंद रसगुल्ले लेकर। उसने ताऊजी के पैर छुए और उनके पास बैठकर उनके गांव का हालचाल पूछा। राघव की इस समझदारी और विनम्रता ने उस बर्फ को पिघला दिया जो कल रात जम गई थी। ताऊजी भी समझ गए कि उन्होंने अपनी बच्ची के लिए एक बेहतरीन लड़का चुना है, जो न केवल काव्या की खुशी समझता है, बल्कि परिवार के मान-सम्मान की भी कद्र करता है। एक टूटने के कगार पर पहुंचा पल, समझदारी के एक छोटे से कदम से हमेशा के लिए मज़बूत हो गया।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या नए रिश्तों में पुरानी पीढ़ी की दखलंदाजी हमेशा गलत होती है, या कभी-कभी हमें उनके नज़रिए को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए? अपनी राय कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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