उनके गालों पर एक आँसू लुढ़क आया था। यह आँसू इस बात का नहीं था कि उन्हें खाने के लिए फल नहीं मिले। दर्द की चुभन उन फलों की कमी की नहीं थी। पीड़ा तो इस बात की थी कि वह घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था, आज उसी घर में वे एक अनचाहे मेहमान बन गए थे। वह संकोच, जिसने कल रात उनके काँपते हाथों को फ्रिज में रखे फलों को छूने से रोक दिया था, वह संकोच किसी और ने नहीं, बल्कि उनके अपने ही बनाए घर के माहौल ने पैदा किया था।
शहर के उस व्यस्त और पॉश इलाके में खड़ा तीन मंजिला मकान ‘आशियाना’ बाहर से जितना शानदार दिखता था, भीतर से उतना ही शांत और खामोश था। यह मकान कैलाश बाबू ने अपनी जीवन भर की जमापूंजी, प्रोविडेंट फंड और अपनी पत्नी सावित्री के कुछ गहने बेचकर बनवाया था। जब इस घर की नींव खोदी जा रही थी, तब कैलाश बाबू चिलचिलाती धूप में खड़े होकर ईंटों की गिनती किया करते थे। उनका सपना था कि उनका बेटा मयंक जब बड़ा होकर इंजीनियर बनेगा, तो उसे एक ऐसा घर मिले जहाँ उसे कभी किसी चीज़ की कमी न हो। समय का पहिया घूमा, मयंक सचमुच एक बड़ा इंजीनियर बन गया, उसकी शादी भी एक बहुत ही पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की नीतिका से हो गई। घर का ढांचा वही रहा, लेकिन अंदर की दुनिया पूरी तरह से बदल गई। पुरानी लकड़ी की कुर्सियों की जगह इटैलियन सोफों ने ले ली, और कैलाश बाबू का वह बड़ा सा कमरा, जहाँ से पूरे घर का आंगन दिखता था, अब मयंक के होम-थिएटर रूम में तब्दील हो गया था। कैलाश बाबू को पीछे वाला वह कमरा दे दिया गया, जिसकी खिड़की से बाहर का आसमान नहीं, बल्कि पड़ोसी की दीवार दिखती थी।
पत्नी सावित्री के गुज़र जाने के बाद कैलाश बाबू वैसे भी बहुत खामोश रहने लगे थे। उम्र पचहत्तर के पार हो चुकी थी और शरीर अब बीमारियों का घर बनने लगा था। पिछले ही हफ्ते डॉक्टर ने उनकी गिरती हुई सेहत और खून की भारी कमी को देखते हुए सख्त हिदायत दी थी कि उन्हें रोज़ाना ताज़े फलों का सेवन करना चाहिए, विशेषकर कीवी, अनार और ड्रैगन फ्रूट जैसे फल जो उनके प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन को बढ़ा सकें। डॉक्टर ने तो यहाँ तक कहा था कि अगर खान-पान में कोताही बरती गई, तो कमज़ोरी इतनी बढ़ जाएगी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ सकता है। मयंक उस समय उनके साथ ही था और उसने डॉक्टर के सामने हामी भी भरी थी कि वह अपने पिता की डाइट का पूरा ख्याल रखेगा।
बुधवार की शाम थी। नीतिका सुपरमार्केट से ढेर सारा सामान लेकर लौटी। उसके हाथों में कई बड़े-बड़े बैग थे। एक बैग पूरी तरह से महँगे और विदेशी फलों से भरा हुआ था। उसमें लाल सुर्ख अनार, हरे-भरे कीवी, ड्रैगन फ्रूट और कुछ खास किस्म के विदेशी सेब थे। कैलाश बाबू उस समय डाइनिंग टेबल के पास बैठकर अपना चश्मा साफ़ कर रहे थे। फलों से भरे उस बैग को देखकर उनके मन में एक अजीब सी तसल्ली हुई। उन्हें लगा कि शायद मयंक को डॉक्टर की बात याद रही होगी और उसने ही नीतिका को ये फल लाने के लिए कहा होगा। बुढ़ापे में शरीर जब साथ छोड़ने लगता है, तो इंसान को अपनों से बस एक छोटी सी उम्मीद, एक छोटे से खयाल की आस रहती है।
नीतिका ने फलों को निकालकर रसोई के बड़े से डबल-डोर फ्रिज में करीने से सजाना शुरू किया। सामान रखते हुए उसने अपने मोबाइल पर किसी से बात करते-करते, बिना कैलाश बाबू की तरफ देखे, कुछ इस तरह कहा जिससे उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूंज गई— “हाँ यार, सब ले आई हूँ। ये सारे इम्पोर्टेड फल मैंने फ्रिज के नीचे वाले हिस्से में रख दिए हैं। इस शनिवार को मयंक के बॉस और कुछ वीआईपी गेस्ट्स डिनर पर आ रहे हैं न, तो उनके लिए मुझे स्पेशल फ्रूट कस्टर्ड और एक्सोटिक डेज़र्ट बनाना है। बहुत मुश्किल से ये फ्रेश फल मिले हैं, बस अब इन्हें कोई हाथ न लगाए वरना मेरी पूरी डिश खराब हो जाएगी।”
नीतिका की यह बात सीधे कैलाश बाबू के कानों में पड़ी। उन्होंने अपना चश्मा वापस पहना और चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गए। उन्होंने नीतिका से कुछ नहीं कहा। उनके होठों पर एक हल्की सी, फीकी मुस्कान थी, लेकिन उस मुस्कान के पीछे का दर्द केवल वही समझ सकते थे।
रात का दूसरा पहर था। दीवार घड़ी में रात के दो बज रहे थे। कैलाश बाबू को ज़ोरों की प्यास लगी थी और उनका गला सूख रहा था। कमज़ोरी के कारण उनके पैरों में दर्द उठ रहा था। उन्होंने अपनी दवा की शीशी उठाई, पर पानी का जग खाली था। वे धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए अपने कमरे से बाहर निकले और रसोई की ओर गए। रसोई में घुप अंधेरा था, केवल फ्रिज की हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी। उन्होंने पानी की बोतल निकालने के लिए फ्रिज का दरवाज़ा खोला।
ठंडी हवा का एक झोंका उनके चेहरे पर लगा। उसी रोशनी में उनकी नज़र नीचे रखे उन फलों पर गई। लाल अनार और हरे कीवी देखकर उनके कमज़ोर शरीर ने जैसे एक मूक पुकार लगाई। डॉक्टर की हिदायत उनके कानों में गूंजी कि उन्हें इन फलों की कितनी सख्त आवश्यकता है। उनका एक काँपता हुआ हाथ अनायास ही कीवी की ओर बढ़ा। एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह एक फल ले लें और सुबह नीतिका को बता देंगे कि उन्हें रात में अचानक बहुत कमज़ोरी लग रही थी।
लेकिन तभी… उनका हाथ बीच हवा में ही रुक गया।
“शनिवार को बॉस आने वाले हैं… इन्हें कोई हाथ न लगाए…” नीतिका के वो शब्द किसी अदृश्य दीवार की तरह उनके सामने खड़े हो गए। कैलाश बाबू के हाथ पीछे हट गए। उन्होंने फ्रिज के दरवाज़े को देखा, फिर उन फलों को, और अंततः एक गहरी साँस लेकर उन्होंने केवल पानी की बोतल निकाली। दवा खाई, और वापस अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गए। उस रात उन्हें नींद नहीं आई। वे बस छत के पंखे को देखते रहे और सोचते रहे कि कैसे एक समय था जब वे खुद भूखे रहकर मयंक के लिए बाज़ार के सबसे अच्छे फल और मिठाइयाँ लाया करते थे। तब इस घर में कोई भी चीज़ किसी खास मेहमान के लिए रिज़र्व नहीं होती थी, बच्चों का हक़ सबसे पहले होता था।
अगले दिन दोपहर का समय था। कैलाश बाबू का छह साल का पोता कबीर स्कूल से वापस आया। वह बहुत शरारती और चंचल था। स्कूल से आते ही उसने अपना बैग सोफे पर फेंका और सीधा रसोई में घुस गया। उसे भूख लगी थी। उसने बिना किसी से पूछे फ्रिज खोला और उसी बास्केट में से दो कीवी, एक अनार और एक सेब निकाल लिया। कबीर को फल काटना नहीं आता था, इसलिए उसने चाकू से कीवी को आड़ा-तिरछा काट डाला, उसका गूदा ज़मीन पर गिरा दिया। अनार को छीलने की कोशिश में उसने उसके दाने पूरे किचन के फर्श पर बिखेर दिए। सेब का बस एक छोटा सा हिस्सा खाकर उसने बाकी सेब डस्टबिन में डाल दिया। वह फल खाने से ज्यादा उनसे खेल रहा था।
किचन से आ रही आवाज़ सुनकर नीतिका दौड़ती हुई बाहर आई। उसने फर्श पर बिखरे फलों और कबीर को देखा। कैलाश बाबू भी अपने कमरे से बाहर आ गए थे और चुपचाप दरवाज़े के पास खड़े यह सब देख रहे थे।
नीतिका ने कबीर को बिल्कुल नहीं डांटा। बल्कि उसने प्यार से कबीर को गोद में उठा लिया और उसके गाल चूमते हुए बोली, “अरे मेरा बच्चा! इतनी ज़ोर से भूख लगी थी मेरे बेटे को? तुमने क्यों काटे फल, मम्मा को बोलते मैं काटकर देती। और ये क्या, तुमने तो सब गिरा दिया। कोई बात नहीं, तुम ये सेब खाओ, मैं मेहमानों के लिए आज शाम को ऑनलाइन और फ्रूट्स ऑर्डर कर दूँगी। मेरे बच्चे से बढ़कर थोड़े ही है कोई बॉस या मेहमान!”
यह कहकर नीतिका ने हँसते हुए कबीर को गले लगा लिया।
कैलाश बाबू कुछ पल तक उस दृश्य को देखते रहे। कबीर के बिखेरे हुए अनार के लाल दाने फर्श पर पड़े हुए थे। उन दानों को देखकर कैलाश बाबू ने अपनी आँखें मूँद लीं। वे धीमे कदमों से वापस अपने कमरे में आए और दरवाज़ा बंद कर लिया।
उनके गालों पर एक आँसू लुढ़क आया था। यह आँसू इस बात का नहीं था कि उन्हें खाने के लिए फल नहीं मिले। दर्द की चुभन उन फलों की कमी की नहीं थी। पीड़ा तो इस बात की थी कि वह घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था, आज उसी घर में वे एक अनचाहे मेहमान बन गए थे। वह संकोच, जिसने कल रात उनके काँपते हाथों को फ्रिज में रखे फलों को छूने से रोक दिया था, वह संकोच किसी और ने नहीं, बल्कि उनके अपने ही बनाए घर के माहौल ने पैदा किया था।
उन्होंने महसूस किया कि कैसे एक ही छत के नीचे दो अलग-अलग पीढ़ियों के लिए अधिकारों के पैमाने बदल जाते हैं। पोते के लिए जो फल खिलौने बन गए, वे एक बीमार पिता के लिए वर्जित हो गए। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन उन दीवारों के बीच खिंची वह अनकही लकीर इतनी गहरी थी कि एक पिता अपने ही घर में, अपने ही पैसों से खरीदी गई चीज़ पर अधिकार जताने से डरने लगा था। उन्होंने चुपचाप अपनी आँखें पोंछीं, और अपनी नियति को उसी बंद कमरे की खामोशी के साथ स्वीकार कर लिया।
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मूल लेखिका : डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत)