भाभी आप तो कभी हमारे साथ बैठतीं हीं नहीं है। आखिर हम ननदें हैं आपकी ,थोड़ा बहुत समय हमारे लिए भी निकाल लिया करें। संगीता जिसकी शादी को अभी कुछ ही समय हुए थे।पति रोहित की तीन बहनें और मां – पापा से भरा पुरा परिवार था। जूही बड़ी ननद एम .ए. कर रही थी, मंझली रुही बी.ए. का दूसरा साल तीसरी कली बारहवीं कक्षा में थी। रोहित घर का सबसे बड़ा बेटा था तो संगीता बड़ी बहू थी लेकिन उम्र में जूही और रूही के बीच की थी।
बी.ए. पास ही किया था की रोहित के घर से रिश्ता आ गया। सरकारी नौकरी बड़ी पोस्ट तो माता पिता ऐसा रिश्ता हांथ से जाने नहीं देना चाहते थे। संगीता ने बहुत जिद्द की थी की उसे आगे पढ़ाई करके नौकरी की तैयारी करनी है पर पापा ने साफ कह दिया था कि ” जो भी मन है शादी के बाद करना और भी जिम्मेदारियां हैं तुम्हारे भाई-बहनों को भी तो देखना है। मां चाह कर भी कुछ नहीं कर पाई थी। चार भाई बहन थे। बड़े भाई की शादी हो चुकी थी और छोटे भाई बहन पढाई कर रहे थे।
ससुराल में आकर संगीता को लगा की जैसे इस घर में मेरे आने से पहले कोई भी काम कैसे होता था। ऐसा लगता था की मुफ्त की नौकरानी मिल गई हो सबको। सांस लेने की फुर्सत नहीं ऊपर से ये भी ताने की” आप तो हमारे साथ बैठतीं हीं नहीं हैं भाभी बस काम ही काम में लगी रहतीं हैं”।जरा सा ऊंचा नीचा हो जाए तो मांजी तुंरत ही सुना देती कि,” बहू क्या सिखाया है तुम्हारी मां ने?”
सुबह से चकरघिन्नी जैसी चलती ही रहती लेकिन परिवार का कोई भी सदस्य संतुष्ट नहीं होता। रोहित तो श्रवण कुमार थे ।जितने लोग उतने नखरे ।चार लोग तो चार तरह का नाश्ता बनता। पापा जी तो दलिया ही खाते हैं,बहू मेरे गले तो दलिया उतरती नहीं ऐसा करना बेसन के दो चिल्ले बना देना और हां रोहित और तीनों ननदों का टिफिन समय से बना देना।”
एक दिन कामवाली बाई कमला से देखा नहीं गया तो बोली भाभी,” अम्मा जी अपनी बेटियों से काम नहीं करवातीं,इतनी बड़ी – बड़ी लड़कियां हैं अगर आपके साथ हांथ बटाए तो आप को भी आराम मिल जाए और आप भी समय पर कुछ खा पी लिया करो। सुबह के एक कप चाय पर आधा दिन निकाल देती हो।”
संगीता मुस्कुरा दी क्योंकि कुछ भी कहना अपनों की बुराई करना ही तो था लेकिन जो बात कमला को दिखाई और सुनाई देती है वो मांजी को क्यों नहीं? मैं भी तो किसी की बेटी हूं,कल को दीदी भी शादी करके जाएंगी और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा और जिसे कामकाज से लेना-देना ही नहीं है तो उनको ताने नहीं सुनने मिलेंगे क्या?
मन की उथल-पुथल के साथ काम निपटाने में लग गई। बहुत थक जाती आखिर वो भी छोटी ही थी। मां ने कामकाज सब सिखाया था पर हम सब मिलकर काम करते अकेले नहीं और भाभी को कभी भी अकेला नहीं छोड़ा था रसोईघर में।वो स्वयं बाहर से मदद करतीं और हमें उनका हांथ बंटाने को हमेशा कहतीं। “सब लोग साथ मिलकर काम करेंगे तो बहू का काम भी निपट जाएगा और साथ ही वो खाली समय में अपने पसंदीदा काम कर सकती है।घर की सदस्य है नौकरानी नहीं है”।हम चिढ़ाया करते मां को कि,” हां – हां बहू के साथ ही रहना है अंत में तो मिलाकर रखना चाहती हो ना मां?” मां हंस देती और कहती कि,” बेटा वो भी किसी की बेटी है। उसके भी अरमान होंगे अपने ससुराल में अगर हम उसे अपना नहीं समझेंगे तो वो कैसे हमें अपना मानेंगी? अपना घर छोड़कर आई है तो हमारी जिम्मेदारी बनती है की हम पहले हांथ बढ़ाए और उसे ये परिवार अपना लगे ना की कैदखाना और मैं जेलर” ।
कितनी सुलझी हुई हैं मां और समझदार भी संगीता की आंखें नम हो गई। साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुए जल्दी – जल्दी काम खत्म करने लगी।आज उसका मन उचट गया था, मां से मिलने का बहुत मन कर रहा था।
मायका दूर नहीं था तो सोची मां जी से पूछतीं हूं अगर जाने देंगी तो शाम तक आ जाऊंगी वापस।
खाना – पीना निपटाने के बाद मांजी के कमरे में गई। मां!” आप कहें तो मैं घर हो आऊं, मम्मी से मिलने का मन कर रहा है।”
बहू!” मुझे तो कोई एतराज़ नहीं है लेकिन जल्दी – जल्दी घर आओगी जाओगी तो मायके में सम्मान खत्म हो जाता है।इस घर को अपना घर समझ कर जितनी जल्दी अपनाओगी ना सुखी रहोगी। अब से यही तुम्हारा परिवार है, मायके का मोहभंग करना सीखो वरना दो नाव पर पांव रखने से कहीं की नहीं रहोगी। अपनी घर गृहस्थी में मन लगाव।”
संगीता का मुंह खुला ही रह गया।वो सोचने लगी जिसकी खुद तीन – तीन बेटियां हैं वो ऐसी सोच रखती हैं और मां जी खुद भी तो एक औरत हैं।उनको जरा सा भी नहीं लगा की मैंने घर की सारी जिम्मेदारी उठाई है,सबका काम करती नहीं थकतीं हूं और मायके जाने को कहा तो इतना सुना दिया। चुपचाप कमरे से बाहर आई और अपने कमरे जाकर सोचने लगी कि कुछ ज्यादा ही सख्ती मेरे साथ किया जा रहा है। मैं कितना भी काम कर लूं ना तो वाहवाही है और ना ही कीमत। ऐसा तो बिल्कुल नहीं चलेगा।आज मैं रोहित से बात करूंगी आखिर वो मुझे व्याह कर लाएं तो ऐसे आंख बंद कर के निकल नहीं सकते और आज मैं अपनी पूरी बात रखूंगी और उनको मेरी बात भी सुननी पड़ेगी।
रात को खाना बनाने गई नहीं तो जूही कमरे में आई “भाभी देर हो रही है खाना कब बनाएंगी?”
” दीदी मेरा सिर बहुत दर्द हो रहा है कृपया आज एक दिन आप लोग मैनेज कर लीजिए और हां दीदी एक कप चाय बना दीजिएगा मेरे लिए भी पी कर थोड़ा आराम मिल जाएगा।”
संगीता ने कभी भी ऐसे नहीं कहा था तो जूही की समझ में नहीं आया की आज भाभी ने ऐसा क्यों कहा।
मां!” भाभी की तबीयत ठीक नहीं है तो वो आराम कर रहीं हैं और उन्होंने एक कप चाय मांगी है,सिर में बहुत दर्द है उनको।” जूही कहकर अपने कमरे में चली गई। सुशीला जी की हालत खराब सोच में पड़ गईं की अचानक से ऐसा भी क्या हो गया जो बिस्तर पर ही पड़ गई बहू? इतना काम अकेले ही करना पड़ेगा मुझे।चाय दे कर देखतीं हूं।एक कप चाय लेकर पहुंची कमरे में। संगीता,” क्या हो गया? चाय पी कर आराम मिल जाएगा तो आकर हल्का-फुल्का ही कुछ बना लेना।”
मां जी,” बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है। दीदी लोगों से कहिए कि कुछ बना लें आज और मैं थोड़ा आराम कर लूंगी तो सुबह से काम कर पाऊंगी।”
” दीदी लोग कुछ नहीं करेंगी, मुझे ही करना पड़ेगा” बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर निकल गई।
रात को रोहित जब आफिस से आया तो मां को रसोई घर में देखा। बर्तन पटके जा रहीं थीं और बड़बड़ा कर खाना बना रहीं थीं। मां!” क्या हुआ सब लोग कहां हैं? “
” संगीता की तबीयत ठीक नहीं है” सुशीला जी बोली ।
” और भी लोग तो हैं ना मां, जूही,रूही से काम क्यों नहीं करवातीं हो? संगीता के आने से पहले भी तो खाना खाते थे हम लोग ना।उसकी अकेली की जिम्मेदारी नहीं है ना। तुम्हारी बेटियां भी कल को किसी की बहू बनेंगी फिर क्या होगा इनका सोचा है कभी तुमने इसके बारे में” रोहित टीफिन रख कर कमरे में चला गया।
” क्या हुआ संगीता? तुमने बताया क्यों नहीं मुझे? चलो डाक्टर के पास चलते हैं” रोहित की फ़िक्र देख कर संगीता गले से लग कर रोने लगी और उसने पूरी बात बताई।
” चलो तैयार हो जाओ मैं ले चलता हूं मम्मी जी से मिलवाने ” रोहित बोला।
रोहित दिल का अच्छा था बस बड़ा होने के नाते कुछ बातें अनदेखी कर देता।उसे लगता की घर वाले ये ना सोचें की मां बाप को भूल कर बीवी के बस में हो गया।इतने दिनों में उसने संगीता को देखा था की उसने हर रिश्ते दिल से अपनाया था और कभी भी कोई शिकायत नहीं की थी।
संगीता जब तक तैयार हो रही थी रोहित ने जूही रूही को बुलाया और कहा तुम दोनों रसोईघर में जाओ और मां का हांथ बटाओ। बड़ी समझदारी से सबकुछ संभाल लिया था रोहित ने, नहीं तो आज कुछ बड़ा होने ही वाला था।उसे समझ में आ गया था की संगीता भी हमारा परिवार है अगर मैं सबकी भावनाओं की कद्र करता हूं तो संगीता के साथ अन्याय नहीं होने दे सकता।
अब संगीता भी खुश रहने लगी थी। सभी मिलकर काम निपटाते और उसे भी खुद के लिए और परिवार के लिए फुर्सत मिलने लगी थी।
रोहित ने मां को समझाया था कि,”सभी लोग मिलजुल कर रहोगे तो हम सभी खुश रहेंगे। जूही रूही को भी शादी करके जाना है कहो अपनी भाभी से कुछ सीखें वरना उनके ससुराल से ताने सुनने पड़ेंगे मां।”
सुशीला जी को समझ में आ गई थी सारी बातें। उनके मन में डर बैठ गया कि कहीं बेटा – बहू अलग ना हो जाएं और संगीता की बुराई रोहित से क्या ही करतीं क्योंकि वो सबकुछ अच्छी तरह से संभाल ली थी।
परिवार को बनाए रखने के लिए सभी की बराबर की अहमियत होनी चाहिए वरना पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा