लॉन में बैठी मालती देवी बुत बनकर यह पूरा नज़ारा देख रही थीं। उनके हाथों में पकड़ी हुई नीली रजाई अब उन्हें कांटों की तरह चुभने लगी थी। उनकी रईसी, उनका बड़ा घर, और उनके महँगे कपड़े—सब कुछ उस गरीब बंजारन के उस एक कृत्य के सामने बौने पड़ गए थे।
दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड का मौसम था। सुबह के दस बज चुके थे, लेकिन कोहरे की सफेद चादर ने पूरे शहर को अपने आगोश में ले रखा था। शहर के सबसे पॉश इलाके में बनी एक आलीशान कोठी के हरे-भरे लॉन में बैठकर मालती देवी अपनी केसरिया चाय की चुस्कियां ले रही थीं। मालती देवी के पति शहर के जाने-माने व्यापारी थे और उनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। हीटर की गर्माहट और पश्मीना शॉल में लिपटी मालती देवी को इस बात का बहुत गुरूर था कि उनके पास वह सब कुछ है, जो किसी भी आम इंसान का सपना हो सकता है।
तभी कोठी के भारी-भरकम लोहे के गेट के बाहर से एक देहाती और ठिठुरती हुई आवाज़ आई। “मेमसाब, हाथ की बुनी गर्म रज़ाइयाँ और गुदड़ी ले लो… बहुत ठंड है, सस्ते में दे दूँगी।”
मालती देवी ने अपनी नौकरानी को भेजकर उस औरत को अंदर बुलवा लिया। वह एक गरीब बंजारन थी, जिसका नाम रुकमा था। रुकमा के खुद के कपड़े कई जगह से फटे हुए थे और उसने ठंड से बचने के लिए अपने सिर और कानों को एक पुरानी सूती साड़ी से लपेटा हुआ था। उसके कंधे पर कई रंग-बिरंगी, हाथ से सिली हुई रज़ाइयों का एक भारी गट्ठर था।
रुकमा ने अपना गट्ठर लॉन की घास पर खोला। लाल, नीले और पीले धागों से की गई बारीक कढ़ाई देखकर मालती देवी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने एक गहरे नीले रंग की बेहद खूबसूरत और मोटी रजाई पसंद की।
“ये नीली वाली कितने की है?” मालती देवी ने अपने शॉल को कसते हुए पूछा।
“मेमसाब, ये सबसे अच्छी रुई और पक्के धागे से बनी है। पंद्रह दिन लगे हैं इसे सिलने में। आप एक हज़ार रुपये दे दीजिए,” रुकमा ने उम्मीद भरी नज़रों से कहा।
मालती देवी ने तुरंत मुँह बनाते हुए कहा, “एक हज़ार? पागल हो गई हो क्या? पुरानी कतरनों और चीथड़ों को जोड़कर ही तो बनाया है! इसके मैं चार सौ रुपये से ज्यादा एक धेला नहीं दूँगी।”
रुकमा के चेहरे पर बेबसी छा गई। “अरे नहीं मेमसाब! चार सौ में तो मेरी रुई और धागे का खर्च भी नहीं निकलेगा। मेरी छोटी बच्ची को बुखार है, उसे डॉक्टर को दिखाना है। आप आठ सौ दे दीजिए।”
“देखना है तो चार सौ में दे, वरना अपना गट्ठर बाँध और चलती बन। वैसे भी तुम्हारे जैसे लोग पैसे ऐंठने के बहाने ढूंढते हैं,” मालती देवी ने अपना आखिरी फैसला सुनाते हुए रजाई वापस उसकी तरफ फेंक दी।
रुकमा जानती थी कि आज सुबह से उसकी बोहनी तक नहीं हुई थी और बच्ची की दवा के लिए पैसे निहायत ज़रूरी थे। कुछ देर चुप रहने के बाद, एक गहरी सांस लेकर उसने हार मानते हुए कहा, “ठीक है मेमसाब, रख लीजिए।”
मालती देवी के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान छा गई। उन्होंने अपने बटुए से चार सौ रुपये निकालकर रुकमा की तरफ बढ़ा दिए। वह अपने इस बेहतरीन ‘सौदे’ पर मन ही मन खुद की पीठ थपथपा रही थीं कि उन्होंने अपनी मोल-भाव की कला से पूरे छह सौ रुपये बचा लिए थे।
रुकमा पैसे समेट ही रही थी कि तभी कोठी के गेट पर एक सत्तर-पचहत्तर साल का एक बेहद बूढ़ा और लाचार भिखारी आकर खड़ा हो गया। उसके शरीर पर कपड़ों के नाम पर सिर्फ एक फटी हुई धोती और एक जालीदार पतली सी कमीज़ थी। ठंड के मारे उसके हाथ-पैर बुरी तरह कांप रहे थे और उसके दाँत किटकिटा रहे थे।
“माई-बाप… बहुत ठंड लग रही है, रात से कुछ खाया नहीं है। कोई पुराना स्वेटर या खाने को दे दो… भगवान तुम्हारा भला करेगा,” बूढ़े ने कांपती और भर्राई हुई आवाज़ में गुहार लगाई।
मालती देवी की नज़र जैसे ही उस भिखारी पर पड़ी, उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं। उन्होंने अपनी नौकरानी से झुँझलाते हुए कहा, “सुबह-सुबह आ जाते हैं यहाँ गंदगी फैलाने! जा, कल रात की जो दो ठंडी रोटियां और सूखी सब्जी बची है, वो इसे दे दे। और कह दे कि कपड़े-वपड़े यहाँ कुछ नहीं हैं। ये लोग कपड़े लेकर दारू पी जाते हैं।”
नौकरानी ने जाकर वो बासी रोटियां बूढ़े के कांपते हाथों में रख दीं। मालती देवी ने उस बूढ़े की तरफ से मुँह फेर लिया और अपनी नई खरीदी हुई खूबसूरत रजाई पर हाथ फेरने लगीं।
रुकमा ने अपने गट्ठर को वापस बांधा और गेट की तरफ चल दी। जैसे ही वह गेट के पास पहुँची, उसके कदम उस कांपते हुए बूढ़े के पास आकर ठिठक गए। रुकमा ने देखा कि वह बूढ़ा ठंड से इतना सिकुड़ गया था कि उसके हाथों से वो ठंडी रोटियां भी नहीं पकड़ी जा रही थीं।
अचानक रुकमा ने अपना भारी गट्ठर जमीन पर रखा। उसने गट्ठर खोला और उसमें से अपनी सबसे मोटी, लाल रंग की एक बिल्कुल नई रजाई निकाली—वही रजाई जिसकी कीमत उसने मालती देवी को एक हज़ार रुपये बताई थी। रुकमा ने वह रजाई खोली और उस ठिठुरते हुए बूढ़े बाबा के कंधों पर बहुत ही प्यार से ओढ़ा दी।
रजाई की गर्माहट पाते ही बूढ़े की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने कांपते हाथों से रुकमा को ढेरों दुआएं दीं। रुकमा ने अपनी फटी हुई साड़ी के पल्लू से अपना माथा पोंछा, बूढ़े को देखकर एक सुकून भरी मुस्कान दी, और अपना बचा हुआ गट्ठर उठाकर कोहरे में आगे बढ़ गई।
लॉन में बैठी मालती देवी बुत बनकर यह पूरा नज़ारा देख रही थीं। उनके हाथों में पकड़ी हुई नीली रजाई अब उन्हें कांटों की तरह चुभने लगी थी। उनकी रईसी, उनका बड़ा घर, और उनके महँगे कपड़े—सब कुछ उस गरीब बंजारन के उस एक कृत्य के सामने बौने पड़ गए थे।
मालती देवी को बहुत अच्छी तरह समझ आ गया था कि रुकमा ने चार सौ रुपये में रजाई क्यों दे दी थी—क्योंकि उसकी मजबूरी थी। लेकिन उस मजबूरी के बावजूद, जब बात किसी दूसरे के दुख को कम करने की आई, तो रुकमा ने अपना सबसे कीमती सामान बिना किसी मोल-भाव के दान कर दिया।
मालती देवी का सिर शर्म से झुक गया। वह जान चुकी थीं कि जेब में पैसे होने से कोई अमीर नहीं होता। किसी को कुछ देने के लिए बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि एक बड़े और साफ़ दिल की ज़रूरत होती है। आज एक फटेहाल महिला ने शहर की सबसे अमीर औरत को बुरी तरह परास्त कर दिया था।
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