मनुष्य के जीवन में सुख-दुख का मेला लगा ही रहता है।नियति के खेल निराले हैं, उसमें कभी तो सुखों की बरसात होती है और कभी दर्द के काले बादल उसकी जिंदगी में अंधेरा कर जाते हैं । फिर अचानक से उसकी जिंदगी के आसमान में बिजली चमककर एक नया रास्ता भी दिखा देती है।
बारह वर्षीय अंश की हॅंसती -खेलती ज़िन्दगी को न जाने किसकी नज़र लग गई?वह स्वयं को संसार का सबसे भाग्यशाली बच्चा समझता था, अचानक से उसकी जिंदगी की सुख-शांति को ग्रहण लग गया और उसमें दर्द का सिलसिला शुरू हो गया। अचानक से कोरोना से माता-पिता की मौत के बाद मानो उसकी जिंदगी में जलजला आ गया। माता-पिता का निधन उसकी जिंदगी में सबसे बड़ा वज्राघात था, जिसने उसे जिंदगी भर का दर्द दे दिया।
कोरोना की लहर धीमी पड़ चुकी थी।बारह वर्षीय अंश को अकस्मात् अपने शिक्षक के साथ हाॅस्टल से अपने घर जयपुर आना पड़ा।घर आकर उसे पता चलता है कि कोरोना से ग्रसित उसके माता-पिता अस्पताल में भर्त्ती हैं।उसके अस्पताल पहुॅंचने से पहले ही उसकी माॅं दम तोड़ चुकी थी और उसके पिता की भी हालत खराब थी।
मासूम अंश बीमारी की भयावहता को समझ नहीं पाता है। कहाॅं तो वह हाॅस्टल से मन में माॅं के लिए ढ़ेरों शिकवे-शिकायत लेकर आया था और कहाॅं उसे सफेद पाॅलिथीन में लिपटा माॅं का निर्जीव शरीर देखने को मिला!वह इतना बड़ा तो अवश्य था कि मौत का मतलब समझ सके।दूर खड़ा वह समझ चुका था कि अब उसकी माॅं उठकर उसे कभी प्यार नहीं करेगी।
अंश शोक-संतप्त सा अपने शिक्षक का हाथ पकड़कर बैठा था।उसके शिक्षक उसे अपने शरीर से लगाए हुए सांत्वना दें रहे थे।उधर डॉक्टर सुमित अपने सहयोगियों के साथ अंश के पिता के जीवन की बुझती हुई लौ को जलाये रखने का प्रयास कर रहे थे, परन्तु उनका प्रयास निरर्थक हो जाता है।
अंश के पिता भी कोरोना के चक्रव्यूह से निकल नहीं पाते हैं। डॉक्टर सुमित और अपने शिक्षक की मदद से उसने अपने माता-पिता का दाह-संस्कार किया।अंश अपने शिक्षक के सीने से लगकर फूट-फूटकर रो उठा।उसकी मर्माहत चीख से मानो आस-पास के सभी लोगों का कलेजा फट पड़ा।
शिक्षक उसे सॅंभालते हुए कहते हैं -“बेटा! ज़िन्दगी में कभी लापरवाही मत करना। तुम्हारे माता-पिता कोरोना महामारी को खत्म समझकर लापरवाह हो गए।उनकी यही लापरवाही उनकी जिंदगी और तुम पर भारी पड़ गई!”
अंश कुछ न समझते हुए भी दर्द भरी नजरों से अपने शिक्षक की ओर देखने लगता है।
डॉक्टर सुमित अपने घर आकर अंश की हृदयविदारक चीख से द्रवित हो उठते हैं।वे अंश के पारिवारिक डॉक्टर थे।वह अपनी नम ऑंखों से खामोश से बैठे हैं। बार-बार अंश का दर्द भरा चेहरा उन्हें व्यथित कर जाता है। दो-चार दिनों के लिए तो अंश के शिक्षक उसे अपने पास रखने को राजी हो गए थे, परन्तु उसके बाद तो उन्हें ही अंश की जिम्मेदारी लेनी होगी, क्योंकि उसके माता-पिता ने उन पर भरोसा कर उन्हें ही उसका कानूनी अभिभावक बनाया था।अब इस विषय में पत्नी से बात करनी ही होगी।वह पत्नी के पार्लर से लौटने का इंतजार करने लगे।
शिक्षक अंश को अपने पास कमरे में ले आऍं।नियति उसे दर्द के महासागर में ढकेल चुकी थी।उसके जीवन की बगिया में वसंत खिलने से पहले ही पतझड़ बनकर आ चुका था। माता-पिता की असमय दर्दनाक मौत देखकर उसकी निस्तेज ऑंखें मानो पलक झपकाना ही भूल गईं हों। असमय अस्त हुए माता-पिता रूपी सूरज ने उसे अंधकार में ढकेल दिया है। शिक्षक उसे सॅंभालने की पूरी कोशिश करते हैं परन्तु उसके दर्द को महसूस कर वे भी भाव-विह्वल हो उठते हैं।
रह-रहकर माता-पिता की यादों से उसकी ऑंखें नम हो उठतीं हैं, जिन्हें वह चुपके से पोंछ लेता है। उसके जीवन में मरघट -सा सन्नाटा पसरा चुका है।उसके मन में सर्द खामोशी भर चुकी है।उसकी जिंदगी अनसुलझी पहेली बन गई है।शिक्षक चाहकर भी उसे सुलझाने का रास्ता नहीं निकाल पा रहें हैं।अंश इतना बड़ा भी नहीं है कि उसे जीवन-मृत्यु के बारे में समझाया जा सके।शिक्षक बस उसे अपने नर्म स्पर्श से उसे सॅंभालने की कोशिश करते हैं।
शाम के समय डॉक्टर सुमित की पत्नी शोभा पार्लर से आकर चाय लेकर पति के पास बैठ जाती है। डॉक्टर सुमित पत्नी से पूछते हैं -” अब तुम्हारा पार्लर कैसा चल रहा है?”
शोभा -“जैसे-जैसे कोरोना का प्रकोप कम हो रहा है, वैसे-वैसे अब कुछ लोग आने लगें हैं!”
डॉक्टर सुमित अब भूमिका न बाॅंधकर सीधे मुद्दे पर आकर पत्नी से कहते हैं -“शोभा! एक मासूम अनाथ बच्चा एक महीने के लिए हमारे घर पर रहेगा, फिर स्कूल खुलने पर अपने हाॅस्टल चला जाएगा!”
डॉक्टर सुमित की बातें सुनकर शोभा बिफरते हुए कहती हैं -“तुम अपनी परोपकार भावना से बाज नहीं आओगे। पिछली बार भी एक लड़के को लेकर आए थे,जो एक महीने के बदले छः महीने रहकर गया था।मुझसे यह सब नहीं हो पाएगा!”
डॉक्टर सुमित पत्नी की बातें चुपचाप सुनते रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी पत्नी देखने में जितनी सुंदर है,दिल की भी उतनी ही अच्छी है। विशेषकर वह उनकी भावनाओं का बहुत सम्मान करती है। शुरू में ज्यादा बोलेगी, फिर स्वभावतया मान भी जाएगी।
पति को खामोश देखकर शोभा पूछती है -“अच्छा!अब चुप भी मत रहो।बताओ कि वह मासूम अनाथ कौन है?”
डॉक्टर सुमित मुस्कराते हुए -“मुझे पता था कि तुम जरूर मान जाओगी।”
शोभा -“मैं मान नहीं गई,पर बताओ तो कौन है?”
डॉक्टर सुमित -” बच्चे के माता-पिता अपने ही शहर के थे। कोरोना में उनकी मौत हो गई।उनका बेटा दिल्ली में हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था।अब एकदम अकेला रह गया है।अभी वह अपने शिक्षक के साथ है।”
शोभा -“फिर उसे ले आओ, परन्तु उसे घर के पिछले हिस्से में रखूॅंगी।”
डॉक्टर सुमित -“कैसी बातें करती हो?अच्छे परिवार का बारह साल का बच्चा अकेले उधर कैसे रहेगा?”
शोभा -“ठीक है! परन्तु मेरे बेटे के कमरे में बिल्कुल नहीं रहेगा।उसके बगलवाले छोटे कमरे में रहेगा।”
डॉक्टर सुमित -“ठीक है!उसके शिक्षक को उसे कल यहाॅं लाने के लिए फोन कर देता हूॅं।”
डॉक्टर सुमित ने अपने आठ वर्षीय बेटे बबलू से कहा -“बेटा!कल घर में आपके एक बड़े भैया आएंगे।आप उनके साथ प्यार से रहना।”
बबलू ने कहा -“सचमुच पापा! मैं उनके साथ कभी झगड़ा नहीं करूॅंगा।सदा प्यार से रहूॅंगा।”
छुट्टियों में बबलू भी अकेले-अकेले टेलीविजन देखकर बोर हो चुका था।वह भी अंश के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगा।अगले दिन अपने शिक्षक के साथ डरा-सहमा हुआ अंश डॉक्टर सुमित के घर आ पहुॅंचा।
शोभा ने अपने पति से कहा -“सुमित!इसके सामान छोटे कमरे में रखवा दो!”
उसके पास सामान के नाम पर बस एक अटैची भर थी।
कुछ देर के बाद शोभा उनके लिए चाय -नाश्ता लेकर आती है।अंश के शिक्षक ने तारीफ करते हुए कहा -“मैडम!अंश बहुत समझदार बच्चा है।अभी बहुत दर्द से गुजर रहा है।आपसे हाथ जोड़कर गुजारिश है कि इस दुख भरे समय में अपने बच्चे -सा ख्याल रखेंगी।”
शोभा ने जब अंश की तरफ नजरें उठाकर देखी तो उसका मासूम उदास चेहरा अनायास ही उसके मर्मस्थल को बेंध गया।मातृ-पितृहीन बालक के लिए उसके अन्तर्मन में एक टीस-सी उठ गई।अंश की ऑंखों में नीले आसमान -सा सूनापन और नीली गहरी झील-सी खामोशी थी।
बबलू उत्साहित होकर अंश को कमरे में ले जाकर अपने खिलौने और कापी-किताबें दिखाने लगा। डॉक्टर सुमित और बबलू के प्यार और अपनेपन से अंश का दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा, परन्तु शोभा उससे दूरी बनाए रखने का प्रयास करती।बबलू तो अंश का साथ पाकर काफी खुश रहने लगा।हमेशा अंश भैया की रट लगाए रखता।बबलू जो हमेशा टेलीविजन देखने की वजह से डाॅंट सुनते रहता था।अब अंश के साथ पढ़ता और खेल-कूद करता।अंश बड़े भाई के समान कभी उसे कविता सुनाता कभी कोई कहानी।बबलू में आए इस बदलाव को शोभा बखूबी महसूस कर रही थी।एक दिन उसने पति से कहा -“अंश के आने से बबलू में बहुत से सकारात्मक बदलाव आने लगें हैं!”
डॉक्टर सुमित हॅंसते हुए -” बबलू ही क्यों? मैं तो उसके प्रति तुम्हारे लगाव को भी महसूस कर रहा हूॅं।माॅं-बेटा उससे इतना अधिक लगाव मत रखो, जिससे अंश के जाने के बाद तुम्हें दर्द महसूस हो”
शोभा -“ऐसा कुछ नहीं है।अंश के हाॅस्टल जाने तक ही उसके प्रति मेरी जिम्मेदारी है!”
अगले दिन शोभा बच्चों और सुमित को नाश्ता कराने के बाद पार्लर चली गई। अचानक से पार्लर में उसकी दोस्त नीरा फेशियल करवाने आ गई। बातों -ही-बातों में नीरा ने पूछा -” शोभा!तुम्हारा बेटा तो बड़ा हो गया होगा?”
शोभा -“हाॅं!आठ साल का हो गया है।”
नीरा -“क्या तुमने दूसरे बच्चे के बारे में भी सोचा है?”
शोभा ने उदास होते हुए कहा -“अब तुझसे क्या छुपाऊॅं?मुझे आरंभ से ही दो संतान की चाहत थी, परन्तु दो-तीन बार मिसकैरेज हो गया है।अब डॉक्टर ने दूसरे बच्चे का प्रयास करने को जान के लिए जोखिम बता दिया है!”
नीरा -“ओह!साॅरी,मुझे कुछ पता नहीं था।”
नीरा उसकी दुखती रग पर हाथ डालकर पार्लर से चली जाती है।उस दिन से शोभा के मन में कशमकश रहने लगा। ज्यों -ज्यों अंश के हाॅस्टल जाने का दिन नजदीक आ रहा था, त्यों-त्यों उसकी ऑंखों से नींद गायब होने लगी।वह अंश को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी।उसे समझ में नहीं आता है कि बबलू के साथ उसे खेलते-पढ़ते हुए देखकर उसके दिल को सुकुन क्यों मिलता है?उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर उसे आत्मसंतुष्टि क्यों मिलती है।अंश के साथ उसे पूर्व जन्म के रिश्ते का आभास क्यों होने लगता है?
बिस्तर पर लेटे-लेटे अंश को लेकर उसके मन में अंतर्द्वंद्व मचा हुआ है।वह बिस्तर से उठकर रसोई में पानी पीने जाती है।उसे अंश के कमरे से रोशनी आती दिखती है।वह जाकर देखती है कि जिस समय रात के अंधियारे में निद्रा रानी पूरे जग को अपने आगोश में समेटे लोरियाॅं सुना रही थी,उस समय अंश की ऑंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।वह अपने माता-पिता की फोटो लेकर पैरों में सिर झुकाए हिचकियाॅं लेकर धीरे-धीरे सुबक रहा था।शायद आनेवाली जिंदगी की चुभन उसे सूई की तरह बींध रहीं थीं।बिस्तर की सलवटें उसके दर्द को बयां कर रहीं थीं।मानो उसके चारों तरफ दर्द का महासागर गर्जना कर रहा था।
अंश को इस हालत में देखकर शोभा के मन का अंतर्द्वंद्व कोहरे की भाॅंति साफ हो चुका था।उसने आगे बढ़कर अंश को अपने आलिंगन में समेट लिया।उसने निर्णय ले लिया कि अंश अब हाॅस्टल न जाकर सदा के लिए उसी के पास रहेगा। हमेशा से उसे दो बच्चों की चाहत थी,जिसे ईश्वर ने उसके पास अंश के रुप में भेज दिया है। अंश के ऑंसू पोंछकर उसे बबलू के कमरे में ले जाकर थपकियाॅं देकर सुला देती है।
अगली सुबह शोभा की नींद कुछ देर से खुलती हैं।सुबह के उजास में वह अंश को बबलू का हाथ थामे बगीचे में देखती है।अब उसके निर्णय में उमड़ते बादलों -सा कंपन नहीं था, बल्कि हवाओं की ठंढ़क-सा ठहराव था।एक दृढ़ निर्णय उसने ले लिया ।
उसने अपने पति से कहा -“अंश अब हाॅस्टल न जाकर हमारे पास ही रहेगा।हम उसे कानूनन गोद ले लेंगे। हमें दूसरा बच्चा और बबलू को बड़ा भाई भी मिल जाएगा।”
डॉक्टर सुमित की तो मानो मुराद ही पूरी हो गई।वह अंश के माता-पिता के प्रति भी वचनबद्ध थे। उन्होंने आसमान में ईश्वर की तरफ देखा और धीरे-धीरे उनके चेहरे पर सुकून फैलने लगा। उन्होंने पत्नी से कहा -“शोभा!आज तक मैंने तुम्हारी कोई बात काटी है,जो काटूॅंगा।तुमने आज एक अनाथ बच्चे को अपनी ममता की छाॅंव देकर मुस्कराहटों से भर दिया है!”
बबलू खुश होकर अंश के साथ नाचने लगता है।
अंश की ठहरी हुई जिंदगी में मानो रवानी आ गई। दर्द को पीछे ढकेलकर उसकी जिंदगी में आशाओं के दीप टिमटिमा उठे।
समाप्त। लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)