आखिरी फोन कॉल – लतिका श्रीवास्तव

पैर पत्थर से टकराया और दर्द की एक तीखी लहर रमिया के शरीर में दौड़ गई। वह लड़खड़ाकर सड़क किनारे बैठ गई। घुटने से रिसते खून को देखकर उसने अनायास ही एक फीकी मुस्कान भर दी।

“इतना दर्द तो नहीं था…” उसने मन ही मन सोचा।

दर्द की असली परिभाषा तो उसे उस आखिरी फोन कॉल के बाद समझ आई थी जो उसकी बेटी सीमा ने किया था।

कहते हैं समय हर घाव भर देता है, पर कुछ घाव ऐसे होते हैं जो भरते नहीं, बस इंसान उनके साथ जीना सीख जाता है। सीमा की मृत्यु ऐसा ही एक घाव थी। दहेज की आग ने केवल उसकी बेटी को नहीं छीना था, उसने रमिया की हँसी, उसकी नींद और उसके भीतर का एक हिस्सा भी राख कर दिया था।

आज घुटने की चोट से निकला खून देखकर उसे वह दिन याद आ गया, जब उसकी आँखों से निकले आँसू सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। फर्क बस इतना था कि यह घाव कुछ दिनों में भर जाएगा, लेकिन उस दिन जो घाव मिला था, वह उसकी आखिरी साँस तक उसके साथ रहने वाला था…!!

टीस उठती थी रमिया के कलेजे में जब बेटी का आखिरी फोन कॉल याद आता था जो उसने मरने के एक दिन पहले चोरी से किया था।सीमा को तो फोन उपयोग प्रतिबंधित हो गया था ससुराल में।बेटी की वह आखिरी बातचीत की गूंज उसके कानों में ही नहीं दिल दिमाग में अब तक थी…

”  हेलो….अम्मा तू कैसी है। मैं ठीक हूं कोई चिंता ना करना।मेरी सासू मां तुझे जो कह रहीं थीं कल उस पर ध्यान ना देना।उनकी तो आदत है ।तू बस अपना ख्याल रखना कितनी मुसीबत उठाई तूने मेरी परवरिश में अभी तक ये वह कैसे समझेंगी।बापू के जाने के बाद कितने ताने उलाहने झेले फिर भी सारी दुनिया से लड़ गई मुझे पढ़ाया लिखाया

सारे नखरे उठाए और खुद रात दिन दूसरों के घर खाना पकाने जाती रही। तूने मेरा ब्याह कितने धूम धाम से कर दिया कि ताने देने वालों ने भी बड़ाई की और आकर असीस दी मुझे।सच में अम्मा तू कितनी अच्छी है। मैं ठीक हूं बस थोड़ी परेशानी है मेरे पति को कारोबार के लिए ज्यादा रुपए चाहिए उसका प्रबंध नहीं हो पा रहा है।

कह रहे थे अम्मा को बताओ।पर मैंने कहा अम्मा को क्यों बताए!! शादी के बाद ये तो अब हमारी तुम्हारी समस्या है मिलकर सुलझा लेंगे।बेकार में अम्मा परेशान होंगी। मैं सब ठीक कर लूंगी तू चिंता मत करना अम्मा आखिर तेरी बेटी हूं हंसते हुए उसने कहा था और रमिया ने अनजान बनते हुए उसकी बातों में छिपे दर्द को झुठलाते हुए उसकी बातों पर भरोसा कर लिया था।

और वह करती भी क्या!!

बिटिया की शादी करने के बाद से उसकी इज्जत सब जगह बढ़ गई थी सब जगह उसकी प्रशंसा होने लगी थी।इतने अच्छे घर में इतने शान से ब्याह जो किया था उसने।सारे दिल के अरमान पूरे कर लिए थे।बेटी जिसे उसने जनम से तिल तिल पाला था बलैया ली थीं

ना जाने कितनी बार नजर उतारी थी काजल का टीका लगा उसकी सारी बलाएं अपने सिर ले ली थीं उसके ब्याह के बाद वह निश्चिंत हो गई थी।सीमा की इच्छा नौकरी करने की थी

लेकिन रमिया उसकी शादी करके जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थी समाज को दिखाना चाहती थी कि अकेले होकर भी उसने मां के साथ पिता का दायित्व भी बखूबी निभाया किसी भी कर्तव्य निर्वहन में पीछे नहीं रही।इसीलिए सीमा की इच्छा ना होते हुए भी उसका ब्याह कर वह चिंता मुक्त हो गई थी।

उस दिन सीमा की बातों से रमिया के मन में उसके ससुराल के प्रति चिंता उठी थी कहीं वे लोग मेरी बेटी को परेशान तो नहीं कर रहे हैं रुपए की मांग तो नहीं कर रहे हैं?? लेकिन अब उसके पास बेटी को देने के लिए कुछ था ही नहीं।अगर वह भूले से मांग बैठती तो रमिया क्या करती?

और रमिया यह भी नहीं चाहती थी कि इसी बात को मुद्दा बना कर उसकी बेटी मायके आ जाए आशंकित थी वह कहीं सास नाराज़ होकर वापस ही ना ले जाएं फिर वह समाज को क्या मुंह दिखाएगी.. इन्हीं दुश्चिंताओं के कारण वह सीमा से खुल कर बात भी नहीं कर पाती थी

और ना ही उसकी ससुराल जाने की हिम्मत! उसे भरोसा था मेरी बेटी सबको खुश कर लेगी सब ठीक कर लेगी वह है ही इतनी अच्छी!

दूसरे ही दिन वज्रपात हुआ था जब आग में जलकर सीमा के मरने की दर्दनाक खबर सुन वह उसके ससुराल पहुंची थी।

“….पूजा करते समय दिया बाती से आग साड़ी में लग गई घर में कोई नहीं था उस समय ….. आग इतनी बढ़ी कि वह झुलस गई जब तक हम आते और हॉस्पिटल ले गए उसने दम तोड़ दिया….. दामाद जी की यही संक्षिप्त सफाई थी।ससुराल वालों ने पूरा मामला दबा दिया था।बेबस रमिया ….

भीतर के सुलगते शोलो को उसने भीतर ही दबा दिया था।अब क्रोध का क्या औचित्य जब बेटी ही चली गई और फरियाद भी किससे करती।कसूरवार खुद को माना था उसने चुपचाप अपनी बेटी की चिता को अग्नि देते उन हाथों को देखती रही जिनके हाथों में बेटी का हाथ सौंप वह चिंतामुक्त हुई थी आज राख हो चुकी थी।

तब से आज तक भीतर का दर्द मानो नासूर बन लहकता रहता था। आठों पहर चैन ना लेने देता।वह आखिरी फोन कॉल बिटिया का आखिरी संदेश बन उसकी आत्मा में समा गया था जो उसकी नस नस को बेचैन कर देता था। रातों को अक्सर वह उठ कर बैठ जाती इधर उधर अपनी बेटी को ढूंढती..

” मै आ रही हूं तुझे बचा लूंगी बेटी और अक्सर स्वप्न में वह सीमा को आग की लपटों में झुलसता हुआ देख तड़प कर उठ जाती।मृत्यु ही आखिरी समाधान है इस दर्द का इस असहनीय व्यथा का रमिया ईश्वर से दुआ करती मौत दे दो मुझे।

लेकिन शायद ईश्वर ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था।

एक दिन गाँव की चौपाल में महिलाओं की सभा लगी थी।रमिया भी एक किनारे बैठी थी।तभी वहाँ एक लड़की रोते हुए अपनी माँ के साथ आई। उसकी शादी तय हुई थी और लड़के वालों ने आखिरी समय पर मोटी रकम की माँग रख दी थी। माँ-बेटी दोनों असहाय थीं। मां उपस्थित सभी महिलाओं से चंदा एकत्र कर बेटी की शादी करवाने की करुण याचना कर रही थी अगर रकम इकट्ठी ना हुई तो यह रिश्ता टूट जाएगा तो शादी कभी ना हो पाएगी विनती कर रही थी।

न जाने क्यों, उस दिन रमिया के भीतर दबा हुआ दर्द और क्षोभ का ज्वालामुखी फूट पड़ा उसे उस रोती हुई लड़की में अपनी बेटी सीमा नजर आने लगी।

“शादी टूट जाए तो टूट जाए,रिश्ता छूट जाए तो छूट जाए लेकिन बेटी को उन लोगों के घर मत भेजना,” उसने दृढ़ स्वर में कहा।

लोग आश्चर्य से उसे देखने लगे। पहली बार रमिया ने अपनी सीमा की कहानी का सच सबके सामने रखा। आज उसे कोई डर नहीं था समाज क्या कहेगा … आज वह इस बेटी को बचाने को कृतसंकल्पित हो उठी थी।उसके शब्दों में आँसू थे, दर्द था, पश्चाताप था और एक माँ की वह चेतावनी थी जिसे सुनकर चौपाल में सन्नाटा छा गया।

सुनो बहन ,तुम अपनी बेटी को और पढ़ाओ काबिल बनाओ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाओ अपने भरण पोषण के लिए किसी पर आश्रित ना रहे उसके बाद ही इसको ब्याहने की सोचना हड़क कर बोल उठी वह।

उस दिन के बाद से रमिया बदलने लगी।जैसे उसने अपने दर्द की दवा खोज ली थी।जीवन जीने का उद्देश्य मिल गया था

वह गाँव की बेटियों से मिलने लगी। उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित करती, उनके माता-पिता को समझाती कि बेटी की शादी से पहले उसका आत्मनिर्भर होना ज़रूरी है। जहाँ कहीं दहेज की बात सुनती, सबसे पहले विरोध में खड़ी हो जाती।हर घर में जाकर बहू के साथ मधुर व्यवहार करने की उसका ख्याल रखने की अलख जगाती।

धीरे-धीरे लोग उसे “सीमा की अम्मा” नहीं, बल्कि “गाँव की अम्मा” कहने लगे।एक दिन किसी ने रमिया से पूछा था अम्मा तुमने सीमा के ससुराल वालों की थाने में रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की? अपनी बेटी की मौत का बदला क्यों नहीं लिया !वे सजा भुगतते तभी तो तेरा बदला पूरा होता और ऐसी घटनाओं को विराम मिलता और सीमा की आत्मा को शांति मिलती!!

पुलिस थाना जेल सजाएं नाकाम हैं ऐसी घटनाओं को रोकने में।असली बदला और बदलाव तभी होगा जब हमारी बेटियां पढ़े लिखें आर्थिक स्वतंत्र बनें ।मेरी बेटी की मृत्यु का बदला पूरा हो रहा है हर उस बेटी के साथ जो अन्याय से जूझना सीख रही है हर उस पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर बेटी के साथ जो स्वाभिमान से जीना सीख रही है

हर उस बेटी के साथ जो सीमा की तरह असहाय निरीह नहीं बल्कि अपने हक के लिए शेरनी की तरह गर्जना कर रही हैं….. वो देखो मेरी बेटी सीमा अब मुझसे मुस्कुरा कर मिलती है अब कोई सीमा अग्नि में झुलस कर प्राण नहीं त्यागेगी बल्कि उसे जलाने वाले हाथों को ही भस्म कर देगी…

बस यही असली बदला है ।वो आखिरी कॉल नहीं था बल्कि चेतावनी थी आवाहन था अन्याय के विरुद्ध शुरुआत थी जो अपनी माँ के दिल में उतरकर सैकड़ों बेटियों की आवाज़ बन गई। सीमा तो चली गई, पर उसकी आवाज़ आज भी हर उस घर में गूंजती है जहाँ बेटियों को बोझ समझा जाता है। उस दिन एक बेटी की साँसें थम गई थीं, लेकिन उसी दिन एक माँ का नया जन्म हुआ था। अब रमिया जी नहीं रही थी, वह हर बेटी के अधिकार की लड़ाई बन चुकी थी।”

घुटने के घाव से रिसता खून अब थम चुका था।

रमिया धीरे से उठी, अपनी साड़ी का पल्लू झाड़ा और आगे बढ़ गई।

दर्द अभी भी था, लेकिन अब वह उसे तोड़ता नहीं था।

वही दर्द अब उसकी ताकत बन चुका था।

क्योंकि उसने जान लिया था कि कुछ घाव भरने के लिए नहीं होते ।

लतिका श्रीवास्तव  ✍️

दर्द# कहानी प्रतियोगिता 

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